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भारतीय संस्कृति

संसार की उलझन से कैसे पार हो

नींद में सपना देखा तो अच्छा लगा। नींद टूटने पर दुख हुआ । क्योंकि जागने पर जो देखा वह स्वप्न से अलग था। नाशवान प्रकृति के नाशवान दृश्यों में मन रम गया । तो मृगतृष्णा का शिकार हो गया। दूर-दूर तक भागने लगा । हताश निराश होकर अंत में मौत की गोद में समा गया। युग युगों से प्राणी की यही गति होती चली आ रही है । परंतु बार बार मुंह की खाने के उपरांत भी सच को समझने का प्रयास नहीं करता। जो नाशवान है ,नश्वर है , मिटने वाला है, उसी की उपासना , उसी की साधना में आकर लग जाता है।
फिर जीव हर दिखने वाली वस्तुओं के मोह में क्यों डूब जाता है ?
मिट्टी को जिस रूप में चाहो , ढाल लों, ढल जाएगी। मिट्टी से घड़ा बनाया , लेकिन घड़ा बना तो अपने मूल अर्थात मिट्टी को ही भूल गया और भ्रम में पड़ गया कि मैं अपने आप ही सदैव के लिए बन गया हूं । लेकिन यह भी भूल गया कि कोई अपने आप नहीं बन सकता और अगर मिट्टी न होती तो क्या घड़ा बनता। बना ही मिट्टी के कारण है। ईश्वर जीव और प्रकृति अजर अमर हैं , अनादि हैं और अनंत हैं ।इनका कभी नाश नहीं होता । जीव को शरीर मिलता है । शरीर मिलने के बाद इसे यह भूल हो जाती है कि शायद तू इसका स्वयं ही निर्माता है और अब सदैव इसी शरीर के माध्यम से यहाँ रहकर अपने कार्य संपादन करता रहेगा।
जीव की यही अज्ञानता है कि वह अपने परिमित और सीमित ज्ञान के कारण यह नहीं समझ पाता कि तू है कौन और तुझे जाना कहां है ? अल्पज्ञ होकर वह स्वयं को सर्वज्ञ मान बैठता है और यहीं से उसके अहंकार की कहानी का आरंभ हो जाता है । जो उसे अंधकार की ओर ले जाती है । वह अपने मूल परमात्मा को भूल जाता है । जो भूल गया तो उलझ गया जो समझ गया वह सुलझ गया। अतः परमात्मा से जुड़ना अथवा उसको याद रखना चाहिए।
संसार के सारे ऐश्वर्य , संसार के सारे भोग साधन , संसार की सारी वस्तुएं , धनसंपदा आदि जिनमें जीव अपना मन लगाता है , यह सारी की सारी तो नाशवान हैं । यह ना तो किसी के साथ गई और न जाएंगी ।बस , इसी भूल में वह पड़ जाता है कि शायद यह तेरे साथ जाएंगी ।
याद रखो जगत की वस्तुएं जगत को बनाने वाले के पास ही रह जाती हैं। जैसे शरीर का रूपांतरण होता रहता है वैसे ही भौतिक जगत की हर वस्तु का रूपांतरण होता रहता है । जो आज हमारी है , कल वह किसी और की होगी , और जब वह कल किसी और की होगी तो हम उसे पहचान नहीं पाएंगे । वैसे ही जैसे जब यह जीव नए-नए शरीर बदलता रहता है तो फिर पूर्व जन्म के हमारे सगे संबंधी, मित्र ,बंधु बांधव यह नहीं जान पाते कि अब वह जीवात्मा किस रूप में मेरे सामने खड़ी है ?
कोई व्यक्ति दफ्तर में काम करता है ,वह मेज, कुर्सी पेन आदि को अपनी कहता है । जब ड्यूटी समाप्त हुई तो किसी और दूसरी जगह फिर अपनी वस्तु कहता है। यह सारी पहली वस्तुएं पीछे छोड़ जाता है।
क्यों ? जब किसी एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय के लिए स्थानांतरण हो जाता है तो फिर उस ऑफिस को और उसकी वस्तुओं को जाकर अपनी कहने लगता है। इसी को माया मोह कहते हैं।
इसलिए कि वे वस्तुएं उसकी थी ही नहीं। जब दफ्तर से निकला तो दफ्तर के मालिक को सब वस्तुएं सौंप दीं । मालिक वस्तुएं अपने साथ ले जाने नहीं देता।
ठीक उसी प्रकार जगत और जगत की वस्तुएं हैं। सब यहीं इसी मालिक के पास छोड़कर जाना पड़ता है । लेकिन कितना कृतघ्न है इंसान , जिसने वस्तुएं दीं उसे ही भुला देता है । जब ड्यूटी खत्म अर्थात मौत आती है तो यहीं छोड़ जाता है। जिसकी हैं उसे सौंप जाता है ,तो फिर यह वस्तुएं अपनी कैसे हुई ।
इसलिए वैद्य ने कहा कि तू जिस उद्देश्य को लेकर यहां आया था , हे जीव ! तू अपने उस वचन को अपने कर्म को स्मरण कर और संसार के इन विषय भोगों में क्षणभंगुर नाते रिश्तों और वस्तुओं में अपने आप को भटका मत । अपने लक्ष्य को पहचान और समय रहते उस परमपिता परमेश्वर से अपना संबंध बना ।
तू अपने मरने के बाद की स्थिति का भी ध्यान कर जब तेरी इस कंचन जैसी काया की दो मुट्ठी राख हो जाएगी और लोग उसे भी उठा कर कहीं नदी नाले तालाब आदि में फेंक देंगे। जो वस्तुएं मूल रूप में तेरी नहीं हैं और ना तेरी हो सकती हैं तू उन्हें अपनी समझने की भूल मत कर।
जैसे घड़ा अपने मूल अर्थात मिट्टी को भूल गया था। यह इंसान भी उस घड़े की भांति अपने चेतन को भूल गया था ,जिसके कारण इंसान चलता फिरता है , आंखें देखती हैं, कान सुनते हैं, हाथ-पैर चलते हैं ,दिमाग सोचता है नाक सूंघती है मुर्दा भी तो इंसान जैसा ही है ।फिर मुर्दा में और इंसान में क्या अंतर हो जाता है ? यही याद रखने की बात है जो इसे याद रखता है ,वह दुखी नहीं होता । सुख होने पर सुखी नहीं होता और दोनों स्थितियों में समान रहता है ,वही एकमात्र सुखी व्यक्ति है।
जैसे रात्रि को पक्षी वृक्ष पर इकट्ठे बैठते हैं और प्रातः होते ही उड़ जाते हैं उसी तरह हम परिवार के बंधु बांधव समय आने पर अर्थात मृत्यु के आने पर बिछड़ जाते हैं।

अपना गीत सुनाय कर हो जाएंगे मौन ।
न जाने इस डाल पर फिर चहकेगा कौन।।

मनुष्य को धैर्य से प्रतीक्षा करते हुए समय आने पर ही अपनी बात कहनी चाहिए ।।जैसे वसंत ऋतु के आने पर कोयल मौन रहती है और जब अनर्गल और अप्रासंगिक और असामयिक बातें हो रही हों तो मौन धारण कर लेना चाहिए। जैसे :-

तुलसी पावस के समय गही कोकिला मौन।
अब तो दादुर बोल हैं हमको पूछे कौन।।

जो मनुष्य अच्छे कार्यों से अपनी आजीविका चलाता है उसकी संतान सद्गुणों से युक्त रहती है।
महाभारत में धृतराष्ट्र को विशेष रूप से देखो और महाभारत सीरियल में जो प्रसारण के प्रारंभ में काल बोल रहा होता है उसको विशेष रूप से सुनो ।फिर दुर्योधन के वचनों पर विचार करिए अपने आप परिस्थितियों बनती आ रही हैं विनाश की ।

कालचक्र क्या है ?

कालचक्र कभी किसी से पक्षपात नहीं करता, लेकिन उसकी सम व विषम परिस्थितियों की परिधि के साथ गतिमान मनुष्य अवश्य अपने आसपास एकत्रित लोगों के साथ पक्षपात करने लगता है (धृतराष्ट्र में देखो) पांडवों से पक्षपात करता है।
कालचक्र अथवा ईश्वरीय न्याय व्यवस्था के बारे में किसी कवि ने कितना अच्छा कहा है :–

तो देर है ना अंधेर है ।
तेरे कर्मों का सारा फेर है ।

परिस्थितियां यदि अनुकूल हैं तो अधिकतर मानव ऐसी भूल कर जाते हैं कि वे स्वार्थी , धोखेबाज और झूठी प्रशंसा करने वाले लोगों की संगति पसंद करते हैं । ऐसे में सदाचारी, सत्यवादी और विश्वासपात्र लोगों का संग उसे किसी काल कोठरी की कैद के समान लगता है( यह बात दुर्योधन पर घटित होती है जो भीष्म पितामह , गुरु द्रोणाचार्य , कुलगुरु कृपाचार्य और तात महात्मा विदुर की सदाचारी और सत्यवाणी को अनुचित समझता है तथा धोखेबाज गांधार नरेश शकुनी और अपने मित्र कर्ण पर विश्वास करता है)
किंतु परिस्थितियों का कृष्ण पक्ष (कुरुक्षेत्र का मैदान) आरंभ होते ही स्वार्थी लोगों की भीड़ कीट पतंगों की भांति अंधेरे में उसका साथ छोड़ देती है । अहंकार व लालच के पंख लगाकर उड़ने वाला वह मनुष्य स्वयं को धरती पर ही जड़ों से बेदखल हुआ मानकर पश्चाताप की अग्नि में जलने लगता है। (जैसा कि दुर्योधन रात्रि में अकेला सोते हुए डरता है) हालांकि यह खेल कालचक्र द्वारा संचालित है ।
लेकिन ईश्वर का ध्यान, चिंतन ,बड़ों का आशीर्वाद और शुभचिंतकों के साथ चलने वाले मनुष्यों को कभी भी कालचक्र के इस खेल से भ्रमित नहीं होना पड़ता। मानव की पहचान उसके गुणों से होती है यदि गुण, कर्म ,स्वभाव श्रेष्ठ होंगे तो कुल का गौरव होगा।
किसी भी मनुष्य का भाग्य कर्म फल होता है और जो भाग्य में लिखा है जो कर्म फल मिलना है वह होकर ही रहेगा या मिलकर ही रहेगा। काल बड़ा बलवान होता है , इसके प्रभाव से कोई नहीं बच सकता। भाग्य उसे कहते हैं जो हमारे कर्म का तत्काल फल मिल रहा है । इस प्रकार कर्म के तत्काल मिलने वाले फल को शुभ कर्म करके हम परिवर्तित कर सकते हैं। परंतु भाग्य कुछ देर पश्चात जब प्रारब्ध में परिवर्तित हो जाता है तब उसका फल जन्म जन्मांतर में भोगना ही पड़ता है । इसलिए व्यक्ति को भाग्यवादी नहीं होना चाहिए ।

मानव की सावधानी ही साधना है

कल का दिवस तो उन सपनों की अनुक्रमणिका में अंकित हो गया है। अब आज के दिवस को देखते हैं क्या होगा या आज का दिवस भी कल के दिवस का यथानुगमन करेगा ऐसा आभास होता है। आज हमेशा वर्तमान में जब होता है उसका सदुपयोग उसी क्षण करना चाहिए। जिसने आज वर्तमान को संभाल लिया उसे भूत का पश्चाताप और भविष्य की चिंता नहीं रहती। वर्तमान चल रहा है वर्तमान को संभालो। यही श्रेयस्कर है एक मानव के लिए।
एक मनुष्य के जीवन का यथार्थ में विश्राम परमात्मा पर पड़ता है भौतिक जगत के प्रसंगों पर नहीं।
वह मानव अभावग्रस्त स्वभाव से ही है , जिसको विषयों की आसक्ति ने घेर रखा है वह हमेशा अभावग्रस्त ही रहेगा।
एक मानव के जीवन में साथ ही तो अनेक मिलते हैं लेकिन उसका असली साथी तो परमात्मा है ( उसके अंदर जीव है) जिसका आश्रय लिए बिना जीव की यात्रा समाप्त नहीं होती।
एक मानव को अपने कर्म ही यदि योग बनाने हैं तो ऐसी शैली अपनाने के लिए निरंतर भगवत गुण लीलाओं का श्रवण मनन अनिवार्य है।
परमात्मा को प्रतिक्षण याद रखना चाहिए , भक्ति में शक्ति वीरता ज्ञान और आनंद है । आत्मा परमात्मा का प्रेम ही परम धर्म है । आत्मा परमात्मा को जानने की विद्या सभी विधाओं से अधिक आनंददायक है। सुख और सम्मान देने से अधिक मिलते हैं लेने से कम हो जाते हैं।

दुनिया के रूप

यह दुनिया एक हलचल है।
यह दुनिया एक दलदल है।
यह दुनिया एक पल की है।
यह दुनिया आज कल की है।
यह दुनिया निश्चल की है ।
यह दुनिया कपटी छल की है ।
यह दुनिया दो रंगी है।
यह दुनिया सतरंगी है।
यह दुनिया बहुरंगी है।
यह दुनिया नंगी की नंगी है।
यह दुनिया कलंगी है।
यह दुनिया एक डाली है।
यह दुनिया जोश_ए_प्याली है।
यह दुनिया निराली है।
यह दुनिया खाली है।
दुनिया में हर कोई अपना है।
मगर दुनिया एक सपना है।
यह दुनिया फूल है।
यह दुनिया निर्मूल है।
यह दुनिया शूल है।
यह दुनिया भूल है।
यह दुनिया अनुकूल है।
यह दुनिया प्रतिकूल है।
यह दुनिया सनासाई है।
यह दुनिया तन्हाई है।

दुनिया की उलझन से निकलने का मार्ग बताते हुए श्रीकृष्णजी कहते हैं कि कुछ मनीषियों का कथन है कि कर्म सदा दोषमुक्त होता है-उनका मानना है कि कर्म में दोष रहना ही है, उसे दोषमुक्त किया ही नहीं जा सकता अत: दोषयुक्त कर्म का त्याग कर देना ही उचित है। जो लोग भक्ति के नाम पर निकम्मे और निठल्ले होकर बैठते हैं वे गलती ही करते हैं। इससे वह यज्ञ, दान, तप और कर्म का त्यागकर निकम्मे होकर बैठ जाते हैं। जबकि गीता की द्रष्टि में यह निकम्मापन सर्वथा अक्षम्य है। श्रीकृष्ण जी का कहना है कि यज्ञ, दान, तप और कर्म का कभी भी और किसी भी स्थिति में त्याग नहीं करना चाहिए।
श्रीकृष्णजी की मान्यता है कि त्याग भी सत्व, रज और तम इन तीन प्रकार का होता है। यज्ञ, दान, तप और कर्म कभी भी त्याग करने योग्य नहीं होते हैं। अत: इनका त्याग करने के विषय में मनुष्य को सोचना भी नहीं चाहिए। इन्हें करने में किसी प्रकार के आलस्य या प्रमाद का सहारा नहीं लेना चाहिए। इन्हें तो करना ही चाहिए। क्योंकि यज्ञ, दान, तप और कर्म के करने से तो विद्वान भी पवित्र हो जाते हैं।
सभी कर्मों को फल की आशा से मुक्त होकर अर्थात अनासक्ति भाव से यदि किया जा सकता हो तो उन्हें अवश्य ही पूर्ण करना चाहिए। हे पार्थ यह मेरा निश्चित और अन्तिम मत है।

देवेंद्र सिंह आर्य
चेयरमैन : उगता भारत

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