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महत्वपूर्ण लेख

वैलेंटाइन डे विकृति

डा. मधु सूदन
(1) वह उत्सव समाज में समन्वयता, सामंजस्य, सुसंवादिता, या भाईचारा बढाने वाला हो।
(2) ऊंच-नीच या अलगता का भाव प्रोत्साहित करनेवाला ना हो।
(3) समाज के अधिकाधिक सदस्यों का उत्थान करने वाला हो।
(4) समाज के सभी स्तरों को स्पर्श करने की क्षमता रखता हो।
(5) सांस्कृतिक परम्पराओं से जुडने की क्षमता रखता हो
व्हॅलंटाईन डे, इनमें से एक भी कसौटी पर मुझे सफल प्रतीत नहीं होता।
परदेशी उत्सव भी यदि समन्वयकारी हो, तो, उपरि कसौटियों पर कसकर ही स्वीकारा जा सकता है।
(6) अत्यावश्यक विशेष कसौटी =सामथ्र्य और उच्च प्रतिष्ठा प्राप्त, स्थिति से ही, ऐसी स्वीकृति भी, परम्परा में पच सकती है। हीन वृत्ति और ग्रन्थि से पीडित, बुद्धि भ्रमित ब्रेन वॉश मानसिकता से उसे स्वीकार करना देश को फिर से दासता में धकेलने का प्रयास माना जाएगा।
वैलेंटाईन डे इन में से किसी भी कसौटी पर खरा उतरता नहीं है। यह एक विशिष्ट ब्रैन-वॉश्ड वर्गका त्यौहार प्रतीत होता है।
(7) वैसे भी भारत के पास संसार भर में सभीसे अधिक पर्व, उत्सव या त्यौहार हैं। जहां द्रौपदी को अर्जुनने स्वयंवर में जीता था, उस गुजरात के, त्रिनेत्रेश्वर (तरणेतर) के मेले में युवतियां अभी भी अपना साथी आप ही परखकर चुनती करती हैं। परम्परागत परिधान और अलंकार सज धजकर इस मेले में जीवन साथी ढूंढने के उद्देश्य से, युवकों की परीक्षा युवतियां करती है। इस मेले का पूरा वर्णन अलग लेख की सामग्री है। यह परम्परा कुछ अलग है, पर इसे भी अन्य प्रदेशों में प्रवर्तित किया जा सकता है।
(8) वैसे ही, और एक, नवरात्रि के नौ दिन चलने वाला, गुजरातका दांडिया-रास-गरबा इत्यादि भी युवक-युवतियों को सीमित ढंग से निकट आने में सहायक है।ऐसे उत्सव और भी होंगे, जो इस लेखक के ध्यानमें नहीं है। ऐसी अपनी ही परम्परा के आधारपर रूढियां, या उत्सव गढना सांस्कृतिक दृष्टिसे मुझे कुछ अधिक जँचता है।
(9) पश्चिम का इतिहास
पश्चिम कैसे, इस व्हॅलंटाईन डे संदर्भित स्वैराचारी स्त्री-पुरूष शरीर सम्बंधों की पटरी पर बढते बढते गत 50-60 वर्ष की अवधि में कहां से कहां पहुंच गया है, यह जानकारी हर देश हितैषि को शायद ही, चौंका सकती है। प्रारम्भ में यहां भी नैतिकता का स्तर ऊंचा ही दिखाई देता था। पर मूल आधार स्व केन्द्रित और भौतिक ही होने के कारण, उसकी प्रेरणा शक्ति भी सीमित ही थी। आध्यात्मिकता की असीम प्रेरणा से अधिकतर (कुछ अपवाद छोडकर) पश्चिम अनजान ही है। पर जब भौतिकता से जुडी विलासिता और उससे जुडे शारीरिक सुखोपभोग एवम वासना पूर्ति में ही सारे पुरूषार्थों का चरम सिद्ध होने लगा तो पश्चिम में, हास प्रारंभ हो चुका है।
(10) विवाह-पूर्व शरीर संबंध
जिस पश्चिम से, भारत में, विवाह-पूर्व सम्बंधों का , अंधानुकरण हो रहा है, उस पश्चिम की स्थिति अवलोकन की जानी चाहिए। वहां, विवाह-पूर्व पुरूष-स्त्री, शरीर संबंध, डेटींग कहा जाता है; और व्हॅलंटाईन डे ऐसे डेटींग करने वाले विवाहित और अविवाहित, जोडों का, उत्सव माना जाता है। ऐसे जोडे मोटल में एक कक्ष एक रात्रि के किराए पर रखकर शरीर-भोग-सम्बंध करते हैं।
शराब, और डिन्नर इत्यादि भी होता है। वैसे प्रत्येक शुक्रवार रात्रि डेटींग रात्रि होती है। पर व्हॅलंटाईन डे की रात्रि एक त्यौहार की भाँति विशेष मनाई जाती है। मोटल व्यवसाय का एक बडा आधार यह भी है।
स्वाभाविक रूपसे व्यापार-वाणिज्य, होटल-मोटल, शराब विक्रेता, बधाई या अभिनन्दन पत्र विक्रेता, इत्यादि व्यवसायों के स्थापित हितों से, प्रोत्साहित होकर इस दिन को पुरस्कृत किया जाता है। भौतिक विलासिता को ही ब्रह्म-सत्त्य मानने वाले बहुसंख्य समाज के लिए विशेष कोई निर्बंध दिखाई नहीं देता।
(11) भारत के, हितचिन्तक माता पिता अपने बालकों के हित में योग्य निर्णय ले पाए इस लिए पाठकों के सामने निम्न बिन्दुओं को रखने का साहस कर रहा हूँ। हरेक समस्या अलग होती है, इस लिए विवेक से काम लेना आवश्यक ही नहीं अनिवार्य है।स्थूल रूपसे विचार रखे गए है।किसी भी रखे गए विचार को सैद्धान्तिक मानकर चलने की आवश्यकता नहीं है। किसी भी प्रक्रिया को समग्रता में देखने के लिए, उस प्रक्रिया से बाहर होना पडता है। और जब युवक-
युवति स्वत: ऐसे सम्बंध से लिप्त होते हैं, तो सबसे पहले इस वस्तुनिष्ठता की मृत्यु होती है।
(12)आदर्श प्रेम
ऊपर ऊपर से, आदर्श प्रेम का द्योतक दिखाई देने वाला यह उत्सव वयक्तिक स्वातंत्र्य का परिचायक भी माना जा सकता है, पर ऐसी वयक्तिक स्वतंत्रता, धीरे धीरे स्वच्छंदता और स्वैराचार में बदल जाती अनुभव होती है। और लेख के अंत में प्रस्तुत सांख्यिकी आंकडे इसी की सच्चाई के प्रमाण है।
कठोर कर्तव्य मानकर कडवी जानकारी दे रहा हूँ। मुझे कुछ भारतीय युवक-युवतियों के, जीवन उजाड देने वाली घटनाएं भी पता है; पर, उन को उजागर किए बिना ही, विषय रखना चाहता हूँ।
(13)प्रेम और वासना
वास्तवमें प्रेम और वासना-पूर्ति में बहुत अंतर है। यह उत्सव शतकों पहले, विशुद्ध प्रेम पर आधार पर प्रस्थापित हुआ होगा। पर, मैं इसके इतिहास में जाना नहीं चाहता। इस विशुद्ध प्रेम का जो वासना पूर्ति में बहुतेरा रूपान्तर हो चुका है; उस ओर ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ। पश्चिम में प्रेम शब्द से शारीरिक (लैंगिक) वासना युक्त प्रेम समझा जाता है, जब भारतीय परम्परा प्रेम को आदर्श के रूप में देखती है। शब्द एक ही पर अलग अर्थ में प्रयुक्त होता है, इस कारण से भी भ्रांत अर्थ लगाया जाता है।
एक विशेष बात बल पूर्वक कहना चाहता हूँ, कि, युवक-युवति के शरीर सम्बंध में युवति ही अधिक घाटे में होती है।वही, अधिक हानि भी सहती है। युवक एक मुक्त पंछी की भाँति उड जा सकता है।
(14) ऐसी परम्परा का आरम्भ कर पश्चिम आज ऐसे सांस्कृतिक पडाव पर पहुंचा है, जिसके फल स्वरूप समाज नष्ट हो चुका है। जहां से परिवर्तन कर फिर से विशुद्ध सामाजिक व्यवस्था निर्माण करना समुंदर को उलीच कर शुद्ध करने जैसा ही कठिन ही नहीं पर असंभव अग्निदिव्य प्रमाणित हो चुका है। खाई में कूदा तो जा सकता है, बाहर निकला नहीं जा सकता। पश्चिम खाई में कूद चुका है।
भारत को इससे बचाया जा सकता है।
(15)भारतीय व्हॅलंटाईन डे
मानता हूँ, कि इस व्हॅलंटाईन डे के, भारतीय पुरस्कर्ता शुद्ध प्रेम से प्रेरित हो सकते हैं; उन्हें इस परम्परा की परिणती किस अंत में हो सकती है, इस की जानकारी शायद नहीं है। इस लेख के माध्यम से, विशेष में युवतियों को और उनके माता-पिताओं को, भी, गम्भीर चेतावनी देना चाहता हूं। किन्तु मेरे कहने पर नहीं, सांख्यिकी आंकडों के आधारपर। जो सर्व स्वीकृत होने में कठिनाइ कम होगी। जिस अमरिका में यह दिन बिना-हिचक खुल्लम खुल्ला मनाया जाता है, वहां का सामाजिक ढांचा कहां पहुंच चुका है, यह देखना लाभप्रद होगा।
वैसे पश्चिम के पास भारत जैसी विवाह को संस्कार मानने की परम्परा नहीं है। यहां विवाह अधिकांश में, भोग आधारित संविदा माने जाते हैं। इसलिए यहां अन्ततोगत्वा जब किसी वयक्तिक स्वार्थ की पूर्ति नहीं होती, तो उसका परिणाम विवाह विच्छेद में हो जाता है।
(16)आज यहां विवाह करने वालों की संख्याभी घट रही है। कारण जो विवाह के बाद प्राप्त होता है, वह बिना विवाह ही प्राप्त होने लगे, तो कौन युवा विवाहित जीवन के झंझट मोल लेगा? युवतियां विवाहोत्सुक होती है, पर युवा उत्तर दायित्व लेने में हिचकिचाता है। और विवाह हो भी जाता है, तो शारीरिक वासना पर ही आधारित होने से ऐसा विवाह अधिक दिन चल नहीं सकता। दूसरा, माता-पिता के और अन्य परिचितों के घटित अनुभवों से, मनुष्य सीख लेकर बडा होता है, जाने अनजाने वही उस का जीवन जीनेका प्रतिमान बन जाता है।
इसके कारण विवाह विच्छेद यहां एक संभावना ही नहीं, पर जीवन की सच्चाई के रूपमें स्वीकार्य हो गया है। ऐसे विवाह विच्छेद से प्रभावित बालकों के जीवन देखना शिक्षाप्रद होगा।
(17)विवाह विच्छेद से प्रभावित बालकों के जीवन एक सांख्यिकीय समीक्षा।
(क) लगभग आधे अमरिकी बालक माता पिता के विवाह विच्छेद के साक्षी होंगे। इनमें से आधे (कुल विवाह संख्या के चौथा भाग, 25) पालकों के दूसरे विवाह के विच्छेद के भी साक्षी होंगे।
(ख) करोडों बालको में से जिन्हों ने अपने माता पिता का विवाह विच्छेद देखा है, हर दस बालकों में से 1 बालक 3 या 3 से अधिक विवाह विच्छेद के अनुभव से प्रभावित होकर निकलेगा।
(ग) आज (1997 में), 40 प्रतिशत बडे हो रहे अमरिकी बालक, अपने पिता की (छत्र छाया ) बिना ही बडे हो रहे हैं।
(घ) इस वर्ष विवाहित माता पिता के घर जन्मे, बालकों में से 50 बालक अपनी 18 वर्ष की आयु तक पहुंचने के, पहले ही, अपने माता पिता के विवाह विच्छेद का अनुभव करेंगे। मानसिक संवेदना पर पडता विवाह विच्छेद का दुष्परिणाम।
(च) 1980 के दशक में हुए अध्ययनों ने दर्शाया था, कि पुन: पुन: विवाह विच्छेद के अनुभवों से प्रभावित बालक शालाओं में निम्न श्रेणी प्राप्त करते हैं। उनके सहपाठी भी, उनका संग कम आनन्द देने वाला अनुभव करते हैं।
(छ) एक ही पालक वाले कुटुम्ब में, या मिश्र-कुटुम्ब में बडे होते किशोरों एवं नव युवकों को मानसिक परामर्ष की आवश्यकता किसी एक वर्ष में, तीन गुना होती है।
(ज) मृत्यु से दुष्प्रभावित घरों के बालकों की अपेक्षा विच्छेदित घरों के बालक अधिक मनोवैज्ञानिक समस्या ओं से पीडित पाए गए हैं।. अन्य अध्ययनों से संकलित जानकारी बालकों पर विवाह विच्छेद के दुष्परिणामों के निम्न सांख्यिकी आंकडे आपको धक्का देने वाले प्रतीत होंगे।
(ट)पिता या माता की मृत्यु भी, बालकों पर, विवाह विच्छेद के जीवन उजाड देने वाले परिणामों से कम विनाशकारी होती है। ( बिना सांख्यिकी आंकडे देखे, इस पर, मैं भी विश्वास ना करता) इसके अतिरिक्त चेतावनी रूप है शारीरिक पीडाकी सांख्यिकी।
(ठ)दमा, शारीरिक क्षति, शिरोवेदना, और तुतलाने की, समस्याएं विवाह विच्छेदित कुटुम्ब के बालकों में पायी जाती है।
(ड) उनकी आरोग्य विषयक समस्याओं की संभावना भी 50त्न अधिक होती है।
(ढ) अकेली माँ की देखभाल वाले कुटुम्ब में , बडे होते बालक की हत्या की संभावना 10 गुना होती है।
(ण) अकेलापन, दुखी, असुरक्षा अनुभव करने वाले, और चिन्तित बच्चे।
(त)70 लम्बी सजा भुगतने वाले, जैल वासी खण्डित कुटुम्बों से पाए गए हैं।
(थ) खण्डित कुटुम्बों के लडके अधिक आक्रामक पाए गए हैं।
(द) आत्म हत्या का प्रमाण भी अधिक पाया गया है।

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