Categories
मुद्दा

जान है तो जहान है

प्रमोद भार्गव

संयुक्त राष्ट्र ने कोरोना महामारी के चलते भारत की अर्थव्यवस्था लड़खड़ा जाने की आशंका जताई है। उसका अनुमान है कि चालू वित्तीय वर्ष में भारत की सकल घरेलू उत्पाद दर जीडीपी घटकर 4.8 फीसदी रह सकती है। इससे पहले संयुक्त राष्ट्र के ही श्रमिक संस्थान ‘अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन’ ने भारत में 40 करोड़ लोगों के गरीबी के दायरे में आ जाने की चिंता जताई थी। अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष जैसी संस्थाएं भी इन्हीं से मिलती-जुलती आशंकाएं जता रही हैं। हालांकि इनमें कोई नहीं बात नहीं है। भारत शहरों से ग्रामों की ओर पलायन करने वाले लोगों को सड़कों पर देख चुका है। देशबंदी की घोषणा के बाद पलायन का यह आकार सड़कों पर दिखेगा, इसका अंदाजा पंचवर्षीय योजना बनाने वाले नेताओं और नौकरशाहों को भी नहीं था। बावजूद कोविड-19 महामारी से भारत ही नहीं उन सभी देशों की अर्थव्यवस्था गड़बड़ाएगी, जिनमें कोरोना के चलते लाॅकडाउन के हालात बने हैं। क्योंकि इस विकट स्थिति में घरेलू काम-धंधों से लेकर सीमापार व्यापार, पर्यटन, शिक्षा और द्विपक्षीय संधियों के तहत होने वाले सौदे भी बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। हमारी आर्थिक स्थिति बहुत ज्यादा इसलिए प्रभावित नहीं होगी क्योंकि एक तो हमारे पास इस महामारी से लड़ने के लिए नरेंद्र मोदी जैसा मजबूत नेतृत्व है, दूसरे हमारी बुनियादी जरूरतों की पूर्ति ग्राम आधारित अर्थव्यवस्था और खेती-किसानी से होती है।
भारतीय आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार असंगठित क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों की संख्या करीब 40 से 45 करोड़ है। इन्हीं में से करीब 20 प्रतिशत यानी नौ करोड़ लोग सड़कों पर थे। इस मौजूदगी से साफ हो गया कि असंगठित क्षेत्र के करोड़ों लोगों के लिए रोजगार का संकट पैदा हो गया है। वैसे भी भारत में 90 प्रतिशत कर्मशील आबादी असंगठित क्षेत्र में है। इसी में से 40 करोड़ लोगों के गरीब हो जाने की चिंता एजेंसियों ने जताई है। जबकि इन्हीं एजेंसियों ने सितंबर 2018 में कहा था कि नरेंद्र मोदी की उचित आर्थिक नीतियों के चलते 2016 में 27 करोड़ लोग गरीबी के दायरे से बाहर आ गए हैं। यह उपलब्धि कोरोना प्रकोप ने संकट में डाल दी है। इस स्थिति को मोदी समेत हमारे सभी मुख्यमंत्री भी समझ रहे हैं। इसीलिए केंद्र सरकार ने राज्यों सहित केंद्र शासित प्रांतों को आपात आर्थिक सहायता के रूप में 15000 करोड़ रुपए का पैकेज देने की न केवल घोषणा की बल्कि इसकी पहली किश्त जारी भी कर दी। हालांकि जो आर्थिक क्षति महामारी से होगी उसकी पूर्ति के लिए लगभग 10 लाख करोड़ रुपए की जरूरत पड़ेगी। लेकिन यदि हमें वास्तव में भारतीय अर्थव्यवस्था को स्थाई तौर पर पुख्ता बनाए रखना है तो शहरीकरण और औद्योगिकीकरण पर सिलसिलेवार विराम लगाते हुए ग्राम आधारित अर्थव्यवस्था को फिर से विकसित करने के ठोस उपाय करने होंगे? इससे गांव से जो शहरों की ओर पलायन होता है, वह थमेगा और नदी, तालाब, जंगल, पहाड़ और बर्फ से ढंकी जो प्राकृतिक संपदा है, वे सुरक्षित बनी रहेंगी। मानव स्वास्थ्य भी सही रहेगा, जैसा हम आज लाॅकडाउन के चलते अनुभव कर रहे हैं।
आर्थिक उदारीकरण ने अकल्पनीय औद्योगिकीकरण और शहरीकरण को बढ़ावा दिया है। बहुराष्ट्रीय कंनियों के दबाव में ऐसी नीतियां बनाई गईं, जिससे ग्राम एवं कस्बों में स्थित उद्योगों की कमर टूट गई। राजनीतिक मजबूरी अथवा अदूरदर्शिता के चलते 2007 में देशी-विदेशी कंपनियों को लघु-उद्योगों में 24 प्रतिशत निवेश की बाध्यता समाप्त कर दी गई थी। इस उपाय को लघु उद्योग क्षेत्र में प्राण डालने का बहाना बताया गया था, लेकिन देखते-देखते लघु व मंझोले उद्योग डूबते चले गए। इसी हश्र की आशंका थी। दरअसल प्रकृति के बेहिसाब दोहन से करोड़ों-अरबों के वारे-न्यारे करने वाली कंपनियां लघु-उद्योगों के व्यवसाय में इसलिए नहीं जुड़ीं क्योंकि इनमें अकूत धन कमाना संभव नहीं है। नतीजतन देशी-विदेशी उद्योगपतियों ने इन्हें व्यावसायिक दृष्टि से कभी लाभदायी नहीं माना। गोया, न तो लघु उद्योगों में निवेश हुआ और न ही इनकी संख्या बढ़ी। हां, एक समय लघु उद्योगों के लिए जो एक हजार के करीब उत्पाद आरक्षित थे, उन्हें घटाकर सवा सौ कर दिया गया। शेष उत्पादों के निर्माण व वितरण की छूट कंपनियों को दे गई। जबकि देश में उदारीकरण की नीतियां लागू होने से पहले, बड़ी संख्या में लघु उद्योग, बड़े और मंझोले उद्योगों की सहायक इकाइयों के रूप में काम करते थे और अपने उत्पादों को इन्हीं कंपनियों को बेच देते थे। कंपनियों के हित में नीतियां बना दिए जाने के कारण, इन लघु उद्योगों की भूमिका घटती चली गई और बची-खुची कसर चीन और दूसरे देशों से सस्ते उत्पाद आयात करने की प्रक्रिया ने खत्म कर दी। वैश्वीकरण का यह ऐसा दुखद पहलू था, जिसने ग्राम व छोटे शहरों में स्थित कामगारों को बेरोजगार किया और युवा होते लोगों को महानगरों की ओर रोजगार के लिए विवश किया।
आर्थिक उदारीकरण के बाद दुनिया तेजी से भूमंडलीय गांव में बदलती चली गई। यह तेजी से इसलिए विकसित हुई क्योंकि वैश्विक व्यापारीकरण के लिए राष्ट्र-राज्य के नियमों में ढील देते हुए वन व खनिज संपदाओं के दोहन की छूट दे दी गई। इस कारण औद्योगिकीकरण व शहरीकरण तो बढ़ा लेकिन परिस्थितिकी तंत्र कमजोर होता चला गया। ग्रामों से शहरों की ओर पलायन बड़ा। नदियां दुषित हुईं। विकास के लिए तालाब नष्ट किए गए। राजमार्गों, बड़े बांधों, औद्योगिक इकाइयों और शहरीकरण के लिए लाखों-करोड़ों पेड़ काट दिए गए। नतीजतन वायु प्रदूषण बढ़ा और इसी अनुपात में बीमारियां बढ़ीं। परंतु अब कोरोना संकट ने हालात पलटने की स्थितियों का निर्माण किया है। सभी तरह के आवागमन के साधनों पर ब्रेक लग गया है। अंतराष्ट्रीय व अंतरराज्जीय सीमाएं प्रतिबंधित हैं। सामाजिक आचरण में दूरी अनिवार्य हो गई है। कोरोना के समक्ष चिकित्सा विज्ञान ने हाथ खड़े कर दिए हैं। जिन यूरोपीय वैश्विक महाशक्तियों के उत्पाद खपाने के लिए आर्थिक उदारीकरण की रचना की गई थी, वे शक्तियां इस अदृश्य महामारी के सामने नतमस्तक हैं। सबसे बुरा हाल इटली, स्पेन, जर्मनी, ब्रिटेन, अमेरिका, ईरान का हुआ है। जो चिकित्सक हर मर्ज की दवा देने का दावा करते थे, वे मनुष्य को मनुष्य से दूर रहने और प्रतिरोधात्मक क्षमता बढ़ाने के लिए फल, सब्जी व दाल-रोटी खाने की सलाह दे रहे हैं। अलबत्ता इस देशबंदी का अब यह सकारात्मक पहलू देखने में आ रहा है कि लुधियाना से हिमालय की पर्वत श्रृंखलाएं दिखने लगी हैं। गंगा और यमुना जैसी दूषित नदियों का पानी निर्मल दिखाई देने लगा है। वायु प्रदूषण दूर हो जाने से हर व्यक्ति स्वस्थ्य अनुभव कर रहा है।
कुछ अर्थशास्त्री ऐसे भी हैं, जो इस महामारी के चलते सामने आई देशबंदी को आर्थिक समस्या के रूप में देखते हुए, भारतीय अर्थव्यवस्था में नौ लाख करोड़ रुपए के नुकसान का अंदाजा लगा रहे हैं। जबकि यह संकट अर्थव्यवस्था से कहीं ज्यादा मानव-स्वास्थ्य और गरीब व वंचितों की रोजी-रोटी से जुड़ा है। बहरहाल, अर्थ की जो भी हानि हो, सकल घरेलू दर में जो भी गिरावट आए, इस वैश्विक संकट के चलते देश को निवेश के भारी संकट से गुजरना होगा? बैंकों में औद्योगिक कर्जों की वापसी असंभव है। साफ है अर्थ-चक्र में जरूरी गतिशीलता का बने रहना मुश्किल है। यह स्थिति दर्शाती है कि देश भीषण अर्थ-संकट से घिर जाएगा? लेकिन ऐसा होगा नहीं क्योंकि हमारी अर्थव्यवस्था पूंजीपति देशों की तरह केवल औद्योगिक घरानों पर आश्रित नहीं है। इसके उलट यह खेती-किसानी, व्यापारिक लेन-देन और एमएसएमई मसलन सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों से ही चलती है। इससे पारंपरिक रूप से कुशल और अकुशल व्यवसायी जुड़े हैं। दूध और दूध से बने सह-उत्पाद इसी दायरे में आते हैं। अकेले दूध के व्यापार से सात करोड़ से भी ज्यादा पशुपालक जुड़े हैं। देशज अर्थव्यवस्था में इसकी आज भी 45 प्रतिशत की भागीदारी है। यदि बहुराष्ट्रीय कंपनियों को जिन लघु उद्योगों से जुड़े उत्पादों के निर्माण की छूट दी गई है, उन्हें प्रतिबंधित कर दिया जाए तो लघु उद्योगों को तो ऊर्जा मिलेगी ही, उन अकुशल लोगों को भी स्थानीय स्तर पर रोजगार मिलेंगे, जो शहरों में सस्ते श्रमिक रहते हुए देशबंदी के चलते घर लौटने को मजबूर हुए।

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
betpark
betpark giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
savoycasino giriş
savoycasino giriş
savoycasino giriş
savoycasino giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
holiganbet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
Grandpashabet giriş
safirbet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
artemisbet giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
grandpashabet
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betyap giriş
betyap giriş
betyap giriş
betyap giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
dedebet giriş
dedebet giriş
norabahis giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betkanyon giriş
betkanyon giriş
dedebet giriş
dedebet giriş
holiganbet güncel giriş