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भारतीय संस्कृति

सह अस्तित्व , सफलता और मानव समाज

“मैं हूं” – ऐसा भाव ही मेरा अस्तित्व है । मेरी निजता पर किसी प्रकार का आक्रमण न हो , मेरी निजता हर स्थिति में सुरक्षित रहे , सम्मानित रहे , यही मेरे अस्तित्व की रक्षा है । मैं जिस उद्देश्य को लेकर इस संसार में आया हूं मैं उस उद्देश्य को प्राप्त करने में सफल हो सकूं , यह मेरे अस्तित्व का मुखर होना होगा । इसी से मेरी प्रतिभा मुखरित होगी । जैसे यह अस्तित्व मेरे लिए है , वैसे ही यह दूसरों के लिए भी है , यानि दूसरों का अस्तित्व भी उन्हें उसी प्रकार मुखरित , पुष्पित और पल्लवित होने का अवसर देता है , जैसा मुझे मेरा अस्तित्व प्रदान करता है । मैं अपने अस्तित्व की रक्षा करते हुए दूसरे के अस्तित्व का भी सम्मान करूं , दूसरे के बारे में भी सोचूं कि वह भी मेरे साथ हैं और जैसे मुझे अपनी निजता प्रिय है वैसे ही उन्हें अपनी निजता अथवा अपना अस्तित्व प्रिय है अर्थात उनकी निजता भी सम्मानित होनी चाहिए । जब दोनों ओर से इस प्रकार का भाव उत्पन्न हो जाता है तो समझना चाहिए कि सह अस्तित्व का वास्तविक भाव वहां पर अंगड़ाई लेने लगता है । इसी से मानवता मुखरित होती है , सम्मानित और संस्कारित होती है । यही भाव सकारात्मक होता है।

ऐसा ही भाव हमको प्रकृति के साथ भी रखना चाहिए।
याद रहे कि प्रकृति के साथ छेड़छाड़ कर हम अपने अस्तित्व को मिटाने का जुगाड़ ढूंढते हैं । प्रकृति के अस्तित्व को हम नहीं मिटा सकते , क्योंकि प्रकृति वैसे ही अजर और अमर है जैसे ईश्वर अजर और अमर हैं । यदि हमने अपनी शक्तियों का अतिक्रमण कर प्रकृति जैसे शाश्वत सत्य को मिटाने या उसके साथ छेड़छाड़ कर युद्ध जारी करने का निर्णय लिया तो निश्चित है कि हमारा ही अस्तित्व समाप्त हो जाएगा । इसलिए उचित यही है कि हम प्रकृति के साथ मित्रतापूर्ण व्यवहार करें। क्योंकि उसने प्रकृति के पांच तत्वों से निर्मित यह चोला अर्थात शरीर हमें प्रदान कर स्वयं हमारे प्रति मित्रता का दृष्टिकोण अपनाया है । मित्र के साथ शत्रुता का व्यवहार करना मूर्खता होती है । आज का मनुष्य इसी मूर्खता को कर रहा है कि वह प्रकृति को चुनौती दे रहा है , बिना यह समझे कि इस प्रकृति ने स्वयं तेरे साथ भी कितना उपकार किया है ? यही कारण है कि मनुष्य सर्वत्र अशांत है, बेचैन है । इसलिए प्रकृति के साथ भी खिलवाड़ नहीं करना चाहिए ।
जब हम यह सोच लेंगे कि मैं भी रहूं और आप भी रहें तो इसी से पारस्परिक प्रेम की उत्पत्ति होगी .। उस पारस्परिक प्रेम में ही जीवन की प्रासंगिकता है।
वस्तुतः अकेला मनुष्य परेशान ही रहता है । उसको अकेलापन भी है। इसलिए सह अस्तित्व सार्थक तभी होगा जब दूसरे का सहयोग और उनकी सेवा करना जीवन में अति आवश्यक मान लेंगे। केवल स्वार्थी नहीं रहना चाहिए। स्वार्थ में जीवन असफल होता है । सह अस्तित्व के भाव में जीवन सफल होता है। तभी सुखद समाज का निर्माण होता है।
सह अस्तित्व प्रेम का बोध है । प्रेम का वह भाव है जो धर्म का प्रतीक है । धर्म प्रेम की सबसे सुंदर अभिव्यक्ति है । जब प्रेम की इस सबसे सुंदर अभिव्यक्ति को मनुष्य अपने व्यवहार से अभिव्यक्ति प्रदान करने लगता है और आचरण में ओढ़कर नृत्य करने लगता है , तब संसार में सकारात्मकता का संगीत प्रवाहित होता है और सकारात्मकता के उसी संगीत से निकलता है मानवतावाद का वह सुंदर भाव जो हम सबको एक साथ एक माला के मोती बनाकर पिरो देता है । हमारे ऋषियों ने मानवता की इसी माला का नाम धर्म कहा है।

सफलता

प्रत्येक मनुष्य अपने जीवन में सफलता प्राप्त करना चाहता है । आज के भौतिकवादी मनुष्य की यह सोच बन गई है कि सफलता चाहे किसी प्रकार से प्राप्त हो , बस होनी चाहिए । माना जाता है कि जो जीत गया वही मुकद्दर का सिकंदर होगा , उसके लिए चाहे उसने जैसे भी साधन प्रयोग किये हों , जमाना उसी की जय जयकार करेगा , जिसने जीत प्राप्त कर ली हो । उसके लिए साधन चाहे अनुचित भी हो ।आज वही सफलता मानी जाती है। चाहे वह राजनीति का क्षेत्र हो , चाहे वह आध्यात्मिक क्षेत्र हो । हर क्षेत्र व विषय में मनुष्य को सफलता चाहिए। या यूं कहें कि सफलता प्राप्त करना प्रत्येक व्यक्ति का सपना होता है। इसी वजह से उसे पाने की जीवन भर होड़ लगी रहती है। लेकिन वास्तव में सफलता है क्या ? इस पर भी विचार होना चाहिए । हमारा मानना है कि सफलता वास्तव में वही होती है , जिससे अन्य प्राणियों को कोई कष्ट न हो अर्थात आप अन्य प्राणियों के प्रति अपने कर्तव्य का निर्वाह करते हुए और उनके जीवन का सम्मान करते हुए अपने आपको किसी भी क्षेत्र में सम्मानित स्थान पर स्थापित कर पाएं – यही आपकी सफलता है ।
पशुबल के आधार पर जब दूसरों के अधिकारों का दमन करते हुए और किसी व्यक्ति , व्यक्ति समूह या समुदाय या देश और समाज के अधिकारों का हनन कर जब बलात राज्यसत्ता प्राप्त की जाती है ,तब वह आपकी मुथमर्दी होती है , विजय नहीं । उस विजय पर चाहे आपके चाटुकार आप की वंदना कर लें , परंतु नैतिकता , धर्म , समाज के शांतिप्रिय लोग , दैवीय शक्ति , ईश्वर और यहां तक कि आपकी अपनी अंतरात्मा भी आपके विरोधी होते हैं । इसलिए ऐसी सफलता पर धर्म भी आपका विरोधी हो जाता है। माना कि आप ऐसी मुठमर्दी को इतिहास में भी महिमामंडित करा दें , परंतु इसके उपरांत भी आप ऐसी सफलता को प्राप्त कर इतिहास के उन नरपिशाचों में ही गिने जाओगे जिन्हें हम तैमूर , हलाकू , चंगेज ,औरंगजेब आदि के नाम से जानते हैं।
क्या यही सफलता है कि धन, बल ,संपत्ति, सत्ता, अधिकार पा लिया या इसके अलावा और कोई सफलता है ? अगर इसको आध्यात्मिक रूप से देखें तो यह तो कोई सफलता नहीं है। धन, संपत्ति ,सत्ता, अधिकार को प्राप्त करने में कितना पुरुषार्थ और कितना सही साधनों का प्रयोग किया होगा ? यह तथ्य अधिक महत्वपूर्ण है। सफलता यदि वास्तव में है तो उसके लिए तो देव संस्कृति ही अपनानी होगी। यदि धन, बल ,सत्ता या अधिकार छल से प्राप्त किया गया है तो वह सफलता नहीं है।
क्योंकि रेस में जब बहुत सारे प्रतियोगी एक साथ दौड़ते हैं और उसमें दौड़ने वालों को आप टँगड़ी मारकर के आगे निकले तो वह सफलता कही ही नहीं जाती, क्योंकि उसमें छल है।
सफलता की यदि वास्तविक परिभाषा हम देखना चाहते हैं तो उसमें भी मानवता का पुट होना चाहिए । नैतिक मूल्यों को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए। तथा भौतिक सफलताओं के अतिरिक्त आत्मिक एवं आध्यात्मिक स्रोत की खोज करनी चाहिए ।वही मनुष्य की वास्तविक सफलता है। और उसी का जीवन सफल है।
सफलता की प्राप्ति के लिए परिवार का प्रेम बहुत आवश्यक है । यदि आप अपने परिवार में प्रेमपूर्ण परिवेश बनाए रखने में सफल हैं तो समझिए कि आप एक सफल व्यक्ति हैं । क्योंकि आपने अपने परिवार में किसी के साथ छल कपट नहीं किया और आपने प्रत्येक परिजन के अधिकारों का सम्मान करते हुए अपने कर्तव्यों का निर्वाह किया । परिवार से मिला यह संस्कार आपको समाज में लेकर जाता है । तब आप प्रियजनों के साथ ऐसा ही व्यवहार करते हो तो समाज के लोग आपको स्वाभाविक रूप से एक सफल व्यक्ति के रूप में प्रशंसित करने लगते हैं।
जब समाज के लोग आपको इस प्रकार का प्रमाण पत्र देने लगते हैं तो समझ लें कि उस प्रमाण पत्र में आपके परिवार का संस्कार बोल रहा है । यही दृष्टिकोण हम किसी भी पार्टी या संगठन में रहते हुए अपने साथियों के साथ अपनाते हैं । जब हम अक्सर उनसे यह कहते हैं कि आप और हम सब एक ही परिवार के सदस्य हैं । तब समझ लें कि वहां भी आप अपने परिवार का संस्कार लेकर उपस्थित हैं । जिसकी सृष्टि आप वहां करना चाहते हैं । इस प्रकार परिवार से समाज और राष्ट्र का निर्माण होता है । इसी को “घर संसार” इन दो शब्दों के रूप में एक साथ बोलकर अभिव्यक्ति दी जाती है । बात साफ है कि घर से संसार बनता है , संसार से घर नहीं । अतः जो लोग घर में आग लगाकर संसार में शांति के उपदेश देने के लिए निकलते हैं , वे कभी सफल नहीं हो सकते । क्योंकि वह समाज में कोई सकारात्मक संदेश लेकर नहीं निकलते और समाज उन्हें समझ जाता है कि यह अपने घर में आग लगाकर आया है तो हमें क्या देगा ? इसलिए समझ लो कि घर को स्वर्ग बना कर संसार को स्वर्ग बनाने का सपना देखो , तभी जीवन सफल और सार्थक होगा।
आजकल राजनीति के लिए लोग अपने घर से उस निकम्मे , निकृष्ट , उत्पाती , उन्मादी लड़के को देते हैं जो घर में सब का जीना हराम के रखता है । समाज के लिए हमारे देश में सर्वोत्कृष्ट हीरा अर्थात परिवार के सबसे अच्छे व्यक्ति को देने की परंपरा थी , परंतु अब हम सबसे निकृष्ट व्यक्ति को समाज को देते हैं। जिससे समाज समाज नहीं रहा है बल्कि असामाजिक तत्वों का वर्चस्व उस पर स्थापित हो जाने से दम घुटने का स्थान हो गया है । यही कारण है कि समाज में राजनीतिक लोगों पर कोई विश्वास नहीं करता। राजनीतिक लोगों के लिए विश्वास का संकट बना हुआ है । यदि हम सबसे भरोसेमंद सबसे अधिक संस्कारित और सबसे अधिक मानवीय दृष्टिकोण रखने वाले व्यक्तियों को घर से निकाल कर समाज को देना आरंभ कर दें तो राजनीतिक लोगों या तथाकथित समाजसेवियों के प्रति जन्मे इस विश्वास के संकट को समाप्त किया जा सकता है।

श्रद्धा और विश्वास में अंतर

श्रद्धा और विश्वास में अंतर समझने के लिए पहले श्रद्धा और विश्वास को समझना होगा। श्रद्धा के विषय में महात्मा नारायण स्वामी द्वारा कृत पुस्तक योग रहस्य में निम्न प्रकार मार्गदर्शन किया है।
श्रद्धा किसे कहते हैं श्रद्धा श्र त + धा अर्थात् सच्चाई के धारण करने का नाम है। सच्चाई का ज्ञान तर्क से हुआ करता है ।ज्ञान होने पर उसे हृदय में धारण कर लेना श्रद्धा कहलाता है। हृदय में धारण कर लेने का अभिप्राय यह है कि मनुष्य उसके विपरीत आचरण न कर सके ।श्रद्धा रखते हुए सबसे पहले यमों को हृदय में धारण करने का अभ्यास करना चाहिए ।
इसके अतिरिक्त विश्वास मन की स्थिति है और मन में विचार है । जिसका तात्पर्य है कि विश्वास विचार द्वारा नियमित और पोषित है और जिस क्षेत्र की जानकारी होती है वहीं तक सीमित होता है । यह जानकारी देने पर मान लिया जाता है।लेकिन मन इसी विश्वास के आधार पर एक धारणा बना लेता है जो बनावटी हो सकती है और जिसका विनाश भी हो सकता है इसलिए विश्वास कभी भी निश्चित ही के रूप में नहीं होता है। क्योंकि वह मन की वस्तु है और मन स्वयं ही संकल्प और विकल्पों में घिरा रहता है।
यही विश्वास जब अपनी सीमाओं का अतिक्रमण करता है अर्थात बताए हुए पर यथावत विश्वास करने लगता है तो वह अंधविश्वास कहा जाता है। इसके विपरीत श्रद्धामन के विचारों से निर्मित नहीं है , वह हृदय में स्वत: स्फूर्त है। श्रद्धा अंतरात्मा में एक निश्चिती है। जो विश्वास की तरह मानसिक या बाह्य परिस्थितियों पर निर्भर नहीं करती है क्योंकि निश्चिती की स्थिति में द्वंद नहीं है। बल्कि द्वंद समाप्त हो जाता है। तथा सभी प्रकार की शंका प्रतिशंका,प्रश्न, प्रतिप्रश्न ,विरोध सब शांत हो जाते हैं।

ब्रह्म कण

ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत् । तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम् ।।
( ईशोपनिषद्, मन्त्र 1)

अर्थात जड़-चेतन प्राणियों वाली यह समस्त सृष्टि परमात्मा से व्याप्त है । मनुष्य इसके पदार्थों का आवश्यकतानुसार भोग करे, परंतु ‘यह सब मेरा नहीं है के भाव के साथ’ उनका संग्रह न करे ।
हमारे ऋषियों ने, ब्रह्म तत्ववेत्ताओं ने सुनिश्चित कर लिया था कि ईश्वर इस जग के कण-कण में विद्यमान हैं अर्थात ब्रह्म इस जग के कण-कण में विद्यमान हैं। यही भारतीय मनीषा का सदैव से उद्घोष रहा है कि इस सृष्टि का निर्माण ईश्वर ने किया है और ईश्वर का कण-कण में वास है।

 

यहां तक कि सूर्य की किरणों में से भी ओ३म की ध्वनि आना सिद्ध हो चुका है ,अर्थात सूर्य की किरणें भी ओ३म की ध्वनि उच्चारित करती हैं। इसको अपने ऋषियों की एवं वेदों की बात यदि हम कहें तो बहुत से अज्ञानी यह कहेंगे ऐसा नहीं हो सकता। क्योंकि जो भारतीय संस्कृति और सभ्यता को जानते नहीं हैं , एवम् उनकी विशेषताओं से परिचित नहीं है वही लोग इस प्रकार की बातें कर देते हैं।
वेदों में ओ३म को शब्द ब्रह्म कहा गया है। सूर्य की किरण जब पृथ्वी की ओर चलती है तो उनमें से एक विशेष आवाज निकलती है। उस निकलने वाली ध्वनि में ओ३म का उच्चारण सुनाई देता है , जिसकी पुष्टि अब विज्ञान ने भी कर दी है। विज्ञान की पुष्टि को अधिकतर सभी निश्चित मान लेते हैं ।आई,आई,टी, बी,एच,यू में भौतिक विज्ञान के प्रोफ़ेसर बी ,एन ,द्विवेदी ने शोध की है कि यूरोपियन स्पेस एजेंसी और नेशनल एयरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन अर्थात नासा की संयुक्त प्रयोगशाला सोलर हीलियसफेरिक ऑब्जर्वेटरी ने संयुक्त रूप से सूर्य से निकलने वाली ध्वनि को पकड़ा। उसका अध्ययन किया ।इसके लिए माइकलसन डॉपलर इमेजर विधि का इस्तेमाल किया गया ।प्रोफेसर द्विवेदी बताते हैं कि यह बड़ी उपलब्धि है। महीनों के विश्लेषण से यह निष्कर्ष निकला कि यह ध्वनि ओ३म के उच्चारण की तरह ही है। जो भारतीय वैदिक मनीषा का आधार है ।
इससे सिद्ध होता है कि ईश्वर की सत्ता सर्वोपरि है। ईश्वर सर्वव्यापक है, और वही इस सृष्टि का दृष्टा सृष्टा है ,सृजन करता है ,वही कोटि कोटि ब्रह्मांड का आधार है, नायक है, संचालक है ,नियंता है, पालक है निराकार है, निर्विकार है।
अर्थात अब विज्ञान भी वैज्ञानिक आविष्कारों के द्वारा कण-कण में ब्रह्म को स्वीकार करने लगा है ।इससे पूर्व हमारे ऋषियों ने इनको विशेष ज्ञान अर्थात दिव्य ज्ञान और दिव्य दृष्टि से पहले ही हमको बता दिया था ,लेकिन विज्ञान आज गॉड पार्टिकल्स की बात करता है , जबकि यह वेदों में पहले से ही निरूपित है।लेकिन यह हर्ष का विषय है कि वैज्ञानिकों ने अपने प्रयोगों के द्वारा गॉड पार्टिकल यानी ब्रह्म कणों से इस सृष्टि का निर्माण होना स्वीकार किया है, जो भारतीय दर्शन की प्राचीन मनीषा है।

देवेंद्र सिंह आर्य
चेयरमैन : उगता भारत

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