Categories
भारतीय संस्कृति

धैर्य व सहनशीलता की साधना और प्राचीन भारत की शिक्षा प्रणाली

शुद्धि से ही सिद्धि संभव है। शुद्धिसिद्धि की सीढ़ी है।
शुद्धि सिद्धि का साधन है। शुद्धि के बिना सिद्धि प्राप्त नहीं हो सकती। शुद्धि सिद्धि वालों को प्राप्त होती है।

शुद्धि से सिद्धि भई सिद्धि जीवन ध्येय ।
जगत में ऐसे लोग ही पा जाते हैं ज्ञेय ।।

इस प्रकार शुद्धि की जीवन में बहुत उपयोगिता एवं आवश्यकता है। अब प्रश्न आता है कि यह शुद्धि है क्या ? शुद्धि का शाब्दिक अर्थ है पवित्रता ,शुचिता।
शुचिता को शौच से प्राप्त किया जाता है , जो साधना का प्रथम सोपान है अर्थात यम और नियम के पालन में शौच एक उपांग है।
शुचिता का तात्पर्य मात्र शारीरिक शुचिता से नहीं है बल्कि मन , वचन और कर्म से है ।

रहस्यवाद

,ईश्वर असीम है , तो एक मनुष्य ससीम है । ईश्वर सर्वज्ञ है तो आत्मा अल्पज्ञ है । दोनों का योग हो तो कैसे ? क्योंकि जब तक ससीम असीम के सान्निध्य में नहीं आता , संसर्ग में नहीं आता , तब तक योग संभव नहीं। असीम को प्राप्त करने के लिए असीमित साधना की आवश्यकता ससीम को होती है। ससीम साकार है और असीम निराकार है।
ससीम का असीम के साथ मिलना ही अध्यात्म का रहस्यवाद है। जो आत्मा और परमात्मा के बीच संबंधों को खोजने का अंतहीन प्रयास है अर्थात इसमें निरंतरता का बना रहना आवश्यक है।
ससीम की इच्छा कभी भी ससीम वस्तुओं से पूरी नहीं हो सकती। ससीम वस्तुएं सीमित पड़ जाती हैं। सीमित से कभी भी इच्छाएं पूरी नहीं होती।
मनुष्य ससीम है और ईश्वर असीम है। इसी प्रकार भौतिक पदार्थ एवं वस्तुएं सभी ससीम हैं , लेकिन भक्ति असीम है । यही कारण है कि ससीम की आवश्यकताएं ससीम से पूरी नहीं होती।

प्रायश्चित

मनुष्य जीवन में प्रतिदिन कोई न कोई गलती प्रति व्यक्ति से हो जाती है। उस गलती के लिए पछतावा करना की प्रायश्चित है। केवल पश्चाताप कर लेना ही पूर्ण नहीं है , बल्कि यह भी प्रतिज्ञा करनी चाहिए कि आज के बाद इस गलती को भविष्य में दोबारा नहीं करूंगा। जैसे किसी दूसरे व्यक्ति को पीड़ा पहुंचाते हैं और उस पीड़ा से उस व्यक्ति की जो अनुभूति है , वह गलत होती है । अतः हम यह प्रतिज्ञा करें कि भविष्य में किसी को भी कोई पीड़ा नहीं पहुंचाएंगे ।उसी से जीवन में सुधार की प्रक्रिया प्रारंभ होती है। इसका तात्पर्य यह होता है कि प्रायश्चित परिष्कार पर समाप्त होता है। परिष्करण की प्रक्रिया धीरे-धीरे करते हुए पाप नष्ट हो जाते हैं और व्यक्ति महान बन जाता है।
प्रायश्चित का तात्पर्य होता है कि अपने दोषों को खुले दिल दिमाग से स्वीकार करना और भविष्य में उसकी पुनरावृत्ति न करना होता है।

मनोबल , आत्मबल

मनुष्य के अपने अंदर जो आंतरिक बल है वह मनोबल कहा जाता है , मानसिक बल कहा जाता है।एक तरफ शारीरिक बल होता है दूसरी तरफ मानसिक बल होता है । शारीरिक बल सीमित होता है मानसिक बल असीमित होता है। मनोबल या आत्मबल भी उसी व्यक्ति का उच्च होता है जो मन वचन और कर्म से पवित्र होता है। जो विद्वान होता है।
जिनका मनोबल उच्च स्तर का होता है , वह कभी असफल नहीं होते।

धैर्य अथवा सहनशीलता

महर्षि दयानंद द्वारा धर्म के जब 10 लक्षण बताए गए हैं तो उनमें से सबसे पहला लक्षण धृति है। इसी को धैर्य अथवा सहनशीलता कहते हैं। विपरीत परिस्थितियों में अथवा विषम परिस्थितियों में भी जिस व्यक्ति का मन चिंता , शोक और उदासी के आवरण से आवृत्त ना हो वही सहनशील है। समझो उसी के अंदर धृति का गुण है। धैर्य धारण करने वाला मनुष्य धीर पुरुष कहा जाता है। धीर , वीर ही जीवन में प्रसन्नता के साथ – साथ सफलता भी प्राप्त करते हैं।
नीति शतक में महाराज भतृहरि द्वारा निम्न प्रकार कहा गया है :–

निन्दन्तु नीतिनिपुणा यदि वा स्तुवन्तु
लक्ष्मीः समाविशतु, गच्छतु वा यथेष्टम् ।
अद्यैव मरणमस्तु , युगान्तरे वा
न्याय्यात्पथः प्रविचलन्ति पदं न धीराः ।।

नीति में निपुण मनुष्य चाहे निंदा करें या प्रशंसा करें ,लक्ष्मी आये या चली जाये । मृत्यु आज हो या युगों के बाद , परन्तु धैर्यवान मनुष्य कभी भी न्याय के मार्ग से विचलित नहीं होते हैं।

वैदिक शिक्षा में बालक व बालिकाओं को सहशिक्षा को पूर्णत: वर्जित घोषित किया गया था। ऐसी शिक्षा बाल सुलभ मन में शरीर की जीवनी शक्ति को नष्ट कर अपना जीवन नष्ट करने की प्रेरणा देने वाली होती है। विपरीत लिंगियों को साथ-साथ बैठाने का अभिप्राय है कि पर्याप्त सावधानी बरतने के उपरांत भी उनको गलत कार्य के लिए अवसर उपलब्ध करा देना। यही कारण था कि वैदिक राष्ट्र में उच्च चरित्र वाले महिला पुरूषों की भरमार रहती थी। कन्या विद्यालय में महिला अध्यापिका तथा लडक़ों के विद्यालय में पुरूष अध्यापक व कर्मचारी रखने चाहिएं।

शिक्षा के केन्द्रों को भारतीय ऋषि लोग प्रकृति की गोद में शांत और एकांत स्थान पर नदी, तालाब आदि के किनारे बनाया करते थे। इसका कारण यही था कि शहरों के कोलाहल से विद्यार्थियों को शिक्षा ग्रहण में बाधा पहुंचती है। भोजन, भजन और विद्या ये तीनों एकांत में ही उचित माने गये हैं। इसलिए प्रकृति की गोद में एकांत स्थान पर विद्या प्राप्ति में विद्यार्थियों को सुविधा प्राप्त होती थी। साथ ही नदी, तालाब आदि के किनारे बैठकर प्राणायाम आदि क्रियाएं बड़े मनोयोग से पूर्ण होती हैं। नदी का कल-कल करता जल ध्यान लगाने की क्रिया में बड़ा सहायक सिद्घ होता है, इसके अतिरिक्त प्राचीनकाल में नदी, तालाब में स्नानादि की भी सुविधा उपलब्ध हो जाती थी। ऐसी व्यवस्था की जाती थी कि विद्यार्थियों को उस शिक्षा केन्द्र पर ही रोका जाए और वहां रखकर ही आचार्यादि लोग उसे ‘द्विज’ बनायें। आचार्य के गर्भ से अर्थात गुरूकुल से बाहर आने पर विद्यार्थी ‘द्विज’ कहलाता था। माना जाता था कि अब उसका दूसरा जन्म हो गया है।
वास्तव में यह द्विज ही वह व्यक्ति होता था जो आत्मा परमात्मा के संबंध को जानता था और धैर्य और सहनशीलता का प्रतिबिंब होता था।
समाज को आज सही दिशा देने के लिए और मानव के भीतर मानवोचित गुणों का विकास करने के लिए भारत की इसी शिक्षा प्रणाली को आज भी लागू करने की आवश्यकता है।

देवेंद्र सिंह आर्य
चेयरमैन : उगता भारत

Comment:Cancel reply

Exit mobile version