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राजनीति

देश के सभी नागरिकों का चरित्र निर्माण किए बिना देश उन्नति होना संभव नहीं

ओ३म
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देश में भौतिक उन्नति की बातें बहुत की जाती है और कुछ सीमा तक देश में भौतिक उन्नति हुई भी है। परन्तु यह भी सच है कि इस उन्नति का लाभ देश के सभी नागरिकों को समान रूप से नहीं मिला। इसका प्रमुख कारण देश के नागरिकों का चरित्रवान न होना है। प्राचीन कहावत है ‘यथा राजा तथा प्रजा’। यह कहावत हमारे देश में चरितार्थ होती हुई प्रत्यक्ष होती है। यह निर्विवाद है कि देश की आजादी के बाद से ही देश में उच्च पदस्थ लोगों में भ्रष्टाचार रहा है जो समय के साथ बढ़ता ही गया। देश में हजारों करोड़ों के अनेक घोटाले हुए हैं। शायद 2जी स्ट्रेक्टम घोटाला देश का सबसे बड़ा घोटाला था जिसमें देश के शीर्षस्थ लोग सम्मिलित थे और आश्चर्य है कि सभी घोटालेबाज बच गये और घोटाले का पैसा वसूल नहीं हुआ। जिस देश में ऐसे एक नहीं अनेक घोटाले होते हों, उस देश के लोगों के चरित्र का अनुमान लगाया जा सकता है। यह भी आश्चर्य है कि यह घोटाले अशिक्षित व अज्ञानी लोगों ने नहीं वरन् समाज के सम्मानित व प्रतिष्ठित लोगों ने किये हैं। अतः देश कितनी भी भौतिक उन्नति क्यों न कर ले, उसका लाभ एक छोटा वर्ग ही लेता रहेगा। देश के सभी लोगों को देश की उन्नति का लाभ मिलना तो चाहिये परन्तु वह मिलेगा नहीं। देश की उन्नति का लाभ सभी लोगों को समान रूप से तभी मिल सकता है कि जब देश के सभी नागरिकों, मुख्यतः सत्ता के शीर्ष में बैठे हुए लोगों, का चरित्र आदर्श चरित्र हो तथा वह सभी मानवीय गुणों से युक्त हों। वह असत्य न बोलते हों और उनका आचरण भी असत्य से युक्त न होकर सत्य से युक्त हो। ऋषि दयानन्द ने सत्य आचरण को ही धर्म की संज्ञा दी है। इस दृष्टि से देखें तो देश में शायद कोई मत, संस्था व समाज इसका दावा नहीं कर सकता कि उसके सब आचार्य और अनुयायी सत्य का पूरी तरह से पालन व आचरण करते हैं। इसी से अनुमान लगा सकते हैं कि हमारे देश में धर्म व मानव चरित्र की अवस्था क्या है?

देश के लोगों का चरित्र आदर्श व उत्तम हो इसके लिये देश के सत्तारूढ़ दलों के शीर्ष नेताओं को सत्य के प्रति दृढ़ प्रतिज्ञ होना आवश्यक है। प्राचीन काल में हमारे राजा उत्तम चरित्र वाले होते थे। वर्तमान के नेताओं को वोट बैंक की राजनीति से ऊपर उठकर केवल सत्य और देश हित का चिन्तन करना चाहिये और राम, कृष्ण, चाणक्य, दयानन्द, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, लाल बहादुर शास्त्री, गुलजारीलाल नन्दा आदि के समान चरित्रवान होना चाहिये। वर्तमान समय में देश में श्री नरेन्द्र मोदी जी की सरकार है। इनके द्वारा विज्ञान व तकनीकि का प्रयोग कर अनेक स्थानों पर होने वाले भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाया गया है। वर्तमान समय में सरकार द्वारा जो धनराशि डायरेक्ट बैनिफिट ट्रांसफर के अन्तर्गत भेजी जाती है, वह पूरी की पूरी धनराशि खाताधारियों को मिलती है। विगत 8 वर्षों से बड़े भ्रष्टाचार का कोई प्रकरण भी सामने नहीं आया है। नीचले स्तर पर भ्रष्टाचार की बातें सुनने को मिलती हैं जिन्हें अवश्य ही दूर किया जाना चाहिये। सत्य के आचरण व चरित्र के प्रति देश में लोगों का विश्वास व आग्रह होना चाहिये। वेद मनुष्य को सत्य का आचरण करने की शिक्षा देते हैं। वैदिक जीवन ही एकमात्र जीवन पद्धति है जो ईश्वर को सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान, सब मनुष्यों के कर्मों का साक्षी तथा सबको उनके सभी कर्मों का निष्पक्ष रूप से फल देने वाली एक ऐसी सत्ता है जो सब प्राणियों के प्रति आदर्श न्याय करती है। यह मान्यता को अनेक उदाहरण देकर सिद्ध किया जा सकता है। सभी मत मतान्तरों में ईश्वर को सर्वव्यापक व सभी जीवों के सभी कर्मों का पक्षपात रहित होकर बिना पापों को क्षमा किये दण्ड देने वाला नहीं माना जाता। यही पाप व भ्रष्टाचार का एक कारण प्रतीत होता है। जिस मत व समाज की मान्यता में मनुष्य को मन में विचार करने पर भी बुरे कामों का दण्ड मिलता हो, उस देश के लोग अपवादों को छोड़कर कोई बुरा काम नहीं कर सकते।

वैदिक धर्म ही एकमात्र ऐसा धर्म व जीवन पद्धति है जो ईश्वर को सर्वव्यापक और जीवों के सभी कर्मों का साक्षी मानते हुए बिना किसी कर्म को क्षमा किये उन सबका दण्ड देने वाली सत्ता के रूप में स्वीकार करती है। इन सिद्धान्तों को मानने के कारण प्राचीन काल से ही वैदिक धर्म में सत्याचारी ऋषि, मुनि, राम, कृष्ण, शंकाराचार्य, चाणक्य और दयानन्द जैसे महापुरुष पैदा होते रहे। अतः देश से अनैतिकता, भ्रष्टाचार तथा सभी बुराईयों को दूर करने के लिये सबको वेदों की शरण में जाना होगा और उससे लाभ उठाते हुए वेद की शिक्षाओं को देश भर में प्रचारित व प्रसारित करना होगा। वेद व वेदानुकूल सिद्धान्तों के अनुरूप ही सब प्रकार के दण्डों का विधान करना होगा। त्वरित न्याय प्रणाली को विकसित करना होगा और अपराध करने वालों को शीघ्र कठोर व निष्पक्ष न्याय देना होगा। ऐसा होने पर ही देश में चरित्र निर्माण हो सकेगा और देश के सभी नागरिकों को न्याय मिल सकेगा। ऐसा करे ही देश की उन्नति हो सकती है और देश के सभी लोगों को उन्नति का लाभ मिल सकता है। इससे देश के लोग त्याग व तप के जीवन को महत्व देंगे तथा देश से सभी अंधविश्वास, मिथ्या सामाजिक परम्पराओं एवं अनिष्ट कार्यों का प्रचलन बन्द होगा। देश की सरकार सहित सभी धार्मिक एवं सामाजिक संगठनों को इस ओर ध्यान देने की आवश्यकता है। यदि ऐसा नहीं करेंगे तो देश इसी प्रकार से चलता रहेगा जहां देश के अशिक्षित एवं निर्धन लोगों को न्याय मिलना कठिन ही नहीं असम्भव प्रतीत होता है।

मनुष्य, मनुष्य समाज तथा देश की उन्नति सत्य नियमों के प्रचलन व उसका पालन करने से ही हो सकती है। देश से अज्ञान व अविद्या दूर करना देश के राजनीतिक दलों का मुख्य कार्य व संकल्प होना चाहिये। इस दिशा में जो कार्य किया जाना चाहिये, वह होता हुआ दिखाई नहीं देता। समाज को अलग अलग मत, धर्म व जाति के रूप में न देख कर सभी मनुष्यों को एक समान मनुष्य के रूप में देखना चाहिये। ईश्वर ने मनुष्यों व प्राणियों में उनके मत, पंथ, सम्प्रदाय आदि के आधार पर अन्तर व भेद नहीं किया है। सभी मतों में तथा संसार के सभी स्थानों पर एक ही ईश्वर ने सब मनुष्यों को दो आंख, दो कान, दो छिद्रो वाली एक नसिका, एक मुंह, दो पैर वाला सर्वत्र एक समान मनुष्य बनाया है। जो मनुष्यों में थोड़ा बहुत अन्तर होता है वह स्थानीय व भौगोलिक कारणों से होता है। मनुष्य की स्वाभाविक भाषा उसकी मातृभाषा होती है। वह चाहे तो संसार की किसी भी भाषा को सीख सकता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि संसार में एक ही परमात्मा है और वह किसी के साथ किसी प्रकार का पक्षपात व भेदभाव नहीं करता। इसी प्रकार से देश की सरकार व सरकारों को भी मनुष्यों में धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र व परम्पराओं के आधार पर पक्षपात और भेदभाव नहीं करना चाहिये। सबकी उन्नति व विकास के लिये सद्धर्म तथा नैतिक शिक्षा को बाल्यकाल से ही अनिवार्य कर देना चाहिये। इसके लिये वेदों के सिद्धान्तों व मान्यताओं को सभी नागरिकों को समान रूप से पढ़ाया जाना चाहिये। ईश्वर और आत्मा का सत्यस्वरूप भी देश के सभी बच्चों व युवाओं को बताया जाना चाहिये। मत-मतान्तरों के कारण समाज में जो पक्षपात व भेदभाव उत्पन्न होता है तथा मतान्तरण आदि की जो कुचेष्टायें एवं कार्य स्वार्थी लोग करते हैं, उनका भी विरोध किया जाना चाहिये। मतान्तरण में छल, बल, लोभ व असत्य का सहारा लिया जाता है। अतः मतान्तर पर पूर्ण प्रतिबन्ध के साथ कठोर दण्ड का प्रावधान होना चाहिये। मनुष्य जो नियम व परम्परायें बनाता है व जो नियम आदि बने हैं, वह नित्य व सर्वकालिक नहीं हो सकते। उन पर पुनर्विचार होते रहना चाहिये ओर उनमें कमियों व त्रुटियों को दूर कर उनका सुधार किया जाना चाहिये। यदि ऐसा नहीं होगा तो हमारा देश कदापि सुरक्षित नहीं रह सकता। छल करने वाले लोग अपने कुत्सित इरादों, योजनाओं व कार्यों में सफल हो जायेंगे जिसका परिणाम हमारी आगामी पीढ़ियों को लिये हानिकर व दुःखप्रद होगा।

मनुष्य का चरित्र सत्य नियमों की शिक्षा, प्रचार तथा तर्क द्वारा सत्य व असत्य का विचार करने से बनता है। चार वेद ही एकमात्र वह ग्रन्थ हैं जो सृष्टि के आदि में परमात्मा से आदि-मनुष्यों व ऋषियों को, जो सृष्टि के सब मनुष्यों के पूर्वज थे, प्राप्त हुए थे। वेदों की सभी मत-सम्प्रदायों को परीक्षा करनी चाहिये और उन पर परस्पर संवाद करना चाहिये। वेदों के सिद्धान्तों की समीक्षा कर उसके सभी सत्य सिद्धान्तों को देश में लागू करना चाहिये और उनका सबको सम्प्रदायवाद से ऊपर उठकर पालन करना चाहिये। वेद सत्य व न्याय को धारण करने की शिक्षा देते हैं। वेद में धर्म का अर्थ किसी व्यक्ति व आचार्य विशेष की सत्यासत्य शिक्षाओं का पालन न होकर केवल सत्य सिद्धान्तों का पालन होता है जिसका आविर्भाव परमात्मा ने सृष्टि के आरम्भ में वेदों के द्वारा किया था। यदि सभी को आरम्भ काल से ही वेदों के सिद्धान्तों का अध्ययन कराया जायेगा और सभी ईश्वर का ध्यान करने सहित ईश्वर की आज्ञाओं का पालन करते हुए अग्निहोत्र यज्ञ, माता-पिता की सेवा, आचार्यों, विद्वानों व अतिथियों की सेवा सहित सभी प्राणियों वा पशु-पक्षियों आदि पर दया व करूणा का भाव रखते हुए पूर्ण अहिंसा का पालन करेंगे, तभी मनुष्यों का चरित्र निर्माण होगा और देश पक्षपात रहित होने के साथ भ्रष्टाचार से भी मुक्त हो सकता है। ऋषि दयानन्द ने इस कार्य को आरम्भ किया था और सत्य के निर्णयार्थ सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ का प्रणयन किया था। सत्यार्थप्रकाश साम्प्रदायिकता से रहित होने सहित सच्ची मानवता का पोषक ग्रन्थ है। इसमें संसार के सभी मनुष्यों को परस्पर समान और एक ईश्वर की सन्तान बताया गया है। सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ में सभी ज्ञेय विषयों की चर्चा है और उनका वेदसम्मत सत्य व तर्कयुक्त समाधान दिया गया है। देश के सभी नागरिकों को सत्यार्थप्रकाश पढ़ना चाहिये। इसकी मान्यताओं व सिद्धान्तों पर सत्यासत्य की दृष्टि से खुलकर बहस करनी चाहिये और सत्य को अपनाना चाहिये। सत्य ही मानव जाति की उन्नति का प्रमुख कारण है। मनुष्य कितना भी ज्ञान क्यों न प्राप्त कर ले परन्तु यदि उसके आचरण में सत्य नहीं है तो न तो उसका चरित्र बन सकता है और न ही कल्याण हो सकता है। शायद इसी कारण देश ने उपनिषद वाक्य ‘‘सत्यमेव जयते नानृतम्” अर्थात् ‘सदा सत्य की ही जय होती है असत्य की नहीं’ के सिद्धान्त को मान्यता दी थी। क्या इस सिद्धान्त वाक्य का देश में सर्वत्र पालन हो रहा है? इस पर सबको विचार करना चाहिये। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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