भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के निर्णयों का लोहा समस्त विश्व ने माना

सुरेश हिंदुस्थानी

लॉकडाउन का निर्णय कितना कठिन है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि समूचे देश की अर्थव्यवस्था ठप्प है और सरकार को प्रतिदिन लगभग 35 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का नुकसान उठाना पड़ रहा है।

कोरोना वायरस का प्रकोप अभी भी मानव समुदाय के लिए खतरनाक बना हुआ है। विश्व के देशों में चीनी वायरस संक्रमितों की संख्या में लगातार हो रही वृद्धि एक बड़ी चिंता का कारण बन रहा है। वहीं दूसरी ओर जिस चीन से इसका फैलाव हुआ है, उसके प्रति विश्व के कई देश खुलकर सामने आने लगे हैं। अभी हाल ही में अमेरिका की ओर से कहा गया है कि चीन को इसके दुष्परिणाम भुगतने होंगे। इसी प्रकार ब्रिटेन में भी चीन से संबंध तोड़ने की बात भी उठने लगी है। जहां तक भारत की बात है तो यहां पर चीन और पाकिस्तान इस वायरस को फैलाने के मुख्य जिम्मेदार माने जा सकते हैं। हम जानते ही हैं कि तब्लीगी जमात के संक्रमित लोगों द्वारा जान बूझकर भारत को इसकी गिरफ्त में लेने का प्रयास किया गया और ऐसा लग रहा है कि अभी भी यह प्रयास लगातार चल रहा है।

विश्वव्यापी कोरोना महामारी से सतर्कता और बचाव के लिए देशव्यापी लॉकडाउन को 3 मई 2020 तक बढ़ा दिया गया। इसकी घोषणा स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश की जनता को संबोधित करते हुए की। गत 24 अप्रैल को प्रधानमंत्री ने देश में 21 दिन का लॉकडाउन रहने की घोषणा की थी, जो 14 अप्रैल को समाप्त हो रही थी। लेकिन देश में जिस तरह कोरोना संक्रमण के मामले लगातार अभी भी बढ़ रहे हैं, उसके मद्देनजर एक बार फिर लॉकडाउन 3 मई तक के लिए बढ़ा दिया गया। यह निर्णय कोई प्रसन्नता पूर्वक नहीं लिया गया, बल्कि ऐसा बोझिल मन से करना पड़ा। हम विश्व के कुछ देशों से तुलना करें तो यह कहना उचित ही होगा कि भारत की सरकार और यहां की जनता ने इस वायरस से लड़ने में एक जांबाज योद्धा की भूमिका निभाई है। दुनिया के बहुत छोटे देशों में कोरोना संक्रमितों की संख्या को देखते हुए यह माना जा सकता है कि 130 करोड़ की जनसंख्या वाले देश भारत की स्थिति बहुत हद तक नियंत्रण में है। लेकिन लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई है। इसलिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कोरोना संकट से बाहर आने के लिए फिर से लॉकडाउन की घोषणा की, क्योंकि पहले लॉकडाउन के जो अपेक्षित परिणाम आना चाहिए थे, वो वास्तव में आए नहीं। उसकी वजह वायरस के संक्रमण की तीव्रता तो है ही, साथ ही मरकज से निकले वे जमाती हैं जिन्होंने सरकार और समाज की चुनौतियों को और ज्यादा बढ़ा दिया। स्थिति यह है कि देश के अनेक राज्यों में जहां-जहां तब्लीगी जमात के लोग पहुंचे वहां संक्रमण के अप्रत्याशित मामले सामने आ रहे हैं। इसलिए 21 दिन के लॉकडाउन के अपेक्षित परिणाम सामने नहीं आ सके।

लॉकडाउन का निर्णय कितना कठिन है इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि समूचे देश की अर्थव्यवस्था ठप्प है और सरकार को प्रतिदिन लगभग 35 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का नुकसान उठाना पड़ रहा है। इस नुकसान के बावजूद प्रधानमंत्री श्री मोदी ने देश की जनता की जान को प्राथमिकता में रखा है और उन्होंने 3 मई तक लॉकडाउन रखने का फैसला किया है। कहा जा सकता है कि अर्थव्यवस्था तो बाद में भी सुधर सकती है, लेकिन महामारी फैल गई तो देश का क्या होगा। यह बात सही है कि पैसों से बीमारी को ठीक किया जा सकता है, लेकिन मरे हुए व्यक्ति को जीवित नहीं किया जा सकता। इसलिए सरकार का यह निर्णय देश की भलाई के लिए उठाया गया उचित निर्णय है।

यह कड़ा निर्णय लेने से पहले प्रधानमंत्री मोदी ने सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों से चर्चा भी की थी जिसमें अधिकतर ने यह सुझाव दिया था कि लॉकडाउन बढ़ाना चाहिए। यद्यपि लोगों को उम्मीद थी कि प्रधानमंत्री 14 अप्रैल को अपने संबोधन में लॉकडाउन में कुछ बदलाव कर सकते हैं मगर एक बड़े खतरे की संभावना पर उन्होंने लॉकडाउन बढ़ाने को ही बेहतर समझा और यही उचित भी था। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में देश की तैयारियों के बारे में भी बताया और देश की जनता से सात वचन निभाने का भरोसा भी मांगा। इसमें कोई दो मत नहीं कि देश की जनता अपने मुखिया पर पूरा भरोसा करती है और वे जैसा कहते हैं वैसा ही करती है। यही वजह है कि लॉकडाउन के दौरान कुछ अप्रिय घटनाओं के बावजूद कोरोना महामारी से भारत की जंग पूरे विश्व से न सिर्फ अलग दिख रही है, बल्कि भारत की और प्रधानमंत्री मोदी के निर्णयों की सराहना भी हो रही है। विश्व के आंकड़े बताते हैं कि यदि हमारे प्रधानमंत्री ने त्वरित निर्णय नहीं लिए होते तो भारत में क्या स्थिति होती। इसीलिए विश्वस्तर पर उनकी बुद्धिमत्ता की प्रशंसा हो रही है और भारत जैसे विशाल देश में कोरोना के आंकड़े अभी तक सीमित हैं। मगर यह जंग अभी समाप्त नहीं हुई। समर अभी शेष है। सतर्कता के साथ इन कठिन परिस्थितियों में देश की जनता को अपनी हिम्मत से करोना से लड़ना भी है और जीतना भी है। इसलिए दृढ़ता के साथ सभी को इस लॉकडाउन का स्वागत भी करना चाहिए और पालन भी।

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