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वैदिक जीवन स्वस्थ व श्रेष्ठ जीवन का संवाहक

संसार में सबसे प्राचीन धर्म व संस्कृति वेद वा वैदिक है। वेद ईश्वर का सृष्टि की आदि में दिया गया ज्ञान है। इस वेदज्ञान के अनुसार जो मत व धर्म प्रचलित हुआ उसी को वैदिक धर्म कहा जाता है। वैदिक धर्म उतना ही पुराना है जितना पुराना हमारा संसार है। न केवल हमारे अपितु संसार के सभी लोगों के पूर्वज वैदिक धर्म को मानने व आचरण करने वाले थे। वर्तमान समय में राजनीति व अज्ञानता के कारण लोग सत्य को स्वीकार न कर अपने अविद्यायुक्त मतों व परम्पराओं को मानने में ही गौरव समझते हैं। यह मनुष्यता व देश एवं समाज के हित में नहीं है और अज्ञानता से पूरित है। मत-मतान्तरों के झगड़ों के कारण ही संसार में अशान्ति व युद्ध आदि होते हैं। लोग अपने अपने मत को अच्छा व दूसरे के मत को अपने से हीन वा बुरा मानते हैं। कुछ मत तो हिंसा में विश्वास रखते हैं। उन्हें अवसर मिलता है तो वह अपने मत के प्रचार व प्रसार के लिये असत्य, छल, बल, लोभ, हिंसा व भय आदि का सहारा लेने से परहेज नहीं करते। वैदिक मत में यह सब बुरी बातें वर्जित हैं। वेद प्रेम व अहिंसा का धर्म है जो सत्य को सर्वोपरि रखता है और असत्य का शत्रु है।

वेद को मानने वाला कभी किसी पर हिंसा नहीं करता। हां वेद हिंसा करने वालों को यथायोग्य उत्तर देना स्वीकार करते हैं। हिंसा को रोकने के लिये यथायोग्य व्यवहार करना आवश्यक होता है। हमारा देश अहिंसा के सिद्धान्त पर चल रहा है परन्तु न्याय की दृष्टि से दुष्ट कर्मियों को फांसी पर भी चढ़ाना पड़ता है। उन्हें जेलों में भी रखना पड़ता है। शत्रु देशों से अनेक बार युद्ध हुए हैं जिसमें हमने अपने हथियारों का प्रयोग किया है जिसमें हमारे लोग भी मरे हैं और इसका प्रतिकार करने के लिये हमारे सैनिकों ने देश रक्षार्थ शत्रुओं को भी उनके उचित स्थान पर पहुंचाया है। कश्मीर में तो विगत 70 वर्षों से ही हालत असामान्य थे। वहां की एक बड़ी जनसंख्या भारत के विरुद्ध तथा पड़ोसी शत्रु देश की सर्मथक थी। कश्मीर के लाल चैक पर स्वतन्त्रा व गणतन्त्र दिवस पर तिरंगा नहीं फहराया जा सकता था। इसके लिये आन्दोलन करने पड़ते थे। पड़ोसी देश से आतंकवादी आते थे और यहां पनाह पाते थे। ये आतंकवादी हमारे देश के देशभक्तों को मारते थे। 4 लाख कश्मीरी पण्डितों को वहां से भगा दिया गया। अनेकों की हत्यायें की गई। माताओं व बहिनों का अपमान किया गया जो शब्दों में वर्णन करने योग्य नहीं है। वैदिक धर्म कभी किसी व्यक्ति का छल, बल, भय व लोभ से धर्मान्तरण नहीं करता जबकि अन्य सब ऐसा करते हुए दृष्टिगोचर होते हैं। यही एक प्रमाण वैदिक धर्म की श्रेष्ठता का पर्याप्त है।

वेद परमात्मा प्रदत्त ज्ञान है। परमात्मा ने सृष्टि और हम सब प्राणियों को बनाया है। परमात्मा हमारी आवश्यकतायें एवं वास्तविक व कृत्रिम सुखों को भी जानता है। हम भ्रमित न हों, इस लिये ईश्वर ने वेदों में हमें हितकारी ज्ञान व उपदेश किया है। हम इससे लाभ तभी उठा सकते हैं जब हम इसका स्वाध्याय करें और इसके महत्व को समझे। वर्तमान स्थिति यह है कि लोग विनाशकारी भौतिक उन्नति के मार्ग पर दौड़ रहे हैं। इस भागदौड़ में मनुष्य उचित-अनुचित, नैतिक-अनैतिक, धर्माधर्म तथा पाप-पुण्य आदि को भूल गया है। सरकारों ने जनता के सामने यही आदर्श रखे हैं। वेद प्रचार ठप्प है। वेद प्रचार हमारी सरकारों को करना चाहिये था परन्तु सब अपने आप को सेकुलर अर्थात् धर्म का विरोधी मानती व दिखलाने का प्रयत्न करती हैं।

मनुष्य नहीं जानता कि यह संसार परमात्मा का बनाया हुआ है। इस जग के कण कण के अन्दर व बाहर परमात्मा व्यापक है। ईश्वर सर्वद्रष्टा है। वह न केवल हमारे कर्मों को ही हर क्षण देखता है अपितु हमारे मन में जो संकल्प-विकल्प होते हैं उन्हें भी भली प्रकार से यथावत जानता है। हमारा कोई भी अच्छा या बुरा कर्म उसकी दृष्टि से छिपता नहीं है। वह परमात्मा समय के साथ मनुष्यों की तरह हमारे कर्मों को भूलता भी नही है। उसकी व्यवस्था ऐसी है कि जब तक कर्म का फल न भोग न लिया जाये उसका संस्कार हमारी आत्मा पर रहता है और वह भोगने के बाद ही समाप्त होता है। हमने इस जन्म व पूर्वजन्मों में जो कर्म किये हैं, जिनका फल भोग लिया है वह तो अब हमें सुख व दुःख नहीं पहुंचायेंगे परन्तु जो कर्म अभी भोगे नहीं है उनके कारण हमें वर्तमान एवं भावी जीवन में सुख व दुःखों की प्राप्ति होगी। अतः इस रहस्य को जानकर हमें अपने जीवन में कर्मों को करना है। यदि हम इसकी उपेक्षा करेंगे तो इसका दंश हमें ही झेलना पड़ेगा और अवश्य ही झेलना पड़ेगा। एक सिद्धान्त वाक्य है कि मनुष्य को अपने शुभ व अशुभ कर्मों का फल अवश्य ही भोगना पड़ता है। बिना फल भोग किये हुए कर्म का प्रभाव नष्ट नहीं होता। अतः हमें वेदों का अध्ययन कर वेदों की सत्य शिक्षाओं को जानना चाहिये और अपने वर्तमान व भविष्य का विचार करके ही निर्णय लेने चाहियें।

वेद हमें सत्य मार्ग पर चलने और असत्य मार्ग का त्याग करने की शिक्षा देते हैं। इसी उद्देश्य से सभी शास्त्रों की रचना हमारे ऋषियों ने वेदों से प्रेरणा ग्रहण कर वेदों के सर्वथा अनुकूल की है। वेदों को स्वतः प्रमाण बताया गया है। अन्य शास्त्र तभी प्रमाणिक होते हैं यदि उनकी मान्यतायें व सिद्धान्त सर्वथा वेदानुकूल हों। हमारे यहां बहुत से ऐसे ग्रन्थ भी हैं जिनमें वेदविरुद्ध बातें भरी पड़ी हैं। मत-मतान्तरों के ग्रन्थों का बहुत बड़ा भाग वेदविरुद्ध मान्यताओं से युक्त है। ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश के ग्यारह से लेकर चौदहवें समुल्लास में इन पर विस्तार से प्रकाश डाला है। यदि हम वेद का स्वाध्याय आरम्भ करने से पूर्व सत्यार्थप्रकाश का अध्ययन कर लें तो हम वेदों के सिद्धान्तों को सार रूप में जान सकते हैं। जिन लोगों ने सत्यार्थप्रकाश को जाना व समझा था, उनके जीवन ही बदल गये। स्वामी श्रद्धानन्द, पं. लेखराम, पं. गुरुदत्त विद्याथी, महात्मा हंसराज, पं. राम प्रसाद बिस्मिल जी आदि सत्यार्थप्रकाश को पढ़कर ही सत्य व कर्तव्य पथ पर आगे बढ़े थे। हम भी यदि सत्यार्थप्रकाश को जाने व समझे तो हमारा जीवन भी कर्तव्य पथ पर आगे बढ़ सकता है। सत्यार्थप्रकाश पढ़कर वेदों का स्वाध्याय करने का आंशिक लाभ भी प्राप्त हो जाता है। अतः वेदों के स्वाध्याय सहित सत्यार्थप्रकाश से भी लाभ उठाना चाहिये। इसके साथ ही उपनिषद, दर्शन, मनुस्मृति, रामायण एवं महाभारत आदि ग्रन्थों का अध्ययन कर भी बुद्धि का विकास वा उन्नति की जा सकती है। एक साधारण मनुष्य भी इन ग्रन्थों को पढ़कर विद्वान बन सकता है।

वेद मनुष्यों को पंच महायज्ञ करने की प्रेरणा करते हैं। वेदों का ज्ञान व विज्ञान से किंचित व कहीं भी विरोध नहीं है। वेद तो ज्ञान व विज्ञान के वाहक हैं। इसी से यह प्रामाणित होता है कि वेद ईश्वरीय ज्ञान है। यदि यह मनुष्य कृत ग्रन्थ होते तो मत-मतान्तरों के ग्रन्थों की तरह से अविद्या से ग्रस्त होते। इनमें अपूर्णता होती। परन्तु इनमें ऐसा नहीं है। जिस प्रकार माता-पिता अपनी सन्तानों को मुख्य मुख्य सभी बातों का ज्ञान देते हैं जिससे कि उनकी सन्तान विचलित व पथभ्रष्ट न हो। इसी प्रकार से वेद में भी परमात्मा ने तृण से लेकर ईश्वर पर्यन्त सभी पदार्थों का ज्ञान दिया है। यह निर्विवाद है कि वेद और उपनिषदों से ही ईश्वर के सत्यस्वरूप का ज्ञान होता है। जिन मत व पन्थों ने वेद के विचारों को अपने मत में सम्मिलित किया है, उस सीमा तक वह निर्दोष हैं। शेष बातें उनकी अपनी हैं जो सत्य के विपरीत व मिथ्या हैं। इसके लिये सत्यार्थप्रकाश के उत्तरार्ध भाग का अध्ययन कर इसे जाना जा सकता है।

वेद मनुष्य को प्रातः ब्रह्ममुहुर्त में शयन त्याग करने तथा शौच आदि से निवृत्त होकर ईश्वरोपासना व यज्ञ आदि करने की प्रेरणा देते हैं। वेद मनुष्य को शुभ व पुण्य कर्म करने की ही प्रेरणा देते हैं और अशुभ व पाप कर्मों का निषेध करते हैं। माता, पिता व आचार्य वेदों की दृष्टि में चेतन देवता होते हैं जिनसे मनुष्य जीवन उन्नति को प्राप्त होता है। इनकी सेवा-शुश्रुषा करना प्रत्येक सन्तान व शिष्य का धर्म होता है। मनुष्यों को पुरुषार्थ से अर्जित सात्विक आहार का ही सेवन करना चाहिये। समाज व देश हित के कार्यों में सम्मिलित होना चाहिये। देश व समाज के शत्रुओं से किसी प्रकार का सहयोग न कर उनके सुधार का प्रयत्न करना चाहिये। उनके कुत्सित एवं देश विरोधी विचारों को भी जानना चाहिये जिससे कि उनके प्रभाव से बचे रहें। जो व्यक्ति व दल देश हित के विरोधी विचारों के पोषक व समर्थक हैं, उनसे व उनके अनुयायियों से भी दूर रहना चाहिये। अपने निर्धन व दुर्बल बन्धुओं के प्रति सद्भाव रखते हुए उनकी सहायता व उन्नति के प्रयत्न करने चाहियें।

मनुष्य को अन्धविश्वासों व कुरीतियों से भी दूर रहना चाहिये और इनका व्यवहार व आचरण करने वाले बन्धुओं को प्रेमपूर्वक इन्हें छोड़ने का आग्रह करना चाहिये। वेदेतर मत-मतान्तरों की विचारधारायें देश का हित करने में समर्थ नहीं है। आर्थिक पक्ष से अधिक कर्तव्य व धर्म पक्ष महत्वपूर्ण है। यदि हमने आर्थिक पक्ष को महत्व देते हुए धर्म पक्ष की उपेक्षा की तो हमारी सन्ततियां हमें कभी क्षमा नहीं करेंगी। हमें भौतिक जीवन को अधिक महत्व न देकर वैदिक जीवन का, जो त्याग व पुरुषार्थ का प्रतीक है तथा जिसमें ईश्वरोपासना व अग्निहोत्र सहित सद्कर्मों को महत्व दिया गया है, उसका ही अनुसरण करना चाहिये और अपने तथा अपने धर्म के शत्रुओं से सदैव सावधान रहना चाहिये। ऐसा तभी होगा जब हममें विवेक बुद्धि होगी। हम वैदिक धर्म की अनुयायी आर्यसमाज संस्था से जुड़ेगे। आर्यसमाज देश व समाज सहित धर्म की रक्षा का पर्याय संगठन है। हम इस संगठन को जितना अपनायेंगे उतना ही हमारा, देश तथा धर्म व संस्कृति का कल्याण होगा। यह हम सब का मुख्य कर्तव्य है।

आईये अपनी आत्मा, सत्य सनातन वैदिक धर्म, वैदिक संस्कृति सहित समाज व देशोन्नति के लिये हम वेद, धर्म तथा आर्यसमाज से जुड़े और अपना कल्याण करें। जीवन को सफल बनाने का वैदिक मार्ग ही उज्जवल एवं श्रेयस्कर मार्ग है। इसके अतिरिक्त अन्य कोई श्रेष्ठ मार्ग नहीं है। ‘वेद है जीवन हमारा वेद प्राणाधार है’ इस वाक्य को अपने जीवन का प्रेरक वाक्य बनायें।

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