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भारतीय संस्कृति

उस रसिया के गीत गा तेरा जीवन आनंद से झूम उठेगा

 

“जैसे कछुआ अपने अंगों को सब ओर से सिकोड़कर अपने खोल के अंदर खींच लेता है ,उसी प्रकार जब कोई पुरुष इंद्रियों के विषयों में से अपनी इंद्रियों को खींच लेता है, तब समझो कि उसकी प्रज्ञा बुद्धि स्थिर हुई । ” ( ५८ )

इस श्लोक में कछुए का दृष्टांत देकर संसार के विषयों से बचने के लिए एक बहुत व्यावहारिक उपाय की तरफ निर्देश किया है। हम दुनिया में रहते हुए काम , क्रोध , लोभ ,मोह और अहंकार से कैसे बचें ?गीता का कहना है कि मनुष्य को अपनी इंद्रियों का भवसागर से पार करने के लिए सदुपयोग करना चाहिए । उनके दुरुपयोग से हर स्थिति में बचना चाहिए । यह कार्य वैसे ही हो जैसे कछुआ ससमुद्र जल में तैरने के लिए तो अपनी इंद्रियों का सदुपयोग करता है परंतु सामान्य दशा में उन्हें समेट कर बैठता है। कछुआ जल में अपने सब हाथ पैर फैलाकर तैरता है। जब कान किन्ही अश्लील शब्दों पर , आंख किसी रूप पर , जीभ किसी स्वाद पर और नाक किसी गंध पर न् तो हर्षित हो न मोहित हो , तब समझो कि हममें कछुआ वृत्तिआ गई है । ऐसी अवस्था ही जितेंद्रियता अवस्था होती है। इस कछुआ वृत्ति को पैदा करने के लिए हमारे विद्यालयों का परिवेश ऐसा हो कि वहां पर छात्र-छात्राएं जितेंद्रियता की इस पवित्र अवस्था को प्राप्त कर लें । वातावरण का मानव के मन पर अमिट प्रभाव पड़ता है। मानव का हम ऊर्ध्वमुखी विकास करना चाहते हैं तो उसके वातावरण का सुधार करना होगा। आज का समाजशास्त्र भी वही बात कहता है जो गीता ने कछुए के दृष्टांत से कहीं।

“देहधारी मनुष्य के निराहार होने पर विषय तो निवृत हो जाते हैं परंतु उन विषयों का रस उनके प्रति लालसा बनी रहती है यह लालसा परब्रह्म का दर्शन करने पर निवृत हो जाती है”। ( ५९)
इस लोक में निराहार का अर्थ भोजन न लेना ही नहीं है , अभिप्राय सब इंद्रियों के उपवास से है ।जब इंद्रियां निराहार होती हैं अपने-अपने रूप ,रस, गंध, शब्द ,स्पर्श इन विषयों को त्याग देती हैं तब भी तो इनमें रस की लालसा बनी रहती है ।यह लालसा कैसे दूर हो ? – गीता का कथन है कि इन विषयों में रस है परंतु परब्रह्म का रस इन सबसे बड़ा है ।’उसे रसानाम’ रस कहा गया है वह रसों का रस है , जब मनुष्य के सम्मुख वह रस आ जाता है तब वह विषयों के रस को भूल जाता है। तब वह आत्मरस का रसिया हो जाता है , उसके उस रस के आगे संसार के सारे रस नीरस हो जाते हैं।
आज का मनोविज्ञान भी यह कहता है कि विषयों को अगर न भोगा जाएगा तो उनकी लालसा मन के भीतर पड़ी-पड़ी बेचैनी पैदा करती रहेगी। मनोविश्लेषण वादियों की यह धारणा है कि जो लोग ब्रह्मचर्य, तपस्या ,संयम आदि पर बल देते हैं यह नहीं जानते कि इन बातों से मानसिक विकृति उत्पन्न हो जाती है। व्यक्ति कुंठित हो जाता है। गीता के लिए यह बात नई नहीं है ।गीता भी कहती है कि इंद्रियों को विषयों का भोग नहीं मिलना ही संयम नहीं है ।इस प्रकार के संयम में लालसा राग तो बना ही रहता है । असली समस्या यह नहीं है कि हम इंद्रियों का भोग उन्हें न दें ।असली समस्या यह है कि हम लालसा को कैसे मिटाएं ? इसका उत्तर मनोविश्लेषणवादी तो यह देते हैं कि इंद्रियों को भोग भोगने देना चाहिए, इससे लालसा मिट जाती है ।मनोविकार नहीं होता। व्यक्ति कुंठित नहीं होता ।
गीता का उत्तर यह है कि इंद्रियों को इंद्रियों के रस से भी ऊंचे रस अर्थात परम ब्रह्म के रस में लगा देना चाहिए ।जब इंद्रियां विषयों से ऊंचे रस में डूब जाएंगी तब न कुंठा होगी ,न मनोविकार होगा। तब व्यक्ति ऊंचे रस में डूबकर स्थितप्रज्ञ हो जाएगा।

“हे कुंती के पुत्र अर्जुन ! पुरुष चाहे कितना ही यत्न करें, कितना ही विवेकशील हो ,यह मथ डालने वाली इंद्रियां बलपूर्वक मन को विषयों की तरफ खींच लेती हैं ” (६०)

“इसलिए इन सब इंद्रियों को वश में करके युक्त होकर अर्थात मेरे साथ जुड़कर मतपर होकर मुझ में ही रम कर बैठ जिस व्यक्ति की इंद्रियां उसके वश में हैं, उसकी प्रज्ञा बुद्धि स्थिर हो जाती है।” (६१)

मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि इंद्रियों का संयम नहीं हो सकता ।जब हम मन की किसी विषय वासना को दबाते हैं तब वह अवचेतना में जाकर बेचैनी पैदा कर देती है ,और वह बेचैनी तभी दूर होती है ,जब विषय का भोग भोग लिया जाता है। मनोविश्लेषणवादियों का यह विचार वर्तमान युग के भौतिकवाद के अनुरूप है। गीता इस भौतिकवाद को नहीं मानती ।गीता का कहना यह है कि इसमें संदेह नहीं कि इंद्रियों का वेग बड़ा प्रबल है ।संयम महा कठिन है, परंतु अगर मन को ब्रह्म में लगा दिया जाए उसमें जोड़ दिया जाए तो वह भी अपने आप शिथिल पड़ जाता है । जैसे ऊंचे शब्द में धीमा शब्द दब जाता है। जैसे सूर्य के प्रकाश में दीपक का प्रकाश लुप्त सा हो जाता है, वैसे परब्रह्म के रस में संसार के विषयों का रस फीका पड़ जाता है स्थितप्रज्ञता की यह अवस्था है।
जिस व्यक्ति की प्रज्ञा स्थिर नहीं होती उसका अगले 2 श्लोकों में और जिसकी स्थिर होती है उसका इन दो श्लोकों से अगले में, इस प्रकार इन दोनों प्रकार के व्यक्तियों का वर्णन श्री कृष्ण करते हुए कहते हैं ;-

“इंद्रियों के विषयों का ध्यान करते करते पुरुष का उन विषयों के साथ” संग ” पैदा हो जाता है। विषयों के लगातार संग से ,ध्यान से उनके प्रति “कामना “पैदा हो जाती है ।कामना पैदा हो जाने के बाद जब उसकी पूर्ति में बाधा पड़ती है तब क्रोध पैदा होता है ।” ( ६२)
“क्रोध से अत्यंत मूढ़भाव पैदा हो जाता है ।मूढ़भाव से स्मृति में भ्रम हो जाता है। स्मृति में भ्रम हो जाने से बुद्धि का नाश हो जाता है, बुद्धि के नष्ट हो जाने से व्यक्ति ही नष्ट हो जाता है” (६३)

इस सारे प्रकरण में बुद्धि को स्थिर रखने की बात कही गई है । अतः यह भी आवश्यक हो गया कि बुद्धि की अस्थिरता या बुद्धिनाश का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया जाए । उक्त दोनों श्लोकों में बुद्धि की अस्थिरता या बुद्धिनाश का मनोविज्ञान की दृष्टि से विश्लेषण किया गया है। बुद्धि को स्थिर रखने का मूल आधार इंद्रियों का विषयों पर विजय पाना है। परंतु इंद्रियों को विषय खींचते कैसे हैं ? इसकी मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया क्या है ?
श्री कृष्ण कहते हैं कि विषयों का बार-बार ध्यान करने से, चिंतन करने से, उन पर ही मन के टिके रहने से ,यह सारा झगड़ा पैदा होता है । वह कैसे ? जब विषयों का संग होता है , तब बार-बार के संग से ,विषयों के ध्यान से ,कामना पैदा हो जाती है ,उसके प्रति आसक्ति पैदा हो जाती है । लोक व्यवहार में भी हम देखते हैं कि अगर कुत्ते के साथ भी हमें देर तक रहना पड़े तो उसके प्रति भी कामना , आसक्ति, अनुराग उत्पन्न हो जाता है। यह कामना कभी पूरी होती है, कभी नहीं होती है ।कामना के पूरा होने में बाधा रुकावट ही पैदा होती है। रुकावट आते ही मनुष्य आग बबूला हो उठता है। क्रोध से तमतमा उठता है। तभी गीता में कहा गया है कि कामना के कारण क्रोध उत्पन्न होता है ।क्रोध में मनुष्य की दो शक्तियां नष्ट हो जाती हैं ।विवेक शक्ति तथा स्मृति शक्ति ।क्रोध में मनुष्य को आगे पीछे का कुछ नहीं सूझता। उसकी विचार शक्ति विवेक ,शक्ति नष्ट हो जाती है।
इसी को गीता में क्रोधादभवति संमोह कहा है । संमोह का अर्थ है विवेक का नष्ट हो जाना। क्रोध से दूसरी शक्ति नष्ट होती है। उसकी स्मृति। क्रोधी को यह स्मरण ही नहीं रहता कि कौन क्या है ? पिता है ? माता है ? गुरु है ? भाई है ? मित्र है ? जिसकी विचार शक्ति और स्मृति शक्ति नष्ट हो गई उसकी तो बुद्धि ही नष्ट हो गईं ।क्योंकि बुद्धि में दो ही बातें तो हैं – विचार तथा स्मृति । इस प्रकार जिसकी बुद्धि नष्ट हो गई , वह मानव नष्ट हो गया । उक्त दो श्लोकों में बुद्धि नाश का चित्र खींच कर आगे के प्रकरण में स्थिर बुद्धि वाले व्यक्ति का स्थितप्रज्ञ का चित्र खींचा गया है।

“जो व्यक्ति राग द्वेष से रहित होकर अपनी इंद्रियों को अपने वश में करके अपने अंतःकरण को विशेष प्रकार से बनाकर, शिक्षित करके ,संसार के विषयों में विचरता है वह प्रसन्नता को प्राप्त होता है।” ( ६४)
“जब मनुष्य प्रसन्नता में, प्रसाद के भाव में रहने लगता है तब उसके सब दुख दूर हो जाते हैं। प्रसन्न चित् वाले व्यक्ति की बुद्धि शीघ्र ही स्थिर हो जाती है।” (६५)

“जो व्यक्ति ब्रह्म के साथ युक्त अर्थात जुड़ा हुआ नहीं है , उसमें स्थिर बुद्धि नहीं होती ,जो व्यक्ति ब्रह्म के साथ युक्त अर्थात जुड़ा हुआ नहीं है , उसमें भावना भी नहीं होती । जिसमें भावना नहीं उसमें शांति भी नहीं , जिसे शांति नहीं उसे सुख कहां ?” (६६)
६३ श्लोक में बुद्धि नाश का वर्णन किया। 65 वें श्लोक में बुद्धि स्थिति का वर्णन किया । यह तो स्वत: सिद्ध है कि मनुष्य को बुद्धि के नाश से बचना है ।बुद्धि की स्थिरता को पाना है , परंतु बुद्धि की स्थिरता को पा लेना पर्याप्त नहीं है। 66 वें श्लोक में इस मनोवैज्ञानिक तत्व का उद्घाटन करते हुए कहा है कि बुद्धि भी कुछ काम नहीं देती जब तक उसके साथ भाव न जुड़ा हो। बुद्धि तो सिर्फ देख सकती है ।भावना देखने वाले को गतिशील बनाती है। अगर कोई देखता भर रहे ,चले नहीं ,तो देखना बेकार है। सर्प को देख लिया , परंतु देखकर मनुष्य उससे भागता तो तभी है जब डर पैदा होता है। यह डर ही तो भावना है ।भाव दो प्रकार के हो सकते हैं सकारात्मक और नकारात्मक ।प्रेम, उत्साह, आशा ,शांति ,प्रसाद सकारात्मक भाव हैं। ईर्ष्या, द्वेष ,क्रोध ,कलह , घणा नकारात्मक भाव है। परंतु कार्य दोनों का बुद्धि को वेग देना है , क्योंकि भाव का काम ही वेग देना है ।गीता की शिक्षा यह है कि संसार में अशांति इसलिए है क्योंकि हमारी बुद्धि के पीछे इसे वेग देने वाली काम, क्रोध ,लोभ ,मोह की नकारात्मक भावनाएं काम कर रही हैं। संसार में शांति लाने का उपाय यह है कि हमारी बुद्धि के पीछे सकारात्मक भावनाएं काम करने लगें ।इसी को गीता ने ‘न चाभव्यतः शांति’ इन शब्दों में कहा है।
गीता में ‘युक्त’ तथा ‘अयुक्त’ यह दो शब्द इसी प्रकरण में आए हैं। 61 वें श्लोक में युक्त शब्द आया है। 63 वें श्लोक में अयुक्त शब्द आया है । दोनों स्थल एक दूसरे से संबंध है । 61 वें श्लोक का अभिप्राय यह है कि हम अपने मन को परब्रह्म से युक्त कर देना चाहिए, जोड़ देना चाहिए, जो जोड़ देते हैं वह स्थितप्रज्ञ हैं। 66 वें श्लोक का अभिप्राय यह है कि अगर हम अयुक्त रहेंगे , मन को परम ब्रह्म से जोड़ेंगे नहीं तो न शांति मिलेगी न सुख मिलेगा।

” हे अर्जुन! यही ब्राह्मी स्थिति है( संसार में स्थित होने के स्थान पर ब्रह्म में स्थित हो जाना है )इसे प्राप्त हो जाने पर कोई भी मोह नहीं रहता , अगर अंतकाल में भी किसी को यह स्थिति प्राप्त हो जाए तो वह ब्रह्म निर्वाण को प्राप्त होता है। ब्रह्म में लीन हो जाता है। या महा निर्वाण को प्राप्त करता है।
इस प्रकार यह स्पष्ट हुआ कि आत्मा अमर है। अविनाशी है। दूसरे सिद्धांत के अनुसार शरीर मरण धर्मा है ।विनाशी है। नष्ट होने वाला है ।चलायमान है। आत्मा के अमरत्व का वर्णन करते हुए कहा गया है कि जैसे शरीर में बालपन ,यौवन तथा जरावस्था आती है ,एक अवस्था बीतती है , दूसरी आती है वैसे ही आत्मा का एक शरीर छूटता है, दूसरा आ जाता है। जैसे पुराने कपड़े उतार कर हम नये पहन लेते हैं ,वैसे आत्मा पुराना शरीर छोड़कर नया धारण कर लेता है। इसे न शस्त्र छेद सकते हैं, न अग्नि जला सकती है, न जल गला सकता है, न वायु सुखा सकती है । इस प्रकार आत्मा अमर है, उसके लिए यह सोचकर कि ‘ ‘मर जाएगा ‘ – शोक करना कहां तर्कसंगत हो सकता है ? शरीर के मरण धर्मा, विनाशी होने के संबंध में कहा गया है कि इस विनाशवान शरीर के लिए क्या शोक करना ? – जो उत्पन्न होता है, वह मरता है। मरना तो अपरिहार्य है। इसमें कोई बच नहीं सकता फिर शरीर के मरने पर हाय हाय क्या करना ?आत्मा अमर है उसे कोई नष्ट कर नहीं सकता.। शरीर जब मरण धर्मा है तो उसे कोई बचा नहीं सकता।
आत्मा और शरीर के इसी संबंध को समझ लेना विवेक उत्पन्न कर लेना है । जब यह विवेक उत्पन्न हो जाता है और यह पता चल जाता है कि यह शरीर मरणधर्मा है जबकि आत्मा अमर है , मैं यहां पर एक सराय में आया हूं और रैन बसेरे के बाद यहां से सुबह होते ही चल देना है तो इस संसार से वैराग्य उत्पन्न होता है , विरक्ति का भाव पैदा होता है। श्री कृष्ण जी वैराग्य के उसी भाव को उत्पन्न कर देना चाहते हैं। वह हमें बता देना चाहते हैं कि इस संसार के झमेले में मत पड़ , तेरा ठिकाना तो कहीं और है ।उस ठिकाने के बारे में सोच । क्योंकि यदि उस ठिकाने को पा लिया तो संसार के यह सारे वैभव , सारे ऐश्वर्य , सब फीके हो जाएंगे , सब नीरस हो जाएंगे ।तू आत्मरस का रसिक बन और रसिया बनकर उस सबके रसिया के गीत गा , तेरा जीवन आनंद से झूम उठेगा।

देवेंद्र सिंह आर्य एडवोकेट
चेयरमैन : उगता भारत

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