समझें, आत्मकेन्द्रित होने के सही अर्थ

प्राय: देखा गया है कि लोग आत्मकेन्द्रित होने का अर्थ अपने तक सीमित रहना, जिसे अंग्रेजी में रिजर्व नेचर कहते हैं। यह तो स्वार्थपरता है, अर्थ का अनर्थ है। आत्मकेन्द्रित होने से वास्तविक अभिप्राय है-अपने आत्मस्वरूप में केन्द्रित होना, अनंत आनंद में जीना, संतोष, सरसता और शांति में जीना। इसके लिए ध्यान में उतरने का निरंतर प्रयास करें। याद रखें, आत्मा का सौंदर्य जब आपके चेहरे पर सौम्यता बनकर प्रकट होने लगे तो समझिए आप आत्म केन्द्रित हो चुके हैं।
क्षण-क्षण में जीना
अर्थात एक एक क्षण को बड़े साहस के साथ जिओ। प्रेम, उदारता, सरलता और उत्साह में जीने की प्रवृत्ति बच्चों से सीखनी चाहिए। जिंदगी के एक एक क्षण को बड़े आनंद के साथ जीना चाहिए, क्योंकि प्रभु ने जो निश्चित सांस दिये हैं, वे बड़े ही अमूल्य है। इसलिए एक एक क्षण को भगवान कृष्ण की तरह विषम से विषम परिस्थिति में भी आनंद और मुस्कान के साथ बिताईए। जीवन रूपी वीणा से दूसरों को मंत्रमुग्ध करने वाली उर्मियां निकालते रहिए। मन को कभी अवसाद अर्थात डिप्रेशन में न जाने दीजिए। हमेशा उत्साह और ऊर्जा से भरे रहिए। जीवन क्षण भंगुर है। इस संदर्भ में महात्मा कबीर सतर्क करते हुए कितना सुंदर कहते हैं-
कबिरा धूल सकेल कै,
पुरिया बांधी देह।
दिवस चार को पेखना,
अंत खेह की खेह।।
पेखना अर्थात-तमाशा
खेह अर्थात-राख
अत: सर्वदा मन में यह भाव रखो कि गुजारा ही नही करना, अपितु जिंदगी को जी भरके जीना है, आनंद के साथ जीना है पूरे उत्साह से जीना है। यजुर्वेद के चालीसवें अध्याय में आया है कि जो बीत गया उसे बीत जाने दो, उसकी दुखद याद, कभी भी चित्त पर मत आने दो क्योंकि वह दुखद घटना आपके चित्त में ऐसी संवदेना पैदा करेगी जिससे उदासी और निराशा या डिप्रेशन उत्पन्न होगी और आपका उत्साह टूट जाएगा। जीना है तो मन में उत्साह की निरंतरता को बनाए रखिए। एक एक क्षण का सदुपयोग कीजिए और अंधेरे से प्रकाश की ओर बढ़ते रहिए और इन पंक्तियों को गुनगुनाते रहिए-
महज सुनहरा ख्वाब, नही ये जिंदगी।
कांटों से घिरा गुलाब, है ये जिंदगी।।
जिसने इस सच्चाई को गहराई से समझा।।
उसी ने संवारली, ये जिंदगी।।
मायावाद के भंवर में फंसे लोगों के संदर्भ में
महात्मा गौतमबुद्घ ने इस संसार को दुखों का घर कहा था। हमारे वेद उपनिषद और गीता ने आत्मा का आवागमन के क्रम में आबद्घ होने का मूल कारण कामना तृष्णा को माना है। जो तृष्णा के भंवर में फंस जाते हैं, उन्हें कभी मानसिक शांति नही मिलती चाहे वे धन के कुबेर क्यों न बन जाएं। जो लोग काले धंधे करते हैं और मानसिक शांति की बाट देखते हैं, ऐसे लोग मूर्खों के स्वर्ग में रहते हैं। वे मृगतृष्णा में जीते हैं। इस संदर्भ में कवि व्यंग्यात्मक शैली में कहता है-
ये कैसे लोग हैं?
जो हौंसलों को खोकर
जुनून ढूंढ़ते हैं।
हशरतों की आग में जलते हैं
और दिल का सुकून ढूंढ़ते हैं।

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