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इतिहास के पन्नों से

1857 की क्रांति , धन सिंह गुर्जर कोतवाल और भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन

10 मई 1857 की प्रातः कालीन बेला। स्थान मेरठ ।
क्रांति का प्रथम नायक धनसिंह गुर्जर कोतवाल। नारा – ‘मारो फिरंगियों को।’
मेरठ में ईस्ट इंडिया कंपनी की थर्ड केवल्री की 11 और 12 वी इन्फेंट्री पोस्टेड थी । 10 मई 1857 रविवार का दिन था। रविवार के दिन ईसाई अंग्रेज अधिकतर चर्च जाने की तैयारी प्रातःकाल से ही करने लगते हैं।सब उसी में व्यस्त थे।
वास्तव में दिनांक 6 मई 1857 को 90 भारतीय जवानों में से 85 ने वह कारतूस मुंह से खोलने से मना कर दिया , जिस -जिस राइफल के कारतूस में गाय और सूअर की चर्बी लगी होने की चर्चा फैल गई थी।
इन 85 भारतीय सैनिकों का कोर्ट मार्शल करते हुए अंग्रेजों ने उन्हें आजीवन कारावास की सजा दी। जो मेरठ की जेल में बंद थे , इसके अलावा 839 भारतीय लोग इसी विक्टोरिया जेल में बंद थे।
तभी सुबह-सुबह कोतवाल धनसिंह चपराणा ने अंग्रेजों पर यकायक गोलियां चलानी शुरू कर दीं । जब तक वह समझ पाते और संभल पाते तब तक बहुत सारे अंग्रेज मार दिए गए और विक्टोरिया जेल का फाटक खोल कर वह 85 सैनिक तथा शेष 839 अन्य कैदी लोग जेल से मुक्त कर दिए गए । यह सभी लोग एक साथ हथियार लेकर अंग्रेजों पर टूट पड़े। इस प्रकार मेरठ से प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का बिगुल बज गया। इस क्रांति के नायक कोतवाल धनसिंह गुर्जर बने।

संक्षिप्त इतिहास

14 फरवरी 1483 को बाबर का जन्म हुआ। जो दिनांक 17 नवंबर 15 25 ई0 को पांचवीं बार सिंध के रास्ते से भारत आया था। जिसने 27 अप्रैल 1526 को दिल्ली की बादशाहत कायम की। 29 जनवरी 1528 को राणा सांगा से चंदेरी का किला जीत लिया।
लेकिन 4 वर्ष पश्चात ही दिनांक 30 दिसंबर 1530 को धौलपुर में बाबर की मृत्यु हो गई। महारानी एलिजाबेथ प्रथम ने 31 दिसंबर 1600 ई0 को ईस्ट इंडिया कंपनी की स्वीकृति दी।
2 जनवरी 1757 को नवाब सिराजुद्दौला से ईस्ट इंडिया कंपनी ने कोलकाता छीन लिया । 9 फरवरी 1757 को संधि हुई । जिसमें काफी रियासत अंग्रेजों को दी गई। लेकिन 13 फरवरी 1757 को लखनऊ सहित अवध पर कब्जा कर लिया।
23 जून 1757 को प्लासी का युद्ध लॉर्ड क्लाइव के नेतृत्व में अंग्रेजी सेना,और मुगल सेना के बीच हुआ जिसमें विशाल मुगल सेना का सेनापति मीर जाफर लॉर्ड क्लाइव से दुरभिसन्धि करके षड्यंत्र के तहत जानबूझकर हार गया।
20 दिसंबर 1757 को लॉर्ड क्लाइव बंगाल का गवर्नर बना। 30 दिसंबर 1803 को दिल्ली के साथ-साथ कई अन्य शहरों पर ईस्ट इंडिया कंपनी का आधिपत्य हो गया। 26 फरवरी 18 57 को पश्चिम बंगाल के बुरहानपुर में आजादी की लड़ाई की शुरुआत हुई। जिसमें मंगल पांडे को 8 अप्रैल 1857 को खड़कपुर की बैरक में फांसी दे दी गई।
हमें क्रांतिवीर मंगल पांडे के विषय में यह जान लेना चाहिए कि बैरकपुर में कोई जल्‍लाद नहीं मिलने पर ब्रिटिश अधिकारियों ने कलकत्‍ता से चार जल्‍लाद इस क्रांतिकारी को फांसी देने के लिए बुलवाए थे। जिन्होंने उन्हें फांसी देने से मना कर दिया था। इस समाचार के मिलते ही कई छावनियों में ईस्ट इंडिया कंपनी के विरुद्ध असंतोष भड़क उठा । इसे देखते हुए उन्‍हें 8 अप्रैल 1857 की सुबह ही फांसी पर लटका दिया गया । इतिहासकार किम ए. वैगनर की किताब ‘द ग्रेट फियर ऑफ 1857 – रयूमर्स, कॉन्सपिरेसीज एंड मेकिंग ऑफ द इंडियन अपराइजिंग’ में बैरकपुर में अंग्रेज अधिकारियों पर हमले से लेकर मंगल पांडे की फांसी तक के घटनाक्रम के बारे में सभी तथ्यों का विस्तार से वर्णन किया गया है ।. ब्रिटिश इतिहासकार रोजी लिलवेलन जोंस की किताब ‘द ग्रेट अपराइजिंग इन इंडिया, 1857-58 अनटोल्ड स्टोरीज, इंडियन एंड ब्रिटिश में बताया गया है कि 29 मार्च की शाम मंगल पांडे यूरोपीय सैनिकों के बैरकपुर पहुंचने को लेकर बेचैन थे । उन्‍हें लगा कि वे भारतीय सैनिकों को मारने के लिए आ रहे हैं ।इसके बाद उन्‍होंने अपने साथी सैनिकों को उकसाया और ब्रिटिश अफसरों पर हमला किया । उन्हें 18 अप्रैल 18 57 के दिन फांसी देना निश्चित किया गया था । परंतु जब जल्लादों ने उन्हें फांसी देने से इनकार कर दिया तो नियत तिथि से 10 दिन पहले ही क्रांतिकारी मंगल पांडे को फांसी की सजा दे दी गई थी। हम क्रांतिकारी मंगल पांडे का पूरा सम्मान करते हुए और उनकी क्रांति के प्रति समर्पण की भावना को नमन करते हुए यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि मेरठ की क्रांति से उनका कोई संबंध नहीं था।
10 जनवरी 18 18को मराठों और अंग्रेजो के बीच तीसरी और अंतिम लड़ाई हुई थी। वास्तव में शूरवीर महाराणा प्रताप छत्रपति शिवाजी महाराज महाराजा रणजीत सिंह आदि भी आजादी के दीवाने थे । उन्हीं से प्रेरणा लेकर मई 1857 का स्वतंत्रता संग्राम प्रारंभ हुआ था। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में तात्या टोपे , रानी लक्ष्मीबाई , चांद बेगम ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।राजस्थान के शहर कोटा में लाला जयदयाल कायस्थ , मेहराब खान पठान ने 15 अक्टूबर 18 57 को विद्रोह किया । जिनको अंग्रेजों ने फांसी लगाई थी , अदालत के सामने शहीद चौक उसी स्थान पर बना है।
इसके अलावा सम्राट नागभट्ट प्रथम , बप्पा रावल, नागभट्ट द्वितीय , गुर्जर सम्राट मिहिर भोज, गुरु तेग बहादुर ,गुरु गोविंद सिंह, बंदा वीर बैरागी ,वीर हकीकत राय आदि अनेकों क्रांतिकारी महापुरुष कोतवाल धन सिंह गुर्जर के प्रेरणा स्रोत थे।
10 मई 1857 को मेरठ से इस क्रांति का जब बिगुल बजा तो इस स्वतंत्रता संग्राम की चिंगारी पूरे भारतवर्ष में बहुत ही शीघ्रता के साथ फैल गई और प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के यह सैनिक 11 मई 1857 को तत्कालीन मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर से मिले और उन्होंने बहादुर शाह जफर को नेतृत्व संभालने के लिए आग्रह किया । लेकिन तत्समय भारत पर शासन करने वाली ईस्ट इंडिया कंपनी ने भी पराजय के बाद शीघ्रता से कार्यवाही कर क्रांतिकारियों का दमन करते हुए सत्ता पर अपनी पकड़ बनाने का प्रयास किया। जिसे इतिहास में प्रति क्रांति के नाम से जाना जाता है ।
दिल्ली में अंग्रेज अपने आपको बचाने के लिए कोलकाता गेट पर पहुंच गए । यमुना किनारे बनी चुंगी चौकी में आग लगाए जाने और टोल कलेक्टर की हत्या की जानकारी मिलने के बाद दिल्ली में तैनात लगभग सभी प्रमुख अंग्रेज तथा अधिकारी अपने नौकरों सहित कोलकाता गेट पहुंच गए। कोलकाता गेट यमुना पार कर दिल्ली आने वालों के लिए सबसे नजदीकी गेट था । 11 मई को सुबह मेरठ से क्रांतिकारी सैनिकों के दिल्ली में प्रवेश करने के बाद अंग्रेज इस बात को सोचने के लिए विवश हो गए कि क्रांतिकारी फिर इसी गेट से दिल्ली में घुसने का प्रयास करेंगे । इसलिए यहां अतिरिक्त फौजी तैनाती का हुक्म दिया गया । आज के यमुना बाजार के निकट कोलकाता गेट हुआ करता था । लेकिन आज वहां पर उपलब्ध नहीं है , क्योंकि बाद में जब अंग्रेजो के द्वारा रेलवे लाइन यहां से निकाली गई तो वह गेट तोड़ना पड़ा था।
11 मई 1857 को दिल्ली के ज्वाइंट कमिश्नर थियोफिलस मैटकॉफ जान बचाकर भागे थे । कोलकाता गेट के पास क्रांतिकारी सिपाहियों के साथ हुई मुठभेड़ के बाद कैप्टन डग्लस और उसके सहयोगी भागते हुए लालकिले के लाहौरी गेट तक पहुंचे थे । उसके बाद दिल्ली में जो स्थितियां पैदा हुईं उसमें अंग्रेजों को जान के लाले पड़ गए । जिसे जहां अवसर प्राप्त होता था, वहीं वह हमला कर देता था
। अंग्रेजों को इससे बचने के लिए जगह जगह शरण लेनी पड़ी।
दादरी जिला बुलंदशहर में एक छोटी सी रियासत हुआ करती थी ।दादरी के अलावा कठेड़ा, बढ़पुरा, चिटेहरा,बील अकबरपुर,नगला नैनसुख सैंथली,लुहार्ली , चीती , देवटा आदि गांव के क्रांतिकारियों ने एकजुट होकर अंग्रेजी शासन को उखाड़ फेंकने के लिए बिगुल बजाया था । दादरी राव दरगाही सिंह की रियासत हुआ करती थी , जिनकी मृत्यु 1819 में हो गई थी। उनका बेटा राव रोशनसिंह था तथा राव उमराव सिंह ,राव विशन सिंह, राव भगवंत सिंह उनके भतीजे इस प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में शामिल हुए थे । जिन्होंने अंग्रेजी सेना को बुलंदशहर की तरफ से कोट के पुल से आगे नहीं बढ़ने दिया था। दिल्ली में बादशाह जफर से मिलकर उनके नेतृत्व में अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध लड़ा ।बुलंदशहर जिले में ही एक छोटा सा मालागढ़ ग्राम होता था । जिसका नवाब वलीदाद खान था, जो बहादुर शाह जफर का रिश्तेदार था, राव उमराव सिंह ,रोशन सिंह ने तोपखाना से 30 व 31 मई को गाजियाबाद के हिंडन नदी के पुल पर अंग्रेज सेना को दिल्ली जाने से रोका था । जहां पर अंग्रेजों की कब्रें आज भी बनी हुई है ।यह कार्यवाही नवाब वलिदाद खान मालागढ़ और दादरी के रियासतदार राव उमराव सिंह के नेतृत्व में हुई थी।
अंग्रेजी सेना के काफी सैनिक एवं अधिकारी वहां पर मारे गए थे और अंग्रेजी सेना वहां से भागकर मेरठ की तरफ गई और मेरठ से उन्हें दिल्ली के लिए बागपत के रास्ते से आए थे । बागपत के रास्ते पर पढ़ने वाले एक जाति विशेष के गांवों के लोगों ने क्रांतिकारियों के साथ विश्वासघात करते हुए अंग्रेजों को शरण दी तथा दिल्ली जाने के लिए अंग्रेजों का रास्ता सुगम किया।
यह एक बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है कि दादरी के इन शहीदों को इतिहास में उचित स्थान नहीं मिला।
क्रांतिकारियों ने सिकंदराबाद के पास अंग्रेजी सेना का खजाना लूट लिया । गुलावठी के पास दो दर्जन अंग्रेज सिपाहियों को मौत के घाट उतार दिया । उनके 90 घोड़े छीन लिए । अलीगढ़ से दादरी और गाजियाबाद तक क्रांतिकारी अंग्रेजों के सामने कठिन चुनौती पेश करते रहे इस सबसे नाराज होकर अंग्रेजों ने एक दिन रात में दादरी रियासत पर हमला कर दिया।
जिसमें कई क्रांतिकारी शहीद हुए।
अंग्रेज जितना अपनी नींव को भारतवर्ष में जमाने का प्रयास कर रहे थे , उतना ही भारतीय जनता उनके खिलाफ हो रही थी । इसका प्रभाव राजपूताना क्षेत्र में नसीराबाद , देवली , अजमेर , कोटा , जोधपुर आदि जगहों पर भी देखने को मिला था । राजपूताना में उस समय अट्ठारह रजवाड़े थे और वे सभी देशी शासक अंग्रेज राज्य के प्रबल समर्थक थे , फिर भी यहां के छोटे जागीरदारों एवं जनता का मानस अंग्रेजों के विरुद्ध था , जिसके फलस्वरूप मेरठ में हुई क्रांति का प्रभाव पड़ा।
मारवाड़ के तत्कालीन महाराजा तखत सिंह व कोटा के महाराव रामसिंह दोनों अंग्रेज भक्त थे। फिर भी मारवाड़ में आउवा के ठाकुर कुशल सिंह के नेतृत्व में 8 सितंबर को तथा कोटा में लाला जय दयाल एवं मेहराब खान पठान के नेतृत्व 15 अक्टूबर 1857 को मारवाड़ में अंग्रेज सरकार के विरुद्ध विद्रोह भड़क गया था।
तत्कालीन अंग्रेज मेजर बर्टन चाहता था कि महाराज अपनी सेना में विद्रोह फैलाने वाले जय दयाल आदि 57 अफसरों को गिरफ्तार कर उन्हें दंडित करें अथवा उन्हें अंग्रेजों के हवाले कर दिया जाए । 14 अक्टूबर को मेजर बर्टन दरबार से मिलने गढ़ में गए और पुनः अपनी बात दोहराई । महाराव रामसिंह भी अंग्रेज भक्ति और सेना के विद्रोही रुख को भी भली-भांति पहचानते थे , फिर भी यह उनके वश में नहीं था कि वह जयदयाल कायस्थ और मेहराब आदि सेनापतियों को गिरफ्तार करके उन्हें दंड दे सके। इसलिए उसने मेजर बर्टन की राय नहीं मानी। लेकिन बर्टन की इस राय के जाहिर होने पर फौज भड़क उठी और 15 अक्टूबर 1857 को एकाएक सेना और जनता ने एजेंट के बंगले को चारों ओर से घेर लिया। वह कोटा नगर के बाहर नयापुरा में मौजूद कलेक्ट्री के पास स्थित वर्तमान बृजराज भवन में रहता था। विद्रोहियों ने एजेंट के बंगले पर 4 घंटे तक गोलाबारी की ।बाकी लोग सीढी लगाकर बंगले में घुस गए। वह छत पर पहुंचे और मेजर तथा उसके दोनों पुत्रों को तलवार से मौत के घाट उतार दिया।
87 क्रांतिकारियों को अंग्रेजों ने बुलंदशहर चौराहे पर कत्लेआम अर्थात कालाआम के पेड़ पर लटका कर फांसी दी । जिसमें उस समय के बुलंदशहर और मेरठ जनपद के अनेकों गांवों के लोगों को भी यत्र तत्र फांसी के फंदे पर लटका दिया गया था। स्वयं लेखक के पूर्वज चौधरी सुलेखा सिंह को भी इसी समय फांसी पर लटकाया गया था। कवि ने कितने अच्छे शब्दों में कहा है कि :-

स्वतंत्रता रण के रणनायक अमर रहेगा तेरा नाम।
नहीं स्मारक की जरूरत खुद स्मारक तेरा नाम ।।
मां हम फिदा हो जाते हैं विजय केतु फहराने आज।
तेरी बलिवेदी पर चढ़कर मां जाते शीश कटाने आज।।

महर्षि दयानंद और 18 57 क्रांति

1857 की क्रांति न केवल भारत के राष्ट्रीय इतिहास के लिए अपितु आर्य समाज जैसी क्रांतिकारी संस्था के लिए भी एक महत्वपूर्ण वर्ष है । इस समय भारत के उस समय के चार सुप्रसिद्ध संन्यासी देश में नई क्रांति का सूत्रपात कर रहे थे। इनमें से स्वामी आत्मानंद जी की अवस्था उस समय 160 वर्ष थी। जबकि स्वामी आत्मानंद जी के शिष्य स्वामी पूर्णानंद जी की अवस्था 110 वर्ष थी । उनके शिष्य स्वामी विरजानंद जी उस समय 79 वर्ष के थे तो महर्षि दयानंद की अवस्था उस समय 33 वर्ष थी।
बहुत कम लोग जानते हैं कि इन्हीं चारों संन्यासियों ने 1857 की क्रांति के लिए कमल का फूल और चपाती बांटने की व्यवस्था की थी ।
कमल का फूल बांटने का अर्थ था कि जैसे कीचड़ में कमल का फूल अपने आपको कीचड़ से अलग रखने में सफल होता है , वैसे ही हमें संसार में रहना चाहिए अर्थात हम गुलामी के कीचड़ में रहकर भी स्वाधीनता की अनुभूति करें और अपने आपको इस पवित्र कार्य के लिए समर्पित कर दें । गुलामी की पीड़ा को अपनी आत्मा पर न पड़ने दें बल्कि उसे एक स्वतंत्र सत्ता स्वीकार कर स्वतंत्रता की प्राप्ति के लिए साधना में लगा दें।
इसी प्रकार चपाती बांटने का अर्थ था कि जैसे रोटी व्यवहार में और संकट में पहले दूसरे को ही खिलाई जाती है , वैसे ही अपने इस जीवन को हम दूसरों के लिए समर्पित कर दें । हमारा जीवन दूसरों के लिए समर्पित हो जाए , राष्ट्र के लिए समर्पित हो जाए ,लोगों की स्वाधीनता के लिए समर्पित हो जाए। ऐसा हमारा व्यवहार बन जाए और इस व्यवहार को अर्थात यज्ञीय कार्य को अपने जीवन का श्रंगार बना लें कि जो भी कुछ हमारे पास है वह राष्ट्र के लिए है , समाज के लिए है , जन कल्याण के लिए है।
स्वतंत्रता का प्रथम उद्घोष
अपने भारतभ्रमण के दौरान देशवासियों की दुर्दशा देख कर महर्षि इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि पराधीन अवस्था में धर्म और देश की रक्षा करना कठिन होगा , अंगेजों की हुकूमत होने पर भी महर्षि ने निडर होकर उस समय जो कहा था , वह आज भी सत्यार्थप्रकाश में उपलब्ध है , उन्होंने कहा था ,
“चाहे कोई कितना ही करे, किन्तु जो स्वदेशी राज्य होता है, वह सर्वोपरि उत्तम होता है। किन्तु विदेशियों का राज्य कितना ही मतमतान्तर के आग्रह से शून्य, न्याययुक्त तथा माता-पिता के समान दया तथा कृपायुक्त ही क्यों न हो, कदापि श्रेयस्कर नहीं हो सकता”

महर्षि दयानंद ने यह बात संवत 1913 यानी सन 1855 हरिद्वार में उस समय कही थी जब वह नीलपर्वत के चंडी मंदिर के एक कमरे में रुके हुए थे , उनको सूचित किया गया कि कुछ लोग आपसे मिलने और मार्ग दर्शन हेतु आना चाहते हैं , वास्तव में लोग क्रांतिकारी थे , उनके नाम थे —
.
1.धुंधूपंत – नाना साहब पेशवा ( बालाजी राव के दत्तक पुत्र )
.2. बाला साहब .
3.अजीमुल्लाह खान .
4.ताँतिया टोपे .
5.जगदीश पर के राजा कुंवर सिंह .
इन लोगों ने महर्षि के साथ देश को अंगरेजों से आजाद करने के बारे में मंत्रणा की और उनको मार्ग दर्शन करने का अनुरोध किया ,निर्देशन लेकर यह अपने अपने क्षेत्र में जाकर क्रांति की तैयारी में लग गए , इनके बारे में सभी जानते हैं
,
महर्षि और रानी लक्ष्मीबाई की भेंट

सन्‌ 1855 ई. में स्वामी जी फर्रूखाबाद पहुंचे। वहॉं से कानपुर गये और लगभग पॉंच महीनों तक कानपुर और इलाहाबाद के बीच लोगों को जाग्रत करने का कार्य करते रहे। यहॉं से वे मिर्जापुर गए और लगभग एक माह तक आशील जी के मन्दिर में रहे। वहॉं से काशी जाकर में कुछ समय तक रहे.स्वामीजी के काशी प्रवास के दौरान झांसी की रानी लक्ष्मीबाई उनके मिलने गई .रानी ने महर्षि से कहा कि ” मैं एक निस्संतान विधवा हूँ , अंग्रजों ने घोषित कर दिया है कि वह मेरे राज्य पर कब्ज़ा करने की तैयारी कर रहे हैं ,और इसके झाँसी पर हमला करने वाले हैं. अतः आप मुझे आशीर्वाद दीजिये कि मैं देश की रक्षा हेतु जब तक शरीर में प्राण हों फिरंगियों से युद्ध करते हुए शहीद हो जाऊँ .महर्षि ने रानी से कहा ,” यह भौतिक शरीर सदा रहने वाला नहीं है , वे लोग धन्य हैं जो ऐसे पवित्र कार्य के लिए अपना शरीर न्योछावर कर देते हैं , ऐसे लोग मरते नहीं बल्कि अमर हो जाते हैं , लोग उनको सदा आदर से स्मरण करते रहेंगे , तुम निर्भय होकर तलवार उठाओ विदेशियों का साहस से मुकाबला करो
अब कोटा नगर के अपने प्रकरण पर पुनः लौटते हैं । बर्टन का सिर काटकर कोटा शहर में घुमाया और तोप से उड़ा दिया । इसके बाद सारे कोटा नगर पर विद्रोहियों ने कब्जा कर लिया। महाराव गढ़ में अपने कुछ राजपूत सरदारों के साथ असहाय अवस्था में बंद हो गए।विद्रोहियों का कब्जा कोटा नगर 20 अप्रैल 1858 तक 6 माह रहा। महाराज की सेना अंग्रेजी सेना विद्रोहियों के मध्य अनेक लड़ाइयां होती रही। इससे पहले मार्च के महीने में चंबल की तरफ से अंग्रेजी सेना आ चुकी थी और महाराज ने कुछ राजपूत सरदारों को बुला लिया था ।तब 27 अप्रैल 1818 को कोटा पर फिर अंग्रेजों का कब्जा हो गया। अंग्रेजों ने अत्याचार और बढ़ा दिए । लड़ाई में अनेक विद्रोही नेता मारे गए और स्वतंत्रता सेनानियों में भगदड़ मच गई । अधिकतर के सिर कटवा दिए गए। लाला जयदयाल और मेहराब बचकर निकल गए थे। उन्हें मालवा और मध्य भारत की तरफ से गिरफ्तार करके कोटा लाया गया और आजादी के इन दीवानों को अंग्रेजी सरकार ने कोटा में हराव पर दबाव डालकर पोलिटिकल एजेंट की उपस्थिति में नयापुरा में फांसी लगाई । जहां अदालत के सामने चौराहे पर शहीद स्मारक बना हुआ है। सच ही तो है :–

जिनकी लाशों पर चलकर यह आजादी आई ।
उनकी याद लोगों ने बहुत ही गहरे में दफनाई।।

बहादुर शाह जफर और 18 57 क्रांति

बहादुर शाह ज़फर (1775-1862) भारत में मुग़ल साम्राज्य के आखिरी शहंशाह, और उर्दू के जानेे-माने शायर थे। उन्होंने 1857 का प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भारतीय सिपाहियों का नेतृत्व किया। युद्ध में हार के बाद अंग्रेजों ने उन्हें बर्मा (अब म्यांमार) भेज दिया जहाँ उनकी मृत्यु हुई ।
जब मेजर हडसन मुगल सम्राट को गिरफ्तार करने के लिए हुमायूं के मकबरे में पहुंचा, जहां पर बहादुर शाह ज़फर अपने दो बेटों के साथ छुपे हुए थे, तो उसने (मेजर हडसन) की स्वयं उर्दू का थोड़ा ज्ञान रखता था ,कहा –
“दमदमे में दम नहीं है ख़ैर मांगो जान की
.. ऐ ज़फर ठंडी हुई अब तेग हिंदुस्तान की..”

इस पर ज़फ़र ने उत्तर दिया-

“ग़ज़ियों में बू रहेगी जब तलक ईमान की..
तख़्त ऐ लंदन तक चलेगी तेग हिंदुस्तान की.”

7 नवंबर 1862 को बहादुरशाह जफर का जब रंगून में देहांत हुआ तो उन्होंने उस समय लिखा था कि :–

कितना है बदनसीब ज़फर दफन के लिए
दो गज जमीन भी न मिली कूए यार में।

इन पंक्तियों में उनकी देशभक्ति के साथ ही अपनी माटी के लिए उनकी दिली मुहब्बत भी झलकती है।
उसी प्रकार दिल्ली के लालकिले को छोड़ते समय भी बहादुरशाह जफर ने बड़े मार्मिक शब्दों में कहा था :–
दरो दीवार को बड़ी हसरत से नजर करते हैं।
खुश रहो अहले वतन हम तो सफर करते हैं।।

महत्वपूर्ण तथ्य

भारत की आजादी के क्रांतिकारी आंदोलन में विजय सिंह पथिक का भी विशेष योगदान रहा । उनका जन्म 18 82 में बुलंदशहर के गुलावठी नामक गांव में हुआ था । उन्होंने जिस प्रकार का आंदोलन चलाया था । उसका लाभ आगे चलकर गांधी जी और उनके साथियों ने उठाया और इस क्रांतिकारी व्यक्तित्व को उपेक्षा के कूड़ेदान में फेंक दिया गया ।
विजय सिंह पथिक की प्रेरणा पर राजस्थान सेवा संघ के कार्यकर्ता साधु सीताराम दास, रामनारायण चौधरी ,हरिभाई किंकर, माणिक्य लाल वर्मा ,नयन राम शर्मा ने बेगा सर प्रथा, भारी लगान अनेक लागत और छोटे जागीरदारों द्वारा किए अत्याचारों से जनता को छुटकारा दिलाने के लिए आंदोलन व सत्याग्रह प्रारंभ किए और जेल की यातनाएं सही।
आधुनिक विश्व में यदि विजय सिंह पथिक को सत्याग्रह का जन्मदाता कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी । भारत में सबसे पहले श्री पथिक ने बिजौलिया सत्याग्रह का सूत्रपात किया था ।
बिजोलिया सत्याग्रह की यह घटना 1916 की है।
बाद में गांधीजी ने इसी सत्याग्रह शब्द को पकड़ा और अपने राजनीतिक जीवन में कई बार सत्याग्रह किया । जब उनसे किसी पत्रकार ने पूछा कि सत्याग्रह का अर्थ क्या है ? तब उन्होंने कहा था कि यदि इसका अर्थ जानना चाहते हो तो विजय सिंह पथिक से जाकर पूछो ।
बाद में जोरावर सिंह , प्रताप सिंह बारहठ , पंडित अभिन्न हरी , शंभू दयाल सक्सेना, बेनी माधव शर्मा , रामेश्वर दयाल सक्सेना , अर्जुन सिंह वर्मा , हीरालाल जैन , भेरूलाल , काला बादल , जोरावर मल जैन , कुंदनलाल चोपड़ा , श्याम नारायण सक्सेना , तनसुख लाल मित्तल , सेठ मोतीलाल जैन , शिव प्रताप श्रीवास्तव , गोपाल लाल , संत नित्यानंद मेहता, गोपाल लाल कोटिया और मांगीलाल भव्य आदि अनेक नेता और कार्यकर्ता स्वाधीनता आंदोलन के दौरान हाडोती के जनमानस पर अपना अच्छा प्रभाव डालने में सफल हुए।
छात्र नेताओं में नाथूलाल जैन, सुशील कुमार त्यागी, सीताशरण देवलिया , रमेश , अनिल , इंद्र दत्त स्वाधीन , पंडित बृज सुंदर शर्मा ,रामचंद्र सक्सेना आदि अनेक नवयुवक छात्र राष्ट्र सेवा के क्षेत्र में उतरे। जिन्हें प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से श्री विजयसिंह पथिक और केसरीसिंह बारहट के अनुपम त्याग और बलिदान से प्रेरणा मिलती रही।

साहित्यकारों का योगदान

साहित्यकारों में भारतेंदु हरिश्चंद्र , गणेश शंकर विद्यार्थी , श्यामलाल गुप्त मुंशी प्रेमचंद आदि अनेक ऐसे साहित्यकार हैं जिन्होंने निज भाषा ,निज देश,और निज राजा की हिमायत की है तथा गुलामी को अनुचित बताया है। साहित्य साधना से राष्ट्र के प्रति कर्तव्य का बोध समाज को कराया।
तिलक नारा दे रहे थे कि स्वतंत्रता मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है तो भारतेंदु हरिश्चंद्र -” निज भाषा उन्नति अहै सब भाषा को मूल”- समझा रहे थे।
गणेश शंकर विद्यार्थी 1826 में शुरू हुए ‘उदंत मार्तंड’ साप्ताहिक हिंदी अखबार का प्रकाशन किया करते थे और संपादन में निकले प्रताप राष्ट्रीय कवि माखनलाल चतुर्वेदी के संपादन में निकले कर्मवीर काला काकर से राजा राम पाल सिंह के द्वारा निकाले गए ‘हिंदुस्तान’ ने राष्ट्र वादियों में स्वतंत्रता का बिगुल फूंका । बंगदूत , अमृत बाजार पत्रिका , केसरी, हिंदू , पायनियर , मराठा , इंडियन मिरर और हरिजन आदि पत्र ब्रिटिश हुकूमत की गलत नीतियों की खुलकर आलोचना करते थे । 18 57 में ही निकले ‘पयाम ए आजादी’ ने आजादी की पहली जंग को धार दी । पहाड़ में बद्री दत्त पांडे अल्मोड़ा अखबार से क्रांति का उद्घोष कर रहे थे तो गणेश शंकर विद्यार्थी , महावीर प्रसाद द्विवेदी , बनारसीदास चतुर्वेदी साहित्यकारों को स्वाधीनता संघर्ष से जोड़ रहे थे।
राष्ट्रकवि दिनकर जैसे कवियों ने अपनी राष्ट्रवादी रचनाओं से स्वाधीनता सैनानियों का पथ प्रशस्त किया । माखनलाल चतुर्वेदी की इन पंक्तियों को भला कौन भूल सकता है –
‘ मुझे तोड़ लेना वनमाली
उस पथ पर तुम देना फेंक ,
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने
जिस पथ जाएं वीर अनेक ।।
भारतेंदु द्वारा लिखे गए नाटक अंधेर नगरी और ‘भारत दुर्दशा’ के प्रदर्शन में अंग्रेजी राज्य की लूट को जनता में उजागर किया। श्यामलाल गुप्त पार्षद कानपुर के एक छोटे से नगर नरवल में बैठकर –
” विजयी विश्व तिरंगा प्यारा ,
झंडा ऊंचा रहे हमारा ।
का ख्वाब देख रहे थे । बेतिया से गोपाल सिंह नेपाली की आवाज गूंज रही थी :– मेरा धन है स्वाधीन कलम । राज्यों की एक नई टोली आजादी की सुबह की टोह निकल पड़ी थी । स्वतंत्रता , स्वराज , समानता का सपना हमारे लेखकों , कवियों के मन में था । उसे पंडित नरेंद्र शर्मा , केदारनाथ अग्रवाल , नागार्जुन , माधव शुक्ल , गया प्रसाद शुक्ल , स्नेही सियारामशरण गुप्त , सोहनलाल द्विवेदी अपनी रचनाओं में रूपांकित कर रहे थे । नवीन की रचनाएं आज के प्रवाह को गति देने वाली थीं तो सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता – खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी , – सैनिकों में जोश भरने वाली थी । झांसी की रानी का चित्र ऐतिहासिक उपन्यासकार वृंदावनलाल वर्मा ने अपने उपन्यास में किया । चंद्रगुप्त स्कंदगुप्त में देश प्रेम की अनुगूंज हैं तो इनके गुलामी की कारा को तोड़ने का आह्वान मिलता है।
1917 की रूस की बोल्शेविक क्रांति ने हिंदुस्तानी लेखकों में गतिशीलता का जज्बा पैदा किया और प्रेमचंद इसी दौर की उपज हैं । उन्होंने कहानियों और उपन्यासों के माध्यम से जहां भारत के सामंतवाद और ब्रिटिश नौकरशाही की आलोचना की , वहीं गुलामी में ब्रिटिश शोषण के अनेक रूपों को भी उजागर किया । यशपाल व भगवतीचरण वर्मा के कथा साहित्य में भी स्वाधीनता की आंच दिखती है। मुंशी प्रेमचंद जी का ‘सोजे वतन’ जो अंग्रेजी शासन में जब्त हुआ था । इसी प्रकार ‘चांद पत्रिका’ का फांसी अंक भी जब्ती का शिकार हुआ । हिंदी में लिखे गए साहित्य को हम युद्ध साहित्य तो नहीं कह सकते , पर देश के नागरिकों में स्वाधीनता राष्ट्र के प्रति प्रेम जगाने के लिए हिंदी के कवियों ने अनुपम योगदान दिया है । निराला लिख रहे थे — ‘भारती जय विजय करे’ तो जगदंबा प्रसाद हितेषी कह रहे थे –

‘शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले ।
वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशा होगा।।

बालकृष्ण शर्मा नवीन कवियों से क्रांति का आवाहन कर रहे थे ।स्वतंत्रता सेनानियों साहित्यकारों , पत्रकारों और बुद्धिजीवियों की संगठित पहल का ही परिणाम था जो भारत 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता प्राप्त कर पाया ।
सजायाफ्ता क्रांतिकारी मन्मथ नाथ गुप्त ने बरेली जेल के भीतर रहकर ही काकोरी शहीदों पर अपनी पहली पुस्तक की रचना की । जिसे वहां बंदी रहे बंगाल के क्रांतिकारी गणेश घोष के छूटने पर उनके हाथ बाहर भिजवाया । लेकिन वह पुस्तक छपते ही जब्त हो गई । पेशावर कांड के विख्यात क्रांतिकारी वीर चंद्र सिंह गढ़वाली ने अपनी पत्नी भागीरथी देवी पर इसी जेल में रहते हुए एक अद्भुत संस्मरणों से भरी साहित्य नामक पुस्तक की रचना की जो अब अप्राप्य है।

काला पानी की दारुण कथा

शचिंद्र नाथ सान्याल ने अंडमान से लौटकर ‘बंदी जीवन’ की रचना की । जो उनकी सर्वाधिक महत्वपूर्ण चर्चित कृति है । ‘अंडमान की अधूरी गाथा’ क्रांतिकारी रामचरण लाल शर्मा ने लिखी । जिसमें ब्रिटिश साम्राज्यवाद के रोंगटे खड़े करने वाले अत्याचार हैं प्रसिद्ध क्रांतिकारी उत्तम आलोकनाथ चक्रवर्ती ने ‘जेलों में 30 वर्ष’ नामक पुस्तक की रचना की । उनका इतने दिन जेल में रहना रिकॉर्ड है । क्रांतिकारी नलिनी दास ने भी ‘अंडमान की गाथा’ को विस्तार से लिखा । जिसमें वहां के नारकीय जीवन के अतिरिक्त उनके व अन्य क्रांतिकारियों के संघर्ष और बलिदान का आंखें खोल देने वाला ब्यौवरा है । अंडमान में रहे अनेक क्रांतिकारी यदि अपनी जीवन गाथा दर्ज नहीं करते तो हम यह जान ही नहीं पाते कि राम रखा ,इंदु भूषण , मोहित मित्र , भानसिंह , हेमचंद्र भट्टाचार्य मोहन किशोर , नमोदास , भूषण नंदी , उल्लासकर दत्त, नानी गोपाल , महावीर सिंह पंडित परमानंद , यासिर अली और पंजाब के क्रांतिकारी देशभक्तों ने देश की स्वतंत्रता के लिए उस टापू पर कितने दारुण दुख झेले ? – उल्लासकर को तो तकलीफों और उत्पीड़न ने पागल कर दिया । हमें सबसे ज्यादा हैरान करता है बंगाल के क्रांतिकारियों का लिखा वह साहित्य जिसकी रचना कालापानी कहे जाने वाले उस टापू पर रहते हुए की गई थी । अरविंद के भाई थे वरिंद्र जो खुद भी बड़े क्रांतिकारी हुए । वरिंद्र दल के एक महत्वपूर्ण क्रांतिकारी थे ।उपेंद्र बनर्जी जो कालापानी से लौटकर सफल पत्रकार बने , उनकी गणना महत्वपूर्ण साहित्यकारों में की जाती है। उन्होंने ‘अंडमान की कहानी’ लिपिबद्ध की जो सचमुच दिल दहला देने वाली है । इसमें महात्मा नंदगोपाल को कोल्हू में तेल पेरने के अतिरिक्त अन्य बहुत सारी यातनाएं दर्ज हैं । नंद गोपाल इलाहाबाद से छपने वाले ‘उर्दू स्वराज्य’ के संपादक थे । उपेंद्र ने उन्हें सत्याग्रह में गांधी जी का सहयोगी कहा था। उपेंद्र की आत्मकथा अद्भुत है । बंगला का आत्मकथा साहित्य वैसे भी बहुत समृद्ध है , लेकिन उपेंद्र को जाने बिना उसका क्रांतिकारी संघर्ष से परिचित होना नहीं कहा जा सकता जो बंगाल की धरती पर निरंतर और देर तक लड़ा गया।
यदि कालापानी का जिक्र करते हैं तो स्वातन्त्र्य वीर सावरकर को भी नहीं भूल सकते। जिन्होंने 1857 की क्रांति के 50 वर्ष पश्चात पूर्ण होने के अवसर पर 1907 में इस क्रांति को भारत का प्रथम स्वाधीनता संग्राम घोषित करते हुए ब्रिटेन में रहते हुए ही पुस्तक लिखी थी । यह भी उतना ही सत्य है कि हम इस छोटे से लेख में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के कारण और उसमें भाग लेने वाले प्रत्येक शहीद का वीर का उल्लेख कर सके , इसलिए सभी सुधि पाठकों से क्षमा चाहता हूं कि अभी भी बहुत सारा इस पर लिखा जा सकता है ।
नेति -नेति।
अंत में इतना ही कहूंगा :-

उनकी तुरबत पर एक दिया भी नहीं ,
जिनके खून से जले थे चिराग ए वतन ।
आज दमकते हैं उनके मकबरे ,
जो चुराते थे शहीदों का कफन।।

देवेंद्र सिंह आर्य एडवोकेट
चेयरमैन : उगता भारत

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