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भारतीय संस्कृति

नहीं की जा सकती वैदिक धर्म की किसी से तुलना

-स्व० चौधरी चरण सिंह (भू० पूर्व प्रधानमन्त्री, भारत सरकार)

मैं जहां राजनीतिक क्षेत्र में महात्मा गांधी को अपना गुरु या प्रेरक मानता हूं, वहां धार्मिक व सामाजिक क्षेत्र में मुझे सबसे अधिक प्रेरणा महर्षि दयानन्द सरस्वती ने दी। इन दोनों विभूतियों से प्रेरणा प्राप्त कर मैंने धार्मिक व राजनीतिक क्षेत्र में पदार्पण किया था। एक ओर आर्य समाज के मंच से हिन्दू समाज में व्याप्त कुरीतियों के विरुद्ध मैं सक्रिय रहा, वहीं कांग्रेसी कार्यकर्ता के रूप में भारत की स्वाधीनता के यज्ञ में मैंने यथाशक्ति आहुतियां डालने का प्रयास किया।

मंगलाचरण स्वदेशी, स्वभाषा व स्वधर्म का गौरव

छात्र जीवन में, लगभग १९-२० वर्ष की आयु में स्वामी सत्यानन्द लिखित महर्षि दयानन्द सरस्वती की जीवनी पढ़ी। मुझे लगा कि बहुत समय बाद भारत में सम्पूर्ण मानव गुणों से युक्त एक तेजस्वी विभूति महर्षि के रूप में प्रकट हुई है। उनके जीवन की एक-एक घटना ने मुझे प्रभावित किया, प्रेरणा दी। स्वधर्म (वैदिक धर्म), स्वभाषा, स्वराष्ट्र, सादगी, सभी भावनाओं से ओत-प्रोत था महर्षि का जीवन। राष्ट्रीयता की भावनाएं तो जैसे उनकी रग-रग में ही समायी हुई थी। इन सब गुणों के साथ तेजस्विता उनके जीवन का विशेष गुण था। इसीलिए आर्य समाज के नियमों में सत्य के ग्रहण करने एवं असत्य को तत्काल त्याग देने को उन्होंने प्राथमिकता दी थी।
महर्षि दयानन्द की एक विशेषता यह थी कि वे किसी के कन्धे पर चढ़कर आगे नहीं बढ़े थे। अंग्रेजी का एक शब्द भी न जानने के बावजूद हीन-भावना ने आजकल के नेताओं की तरह, उन्हें ग्रसित नहीं किया। अपनी हिन्दी भाषा, सरल व आम जनता की भाषा में उन्होंने ‘सत्यार्थप्रकाश’ जैसा महान् ग्रन्थ लिखा। इस महान् ग्रन्थ में उन्होंने सबसे पहले अपने हिन्दू समाज में व्याप्त कुरीतियों पर कड़े से कड़ा प्रहार किया। बाल-विवाह, पर्दा-प्रथा, महिलाओं की शिक्षा की उपेक्षा, अस्पृश्यता, धर्म के नाम पर पनपे पाखण्ड आदि पर जितने जोरदार ढंग से प्रहार स्वामी जी ने किया, उतना अन्य किसी धार्मिक नेता या आचार्य ने नहीं किया। अपने समाज में व्याप्त गली-सड़ी कुरीतियों पर प्रहार करने के बावजूद स्वामी जी ने राजा राममोहनराय आदि पश्चिम से प्रभावित नेताओं की तरह, वैदिक-धर्म को उन दोषों के लिए दोषी नहीं ठहराया, वरन् स्पष्ट किया कि वैदिक, हिन्दू धर्म सभी प्रकार की बुराइयों व कुरीतियों से ऊपर है, वैदिक धर्म वैज्ञानिक व दोष-मुक्त धर्म है, तथा उसकी तुलना अन्य कोई नहीं कर सकता।

स्वामी जी ने अपने वैदिक धर्म के पुरुरुद्धार के उद्देश्य से आर्य-समाज की स्थापना की। उन्होंने नाम भी आकर्षक व प्रेरक चुना। ‘आर्य’ अर्थात् श्रेष्ठ समाज इसमें न किसी जाति की संकीर्णता है, न किसी समुदाय की। जो भी आर्य-समाज के व्यापक व मानवमात्र के लिए हितकारी नियमों में विश्वास रखें वहीं आर्यसमाजी ‘आर्य-समाज’ नाम से दूरदर्शी, व्यापक व संकीर्णता से सर्वथा मुक्त दृष्टि का ही आभास होता है।
स्वामी जी ने स्वदेशी व स्वभाषा पर अभिमान करने की भी देशवासियों को प्रेरणा दी। अंग्रेजी को वे विदेशी अपनी भाषा तथा अपनी वेश-भूषा अपनाने पर बल देते थे। जिन परिवारों में वे ठहरते थे, उनके बच्चों की वेशभूषा पर ध्यान देते थे तथा प्रेरणा भी देते थे कि हमें विदेशों की नकल छोड़कर अपने देश के बने कपड़े पहनने चाहिए, अपना काम-काज ‘संस्कृत व हिंदी’ में करना चाहिए। गाय को स्वामी जी भारतीय कृषि व्यवस्था का प्रमुख आधार मानते थे। इसीलिए उन्होंने ‘गोकरुणानिधि’ लिखी तथा गोरक्षा के लिए हस्ताक्षर कराये। वे ग्रामों के उत्थान, किसानों की शिक्षा की ओर ध्यान देना बहुत जरूरी मानते थे।

जाति प्रथा के विरुद्ध चेतावनी

स्वामी जी दूरदर्शी थे। उन्होंने इतिहास का गहन अध्ययन करके यह निष्कर्ष निकाला था कि जब तक हिन्दू समाज जन्मना जाति प्रथा की कुरीति में ग्रस्त रहेगा, वह बराबर पिछड़ता जायेगा। इसीलिए उन्होंने ‘सत्यार्थप्रकाश’ में तथा अपने प्रवचनों में जाति-प्रथा व अस्पृश्यता पर कड़े से कड़ा प्रहार किया। वे दूरदर्शी थे अतः उन्होंने पहले ही यह भविष्यवाणी कर दी थी कि यदि हिन्दू समाज ने जाति-प्रथा व अस्पृश्यता के कारण अपने भाईयों से घृणा नहीं छोड़ी, तो समाज तेजी से बिखरता चला जायेगा जिसका लाभ विधर्मी स्वतः उठायेंगे। उन्होंने यह भी चेतावनी दी थी कि अस्पृश्यता का कलंक हिन्दू धर्म के साथ-साथ देश के लिए भी घातक होगा।
महर्षि की प्रेरणा पर आर्य समाज के नेताओं लाला लाजपतराय, भाई परमानन्द आदि ने अस्पृश्यता के विरुद्ध अभियान चलाया। आर्य समाज ने जन्मना जाति-प्रथा की हानियों से लोगों को समझाने का प्रयास किया। किन्तु आज तो जाति-पाति की भावनाएं धर्म के नाम पर नहीं, ‘राजनीतिक मठाधीशों’ द्वारा राजनीतिक लाभ की दृष्टि से अपनायी जा रही हैं। आज तो आर्य समाज को इस दिशा में और भी तेजी से सक्रिय होने की जरूरत है।

महर्षि दयानन्द सरस्वती द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्तों अथवा आर्य समाज के दस नियमों का पूरी तरह पालन तो बहुत ही निर्भीक, संयमी व तेजस्वी व्यक्ति कर सकता है, परन्तु इस दिशा में मैंने यथासम्भव कुछ-कुछ पालन करने का प्रयास अवश्य किया है।
मैंने सात वर्षों तक निरन्तर गाजियाबाद में वकालत करते समय एक हरिजन को रसोईया रखकर व्यक्तिगत जीवन में जातिगत भावना को जड़-मूल से मिटाने का प्रयास किया। इसके बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमन्त्री के रूप में प्रदेश की शिक्षा-संस्थाओं के साथ लगने वाले ब्राह्मण, जाट, अग्रवाल, कायस्था आदि जातिवाचक नामों को हटाने का दृढ़ता के साथ कानून बनवाया। मेरे अनेक साथियों ने उस समय कहा कि इससे बहुत लोग नाराज हो जायेंगे। मैंने स्पष्ट उत्तर दिया कि ‘नाराज हो जायें, मैं शिक्षा क्षेत्र में जातिगत संकीर्णता कदापि सहन नहीं कर सकता।’ जिस दिन मेरे क्षेत्र बड़ौत के ‘जाट इण्टर कॉलेज’ का नाम बदलकर जाट की जगह ‘वैदिक’ शब्द जुड़ा, उस दिन मुझे सन्तोष हुआ कि चलो महर्षि के आदेश के पालन करने में मैं कुछ योगदान कर सका। इसी प्रकार अपनी पुत्री तथा धेवती का अन्तर्जातीय विवाह कर मुझे आत्म-सन्तोष तो हुआ ही।

मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि भारत में महर्षि दयानन्द तथा गाँधी के आदर्शों पर चलकर ही सच्चा गौरव प्राप्त किया जा सकता है। दोनों महापुरुष भारत को प्राचीन ऋषियों के समय की सादगी, सच्चाई, न्याय व नैतिकता के गुणों से युक्त भारत बनाने के आकांक्षी थे, ‘महर्षि’ व ‘महात्मा’ दोनों ने इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए प्राचीन संस्कृति व धर्म को जीवन में महत्त्व दिया। धर्म के नाम पर किसी भी तरह घुस आयी कुरीतियों पर प्रहार किया। उनका स्पष्ट मत था कि हम विदेशियों का अन्धानुकरण करके भारत का उत्थान कदापि नहीं कर सकते। आज हमें उनसे दिशा ग्रहण कर इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए बढ़ना चाहिए।

दीपावली ज्योति पर्व है। इस दिन हम अन्धकार अर्थात् अस्पृश्यता, अनैतिकता, भ्रष्टाचार आदि से ऊपर उठकर प्रकाश के मार्ग पर चलने की प्रेरणा ले सकते हैं। ईमानदारी तथा नैतिकता को अपनाये बिना हम संसार में सम्मान कदापि प्राप्त नहीं कर सकते।

[स्त्रोत- आत्म-शुद्धि-पथ मासिक का मार्च २०२० का अंक; प्रस्तुति- प्रियांशु सेठ]

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