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भारतीय संस्कृति

क्या है मन , बुद्धि ,अंतः करण, तेज ,स्मृति आदि

योगी जन किस प्रकार अपने मूल आधार से ब्रह्मरंध्र तक रमण करते हुए यौगिकता को प्राप्त होते हैं ?
ईश्वर ने उनको दो प्रकार के प्राण दिए हैं । एक सामान्य प्राण ,दूसरा विशेष प्राण।
सामान्य प्राण कौन सा है ?
सामान्य प्राण वह है जो संसार को चला रहा है , लोक लोकान्तरों में रमण कर रहा है अर्थात सूर्य मंडल में, वायुमंडल में ,जल मंडल में, अंतरिक्ष मंडल में, सब में ओत प्रोत हो रहा है।
मानव को अपने प्राणों के बारे में विचार करना चाहिए यह हमारा प्राण बहुत ही महत्वपूर्ण है और यह प्राण ही संचालक है । यह प्राण ही हमको कहां कहां तक पहुंचा देता है , यह सारे संसार को चला रहा है। जितने भी चराचर प्राणी हैं , प्राण धारी हैं , सबको चला रहा है। यह भी स्मृति में रहना चाहिए कि प्राणों की संख्या पांच प्रकार की होती है। पान ,अपान ,व्यान, उदान, समान।

यथार्थ के बोलने से वाणी में ओज व तेज आ जाता है। वाणी से हमेशा यथार्थ एवं सत्य ही बोला जाए तो जो बोलोगे वह सत्य ही हो जाएगा। इसलिए वाणी से मिथ्या उच्चारण नहीं करना चाहिए ।वाणी ही वह पदार्थ है जो परमात्मा से मिला देती है। संसार रूपी सागर से पार कर देती है। इसलिए वाणी की उपासना अवश्य करो। वाणी से यथार्थ उच्चारण करना चाहिए।
परंतु वाणी से बढ़कर मन है , जो वाणी से ऊंचा होता है और वायु से भी तेज गति से चलता है ।लोक लोकान्तरों की सैर करा देता है ।इसलिए मन को स्थिर करना सर्वथा उचित होता है। सूक्ष्म तन्मात्राओं से यह संसार रचा हुआ है। तन्मात्राओं ने संसार में जो देखा वे सभी प्रकृति के पदार्थ हैं और तन्मात्राओं ने इसको मन तक पहुंचा दिया । अब यह मन के ऊपर निर्भर करता है कि यदि वह स्थिर है तो निर्णय अच्छा करेगा ,और यदि मन चंचल है तो इसकी गति विलक्षण हो जाएगी और मनुष्य की मृत्यु का सामान बनाने लगेगा।
यदि मन को संसार के शुभ कार्यों में और परमात्मा के चिंतन में लगाए रखते हैं तो तब तक यह यथार्थ रहता है और जब इसको छुटकारा मिला ,संकल्प विकल्प आए मनुष्य की मृत्यु को सामान करने लगता है।
इस प्रकार इस संसार में मन से बढ़कर कोई पदार्थ नहीं है।
लेकिन मन से भी बढ़कर बुद्धि है। बुद्धि, मेधा, ऋतंभरा और प्रज्ञा इन चार प्रकार की बुद्धियों का विवरण महापुरुषों द्वारा किया गया है।
बुद्धि हमारे जीवन की संचालक है । हमें बुद्धि से कार्य करना चाहिए । मेधा ऋतंभरा और प्रज्ञा तीनों प्रकार की बुद्धि की आजादी के पश्चात यह आत्मा परमात्मा में भ्रमण करता है और मोक्ष को प्राप्त हो जाता है।
लेकिन बुद्धि से भी श्रेष्ठ है – अंतःकरण।
इसलिए अंतःकरण को पवित्र बनाना चाहिए । अंतः करण के पवित्र बनाने से जीवन सर्वोच्च , सर्वोत्कृष्ट एवं शिरोमणि हो जाया करता है ।अंतःकरण वह पदार्थ है , जिसमें बड़े बड़े लोक लोकान्तर हैं ।जैसे हमारा पृथ्वी मंडल है ,ऐसी – ऐसी तीस लाख पृथ्वियों इस सूर्य मंडल में समा जाती हैं और जैसा सूर्यमंडल है ऐसे ऐसे 1000 मंडल बृहस्पति मंडल में समा जाते हैं ।परंतु यह सूक्ष्म सा अंतःकरण है , इसमें यह सब लोक लोकान्तर समा जाया करते हैं। ब्रह्मांड का निर्माण जो परमात्मा का रचा हुआ है इस अंतःकरण में समा जाता है। यह अंतरण इतना पवित्र है , इतना विशाल है। इसलिए इसको इतना ऊंचा बनाओ और बुद्धियों को अंतःकरण में रमण करने दो। जब बुद्धि रमण करने लगेगी तो हमारा अंतःकरण शुद्ध एवं पवित्र हो जाएगा।
लेकिन अंतः करण से बढ़कर स्मृतियां हैं , क्योंकि जन्म जन्मांतरों के संस्कार हमारे अंतःकरण में विराजमान रहते हैं और उनके जागृत होने का नाम स्मृति है।
स्मृति से भी उच्च स्थान ब्रह्मचर्य का है। ब्रह्मचारी मनुष्य संसार में ऊंचा कहा जाता है, तेजस्वी कहा जाता है, आदित्य कहा जाता है , मृत्युंजय नाम से भी पुकारा जाता है ,उसको रूद्र भी कहते हैं, इसलिए ब्रह्मचर्य की रक्षा करनी चाहिए। ब्रह्मचर्य से मनुष्य मृत्यु को विजय प्राप्त कर लेता है ।इसलिए ब्रह्मचारी बनना चाहिए ।ब्रह्मचर्य से लंबी आयु वाले होकर मोक्ष को प्राप्त करते हैं।
ब्रह्मचर्य से ही मनुष्य समुद्रों को पान कर लेता है। उदाहरण के तौर पर अगस्तय मुनि ने तीन आचमनों में समुद्र को पान कर लिया था।
मूर्खों के लिए यह सिर्फ इतना है कि जो समुद्र हम पृथ्वी पर देखते हैं उनको पान कर लिया हो। लेकिन यह अवधारणा गलत है।
ज्ञान ,कर्म और उपासना तीन प्रकार की विद्याएं हैं। जो संसार रूपी समुद्र हैं ।इन तीन प्रकार की विद्याओं का पान करना इस संसार रूपी समुद्र को पान कर लेना है। इस संसार को खारी बनाकर अर्थात जो खाने के पीने के योग्य न हो , ऐसा बनाकर त्याग देना चाहिए , एक जिज्ञासु को। इसलिए महर्षि अगस्त्य ऋषि ने तीनों प्रकार की विद्याओं को धारण करके इस संसार रूपी समुद्र को पानकर के पार किया था।
यह है वास्तविकता इसके पीछे ।
ब्रह्मचर्य से भी उच्च है अन्न।
उनके लिए वनस्पतियों की याचना करो , क्योंकि यही अन्न हमको ओज और ब्रह्मचर्य देता है।
उनसे भी उच्च स्थान पृथ्वी का है। क्योंकि पृथ्वी हमारी माता है । हमारी दो प्रकार की माता होती है। एक जननी माता और एक पृथ्वी माता। पृथ्वी से ही हमारा लालन-पालन होता है ।पृथ्वी कल्याणकारी है ।पृथ्वी को ही धेनु भी कहा जाता है। इसको नाना प्रकार से पुकारा गया है।
जिस प्रकार की हम कल्पना करते हैं वह पृथ्वी के अंदर बीज होते हैं , उसी प्रकार की इच्छा के अनुकूल यह हमको वनस्पति और फल दे देती है।
पृथ्वी से भी उच्च स्थान तेज का है। तेज पूरे संसार में उत्पन्न हो रहा है और संसार को चला रहा है । तेज ही जब् वृष्टि करता है तो पृथ्वी से सब तत्व उत्पन्न हो जाते हैं । इसलिए पृथ्वी से अधिक उच्च स्थान तेज का है। तेज के कारण ही समुद्रों का जल बादलों में पहुंचता है और बादलों में वृद्धि होती है । उस वर्षा से नाना प्रकार की वनस्पति उत्पन्न होती हैं। जिनको मनुष्य खाता है और उससे ही ब्रह्मचर्य आता है ।ब्रह्मचर्य सुरक्षित होता है तो स्मृति ऊंची होती है। स्मृति ऊंची होती है तो अंतःकरण पवित्र होता है। जब अंतःकरण पवित्र होता है तो बुद्धि पवित्र होती है। और जब बुद्धि पवित्र होती है तो यह मन पवित्र होता है। जब मन पवित्र होता है तो यह वाणी पवित्र होती है और जब वाणी पवित्र होती है तो हम संसार की सारी जानकारी अच्छी प्रकार से प्राप्त कर लेते हैं।
परंतु तेज से बढ़कर अंतरिक्ष होता है । क्योंकि जो शब्द हम आज बोल रहे हैं वह अंतरिक्ष में रमण कर जाते हैं और अंतरिक्ष से यह शब्द हमारी बुद्धियों के अनुकूल मेधा ,बुद्धि उत्पन्न करते हैं। यह मेधा बुद्धि अंतरिक्ष से संबंधित होती है। वही अंतरिक्ष हमारी बुद्धियों का प्रेरक है। यह अंतरिक्ष ही हमारे जीवन का प्रेरक है। अंतरिक्ष ही हमारी आयु का प्रेरक है।
अंतरिक्ष ही अग्नि का प्रेरक है अर्थात अंतरिक्ष ही प्रत्येक प्रकार की प्रेरणा करने वाला है।
अंतरिक्ष से बढ़कर अंबर है।
अंबर में सभी लोक लोकान्तर भ्रमण करते हैं । जैसे सूर्य मंडल ,चंद्र मंडल, सप्त ऋषि मंडल , भू: भुव: मह: जन:तप:और सत्यम यह लोक लोकान्तर हैं। आरुणि मंडल है, अगस्त्य मंडल है, अचंगआदि लोक लोकांतर हैं।
अंबर से बढ़कर प्राण है।
जो प्राण सारे संसार में ओत प्रोत हो रहा है ।सब का कल्याण कर रहा है। यह प्राण आत्मा का सहायक है। यह प्राण शून्य प्रकृति को चलाने वाला है और इस प्राण से भी महान है परमात्मा ,जो इस प्राण को देने वाला है तो प्राण का इतना महत्व है हमारे ब्रह्मांड में व शरीर में।
प्राण वास्तव में सुधार पवित्र है। ऐसा प्राण हमारे लिए कल्याणकारी होता है। हमको सोमपान कराता है। अमृत पान कराता है ।हमारे जीवन को उच्च और कल्याणकारी बनाता है।
इसके लिए यजुर्वेद के 39 वे अध्याय में अंत्येष्टि कर्म का विवरण दिया है । जिसको अंत्येष्टि कर्म , नरमेध, पुरुषमेध और दाह कर्म संस्कार भी कहते हैं,को उद्धृत करना आवश्यक समझेंगे। जिसका
भावार्थ है कि जब कोई मनुष्य मरे तब शरीर की बराबर तो उड़गई लेकर उसमें प्रत्येक शेर में एक रत्ती कस्तूरी , एक मासा केसर और चंदन आदि कास्त्रो को यथा योग्य संभाल के जितने और धनु पुरुष हो उतनी लंबी 3:30 हाथ चौड़ी और इतनी ही गहरी एक नीचे तले में वेदी बनाकर उसमें नीचे से ऊपर तक समिधा भरकर उस पर मुर्दे को धरकर फिर मुर्दे के इधर-उधर और ऊपर से अच्छी प्रकार समिधा चुनकर वक्ष स्थल आदि में कपूर धरें , कपूर से अग्नि को जलाकर चिता में प्रवेश कर , जब अग्नि जलने लगे तब इस अध्याय के स्वाहान्त मंत्रों की बार-बार आवृत्ति श्री का होम कर मुर्दे को सम्मत जलाएं ।
इस प्रकार मुर्दे का दाह संस्कार करना ही वेद संगत है। मुर्दे को कभी भी खुले में न छोड़ा जाए , क्योंकि ऐसा करने से असंख्य रोगों की उत्पत्ति होती है। जिससे अन्य लोग प्रभावित होते हैं।

देवेंद्र सिंह आर्य
चेयरमैन : उगता भारत

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