Categories
भारतीय संस्कृति

संतान के जीवन में माता-पिता का विशिष्ट और महत्वपूर्ण स्थान

ओ३म्=============
मनुष्य के जीवन में पिता का महत्व निर्विवाद है। माता व पिता ही सब मनुष्यों के जन्मदाता होते हैं। पूर्वजन्म में मृतक आत्मा को मनुष्य योनि में जन्म युवा माता-पिताओं के द्वारा ही मिलता है। यह नियम परमात्मा ने बनाया है। यदि यह नियम न हो तो सृष्टिक्रम चल नहीं सकता। मनुष्य एक शिशु के रूप में जन्म लेता है, माता-पिता मिलकर उसका पालन-पोषण करते हैं व उसे उत्तम संस्कार देते हैं। उसका विवाह आदि भी सम्पन्न कराते हैं। वृद्धावस्था को प्राप्त होकर माता-पिता की मृत्यु हो जाती है। सभी माता-पिता अपनी-अपनी सन्तान के प्रति एक विशेष मोह पितृत्व व मातृत्व के बन्धन से बंधे हुए होते हैं। उनकी सन्तान कुरुप हो या स्वरूप, स्वस्थ हो या रोगी, आज्ञाकारी हो अथवा अवज्ञाकारी, कैसी भी क्यों न हो, माता-पिता का आशीर्वाद एवं शुभकामनायें अपनी सभी सन्तान पर सदैव समान रूप से होती हैं। यहां तक की माता-पिता जीवन भर अपनी जो पूंजी संचित करते हैं, उसका भी वह अकेले उपभोग नहीं करते अपितु अधिकांश उपभोग उनकी सन्तानें ही करती हैं। महाराज दशरथ का ऐतिहासिक प्रसंग सबने सुन रखा है। उनके पुत्र को 14 वर्ष के लिए वन जाना पड़ा था। इस क्लेश से व्यथित होकर उन्होंने कुछ ही दिनों में अपने प्राण त्याग दिये थे। आज ऐसे कुछ उदाहरण मिल जाते हैं जहां एक माता अपनी सन्तान की रक्षा के लिये अपने प्राण दे देती है। पिता एक ऐसा व्यक्ति होता है जो अपने पुत्र की शिक्षा में उन्नति, उसके द्वारा धन प्राप्ति तथा यश प्राप्ति आदि के कार्यों में सर्वाधिक प्रसन्न होता है। पिता के इन्हीं गुणों के कारण पिता को देवता कहा जाता है। देवता वह होता है जो देता है, लेता नहीं है। वायु हमें प्राण वायु देती है इसलिये देवता कहलाती है। जल हमारी पिपासा शान्त करने सहित अनेक प्रकार से उपयोगी होता है, इसलिये जल भी देवता होता है। इसी प्रकार पृथिवी, अग्नि, आकाश, माता, पिता, आचार्य, राजा, विद्वान अतिथि आदि भी हमें कुछ न कुछ देने से देवता कहे जाते हैं। हमें इन सबके प्रति कृतज्ञता व सम्मान का सद्भाव रखना चाहिये। ऐसा करने से हमारे जीवन में निरभिमानता का गुण उत्पन्न होता है। पाश्चात्य व कुछ अन्य जीवन पद्धतियों में यह भावना कुछ कम देखी जाती है। पाश्चात्य संस्कृति को भोगवादी और भारतीय वैदिक संस्कृति को त्याग व श्रेय प्रदान करने वाली संस्कृति कहा जाता है और वस्तुतः कई दृष्टि से यह उचित प्रतीत होता है।

पिता को पिता अपनी सन्तानों की रक्षा करने के कारण कहा जाता है। महर्षि यास्क के अनुसार सन्तानों का पालक, पोषक तथा रक्षक होने से जन्म देने वाले देवता को पिता कहा जाता है। महर्षि मनु ने कहा है कि दस उपाध्यायों से बढ़कर आचार्य, सौ आचार्यों से बढ़कर पिता और एक हजार पिताओं से बढ़कर माता गौरव में अधिक है अर्थात् बड़ी है। मनुस्मृति में कहा गया है ‘‘पिता मूर्तिः प्रजापते” अर्थात् पिता पालन करने से प्रजापति का मूर्तिरूप है। प्रजापति परमात्मा को कहते हैं। इस प्रकार महाराज मनु पिता को प्रजापति कह कर बहुत ऊंचा स्थान देते हैं। महाभारत के वनपर्व में यक्ष व युधिष्ठिर संवाद में यक्ष युधिष्ठिर से पूछते हैं ‘पृथिवी से भारी क्या है? आकाश से ऊंचा क्या है? वायु से भी तीव्र चलने वाला क्या है? और तृणों से भी असंख्य अर्थात असीम व विस्तृत एवं अनन्त क्या है? इसका उत्तर देते हुए युधिष्ठिर कहते हैं ‘माता गुरुतरा भूमेः पिता चोच्चतरं च खात्। मनः शीघ्रतरं वातच्चिन्ता बहुतरी तृणात्।।’ इसका अर्थ है कि माता पृथिवी से भारी है। पिता आकाश से भी ऊंचा है। मन वायु से भी अधिक तीव्रगामी है। चिन्ता तिनकों से भी अधिक विस्तृत एवं अनन्त है। यहां पिता को आकाश से भी ऊंचा बता कर पिता का गौरव गान किया गया है।पिता के विषय में महाभारतकार कहते हैं कि पिता ही धर्म है, पिता ही स्वर्ग है और पिता ही सबसे श्रेष्ठ तपस्या हैं। पिता के प्रसन्न हो जाने पर सारे देवता प्रसन्न हो जाते हैं। पद्मपुराण में माता व पिता दोनों के गौरव का उल्लेख कर कहा गया है कि माता सर्वतीर्थमयी (सारे तीर्थ माता में हैं) है और पिता सम्पूर्ण देवताओं का स्वरूप है (पिता में सारे देवता विद्यमान हैं)। अतएव प्रयत्नपूर्वक सब प्रकार से माता-पिता का आदर-सत्कार करना चाहिए। जो माता-पिता की प्रदशिणा करता है, उसके द्वारा सात द्वीपों से युक्त सम्पूर्ण पृथिवी की परिक्रमा हो जाती है। माता-पिता को प्रणाम करते समय जिसके हाथ, घुटने और मस्तक पृथिवी पर टिकते हैं, वह अक्षय स्वर्ग को प्राप्त होता है।अथर्ववेद में बताया गया है कि जो जन्म देता है, जो भय से बचाता है और जो जीविका देता है- ये तीनों पितर वा पिता कहलाते हैं। चाणक्य नीति में भी पिता की महिमा का गान सुनने को मिलता है। वहां कहा गया है कि जन्म देने वाला, यज्ञोपवीत आदि संस्कार करानेवाला, विद्या देनेवाला, अन्न देनेवाला तथा भय से बचाने वाला ये पांच पिता व पिता समान माने जाते हैं। पंचातयन पूजा में पिता को सत्कर्तव्य देव कहा गया है और उसकी माता के समान ही सेवा करने का उपदेश किया गया है। शतपथ ब्राह्मण का वचन है कि जब तीन उत्तम शिक्षक एक माता, दूसरा पिता तथा तीसरा आचार्य होते हैं तभी मनुष्य ज्ञानवान् होता है। ऋषि दयानन्द ने कहा है कि वह सन्तान बड़ा भाग्यवान् होता है जिसके माता और पिता धार्मिक विद्वान् हों।मर्यादा पुरुषोत्तम राम के जीवन का एक उदाहरण पिता की भक्ति का ऐसा उदाहरण है जो विश्व इतिहास में देखने को नहीं मिलता। इसे सुनकर ही मनुष्य का रोम-रोम पुलकित हो जाता है। जब राम चन्द्र जी का राज्याभिषेक का निर्णय हुआ तो रानी कैकेयी ने महाराज दशरथ के इस निर्णय का विरोध किया। वह महाराज दशरथ से रूठ गई और उनसे पूर्वकाल के देवासुर-संग्राम में राजा दशरथ द्वारा उन्हें दिये दो वर मांग लिये। उसने पहला वर्ष भरत को अयोध्या का राजा बनाने तथा दूसरा राम को चैदह वर्ष का वनवास देने का मांगा। इस पृष्ठभूमि में राम जब कैकेयी के कक्ष में महाराज दशरथ के दर्शन करने पहुंचे तो उनकी दयनीय दशा देख कर उनसे इसका कारण पूछा। जब राजा दशरथ कुछ बोल नहीं पा रहे थे तो राम ने माता कैकेयी को पिता की इच्छा बताने को कहते हुए कहा था कि मुझे लानत है कि आप मुझ पर सन्देह कर रही हैं कि मैं अपने पिता की इच्छा व वचनों को पूरा नहीं करूंगा। राम ने कहा था ‘मैं तो अपने पिता श्री दशरथ की आज्ञा से अग्नि में भी कूद सकता हूं। तीक्ष्ण हलाहल जहर खा सकता हूं और समुद्र में भी कूद सकता हूं। वे तो मेरे गुरु, पिता, राजा और शुभ हितैषी हैं।’ पिता को उन्होंने कहा था कि आपकी जो आज्ञा हो मुझे शीघ्र बतायें। मैं राम प्रतीज्ञा करता हूं कि उसे अवश्यमेव पूरा करूंगा। राम एक बात कहकर फिर उसके विपरीत दूसरी बात नहीं कहता अर्थात् वह अपने वचनों पर अटल रहता है। राम का यह कहना कि मैं पिता के संकेत मात्र करने पर जलती चिता वा अग्नि में कूद सकता हूं, हलाहल विष पी सकता हूं और समुद्र में भी कूद सकता हूं, यह सुन कर रोम रोम पुलकित हो जाता है। ऐसा वाक्य कहने से राम ने एक ऐसा आदर्श स्थापित किया है जिसकी आजकल विश्व में किसी पुत्र से अपेक्षा नहीं की जा सकती।वैदिक धर्म एवं संस्कृति में पिता का गौरव पूर्ण स्थान है। माता का पिता से भी अधिक गौरव है। अतः देश व विश्व के सभी लोगों को अपने माता-पिता के प्रति अपने कर्तव्यों को समझना चाहिये। इसके अनुरूप ही देश में कानून बनने चाहिये। जिस समाज में पुत्र व पुत्रियां माता-पिता को पृथिवी से भारी और आकाश से भी ऊंचा मानते हैं, वह संस्कृति, वह देश व वह धर्म महान व महानतम होता है और वह सन्तान वस्तुतः महान एवं पूजनीय होती है। हमें वैदिक धर्म एवं संस्कृति सहित वैदिक इतिहास ग्रन्थों रामायण एवं महाभारत का भी अध्ययन करना चाहिये। इससे हम एक अच्छे पुत्र व मानव बन सकेंगे। हम आशा करते हैं कि पाठक लेख को पसन्द करेंगे। इस लेख को तैयार करने में हमने आचार्य ब्र. नन्दकिशोर जी की पुस्तक ‘पितृ-गौरव’ से सहायता ली है। उनका हृदय से धन्यवाद करते हैं। ओ३म् शम्।-मनमोहन कुमार आर्य

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
betpark güncel giriş
betgaranti güncel giriş
kolaybet güncel giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
betpark güncel giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
kolaybet giriş
kolaybet giriş
meritking giriş
virüsbet giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
meritking giriş
marsbahis giriş
meritking giriş
realbahis giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark 2026
bets10 giriş
casinoroyal
casinoroyal
hititbet giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
supertotobet giriş
supertotobet giriş
supertotobet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
supertotobet giriş
supertotobet giriş
vaycasino giriş
betnano giriş
betnano giriş
vaycasino giriş
Betpark Giriş
Betpark Giriş
vaycasino giriş
trendbet
trendbet
betnano giriş
betnano giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
betorder giriş
betorder giriş
betorder giriş
betorder giriş
trendbet
trendbet
trendbet
trendbet
hitbet
betnano giriş
restbet giriş
restbet giriş
casinoroyal giriş
casinoroyal giriş
padişahbet giriş
padişahbet giriş
betlike giriş
betlike giriş
casinoroyal
casinoroyal
trendbet
trendbet
betnano giriş
setrabet
setrabet