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भारतीय संस्कृति

ब्रह्मा के दिन रात और दिया हुआ दान

सतयुग ,त्रेता, द्वापर एवं कलयुग चारों युगों का योग 43 लाख 20 सहस्त्र वर्ष होता है। ऐसी 71 चतुर्युगियों का एक मन्वंतर होता है। 14 मन्वन्तरों का सृष्टि काल होता है। 14 मन्वन्तरों को ब्रह्म का एक दिन कहते हैं। इन के पश्चात प्रलय काल हो जाता है ।इस प्रलय काल को ब्रह्म की रात्रि कहते हैं। सृष्टि काल और प्रलय काल दोनों को मिलाकर ब्रह्म का अहोरात्र कहा जाता है। ऐसे 30 अहोरात्र का एक महीना, ऐसे बारह महीनों का एक वर्ष,अर्थात 2 सहस्त्र चतुर्युगीयों का एक अहोरात्र बनता है। ऐसे 360 अहोरात्र का ब्रह्म का 1 वर्ष हो जाता है ।ऐसे ऐसे ब्रह्म के 100 वर्ष व्यतीत होते हैं तो ब्रह्मा की शतायु हो जाती है। जिसे परांतकाल भी कहते हैं । इस प्रकार प्रलय काल , सृष्टि काल इन सबकी अवधि निश्चित है।
मुक्ति से कैसे और कब लौटते हैं?

जब जीव परमानंद में रहता है अर्थात ब्रह्म बनकर परम ब्रह्म के साथ रहता है या इस प्रकार कहें कि जब जीव ब्रह्म बनकर परम ब्रह्म के साथ रमण करता है ,अर्थात उसी की तरह आनंद प्राप्त करता है। स्वतन्त्र होकर सर्वत्र विचरता है। क्योंकि मुक्त जीव के साथ उसका स्थूल शरीर नहीं होता। मोक्ष में भौतिक शरीर या इंद्रियों के गोलक जीवात्मा के साथ नहीं रहते , किंतु अपने स्वाभाविक सद्गुण उसके साथ रहते हैं । जब वह सुनना चाहता है तब कान,जब स्पर्श करना चाहता है तब त्वचा और देखने केल संकल्प से आंख और स्वाद के अर्थ के लिए रसना ,गंध के लिए नाक, संकल्प विकल्प करते समय मन और निश्चय करने के लिए बुद्धि और स्मरण करने के लिए चित्त और अहंकार को अपनी शक्ति से जीवात्मा मुक्ति में प्राप्त कर लेता है। मुक्ति काल में जीव बल ,पराक्रम आकर्षण, प्रेरणा, गति, भाषण, विवेचन ,क्रिया, उत्साह, स्मरण, निश्चय, इच्छा, प्रेम, द्वेष, संयोग ,विभाग, संयोजक, विभाजक, श्रवण, स्पर्श, दर्शन, स्वाद, और गंध ग्रहण तथा ज्ञान इन 24 प्रकार के सामर्थ्य से युक्त रहता है। परंतु यह किसी कर्म में बंधा हुआ नहीं होता है ।
जब ब्रह्म की शतायु के पूर्ण आयु(जिसका विवरण उपरोक्त में दिया जा चुका है) व्यतीत हो जाती है तब मुक्त आत्मा ब्रह्म पद से नीचे इस संसार में फिर से आती है.। क्योंकि यदि पृथ्वी पर पुनः न आए तो मुक्ति के स्थान में बहुत भीड़ हो जाएगी । संसार नहीं रह पाएगा।वहां पर आगम अधिक हो जाएगा और निर्गमन कम होगा तो उससे भी अव्यवस्था बढ़ेगी और यह ठीक नहीं होगी।इसलिए व्यवस्था यही ठीक है कि मुक्ति में जाना और वहां से पुनःआना ।
मुक्ति का काल 36 हजार बार उत्पत्ति और प्रलय का जितना समय होता है उतने समय पर्यंत जीवों को मुक्ति के आनंद में रहना और दुख का न होना बहुत ही महत्वपूर्ण है। लेकिन यहां यह भी स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि मुक्ति प्रत्येक जीव को इतनी लंबी आयु तक प्राप्त नहीं होती बल्कि वह कम और अधिक कर्मों के अनुसार ईश्वर देखता व करता है।
जीवन की इस परमगति अर्थात मोक्ष को प्राप्त करने के लिए हमें सदैव सावधान और जागरूक रहकर कर्म करना चाहिए । हमारे परिवारों में छोटी-छोटी बातों पर झगड़े होते हैं या विवाद की स्थिति उत्पन्न होती है , हमें उनसे बचना चाहिए । पड़ोसियों , संबंधियों , रिश्तेदारों , मित्रों आदि से भी विवाद की और छल कपट या बेईमानी की नीति और नीयत से अपना बचाव करना चाहिए । परिवारों में छोटी-छोटी चीजों को लेकर बंटवारे होते हैं । उनमें 100 – 50 गज पर लोग झगड़ते हैं । जबकि अच्छे लोग त्याग करने के लिए तैयार रहते हैं और यदि कोई चीज एक बार त्याग देते हैं तो फिर उसे दोबारा ग्रहण करने की चेष्टा नहीं करते।
इस प्रसंग में मुझे एक उदाहरण याद आ रहा है। राजा मानसिंह ने अकबर के कहने से एक बार गुजरात व सिंध के क्षेत्र पर आक्रमण कर दिया । जब वह उधर की तरफ बढ़ रहा था तो रास्ते में अटक नदी बड़ी तेज गति से बह रही थी । नदी के तेज प्रवाह को देखकर उसकी हिम्मत नहीं होती थी कि वह उसे पार कर जाए । तब उसने अपनी मां के लिए एक पत्र लिखा । जिसमें उसने लिखा था कि अटक नदी के आ जाने के कारण मैं अपनी सेना सहित इसके किनारे पर अटक गया हूं ? मां ! मुझे अब क्या करना चाहिए , यहां से लौट आना चाहिए या फिर आगे बढूँ ?
तब माँ ने उस पत्र को पढ़कर अपने बेटे के लिए लिखा :–

सबै भूमि गोपाल की या में अटक कहां ?
जाके मन में अटक है वही अटक रहा ।।

मां के इस पत्र को पढ़कर मानसिंह का उत्साह बढ़ गया । उसने अपनी सेना को नदी पार करने का आदेश दिया । कुछ सैनिक बह गए , परंतु उसकी सेना नदी पार करने में सफल हो गई । परिणाम स्वरूप राजा मानसिंह भी विजयी होकर मां के पास लौटे ।
इसके कुछ समय पश्चात राजा मानसिंह को यह सनक पैदा हो गई कि अब उसे श्रीलंका को भी फतह करना चाहिए । सब जानते हैं कि भारत और श्रीलंका के बीच कोई नदी नहीं थी , बल्कि उफनता हुआ समंदर था । जिस पर अब कोई पुल बनाया जाना भी संभव नहीं था । ऐसे में राजा की सनक सचमुच मूर्खतापूर्ण थी । परंतु राजहठ तो हठ होती है। अतः श्रीलंका को जीतने की हठ कर बैठे मानसिंह को सभी ने उसको समझाया , परंतु उसके समझने की सारी सीमाएं पार हो गई । तब समझदार मंत्री ने राजा मानसिंह के भाट को यह जिम्मेदारी दी । मानसिंह के भाट ने बहुत सुंदर वर्णन करने के पश्चात राजा को इस बात के लिए उत्साहित कर लिया कि राजा उस पर कृपा करके यह कह बैठा कि तुम्हें जो कुछ मांगना है सो मांग सकते हैं । तब भाट ने उचित अवसर देखकर राजा को समझाया कि महाराज ! मैं आपसे एक ही निवेदन करता हूं कि आप कोई भी शास्त्र विरुद्ध कार्य न करें । राजा ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा कि मैं तो ऐसा कुछ नहीं कर रहा ।
तब भाट ने कहा कि आप सूर्यवंशी राम के वंशज हैं और आपके पूर्वज श्री राम ने श्रीलंका को जीत कर रावण के भाई विभीषण को दान कर दिया था अर्थात आप उसे लेकर भी त्याग चुके हैं ।अब अपने पूर्वज के द्वारा दिए गए दान को वापस लेकर उनकी अपकीर्ति का भाजन मत बनिए । क्षत्रियों के लिए यह शोभायमान नहीं है कि वह दिए हुए दान को या किसी के लिए छोड़ दी गई वस्तु को किसी भी प्रकार फिर से प्राप्त करने की कोई योजना बनाते या विचार करते हैं। भाट की बात सुनकर मानसिंह ने श्रीलंका को प्राप्त करने का विचार त्याग दिया ।
इसी प्रकार विवेकशील लोग जीवन में यदि किसी वस्तु को किसी भाई के लिए या किसी भी परिजन के लिए , मित्र – संबंधी , समाज के किसी व्यक्ति आदि के लिए छोड़ चुके हैं तो उसे फिर से ग्रहण करने पर विचार नहीं करते । यही उनका धर्म होता है । जो अपनी गरिमा पूर्ण मर्यादा के इस बंधन से बंधे रहते हैं और सदैव सोच समझकर कार्य करते हैं उनके गरिमा पूर्ण कुछ आचरण का लोग लोहा मानते हैं। लोक और समाज से मिला यह यश और कीर्ति व्यक्ति को संसार के बंधनों से मुक्त कर मोक्ष की ओर लेकर चलने में सहायक होता है। इसके विपरीत जो लोग ‘अश्वत्थामा मारा गया’ – वाले युधिष्ठिर के अर्धसत्य का सहारा लेकर अपने प्रयोजन को साधने का प्रयास करते हैं उनकी लोक में कीर्ति भंग हो जाती है। सूक्ष्म जगत में बन रहे उसके पुण्य कार्य का उसका आभामंडल इससे प्रभावित होता है । उसकी आत्मा उसे बताने लगती है कि तेरे सुंदर संसार में कहीं ग्रहण लग गया है। इसलिए उसकी आत्मिक शांति में भंग पड़ जाता है । एक विवेकशील व्यक्ति के लिए ऐसा हो जाना उसके लिए बहुत बड़ी क्षति होती है । यही कारण है कि विवेकशील लोग दिए हुए दान को वापस लेने पर कभी विचार नहीं करते।

देवेंद्र सिंह आर्य
चेयरमैन : उगता भारत

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