‘विभूति शब्द की व्याख्या’ : राही तू आनंद लोक का

vijender-singh-arya111गतांक से आगे…
आठवां श्लोक, पृष्ठ 488
7. ‘पुण्यो गन्ध पृथिव्याम’- से तात्पर्य है पृथ्वी गंध तन्मात्रा से उत्पन्न होती है। भगवान कहते हैं-हे अर्जुन! पृथ्वी में, वह पवित्र गंध मैं ही हूं। यहां गंध के साथ पुण्य का विशेषण देने का तात्पर्य है-पवित्र गंध तो पृथ्वी में स्वाभाविक रूप से रहती है, पर दुर्गंध किसी विकृति से पैदा होती है।
8. ‘तेजश्चास्मि विभावसौ’ से तात्पर्य है-तेज रूप-तन्मात्रा से प्रकट होता है, उसी में रहता है, उसी में लीन हो जाता है। अग्नि में तेज ही तत्व है। तेज के बिना अग्नि निस्तत्व है, कुछ नही। हे धनंजय! वह तेज मैं ही हूं।
9. ‘जीवनं सर्वभूतेषु’ संपूर्ण प्राणियों में एक जीवन शक्ति है, प्राण शक्ति है, जिससे सब जी रहे हैं। इस प्राणशक्ति के कारण ही वे प्राणी कहलाते हैं। प्राणशक्ति के बिना उनमें प्राणीपन कुछ नही है। प्राणशक्ति के कारण गाढ़ निंद्रा में सोता हुआ आदमी भी मुर्दे से विलक्षण दीखता है। वह प्राणशक्ति मैं हूं।
10. ‘तपश्चास्मि पिस्विषु’ से तात्पर्य है परमात्म तत्व की प्राप्ति के लिए कितने भी कष्ट आयें उनमें निर्विकार रहना तप कहलाता है। अत: तपस्वियों का तप मैं हूं।
11. ‘बीजं मा सर्वभूतानां विद्घि पार्थ सनातनम’ अर्थात हे पार्थ संपूर्ण प्राणियों का सनातन (अविनाशी) बीज मैं हूं। यानि कि सबका कारण मैं हूं। संपूर्ण प्राणी मेरे से ही उत्पन्न होते हैं, मेरे में ही रहते हैं और मेरे में ही लीन हो जाते हैं। मेरे बिना प्राणी की स्वतंत्र सत्ता नही हैं।
12. ‘बुद्घिर्बुद्घि मतामस्मि’ अर्थात बुद्घिमानों में बुद्घि मैं हूं। बुद्घि के कारण ही वे बुद्घिमान कहलाते हैं।
13. ‘तेजस्तेजस्विनामहम्’ अर्थात तेजस्वियों में तेज मैं हूं, यह तेज दैवी संपत्ति का एक गुण है। तत्वज्ञ जीवन्मुक्त महापुरूषों में एक विशेष तेज होता है, एक शक्ति रहती है, जिसके कारण दुर्गुण, दुराचारी मनुष्य भी सद्गुण-सदाचारी बन जाते हैं। यह तेज भगवान का स्वरूप है।
दसवां अध्याय पृष्ठ 694 पर 19वां श्लोक:-
यहां भगवान कृष्ण ने अर्जुन को कुरूश्रेष्ठ कहकर संबोधित किया है। इसका मुख्य कारण है-भगवान को तथा भगवान की विभूतियों को जानने की गहरी जिज्ञासा अर्जुन के मन में जाग्रत हो गयी। इसलिए भगवान कृष्ण ने अर्जुन को कुरूश्रेष्ठ कहा है। जब अर्जुन ने कहा भगवान! आप अपनी विभूतियों को विस्तार से पूरी की पूरी कहें, तब भगवान कहते हैं कि हे कुरूश्रेष्ठ अर्जुन! मैं अपनी विभूतियों को संक्षेप में कहूंगा। क्योंकि मेरी विभूतियों का अंत नही है। फिर भी यहां कुछ महत्वपूर्ण विभूतियों का उल्लेख है-
1. संपूर्ण प्राणियों के आदि, मध्य तथा अंत में मैं ही हूं। यह नियम है कि जो वस्तु उत्पत्ति, विनाशशील होती है, उसके आरंभ और अंत में जो तत्व रहता है, वही तत्व उसके मध्य में भी रहता है।
2. चंद्रमा, नक्षत्र, तारा, अग्नि आदि जितनी भी प्रकाशमान चीजें हैं उनमें किरणों वाला सूर्य मेरी विभूति है।
3. अश्विनी, भरणी, कृत्तिका आदि को सत्ताईस नक्षत्र हैं, उनका अधिपति चंद्रमा मैं हूं।
4. सभी देवताओं में मुख्य इंद्र है वह उनका अधिपति है अत: इंद्र मेरी विभूति है।
5. शरीर में सभी इंद्रियों का अधिपति मन है अत: मन मेरी विभूति है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि मन साथ में न रहने से इंद्रियां अपना काम नही करती हैं सामने विषय होने पर भी विषय का ज्ञान नही होता किंतु मन साथ हो तो विषय का आंनद प्राप्त होता है। अत: मन मेरी विभूति है।
6. कुबेर-कुबेर यक्ष तथा राक्षसों के अधिपति है और धनाध्यक्ष है इसलिए कुबेर मेरी विभूति है।
7.अग्नि-आठों वसुओं में अग्नि का प्रमुख स्थान है। अग्नि को भगवान का मुख माना गया है इसलिए यह मेरी विभूति है।
8. सुमेरू पर्वत-सुमेरू पर्वत को सोने चांदी तांबे और रत्नों का भंडार माना गया है। इसलिए सुमेरू पर्वत मेरी विभूति है।
9. बृहस्पति-संसार में संपूर्ण पुरोहितों में और विद्या-बुद्घि में बृहस्पति श्रेष्ठ है। ये इंद्र के गुरू तथा देवताओं के कुल पुरोहित है इसलिए भगवान ने बृहस्पति को अपनी विभूति बताया।
10. हे अर्जुन!महर्षियों में भक्त ज्ञानी और तेजस्वी मैं भृगु हूं। मुनियों में मैं नारद मुनि हूं अर्थात देवऋषियों में मैं नारद हूं क्योंकि वे भगवान के मन के अनुसार चलते हैं। इसलिए नारद को भगवान का मन कहा गया है। 11. वृष्णिवंशियों में मैं कृष्ण हूं। पांडवों में मैं अर्जुन हूं। शस्त्रधारियों में, मैं राम हूं।
12. वेदानां सामवेदोअस्मि वेदों की जो ऋचाएं स्वरसहित गायी जाती हैं, उनका नाम सामवेद है। सामवेद में इंद्ररूप से भगवान की स्तुति का वर्णन है। इसलिए सामवेद को भगवान ने अपनी विभूति बताया है।
13. सरसामस्मि सागर-इस पृथ्वी पर जितने जलाशय उनमें समुद्र सबसे बड़ा है। वह सभी जलाशयों का अधिपति है। इसलिए भगवान ने सागर को अपनी विभूति बताया है।
14. उच्चै श्रवा-नामक घोड़ा तथा ऐरावत नामक हाथी-समुद्र मंथन के समय चौदह रत्नों में ‘उच्चै श्रवा’ नामक घोड़ा भी एक रत्न है तथा समुद्र मंथन से प्राप्त होने वाला हाथी ऐरावत भी एक रत्न है। दोनों ही इंद्र के वाहन हैं और दोनों ही मेरी विभूति है।
15. ‘नाराणां च नराधिपम’ अर्थात संपूर्ण प्रजा का पालन संरक्षण शासन करने वाला होने के कारण राजा संपूर्ण मनुष्यों में श्रेष्ठ है। साधारण मनुष्यों की अपेक्षा राजा में भगवान की ज्यादा शक्ति रहती है। इसलिए भगवान ने राजा को अपनी विभूति बताया है।
16. ‘आयुधानामहं बज्रम’ जिनसे युद्घ किया जाता है उन्हें आयुध (अस्त्र-शस्त्र) कहते हैं। आयुधों में इंद्र का वज्र प्रमुख है। यह दधिचि ऋषि की हड्डियों से बना था। इसमें दधीचि ऋषि की तपस्या का तेज है। इसलिए भगवान ने वज्र को अपनी विभूति बताया है। 17. ‘धेनुनामस्मि कामधुक’ (पृष्ठ 702-703) नयी ब्यायी हुई गाय को धेनु कहते हैं। सभी धेनुओं में कामधेनु मुख्य है जो समुद्र मंथन के समय प्रकट हुई थी। यह संपूर्ण देवताओं और मनुष्यों की कामनापूर्ति करने वाली है। इसलिए यह भगवान की विभूति है।
18. ‘प्रजनश्चास्मि कन्दर्प’ अर्थात संसार की उत्पत्ति काम से होती है। धर्म के अनुकूल केवल संतान की उत्पत्ति के लिए सुखबुद्घि अथवा भोग-बुद्घि का त्याग करके जिस काम का उपयोग किया जाता है वह काम भगवान की विभूति है।
19. काल से आयु की गणना होती है। इसलिए काल भगवान की विभूति है।
20. पक्षियों का राजा गरूड़ को माना गया है तथा भगवान विष्णु का वाहन भी है। यह आकाश में सबसे ऊंची और लंबी उड़ान भरने में सक्षम है इसलिए इसे भी भगवान की विभूति माना गया है।
21. ‘पवन: पवतामस्मि’ वायु से सब चीजें पवित्र होती हैं और शुद्घ वायु से नीरोगता आती है। इसलिए पवित्र और नीरोग करने वाली वायु को अपनी विभूति बताया है।
22. ‘स्रोतसामस्मि जाहन्वी’ संसार में प्रवाहरूप से बहने वाले जितने भी नद, नाले नदी और झरने हैं, उन सब में गंगा जी श्रेष्ठ हैं। इसलिए भगवान ने गंगा जी को अपनी विभूति बताया है।
23. ‘अध्यात्मविद्या विद्यानाम’ अर्थात जिस विद्या से मनुष्य का कल्याण हो जाता है, वह अध्यात्मविद्या कहलाती है। दूसरी सांसारिक कितनी ही विद्या पढ़ लेने पर भी पढऩा बाकी ही रहता है किंतु इस अध्यात्म विद्या के प्राप्त होने पर पढऩा अर्थात जानना बाकी नही रहता अत: भगवान ने अध्यात्म विद्या को अपनी विभूति बताया है।
लौकिक विद्याओं में अध्यात्म विद्या अर्थात ‘आत्मज्ञान’ श्रेष्ठ है। गीता में इसे ब्रह्मविद्या भी कहा गया है।
क्रमश:

Comment:

betgaranti giriş
vdcasino giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
alobet
vegabet giriş
vegabet giriş
restbet giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
roketbet giriş
imajbet giriş
ikimisli giriş
roketbet giriş
ikimisli giriş
ikimisli giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
vdcasino giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
begaranti giriş
betpark giriş
vaycasino giriş
roketbet giriş
vegabet giriş
vegabet giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
betnano giriş
betpark giriş
betpark giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
Safirbet giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betnano giriş
norabahis giriş
betnano giriş
norabahis giriş
roketbet giriş
betbox giriş
betbox giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
betnano giriş
rinabet giriş
rinabet giriş
rinabet giriş
ikimisli giriş
ikimisli giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
ikimisli giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
sekabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
romabet giriş
romabet giriş
İmajbet güncel
Safirbet resmi adres
Safirbet giriş
betnano giriş
noktabet giriş
ikimisli giriş
ikimisli giriş