राजनीतिक अपराधियों के लिए त्वरित न्याय प्रणाली

प्रमोद भार्गव
हमारे देश में बीते ढाई दशको में राजनीतिक अपराधियों की संख्या बेतहाशा बढ़ी है। महिलाओं की हत्या उनसे बलात्कार और छेड़छाड़ करने वाले राजनीतिक अपराधी भी संसद और विधानसाभाओं में हैं। यह कोई कलिपत अवधारणा नहीं है। खुद इन जनप्रतिनिधियों ने अपनी आपरधिक पृष्ठभूमि का खुलासा चुनाव लड़ते वक्त जिला निर्वाचन अधिकारी को दिए शपथ-पत्र में किया है। इस जानकारी को सूचना-अधिकार के तहत ‘एसोसिएशन फार डेमोके्रटिक रिर्फोम ने हासिल किया है। इस रिर्पोट के मुताबिक 369 सांसदों और विधायकों पर महिलाओं को प्रताडि़त व यौन उत्पीडि़त करने के मामले पुलिस थानों में पंजीबद्ध हैं। कई मामलें अदालातों में विचाराधीन हैं। सर्वोच्च न्यायलय में सेवानिवृत महिला आईएस अधिकारी और सामाजिक कार्यकरता ओमिका दुबे द्वारा दायर याचिका पर गौर करें तो देश में 4835 सांसदों और विधायकों में से 1448 के खिलाफ आपराधिक मामले चल रहे हैं।
दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि हमारे यहां अपराध भी अपराध की प्रकृति के अनुसार नहीं,व्यकित की हैसियात के मुताबिक पंजीबद्ध किए जाते हैं और उसी अंदाज में मामला न्यायायिक प्रकिया से गुजरता है। बलिक कभी-कभी तो यह लगता है कि पूरी कानूनी प्रक्रिया ताकतवर दोषी को निदोष सिद्ध करने की मानसिकता से आगे बढ़ रही है। यही वजह है कि आपराधिक छवि वाले जनप्रतिनिधियों की संख्या में निरंतर बढ़ोत्तरी हो रही है। ऐसे में यह मुगालता हमेशा बना रहता है कि राजनीति का अपराधीकारण हो रहा है या अपराध का राजनीतिकरण! इन दुर्निवार हालातों से निपटने के नजरिए से क्यों नहीं जरूरी किया जाता कि राजनीतिक अपराधियों के मामलों को त्वरित न्यायालयों में एक तय समय सीमा में निपटाया जाए?
हमारे यहां विकास और आधुनिकीकरण के लिए सभी राजनीनितक दल अधेासंरचना दुरूस्त करने की पैरवी पुरजोरी से कर रहे हैं। लेकिन इसे बेहद संकीर्ण दायरे में देखा जा रहा है। इसका अर्थ सिर्फ आवागमन और संचार के साधनों से जोड़कर देखा जाता है। जबकि भ्रष्टाचार मुक्त शासन-प्रशासन और सुटृढ़ कानून व्यवस्था इसके बुनियादी तत्व हैं। लेकिन इनकी शिथिलता के चलते जहां अपराधियों का बोलबाला बढ़ रहा है,वहीं विधायिका कि शुचिता लंपटता में तब्दील हो रही है और न्यायपालिका के हाथ बंधे हैं। इसलिए याचिया में न्यायालय से जब यह अनुरोध किया गया कि वह उन सांसदों और विधायकों के निलंबन के आदेश दे जो महिलाओं ंके खिलाफ अपराध के सिलसिले में दायर आरोपत्रों में आरोपी हैं। किंतु षीर्श न्यायालय को लाचारी जताते हुए कहना पड़ा कि सभी मुजरिम सांसदों और विधायकों को अयोग्य साबित कर उन्हें निलंबित करना हमारे अधिकार क्षेत्र में नहीं है।
यह कानूनी विडंबना स्तब्ध कर देने वाली स्थिति है। दरअसल नामजद और सजायाफता अपराधियों के चुनाव लडऩे का अधिकार जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत मिला हुआ है। इस कानून में प्रावधान है कि सजा सुनाए जाने के छह साल बाद राजनेता मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज करा सकते हैं और चुनाव भी लड़ सकते हैं। इसके उलट संविधान के अनुच्छेद 173 और 326 में प्रावघान है कि न्यायालय द्वारा अपराधी करार दिए लोगों के नाम मतदाता सूची में शामिल नहीं किए जा सकते हैं। यहां सवाल पैदा होता है कि जब संविधान के अनुसार कोई अपराधी मतदाता भी नहीं बन सकता तो वह जन प्रतिनिधि बनने के लिए चुनाव कैसे लड़ सकता है? यहां इस विंसगति को दूर करने के लिए यदि राजनेता दृढ़ता दिखाएं तो बड़ी सरलता से जनप्रतिनिधित्व विधान के उस प्रावधान को विलोपित किया जा सकता है,जिसके अंतर्गत सजा प्राप्त राजनेता को मतदाता बनने का हक मिला हुआ है। लेकिन जब संसद में ही 162 दागी बैठे हों तो वे ऐसा कानून आसानी से कैसे बनने देगें,जिससे उन्हीं की गर्दन नपने लग जाए? ऐसे में क्यों न हत्या और बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों के आरोपी संसादों व विधायकों के खिलाफ मामलों की सुनवाई त्वरित न्यायालयों में हो और इन प्रकरणों को छह माह में निपाटने की बाघ्यकारी शर्त जोड़ दी जाए। हालांकि इस दिशा में पहल करते हुए तमिलनाडू की मुख्यमंत्री जयललिता ने अनुकरणीय काम किया है। जयललिता ने 13 सूत्रीय कार्ययोजना पेश करते हुए महिलाओं के विरूद्ध अपराधों की सुनवाई के लिए हर जिले में विशेष त्वरित अदालतों का गठन करने के साथ लोक अभियोजकों का दायित्व भी महिला लोक अभियोजकों को सौंपने का निर्णय लिया है। हालांकि यह जरूरी नहीं है कि महिला लोक अभियोजक,जज वकील अथवा पुलिस होने से कानूनी प्रकिया निर्विवाद रूप से आगे बढ़ जाए, क्योंकि बलात्कार में मौत की सजा पाए पांच अभियुक्तों को अभयदान देने का काम पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा देवी पटिल ने ही किया था। लेकिन त्वरित अदालतें गठित करने का निर्णय प्रषंसनीय है। संवेदनषील राज्य सरकारें एक कदम और आगे बढ़ाते हुए यह भी कर सकती हैं कि भारतीय दण्ड संहिता की जो 354,506 और 509 धाराएं हैं, इनके दायरे में आने वाले अपराधों को गैर जमानती अपराध घोषित कर दिया जाए। धारा 354 और 506 हमला और महिला का शीलभंग करने के लिए बल प्रयोग और आपराधिक भय से जुड़ा है। वहीं 509 अश्लील शब्द, अमर्यादित भाव-भंगिमा या महिला कि आबरू को तार-तार करने की कोशिश से जुड़ी गतिविधि से संबद्ध है। कुछ ऐसे ही कानूनों में बदलाव के मद्रदेनजर तथा नए व कड़े कानून प्रस्तावित करने की दृष्टि से सर्वोच्च न्यायालय के न्यायधीश जेएस वर्मा की आगुआई मे एक समिति असितत्व में ला दी गई है। सभी राज्य सरकारों और राजनीतिक दलों से इस बाबत सुझाव भी मांगे गए हैं। ज्यादातर राजनीतिक दल बलात्कारियों को फांसी की सजा देने की मांग तो कर रहे हैं, लेकिन आईपीसी और जनप्रतिनिधिव कानून की प्रचलित धाराओं में कोई बदलाव नहीं चाहते। जबकि संभावित कई परिर्वतन राज्य सरकारें अपने स्तर पर भी कर सकती हैं। दरअसल ऐसा इसलिए नहीं हो पा रहा है, क्योंकि यौन उत्पीडऩ के मामलों में राजनेताओं के साथ प्रशासन व पुलिस के आला अधिकारी भी संलिप्त हैं। इस लिहाज से कई अवसरों पर पुलिसकर्मी अपराध रोकने में सहायक की संवेदनषील भूमिका का निर्वाह करने की बजाए पीडि़त महिला के साथ निर्ममता से पेश आने के कारण, उसकी पीड़ा और बढ़ाने का काम करते हैं। जाहिर है, राजनीतिक व्यवस्था, प्रजातंत्र में पुलिस लोक कल्याणकारी भूमिका कैसे निभाए, इसे गंभीरता से नही ले रही। इसीलिए पुलिस सुधार आयोग की सिफारिशे अर्से से ठण्डे बस्ते में पड़ी हैं। शीर्श न्यायालय भी सिंतबर 2006 में पुलिस सुधारों के लिए दिशा-निर्देश दे चुकी है,लेकिन किसी भी राज्य सरकार ने इस दिशा में कदम आगे नहीं बढय़ा। तय है,सभी राज्य सत्ताएं पुलिस पर अपना एकाधिकार बनाए रखना चाहती हैं। जब तक खासतौर से राजनीतिक अपराधियों को चुनाव प्रक्रिया से दूर रखने के लिए कोई कानून वजूद में नहीं आता तब तक राजनीतिक दल अपने स्तर पर इतना कर सकते हैं कि वे दागी चरित्र के नेताओं को एक तो टिकट न दें, दूसरे उन्हें राजनीतिक कार्यक्रमों में शामिल करके उनका महिमा-मंडन न करें। बसपा अध्यक्ष मायावती ने जरुर बलात्कारियों को टिकट नहीं देने की इच्छा प्रकट की है। और इस दृष्टि से नया कानून बनाने हेतु सर्वदलीय बैठक बुलाने की भी बात कही है। कहा तो उन्होंने यहां तक है कि दिल्ली दुश्कर्म के बाद लोगों का जमीर तो जाग गया है।

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