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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

एनसीआर में आ रहे बार-बार के भूकंप के झटके कहीं किसी महाविनाश का संकेत तो नहीं

देश की राजधानी दिल्ली में पिछले 30 दिनों में चार बार भूकंप के झटके अनुभव किए गए हैं । भूगर्भीय हलचलों के विशेषज्ञ इस प्रकार के बार-बार के झटकों को किसी बड़ी आपदा का संकेत भी माना करते हैं । जहां तक दिल्ली की बात है तो यह भूकंप संभावित क्षेत्रों के सबसे अधिक खतरनाक क्षेत्रों में सम्मिलित है । ऐसे में यह सवाल बार-बार उठता है कि राजधानी दिल्ली में आ रहे बार-बार के यह भूकंप के झटके किसी खतरनाक आपदा की ओर तो संकेत नहीं कर रहे हैं ? निश्चय ही शासन प्रशासन को इस ओर ध्यान देना चाहिए । जिससे कि समय रहते किसी बड़ी आपदा से देश को बचाया जा सके ।

हमारा मानना रहा है कि दिल्ली और उसके आसपास के एनसीआर कहे जाने वाले क्षेत्र में जनसंख्या का जिस प्रकार जमावड़ा करवाया गया है वह विकास न होकर विनाश की नींव रखी गई है। विशेष रुप से तब जबकि यह तथ्य हमारे अधिकारियों और विशेषज्ञों को भली प्रकार ज्ञात है कि दिल्ली और उसके आसपास के क्षेत्रों की मिट्टी का निर्माण गंगा जमुना द्वारा लायी गई बालू मिट्टी से हुआ है । इस मिट्टी में बहुमंजिला इमारतों का खड़ा होना बेहद खतरनाक है । क्योंकि इस प्रकार की मिट्टी में बहुमंजिला इमारतों को झेलने की शक्ति नहीं होती।
इसके उपरांत भी पूरे एनसीआर में बहुमंजिला इमारतों का निर्माण धड़ाधड़ होता रहा है और हो भी रहा है । जब कभी मैं इन बहुमंजिला इमारतों के पास से निकलता हूं तब तब अपने अधिकारियों और शासन में बैठे लोगों की उस ‘लूट प्रवृत्ति’ पर बहुत अधिक दुखी होता हूं जिसके अंतर्गत यह सब कुछ हो रहा है । लगता है कि बहुमंजिला इमारतें खड़ी नहीं की जा रही हैं बल्कि हमारे विनाश की दीवारें ऊंची की जा रही हैं । यहां के खेतों को और हरियाली को उजाड़कर जिस प्रकार धरती के साथ अन्याय किया गया है उसका परिणाम सिवाय विनाश के और क्या हो सकता है ?

वास्तव में जब भारत में अंग्रेज आए थे तो उन्होंने कॉलोनी सिस्टम को यहां पर लागू किया था । यहां के किसानों की जमीनों को सस्ती से सस्ती दर पर खरीद कर उन्होंने यहीं के लोगों को ऊंचे दामों में जमीनों को बेचना आरंभ किया था और उन्हें आवासीय भूमि के रूप में बेचकर मोटा मुनाफा कमाकर यहां से ले गए थे ।
उन्हीं की इस प्रकार की मूर्खता से महानगरों के निर्माण की प्रक्रिया भारत में आरंभ हुई । बाद में 1947 में जब देश आजाद हुआ तो उस समय भी शासन में बैठे लोगों ने लूट की इस प्रवृत्ति को यथावत बनाए रखा । पिछले शासन में जिस प्रकार शासन और प्रशासन के साथ-साथ मुनाफा खोर प्रॉपर्टी डीलर या तथाकथित बिल्डर शामिल हुआ करते थे उन सबके बीच बहुत बढ़िया ढंग से गठबंधन तय हो गया और ‘कॉमन मिनिमम एजेंडा’ के आधार पर उन्होंने इस लूट को यथावत बनाए रखा ।
परिणाम यह निकला कि महानगर और भी अधिक विस्तार पाते चले गए । दिल्ली जैसा महानगर जो पहले ही आबादी की मार झेल रहा था , अब बेतहाशा रूप से बढ़ने लगा और इतना बढ़ा कि तथाकथित अपने विकास के पंजों में गाजियाबाद नोएडा से लेकर गुड़गांव तक की भूमि को हड़प कर निकल गया और यहां पर जनसांख्यिकीय घनत्व को बहुत खतरनाक स्तर तक बढ़ा दिया।
गुड़गांव और गाजियाबाद की दूरी को खत्म कर दिया अर्थात नोएडा गाजियाबाद से लेकर गुरुग्राम तक कहीं हरियाली नहीं छोड़ी । इसी प्रकार फरीदाबाद से लेकर मेरठ तक के क्षेत्र को आबादी से ढकने की बहुत ही खतरनाक कोशिश आज भी जारी है। इस मूर्खतापूर्ण सोच के चलते जनसंख्या का घनत्व यहां एनसीआर में बढ़ रहा है तो वहीं जन समस्याएं भी बेतहाशा बढ़ रही हैं । आम आदमी की समस्याओं का निराकरण न तो शासन के पास है न प्रशासन के पास है । पावर और पहुंच रखने वाले लोग अपनी समस्याओं का समाधान अधिकारियों से मिलकर करा सकते हैं , परंतु एक कमजोर व्यक्ति आज भी अंग्रेजों के समय की तरह ही साहब के ऑफिस में जाकर चिक उठाकर साहब के दर्शन करने तक का साहस नहीं कर पाता ।
आज स्थिति यह है कि एनसीआर में हवा , पानी सब्जी, दूध , फल , छाछ सब कुछ मोल का हो गया है। आजादी के नाम पर लोगों की आजादी को ही यह महानगर लील गए हैं । व्यक्ति पैसा कमाकर के भी आत्मनिर्भर नहीं है , ऐसी स्थिति में महानगर हमारे विनाश का कारण बन रहे हैं।
दिल्ली में बार-बार आ रहे भूकंप के झटके लगता है प्रकृति के रुष्ट होने का संकेत दे रहे हैं । दिल्ली में एक बार फिर भूकंप का झटका महसूस किया गया है। हालांकि, रिक्टर स्केल पर भूकंप की तीव्रता केवल 2.2 थी । इस वजह से बहुत कम लोगों को इसका आभास हुआ । पिछले 30 दिनों में चौथी बार भूकंप के झटके महसूस किए गए हैं । बताया जा रहा है कि इस बार भूकंप का केंद्र पीतमपुरा इलाके में था ।
इससे पहले 10 मई को दोपहर में करीब 1.45 बजे भूकंप के झटके महसूस किए गए थे । रिएक्टर पैमाने पर इसकी तीव्रता 3.5 बताई जा रही थी । भूकंप का केंद्र उत्तर-पूर्वी दिल्ली में वजीरपुर के समीप सतह से पांच किलोमीटर की गहराई में स्थित था ।
इससे पहले 12 और 13 अप्रैल को दिल्ली में भूकंप के झटके महसूस किए गए थे । 12 अप्रैल को आए भूकंप की तीव्रता 3.5 थी, जबकि 13 अप्रैल को आए भूकंप की तीव्रता रिक्टर स्केल पर 2.7 थी । दोनों भूकंप के झटकों का केंद्र दिल्ली ही था । इस प्रकार के बार-बार के झटके उस समय चिंता को बढ़ा देते हैं जब पांच भूकंपीय क्षेत्रों में से, दिल्ली चौथे क्षेत्र में आता है।
भूकंप के लिहाज से दिल्ली हमेशा काफी संवेदनशील इलाका माना जाता है । मैक्रो सेस्मिक जोनिंग मैपिंग में भारत को 4 जोन में बांटा गया है। यह जोन-2 से 5 तक है। इसमें जोन-2 सबसे कम संवेदनशील क्षेत्र है, जबकि जोन-5 ऐसा क्षेत्र है, जहां भूकंप आने की आशंका सबसे ज्यादा है। दिल्ली को जोन-4 में रखा गया है।
आज कोरोना संकट ने भारत के प्राचीन समाज निर्माताओं की उस सोच को स्पष्ट कर दिया है जिसमें वह हाथ मिलाकर या गले मिलकर या एक दूसरे का चुंबन लेकर अपने प्रेम और आत्मीय भाव का प्रदर्शन न करके दूर से नमस्ते किया करते थे । इसके अतिरिक्त किसी का झूठा न खाना और प्रातः काल भ्रमण आदि करते हुए शाकाहार पर सात्विक जीवन व्यतीत करना जैसी सारी सामाजिक व्यवस्था यह स्पष्ट कर रही है कि हमारे पूर्वजों की जीवनशैली ही स्वस्थ रहने के लिए उपयुक्त थी । जिसे आज का तथाकथित सभ्य समाज चोटें और चांटे खाकर अपनाने पर विवश हो रहा है । कहीं ऐसा न हो कि हमारे पूर्वजों के द्वारा दूर-दूर क्षेत्रों में गांवों को बसाने और उन्हें आत्मनिर्भर बनाए रखने के दृष्टिकोण से फल , फूल , सब्जी , दूध, दही अन्न ,औषधि आदि वही पैदा करने की व्यवस्था के उनके दृष्टिकोण और चिंतन को भी यह संसार उस समय समझे जिस समय महाविनाश मच गया हो।
प्रधानमंत्री श्री मोदी द्वारा जिस समय सौ मेगा सिटी बसाने का निर्णय लिया गया था , हमने उस समय भी मेगा सिटी बसाने की सरकार की योजना का यह कहकर विरोध किया था कि मेधा ग्राम बसाइए और लोगों को गांवों में ही सारी सुविधाएं देकर रोकने का प्रयास कीजिए । यदि महानगरों में ला लाकर गांव को बसाओगे तो भयंकर परिणाम भी भुगतने पड़ सकते हैं । अब फिर हम भारत सरकार से अनुरोध करते हैं कि वह मेधा ग्राम बसाने की योजना पर काम करे , और महानगरों पर बढ़ती जनसंख्या के दबाव को यथाशीघ्र कम करने का प्रयास करे।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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