भाजपा की बढ़ सकती है मुश्किलें, सिंधिया समर्थकों को मंत्रिमंडल में स्थान देने पर

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दिनेश शुक्ला

 प्रदेश में 15 साल बाद सत्ता में लौटी कांग्रेस की कमलनाथ सरकार बनने के 15 महिने बाद ही कुर्सी छोड़ने को मजबूर हो गई। जिसके लिए अब पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ अपनी ही पार्टी के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को इसका जिम्मेदार ठहरा रहे है।

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह की 1 मई को राज्यपाल लालजी टंडन से मुलाकात के बाद से राज्य में एक बार फिर से मंत्रिमंडल विस्तार की सुगबुगाहट शुरू हो गई है। राज्यपाल से इस दौरान मुख्यमंत्री करीब 50 मिनट चर्चा की। बताया जा रहा है कि मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस दौरान राज्यपाल को प्रदेश में कोरोना की स्थिति के बारे में भी जानकारी दी साथ ही राजनीतिक हालात और विश्वविद्यालयों के सत्र को लेकर भी राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच चर्चा हुई। लेकिन मुख्यमंत्री और राज्यपाल के बीच हुई इस मुलाकात ने राज्य में सियासी हलचल बढ़ा दी है।
पिछले माह 21 अप्रैल को भाजपा सरकार बनने के 29 दिन बाद शिवराज सिंह चौहान ने अपने मंत्रिमंडल का गठन किया। इस दौरान शिवराज मंत्रिमंडल में शामिल पांच मंत्रियों को राज्यपाल ने पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। मंत्री पद की शपथ लेने वालों में भाजपा के वरिष्ठ नेता नरोत्तम मिश्रा, कमल पटेल और महिला आदिवासी नेता मीना सिंह सहित हाल ही में ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थन में कांग्रेस छोड़ भाजपा का दामन थामने वाले तुलसी सिलावट और गोविंद सिंह राजपूत शामिल है। इन पांचों मंत्रियों को पहले दिन कोरोना की रोकधाम के लिए संभाग बांटे गए और दूसरे दिन विभाग। मंत्री नरोत्तम मिश्रा के हिस्से गृह, लोक स्वास्थ्य और परिवार कल्याण जैसे अहम विभाग हिस्से में आए तो कमल पटेल को किसान कल्याण एवं कृषि विकास विभाग मिला वही मीना सिंह को आदिम जाति कल्याण विभाग तो सिंधिया समर्थक तुलसी सिलावट को जल संसाधन और गोविंद सिंह राजपूत को खाद्य, नागरिक आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण के साथ सहकारिता विभाग सौंपा गया। जबकि मंत्रिमंडल गठन के बाद प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस ने भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व नेता प्रतिपक्ष गोपाल भार्गव को मंत्री मंत्रिमंडल में शामिल न करने को लेकर बीजेपी पर तंज कसा और सिंधिया समर्थकों को लेकर निशाना साधा।
मध्य प्रदेश में 15 साल बाद सत्ता में लौटी कांग्रेस की कमलनाथ सरकार बनने के 15 महीने बाद ही कुर्सी छोड़ने को मजबूर हो गई। जिसके लिए अब पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ अपनी ही पार्टी के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह को इसका जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। हालंकि यह रायता फैलाने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया अभी आइसोलेशन में क्वारंटाइन है। वह भाजपा की सदस्यता ग्रहण करने के बाद लगातार अपने समर्थकों जिन्होंने 15 महीने पुरानी कांग्रेस की कमलनाथ सरकार गिराकर सत्ता की चाभी बीजेपी के हाथों सौंप दी उनके लिए राजनीतिक भूमि तैयार करने में लगे है। ताकि आगामी उपचुनाव में उनके राजनीतिक समर्थकों को किसी तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े। जिसके लिए वह कोई भी जतन करने को तैयार है। जिसकी बानगी शिवराज मंत्रिमंडल के गठन में दिख गई जो तीन-दो के फार्मूले पर बीजेपी ने काम करते हुए पांच में से दो मंत्री सिंधिया समर्थक बनाए।
लेकिन अपने ही नेताओं की अनदेखी कर रही बीजेपी में अंदर ही अंदर असंतोष पनपने लगा है। पूर्व नेता प्रतिपक्ष और भाजपा के सबसे वरिष्ठ विधायक गोपाल भार्गव निराश बताए जा रहे हैं। पिछले दिनों उन्होनें अपनी ही सरकार को घेरते हुए टॉस्क फोर्स की मीटिंग के दौरान मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से यह दो टूक यह कह दिया कि मजदूरों के खाते में एक हजार रुपये देना अच्छा है, लेकिन मैंने जो अपने क्षेत्र के मजदूरों की सूची सौंपी थी, उनके खातों में अभी तक यह पैसा नहीं पहुंचा है। जिसके बाद सियासी गलियारों में यह चर्चा का विषय बन गया और तभी से लगातार गोपाल भार्गव अपने गृह क्षेत्र में है और भोपाल से दूरियां बना ली हैं। जिसके बाद गुरूवार की रात मंत्री गोविंद सिंह राजपूत गोपाल भार्गव से मिलने उनके घर गढ़ाकोटा पहुँचे। मुलाकात के बाद जब गोविंद सिंह राजपूत से यह सवाल किया गया कि क्या वह गोपाल भार्गव को मनाने आए हैं तो गोविंद राजपूत ने कहा कि मेरी इतनी हैसियत नहीं कि मैं गोपाल भार्गव को मना सकूं। वही पीछे से एक आवाज आई जिसमें गोपाल भार्गव ने कहा कि यदि हम नाराज हो गए यो क्या बचेगा।
तो दूसरी ओर बीजेपी के कई वरिष्ठ नेता मंत्रिमंडल में शामिल होने की बाट जोह रहे है। इसी को लेकर शिवराज सिंह चौहान खासे पसोपेश में नजर आ रहे हैं। मंत्री पद सीमित है और कई वरिष्ठ नेताओं को मंत्रिमंडल में समायोजित करना है यह ढेड़ी खीर बनता जा रहा है। सबसे ज्यादा समस्या आ रही है बुंदेलखंड क्षेत्र से जहां गोपाल भार्गव जैसे दिग्गज और वरिष्ठ नेता है तो वही शिवराज के करीब पूर्व गृहमंत्री भूपेन्द्र सिंह भी मौजूद है। इस क्षेत्र से पहले ही सिंधिया खेमें से गोविंद सिंह राजपूत को मंत्री बनाया जा चुका है। तो वहीं कई ऐसे विधायक भी मंत्रिमंडल में शामिल होने के लिए बेताब है भाजपा के टिकट से लगातार जीतते आ रहे हैं जिसमें शैलेन्द्र जैन और प्रदीप लारिया का नाम सबसे आगे हैं।
जबकि विंध्य क्षेत्र में भी इस बार सिर्फ राजेन्द्र शुक्ला के नाम पर सहमति बनती नहीं दिख रही पार्टी सूत्रों की माने तो विंध्य क्षेत्र के प्रमुख विधायकों ने बैठक करके संगठन से कहा है कि इस बार सिर्फ शुक्ला नहीं चलेंगे। विंध्य क्षेत्र में भाजपा ने इस बार अधिक सीटे जीती हैं, इसलिए अन्य को भी मौका मिले। रीवा संभाग की देवतालाब विधानसभा से बीजेपी के वरिष्ठ विधायक गिरीश गौतम ने इस बैठक को लेकर कहा कि ‘कोरोना समेत कई मामलों को लेकर हम पांच-छह विधायकों ने बैठक की है। हम राजेंद्र शुक्ला का विरोध नहीं कर रहे, लेकिन विंध्य में 30 में से 24 सीटें जीतने के बाद प्रतिनिधित्व तो बढ़ना चाहिए।’ यहां राजेंद्र शुक्ला के अलावा गिरीश गौतम, नागेंद्र सिंह गुढ़, जुगलकिशोर बागड़ी, नागेंद्र सिंह नागौद समेत कुछ और लोग भी मंत्रिमंडल में शामिल होने की आस रखते हैं।
कुछ यही हाल मालवा और निमाड़ क्षेत्र का भी है। जहां इंदौर, उज्जैन, रतलाम, मंदसौर और नीमच में मंत्रिमंडल में शामिल होने के लिए दावेदारों की लाइन लगी है। ओमप्रकाश सकलेचा, जगदीश देवड़ा, यशपाल सिंह सिसोदिया, मोहन यादव, चेतन कश्यप, ऊषा ठाकुर, मालिनी गौड़, महेंद्र हार्डिया और रमेश मेंदोला ने संगठन के सामने अपनी बात रख दी है। इसमें भाजपा महासचिव कैलाश विजयवर्गीय के खास रमेश मेंदोला को जगह मिल सकती है। जबकि ग्वालियर-चंबल क्षेत्र जहां सबसे अधिक 16 विधानसभाओं में उपचुनाव होने है यहां और मालवांचल में बिना सिंधिया की बिना राय के किसी का भी मंत्री बनना मुश्किल होगा। क्योंकि ग्वालियर-चंबल और मालवांचल के कुछ क्षेत्रों में सिंधिया की अच्छी पैठ मानी जाती है। लेकिन वही कांग्रेस सरकार को गिराने में अहम भूमिका अदा करने वाले भिंड जिले की अटेर विधानसभा से विधायक अरविंद भदौरिया मंत्रिमंडल में जगह पा सकते है।
अगर मंत्रिमंडल विस्तार आगामी उपचुनाव को देखकर किया जा रहा है तो भाजपा ज्योतिरादित्य सिंधिया की अनदेखी नहीं करेगी। क्योंकि जिन 24 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होना है उन पर अगर नज़र दौड़ाएं तो ज्यादातर सीटे सिंधिया समर्थकों की है जिसमें सुमावली, मुरैना, दिमनी, अंबाह (अजा), मेहगांव, गोहद (अजा), ग्वालियर (पूर्व), भांडेर (अजा), करैरा (अजा), पोहरी, अशोक नगर (अजा), मुंगावली, जौरा, ग्वालियर, डबरा (अजा), बमोरी, सुरखी, सांची (अजा), सांवेर (अजा), अनूपपुर (अजजा), हाटपिपल्या, बदनावर, सुवासरा, आगर (अजा) शामिल है। जबकि शहडोल संभाग में अनूपपुर से बिसाहूलाल के मंत्री बनने की प्रबल संभावनाओं से भाजपा के पूर्व मंत्री जयसिंह मरावी का पत्ता कट सकता है। तो मालवांचल के मंदसौर-रतलाम क्षेत्र की सुवासरा से कांग्रेस के बागी हरदीप सिंह डंग के मंत्री बनने के बाद यशपाल सिंह सिसोदिया, राजेंद्र पांडे, ओमप्रकाश सकलेचा और चेतन कश्यप में से एक को चुनना ढेड़ी खीर होगी।
लेकिन सबसे बड़ा धर्मसंकट मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के सामने यह है कि सागर जिले में सिंधिया समर्थक गोविंद सिंह राजपूत के मंत्री बनने के बाद गोपाल भार्गव और भूपेंद्र सिंह में से किसको मंत्री बनाया जाए। जिसको लेकर शिवराज सिंह चौहान को पसीना छूट रहा है। एक ही जिले से तीन मंत्री बनाना शायद संभव नहीं हो पा रहा। सूत्र बताते हैं कि इसी को लेकर शिवराज सरकार ने एक फार्मूला निकाला है, जिसमें गोपाल भार्गव को विधानसभा अध्यक्ष का पद देने की पेशकश की गई है। यदि भार्गव मान जाते हैं तो फिर शिवराज, गोविंद सिंह के साथ भूपेंद्र सिंह को भी मंत्री बनाया जा सकेगा। लेकिन ऐसा नहीं होता है तो शिवराज सिंह चौहान के सामने बड़ी चुनौती इस बात की होगी कि वह गोविंद राजपूत के साथ भूपेंद्र सिंह को चुने या फिर गोपाल भार्गव को।
मंत्रिमंडल विस्तार में ज्योतिरादित्य सिंधिया समर्थक कांग्रेस के बागी 8 और मंत्री बनाए जाने हैं। इसके अलावा कई मंत्री राष्ट्रीय नेतृत्व की पसंद के बनने हैं। ऐसे में भाजपा के लिए सिर्फ 21 मंत्री पद ही बचेंगे, जबकि इन पदों के लिए उसके पास दोगुने से ज्यादा दावेदार हैं। इसके बावजूद, मुख्यमंत्री सियासी समीकरणों को देखते हुए मंत्रिमंडल में तीन से चार स्थान खाली रखेंगे। 21 अप्रैल को हुए मंत्रिमंडल के गठन में जिस तरह भाजपा ने नरोत्तम मिश्रा के साथ कमल पटेल और मीना सिंह को शामिल किया है, उससे उन 9 पूर्व मंत्रियों में उम्मीद बढ़ गई है जो 2013 का चुनाव हारने के बाद अब 2018 में फिर जीते हैं।
इन सबके बीच भाजपा के वरिष्ठ नेता गोपाल भार्गव का यह कहना कि यदि हम नाराज हो गए यो क्या बचेगा। यह साफ करता है कि दूर से ही सही लेकिन गोपाल भार्गव इशारा कर रहे हैं कि वह नाराज हैं और अगर उनकी नाराजगी दूर ना हुई तो फिर पार्टी को दिक्कत हो सकती है। वही सियासी गालियारों में यह चर्चा जोर पकड़े हुए है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थकों के दम पर भाजपा ने मध्य प्रदेश में सरकार तो बना ली है, लेकिन क्या भारतीय जनता पार्टी सिंधिया समर्थकों के आगे अपने ही कद्दावर और वरिष्ठ नेताओं को नाराज और नज़रअंदाज करने का जोखिम उठा पाएगी?

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