जब संपूर्ण जंबूद्वीप अर्थात यूरोप और एशिया में पूजे जाते थे श्री कृष्ण

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यूनान देश के यवना लोगों का हिरैक्लीज’ नाम का एक देवता रहा है। जिसकी वह लंबे समय से पूजा करते रहे हैं । कौन था यह हिरैक्लीज ? यदि इस पर विचार किया जाए तो पता चलता है कि इस नाम का देवता विश्व के सबसे अधिक बलशाली व ज्ञान सम्पन्न श्रीकृष्ण जी ही थे।
इस समस्या या शंका का समाधान करते हुए श्रीमद्भागवत गीता का भाष्य करते हुए विद्वान लेखक विद्यामार्तंड डॉक्टर सत्यव्रत सिद्धांतालंकार जो कि संसद सदस्य भी रहे और गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के उपकुलपति भी रहे थे , ने अपनी इस पुस्तक की प्राक्कथन में लिखा है :– ” मैगास्थनीज एक यूनानी यात्री था । वह भारत आया । उसने मथुरा को मैथोरा लिखा है । इस स्थान का वर्णन करते हुए उसका कहना है कि वहाँ के लोग ‘हिरैक्लीज’ की पूजा करते थे । यह ‘हिरैक्लीज’ क्या है ? भाषा विज्ञान के अनुसार ‘हिरैक्लीज’ अपभ्रंश है श्री कृष्ण का । वह कैसे ? ‘श्री’ का ‘सरी’ और ‘सरी’ का ‘सिरै’ होना तो साधारण बात है, ‘स’ का ‘ह’ हो जाना भी भाषा विज्ञान का ही सिद्धांत है । इस दृष्टि से ‘श्री’ का ‘सिरी’ और ‘सिरी’ का ‘सिरै’, ‘सिरै’ का ‘हिरै’ हो गया । कृष्ण का यूनानी भाषा में ‘क्लीज’ हो गया । यूनानी भाषा में नाम के अंत में ‘ईज’ लग जाता है । जैसे ‘मैगास्थनीज’। ‘श्री कृष्ण’ का यूनानी भाषा में ‘हिरैक्लीज’ हो गया । ‘श्री’ का ‘हिरै’ और कृष्ण का ‘क्लीज’ ।”
इसी ‘हिरैक्लीज’ को ‘हरकुलस’ के नाम से यूरोप में प्राचीन काल के एक महानायक के रूप में मान्यता प्राप्त थी । जिसे यूरोप आज तक पूजता आ रहा है। ऐसे में आवश्यकता यह है कि हम अपने प्राचीन इतिहास के प्रतीक शब्दों को समझें और अपने गौरवपूर्ण इतिहास को समझते हुए उनका यथा स्थान निरूपण करने का प्रयास करें।
यूनान के लोग अपने इस देवता को अब से 5000 साल पहले का एक ऐसा महापुरुष मानते हैं जो उस समय संसार का सबसे बुद्धिमान और बलशाली व्यक्ति था । निश्चित रूप से वह व्यक्ति श्री कृष्ण ही थे। जिस पर पश्चिम के विद्वान भी अब सहमत हो रहे हैं । यूनान के इस देवता को पश्चिम के लोगों ने हर्कुलस के नाम से पुकारा है । वह भी अपने हर्कुलस को ईसा से 3000 वर्ष पूर्व का ही मानते हैं। 10 विषैले सांपों से यूनान के लोगों ने अपने देवता को घिरा हुआ दिखाया है , जिन पर वह विजय प्राप्त कर रहा है । यह 10 विषैले सांप और कुछ नहीं बल्कि पांच ज्ञानेंद्रियां और पांच कर्म इंद्रियां है। जिन पर श्री कृष्ण जी को ही विजय प्राप्त हुई थी।
श्री कृष्ण जी ने अपने इसी विराट स्वरूप का दर्शन अर्जुन को कराया था कि वह किस प्रकार जितेंद्रीय होकर विशालता को प्राप्त कर चुके हैं ? जितेंद्रिय होने के पश्चात व्यक्ति के भीतर के सारे रहस्य खुल जाते हैं। उसका तारतम्य ब्रह्मांड की अनेकों शक्तियों से स्वाभाविक रूप से हो जाता है । तब उसको नापना हर किसी के बस की बात नहीं होती।
इसके अतिरिक्त एक महत्वपूर्ण प्रमाण यह भी है कि सिकंदर के समकालीन ग्रीक इतिहासकार बताते हैं कि पोरस के साथ युद्ध लड़ते समय भी हिरैक्लीज यानी कृष्ण की मूर्ति साथ रखते थे । ‘इंडिका’ के लेखक मेगस्थनीज ने लिखा है कि सौरसेनाई (शूरसेन) राज्य की राजधानी मेथोरा (मथुरा) और क्लेईसोबारा (कृष्णपुरा) के निवासी हिरैक्लीज देवता की आराधना करते हैं ।

इस प्रकार श्री कृष्ण जी कभी के संपूर्ण जंबूद्वीप अर्थात आज के यूरोप और एशिया के महानायक के रूप में पूजे जाते थे। इस तथ्य को समझने के लिए पहले जंबूद्वीप को समझना होगा । आप में से जो लोग जंबूद्वीप की स्थिति के बारे में जानते होंगे वह निश्चय ही मेरे इस निष्कर्ष से सहमत हो सकते हैं।
यह एक तथ्य है कि भारत के लोगों से ही प्रेरित होकर यूनानी लोग इस हिरेक्लीज को अपने देवता के रूप में मानते रहे। हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि यूनानी या यवन भारतीय आर्य राजा ययाति के पुत्र तुर्वसु की ही संतान हैं । यवनों ने भारत के धर्म को और उसकी परम्पराओं को बहुत देर तक स्वीकार किए रखा। अब से लगभग 2000 वर्ष पूर्व जब ईसाइयत का जन्म और विकास हुआ तो कुछ कालोपरान्त ईसाइयत ने यूनान में भी पैर पसारने आरंभ किए । तब उन्होंने वहां की प्राचीन भारतीय संस्कृति को उजाड़ने का काम किया और उसके देवी-देवताओं को नष्ट भ्रष्ट कर दिया । उससे पूर्व का यूनान भारतीय संस्कारों से ओतप्रोत था। यह अलग बात है कि हमारे अपने वैदिक हिंदू देवी देवताओं को उन्होंने अपनी भाषा में थोड़े से नाम परिवर्तन के साथ दूसरे अपनी भाषा में बोला। इतना तो हम भारत में भी देखते हैं कि भारत के वैदिक देवी देवताओं का अन्य भाषाओं में या बोलियों में कुछ का कुछ अर्थ लगा लिया गया , जिससे वैदिक संस्कृति को ठेस पहुंची। जब भारत में ऐसी स्थिति हो सकती है तो भारत से बाहर उससे भी अधिक हीन दशा होने की सहज कल्पना की जा सकती है।
भारत के आर्यों की ही संतान रहे यूनानी लोगों की यादें भारत से जुड़ी रहीं । यही कारण रहा कि यूनानियों ने अपने नगरों के नाम भारतीय नगरों के नाम पर और नदियों के नाम भारतीय नदियों के नाम पर ही रखे। इतना ही नहीं उन्होंने कई पौराणिक कथाओं को भी अपने यहाँ पर कुछ दूसरे अर्थों में लिखा। उन कथाओं को भारतीय पौराणिक कथाओं से मिलाकर देखने से ही अर्थ स्पष्ट हो पाते हैं ।
लोगों ने अपने यहां पर नैना या नाना देवी की उपासना करनी आरंभ की । जिसे उनके द्वारा ‘एलम की देवी’ कहा गया है । एलम इल्म अर्थात ज्ञान को कहते हैं और ज्ञान की देवी सरस्वती देवी है। भारतवर्ष में भी सरस्वती देवी की पूजा ज्ञान की देवी के रूप में होती रही है । इसके अतिरिक्त वह अंधों को आंख देने वाली होती है अर्थात अज्ञान रूपी अंधकार को मिटाने वाली होने के कारण नाना देवी अर्थात नैना देवी अर्थात नेत्र देने वाली , आंख देने वाली देवी भी कही जाती है। हिमाचल में स्थित नैना देवी के मंदिर का रहस्य भी यही है । जिसके बारे में कहा जाता है कि यहां माता के नैन गिरे थे। नयन , नैना और नाना का समीकरण मिलाकर देखने और नैन गिरने का अर्थ भी वैदिक दृष्टिकोण से समझने की आवश्यकता है।
‘जेंद अवेस्ता’ में जिस ‘हरहुति’ या ‘हरहवती’ नदी की बात की गई है , वह सरस्वती नदी ही है । जैसे सप्ताह का हफ्ता और सिंधु का हिंदू यूनान में जाकर हो गया है , वैसे ही सरस्वती का हरहवती या हरहुति हो जाना स्वाभाविक है। जिसे हमारे यहां पर प्राचीन काल से बहुत सम्मान के भाव से देखा जाता रहा है। कई लोगों ने हरहुति को सिंधु नदी के साथ जोड़ने का प्रयास किया है , जबकि उसका सिंधु से कोई मिलान नहीं है।
‘ज्ञान की देवी’ होने के कारण उसे ‘एलम की देवी’ कहा गया । एलम से ही इल्म शब्द बना है । जिसका अर्थ भी ज्ञान ही होता है । जबकि सरस्वती की आराधना अर्थात ज्ञान की आराधना करने के लिए भारत प्राचीन काल से प्रसिद्ध रहा है । सरस्वती नाम से ही सरस्वती नदी होने के कारण उसे ‘पानी की देवी’ भी कहा गया।
ज्ञान जहाँ आध्यात्मिक चेतना का नाम है , वहीं जल भौतिक चेतना का नाम है । भौतिक जगत बिना जल के आगे चल नहीं सकता और ज्ञान जब तक नहीं होगा तब तक भौतिक चेतना को भी मनुष्य समझ नहीं पाएगा । इन दोनों का मिलन होने से सृष्टि आगे चलती है। इसलिए प्रजनन शक्ति से भी इसको सम्बद्ध करके देखा जाता है।
ऐसे में हमारी मान्यता है कि नाना देवी अर्थात एलम या इल्म की देवी सरस्वती को उपरोक्त अनुसार भारतीय दृष्टिकोण से पढ़ने व समझने की आवश्यकता है ।
हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि भारत के वैदिक धर्म में से जितने संप्रदाय धर्म के नाम पर निकले या जन्मे हैं , उन सबने अपने आपको वेद के शाब्दिक अर्थ ‘ज्ञान’ से ही किसी न किसी प्रकार बांधे रखा है । जैसे जैन धर्म मैं ‘जैन’ शब्द ‘ज्ञान’ से ही बिगड़कर बना है । हमें ध्यान रखना चाहिए कि संस्कृत में ‘ज्ञान’ शब्द ‘ज्यांन’ बोला जाता है, संस्कृत के विद्वान उसे ‘ग्यान’ नहीं बोलते । ज्यांन और जैन में बहुत समरूपता है इसलिए इसी ज्यांन से ‘जैन’ शब्द बना है । वैसे ही बौद्ध धर्म में ‘बोध’ अर्थात ज्ञान से ही ‘बौद्ध’ शब्द बना है । ‘बोधगया’ नामक स्थान में शब्द ‘बोध’ यह स्पष्ट करता है कि यहीं पर महात्मा बुद्ध को ‘बोध’ हो गया था , इसलिए ‘बोधगया’ नाम रखा । स्पष्ट ही है कि बोध अर्थात उन्हें इस स्थान पर ज्ञान हुआ था , ज्ञान होते ही उन्होंने अपने धर्म का नाम भी ज्ञान के समानार्थक ‘बौद्ध’ ही रखा।
इसी प्रकार आगे चलकर ज्ञान से ही सिक्ख अर्थात शिष्य धर्म की उत्पत्ति हुई है । शिष्य और ज्ञान का परस्पर अन्योन्याश्रित संबंध है । इस पर कुछ अधिक कहने की आवश्यकता ही नहीं है । इसका अभिप्राय है कि ज्ञान की देवी की पूजा करना और ज्ञानार्जन कर संसार का उपकार करना प्राचीन काल से ही भारत की संस्कृति का मौलिक उद्देश्य रहा है । यही कारण रहा कि हमारे सभी आर्य / हिन्दू शासक ज्ञान के उपासक रहे ।
हमारे इन अनसुलझे रहस्यों को समझाने के लिए और प्राचीन भारतीय इतिहास के गौरवपूर्ण पक्ष को स्पष्ट करने के लिए कोई विदेशी या भारत से द्वेष भाव रखने वाला इतिहासकार या लेखक हमें समझाने नहीं आएगा कि इनका अर्थ क्या है ?
हमको स्वयं को ही है खोजना और सोचना होगा कि भारत की आर्य संस्कृति किस प्रकार समस्त संसार पर बौद्धिक अनुशासन बनाए रखने में सफल रही और किस प्रकार उसने समस्त भूमंडलवासियों को अपना बौद्धिक और राजनीतिक नेतृत्व प्रदान कर समस्त भूमंडल पर शांति व्यवस्था बनाए रखने में सफलता प्राप्त की ?
एक बात मैं और भी स्पष्ट करना चाहूंगा कि किसी व्यक्ति , संस्था , संगठन , समाज या संप्रदाय के लोगों की भावनाओं को ठेस पहुंचाना या किसी को नीचा दिखाना या अनावश्यक अपनी ही बात को किसी पर जबरन थोपना मेरा उद्देश्य नहीं है। मैं सभी का हृदय से सम्मान करता हूं और विनम्र भाव से सभी विद्वानों की सेवा में अपने भावों को पहुंचाने का सहज प्रयत्न कर रहा हूं। मैं चाहता हूं कि सत्य सत्य बातों के अर्थ का प्रकाश हो और उस पर विद्वानों के बीच विद्वानों जैसी चर्चा आरंभ हो । जिससे हम एक निष्कर्ष पर पहुंच जाएं और अपने अतीत को समझने में सफल हों। जिससे कि यह बात स्पष्ट हो सके कि सचमुच ‘मेरा भारत महान’ है ।
आज वैचारिक क्रांति के माध्यम से यह स्थापित करने की आवश्यकता है कि भारत संपूर्ण भूमंडल का गुरु रहा है और इसी की परंपराओं से सारा संसार शासित अनुशासित होता रहा है। साथ ही यह भी कि भारत की वैदिक संस्कृति को अपनाकर ही संसार फिर से व्यवस्थित हो सकता है।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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