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भारतीय संस्कृति

वैदिक धर्म के प्रचार में बाधक अविद्यायुक्त बातें और संगठन

ओ३म्

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वैदिक धर्म सत्य ज्ञान ‘चार-वेदों’ पर आधारित मानव धर्म है। वैदिक धर्म का आरम्भ ईश्वर से प्राप्त चार वेदों की शिक्षाओं के जन-जन में प्रचार से हुआ था। हमारे वेदों के ज्ञानी ऋषि व आचार्य ही हमारे धर्म के प्रचारक व उसके संवाहक होते थे। सद्ज्ञान से युक्त ऋषियों व विद्वानों के होते हुए तथा उनके अनुकूल स्वदेशीय राजाओं के होते हुए देश व समाज से अज्ञान व अविद्या दूर रहती थी। अविद्या फैलाने वाले लोग राजकीय व्यवस्था से दण्डित होते थे। महाभारत युद्ध के बाद देश में पठन-पाठन की व्यवस्था भंग होने से वेदाध्ययन की परम्परा भी बाधित हुई जिससे वेद ऋषि व वेदों के आचार्य उत्पन्न होना बन्द हो गये। इस कारण से देश व संसार से वेदज्ञान लुप्त हो गया। समय के साथ वैदिक धर्म में अनेक प्रकार की विकृतियां आईं जिनके कारण सद्धर्म का स्वरूप अज्ञान, अविद्या, अन्धविश्वासों, अन्धपरम्पराओं आदि विकृतियों से युक्त हो गया। विद्या का प्रचार न होने से अज्ञानान्धकार बढ़ता ही गया जिससे कालान्तर में अनेक अविद्यायुक्त मत-मतान्तर उत्पन्न हुए।

इन अविद्यायुक्त मत-मतान्तरों की शाखायें व प्रशाखायें भी उत्तरोत्तर उत्पन्न होने लगी। जिन आचार्यों की जैसी मनोवृत्ति थी उन्होंने अपने अपने ज्ञान व मनोवृत्ति के अनुसार अपने-अपने मतों को चलाया। कालान्तर में इन सभी मत-मतान्तरों में स्पर्धा के कारण से संघर्ष भी हुए जिससे साधारण मनुष्यों के जीवन की सुख-शान्ति भंग हुई व वर्तमान में भी यह स्थिति जारी है। आज भी मत-मतान्तरों में वृद्धि का क्रम बन्द नहीं हुआ है। जो व्यक्ति भी कुछ प्रवचन करना जानता है, वही अर्ध व अल्प ज्ञानी मनुष्य आचार्य व धर्म गुरु बन जाता है जिससे देश व समाज सद्धर्म के मार्ग से हट कर अविद्या व अज्ञान के दुःखमय वातावरण में प्रविष्ट होकर देश की उन्नति में बाधक बनते हैं। इसे स्वतन्त्रता की अभिव्यक्ति के अधिकार के दुरुपयोग के रूप में भी देखा जा सकता है। मत-मतान्तरों की संख्या व उनके प्रभाव में वृद्धि का एक कारण आर्यसमाज का वेद प्रचार आन्दोलन का शिथिल पड़ना भी है। पहले आर्यसमाज के विद्वान मत-मतान्तरों की अविद्यायुक्त मान्यताओं का खण्डन व समीक्षा करते थे, उन्हें शास्त्रार्थ व सत्यासत्य पर चर्चा की चुनौती देते थे। इसके परम्परा के बन्द हो जाने से भी अविद्यायुक्त मत-मतान्तर देश की आजादी के समय से ही फल फूल रहे हैं जिससे आगामी समय में वैदिक धर्म व इस पर आधारित मत व सम्प्रदायों के पूर्णतया विलुप्त व समाप्त जो जाने का खतरा उत्पन्न हो गया है। ऐसी स्थिति में भी हमारा हिन्दू समाज व आर्यसमाज नींद में सोया दीखता है। कहीं से धर्म विरुद्ध कार्यों व योजनाओं का सशक्त विरोध व खण्डन व चिन्ता की जाती दिखाई नहीं पड़ती।

जो मनुष्य व समाज अविद्या से ग्रस्त होता है उसमें ईष्र्या, द्वेष, हिंसा, लूट-खसोट आदि दुष्प्रवृत्तियां भी विद्यमान होती हैं। ऐसे लोग सत्य धर्म व अपने कर्तव्य के मार्ग पर चलने वाले लोगों के प्रति भी दुर्भावना रखते हैं व उनके प्रति अनुचित अपमानजनक तथा हिंसा का व्यवहार करते हैं। इसको रोकने के लिये सद्धर्म के अनुयायियों को अपनी अविद्या दूर कर संगठित होकर विरोध करना चाहिये जो कि वह कर नहीं पाते जिससे समाज में सद्धर्म के विरोध व हिंसा की प्रवृत्तियों में वृद्धि अनुभव की जाती है। ईश्वर की कृपा व देशवासियों का सौभाग्य है कि इस समय देश में एक मानवीय पहलुओं से युक्त संवेदनशील सरकार है। इसके कारण भी बहुत सी देश विरोधी व धर्म विरोधी शक्तियों पर नियंत्रण है। इस सरकार ने देश की रक्षा व वैदिक धर्म के विरुद्ध दुष्प्रचार करने वाले कुछ लोगों व संगठनों पर अंकुश भी लगाया है। ईश्वर देश की हितकारी व देशभक्त सभी शक्तियों का पोषण करें। उन्हें जागृत व बलशाली करें जिससे हमारा सत्य सनातन वैदिक धर्म, धर्म-विरोधी शक्तियों व संगठनों से सुरक्षित रहे और आर्यसमाज का सत्य के प्रचार व असत्य के खण्डन तथा सत्य के ग्रहण व असत्य के त्याग कराने का आन्दोलन पुनः सक्रिय हो व सर्वत्र तीव्रता से चले।

महर्षि दयानन्द ने सन् 1863 में सब सत्य विद्याओं से युक्त वैदिक धर्म के प्रचार का सूत्रपात किया था। यदि देश में वा मत-मतान्तरों में अविद्या न होती तो उन्हें इस कार्य को करने की आवश्यकता नहीं थी। उन दिनों के विचारशील बुद्धिजीवियों तथा सच्चे धार्मिक लोगों का उनको समर्थन मिला था। अधिकांश लोगों ने उनके विचारों को जांचा व परखा था तथा उन्हें स्वीकार किया था। उन्हीं की प्रेरणा से उन्होंने कालजयी धर्मग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश का प्रणयन किया था। इसका दूसरा संशोधित संस्करण भी हमें सन् 1884 में प्राप्त हुआ था। आजकल यह ग्रन्थ सभी मत-मतान्तरों की अविद्या हटाने का सबसे प्रबल प्रतिनिधि ग्रन्थ है। यह वेदों की महत्ता पर प्रकाश डालता है। अन्धविश्वासों से परिचित कराने के साथ उनको दूर करने की प्रेरणा भी करता है। सत्यार्थप्रकाश पढ़कर मनुष्य ईश्वर के सत्यस्वरूप सहित आत्मा के सत्यस्वरूप तथा सृष्टि के अनेक गुप्त रहस्यों को भी जान पाता है। सत्यार्थप्रकाश से मनुष्य को सत्य का ग्रहण करने और असत्य का त्याग करने की प्रेरणा मिलती है। ईश्वर की उपासना की आवश्यकता क्या है? उपासना क्यों करते हैं और उपासना से क्या-क्या लाभ होते हैं, उन सबका तर्कसंगत उत्तर भी सत्यार्थप्रकाश पढ़कर प्राप्त होता है।

सत्यार्थप्रकाश वेद, दर्शन, उपनिषद, मनुस्मृति, रामायण व महाभारत आदि के अध्ययन करने का पोषण करता है। इन ग्रन्थों का अध्ययन करने से मनुष्य की अविद्या दूर हो जाती है। हमें यह भी पता होना चाहिये कि अविद्या व विद्या क्या होती है? अविद्या की चर्चा कर ऋषि दयानन्द ने कहा है कि संसार में देहादि अनित्य व नाशवान पदार्थ हैं। इन अनित्य पदार्थों में जो विपरीत बुद्धि रखकर यह मानता है कि यह जो कार्य जगत् दीखता है, सुना जाता है, यह सदा रहेगा, यह जगत् सदा से है और योगबल से देवों का यह शरीर सदा रहता है, ऐसी विपरीत बुद्धि व ज्ञान का होना अविद्या का प्रथम भाग है। अशुचि अर्थात् मलमय स्त्रियादि के शरीर और मिथ्याभाषण, चोरी आदि अपवित्र में पवित्र बुद्धि होना यह अविद्या का दूसरा भाग है। अत्यन्त विषयसेवनरूप दुःख में सुखबुद्धि आदि तीसरा तथा अनात्मा में आत्मबुद्धि करना अविद्या का चैथा भाग है। यह चार प्रकार का विपरीत ज्ञान अविद्या कहलाती है। ऐसा ज्ञान व बुद्धि समाज में सर्वत्र दृष्टिगोचर होती है। अतः समाज अविद्या से ग्रस्त ही कहा जायेगा।

अविद्या से पृथक विद्या उसे कहते हैं जो नित्य को नित्य, अनित्य को अनित्य, अपवित्र को अपवित्र तथा पवित्र को पवित्र, दुःख को दुःख तथा सुख को सुख, अनात्मा में अनात्मा तथा आत्मा में आत्मा का ज्ञान होना है। जिससे ज्ञान से पदार्थों का सत्यस्वरूप विदित होता है वह विद्या कहलाती है। जिस बुद्धि से पदार्थों का सत्यस्वरूप का बोध न हो, अन्य में अन्य बुद्धि होवे वह अविद्या कहलाती है। इसी प्रकार से मत-पन्थ-सम्प्रदायों में भी जो मान्यतायें व सिद्धान्त अविद्या से युक्त व उसका पोषण करने वाले हैं, उनसे समाज व देश के मनुष्यों को लाभ न होकर हानि होती है। उनको दूर करना तथा प्रचार व खण्डन द्वारा लोगों को उनका यथार्थ स्वरूप विदित करना ही धर्म व विद्या का कार्य होता है। इसी कार्य को ऋषि दयानन्द ने अपने जीवन में किया था। उन्होंने वैदिक धर्म में महाभारत काल के बाद जो विकृतियां आ गई थीं, उन सबको दूर किया और देश व विश्व की जनता के सामने धर्म का सत्यस्वरूप प्रस्तुत किया। उन्होंने वेदों को सत्यज्ञान व विद्या के ग्रन्थ सिद्ध किया और इतर मत-मतान्तरों को अविद्यायुक्त मान्यताओं से युक्त बताया। मत-मतान्तरों की अविद्या का वर्णन उन्होंने अपने ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश में भी किया है। विद्या के प्रसार के लिये ही ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश सहित ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कारविधि, आर्याभिविनय, वेदभाष्य आदि ग्रन्थों का निर्माण किया जिसका अध्ययन करने से मनुष्य की अविद्या दूर हो जाती है और वह सत्यासत्य को भली प्रकार से जानने लगता है। सत्य को जनाना, मानना व मनवाना ही उनका उद्देश्य था। यह प्रेरणा उन्हें अपने गुरु स्वामी विरजानन्द सरस्वती और ईश्वर से प्राप्त हुई थी। इसको पूरा करने के लिये ही उन्होंने अपनी मृत्यु पर विजय प्राप्त कर वेद प्रचार तथा अविद्या दूर करने का सफल प्रयास किया और इसका देश व विश्व पर आशातीत प्रभाव भी हुआ।

मनुष्य, समाज व देश का सबसे बड़ा यदि कोई शत्रु है तो वह अविद्या ही है। आश्चर्य है कि हमारे विद्यालयों में अविद्या को दूर करने व विद्या का प्रचार करने पर बल नहीं दिया जाता। बिना विद्या के प्रचार के मनुष्य की निजी व सामाजिक उन्नति नहीं हो सकती। वेद व वैदिक धर्म में मनुष्य की जिस निजी व सामाजिक उन्नति की कल्पना है, वह वर्तमान शिक्षा पद्धति व सरकारी नीतियांे से नहीं हो पायी है और न ही हो सकती है। इसके लिये ऋषि दयानन्द सहित प्राचीन ऋषियों, विद्वानों तथा शिक्षा शास्त्रियों के विचारों से प्रेरणा लेनी होगी। सभी मतों का कर्तव्य है कि वह अपने अपने मत की मान्यताओं को विद्या की कसौटी पर कसें। असत्य का त्याग कर और सत्य को अपनाये। इस कार्य को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न न बनाये। यदि कोई व्यक्ति अपने दुर्गुणों को जानेगा नहीं तो वह उन्हें दूर नहीं कर सकता। यदि वह यह सोचे कि दुर्गुणों को छोड़ने से उसकी प्रतिष्ठा कम होगी तो उसका सुधार कदापि सम्भव नहीं है। यही बात हमारे सभी अविद्यायुक्त विचारों व मान्यताओं पर भी लागू होती है। इस लेख में हमने ऋषि दयानन्द के जीवन से उत्साहित होकर अविद्या दूर करने, विद्या की वृद्धि करने, असत्य को छोड़ने और सत्य को ग्रहण करने की प्रेरणा की है। ऋषि दयानन्द का सत्यार्थप्रकाश इसमें सर्वाधिक सहायक है। ऋषि दयानन्द का मानव जाति पर बहुत उपकार है जिन्होंने अपने अपूर्व त्याग एवं प्राणों को जोखिम में डालकर यह सत्य ज्ञान हमें प्रदान किया था। यदि हम इसको नहीं अपनाते हैं तो हम कृतघ्न सिद्ध होते हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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