मर्यादाओं का पालन न करने वाला मनुष्य असभ्य और निंदनीय है

ओ३म्===========मनुष्य को मनुष्य मननशील होने के कारण से कहते हैं। मनन का अर्थ है सत्य व असत्य का विचार करने वाला दो पैरों वाला प्राणी। जो मनुष्य शिक्षित नहीं है, ज्ञानी नहीं है, जिसने वेद, उपनिषद, दर्शन, रामायण एवं महाभारत सहित सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कारविधि, आर्याभिविनय आदि ग्रन्थों को नहीं पढ़ा है, वह मनुष्य कुछ-कुछ सभ्य व मर्यादापालक हो सकता है परन्तु ज्ञान न होने के कारण वह पूर्णरुपेण मर्यादापालक नहीं हो सकता है। रामायण का अध्ययन करने पर दशरथ पुत्र राम मर्यादापालक ही नहीं अपितु मर्यादा पुरुषोत्तम कहलाते हैं। उनको यह सम्मान उनके विशिष्ट गुणों के कारण मिला है। उन्होंने मर्यादाओं का पालन करने के लिये महान दुःखों को सहन किया जिसकी हम अपने जीवन में कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। इन गुणों व मर्यादा पालन करने के कारण आज भी उनका यश पूरे विश्व में फैला हुआ है। कौन ऐसा व्यक्ति है जो बाल्मीकी रामायण को पढ़े और राम को महामानव न माने? ऐसा व्यक्ति संसार में कोई नहीं मिलेगा। पक्षपात से युक्त अज्ञानी तथा हठ व दुराग्रह से युक्त मनुष्य की प्रतिक्रिया व मन्तव्य का कोई महत्व नहीं होता।हम मर्यादायें क्या हैं, उन्हें किस प्रकार से जान व सीख सकते हैं? इसके लिये हमारा समस्त वैदिक वांग्मय सहायक एवं उपयोगी है। वेद ईश्वर द्वारा दिया गया ज्ञान है। यह वेद ज्ञान परमात्मा ने सृष्टि के आरम्भ में अमैथुनी सृष्टि में उत्पन्न किये मनुष्यों में से चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य व अंगिरा को दिया था। वेदों में मानवीय गुणों की पराकाष्ठा मिलती है। वेद से इतर यदि मनुस्मृति पर दृष्टि डाले तो महर्षि मनु ने धर्म को परिभाषित करते हुए उसके 10 लक्षण बतायें हैं। इन दस लक्षणों को जानकर इन्हें जीवन में धारण कर लेने मात्र से मनुष्य मर्यादाओं का रक्षक व पालक बन सकता है। यह लक्षण क्या है? यह हैं 1- धृति, 2-क्षमा, 3-दम, 4-अस्तेय, 5-शौच, 6-इन्द्रिय-निग्रह, 7-विवेक बुद्धि से युक्त होना, 8-विद्या, 9-सत्य व 10-अक्रोध। इन लक्षणों का पालन करने से भी मनुष्य मर्यादाओं का पालन करने वाला बन सकता है। हमें इन सब गुणों व बातों पर विचार कर इनका यथार्थ जानना चाहिये और इनका अनुकरण अवश्य ही करना चाहिये। जो मनुष्य इन लक्षणों के विपरीत आचरण व व्यवहार करते हैं वह एक सभ्य व मर्यादित पुरुष नहीं होते। उन्हें धर्म का आचरण करने वाला सम्मानित मनुष्य नहीं कहा जा सकता।वेदों में मनुष्य के सम्पूर्ण विकास का मार्गदर्शन मिलता है। वेदों को अपने जीवन में धारण करने से मनुष्य की आध्यात्मिक तथा सांसारिक दोनों प्रकार की उन्नति होती है। आज की शिक्षा व मत-मतान्तरों में इन गुणों को विशेष महत्व नहीं दिया जाता। दिया तो तब जाता जब हमारे धर्माचार्यों के जीवन में यह गुण होते व वह इन्हें सम्पूर्णता से जानते। उनका अज्ञान व भौतिक जीवन के प्रति उनकी रूचि व प्रवृत्ति ही संसार में पाप कर्मों व दुःखों का कारण बन रही है। हमें राम, कृष्ण व दयानन्द जी के जीवन की सत्य घटनाओं का अध्ययन करना चाहिये और उनसे प्रेरणा लेनी चाहिये। राम को जानने के लिये हमें स्वामी जगदीश्वरानन्द कृत बाल्मीकी रामायण की टीका, योगेश्वर श्री कृष्ण को जानने के लिये इनके जीवन पर लिखी आचार्य चमूपति, डा. भवानीलाल भारतीय तथा लाला लाजपत राय लिखित श्रीकृष्ण के चरितों को पढ़ना चाहिये। ऋषि दयानन्द के जीवन को जानने के लिये पं. लेखराम आर्यमुसाफिर, पं. देवेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय, स्वामी सत्यानन्द तथा डा. भवानीलाल भारतीय जी के जीवन चरित विषयक ग्रन्थों का अध्ययन लाभदायक हैं। इनको पढ़कर हम स्वयं भी एक आदर्श मनुष्य व मर्यादाओं का पालन करने वाले पुरुष बन सकते हैं।संसार में बहुत से मनुष्य अशिक्षित होते हैं। इनको ज्ञान नहीं होता कि हमें कैसा आचरण करना है। इनको इतना ही बताया दिया जाये कि तुम सत्य का आचरण करो अथवा राम, कृष्ण व दयानन्द जी के जीवन को पढ़ व सुन कर उनसे शिक्षा ग्रहण करो तो इससे लाभ हो सकता है। सज्जन व्यक्ति तो इसे स्वीकार कर लेंगे परन्तु संसार में अनेक दुर्जन व्यक्ति भी होते हैं। ऐसे लोग सत्य का ग्रहण व असत्य का त्याग करने में तत्पर नहीं होते। वह सत्य को अपने स्वार्थ के अनुसार ही ग्रहण करते हैं, उसे सर्वांगपूर्ण रूप में नहीं। ऐसे मनुष्य अपनी निम्न स्तर की सोच से देश, समाज व अन्य मनुष्यों को हानि करते हैं। देश व समाज के निर्दोष व सज्जन मनुष्यों को अपने किसी भी प्रकार के आचरण व व्यवहार से हानि पहुंचाना घोर निन्दनीय कर्म है। ऐसे कार्य हम आजकल देश व समाज में देख रहे हैं। अपना हित करने वालों को जाने व अनजाने अथवा अपने आकाओं के बहकानें से जो हिंसा व अनुचित अधर्म का आचरण करते हैं वह निन्दनीय हैं। हमारी व्यवस्था भी ऐसे लोगों को यथोचित कठोर दण्ड देने में असमर्थ रहती है। इसी कारण से देश व समाज में पाप कर्म करने वालों की तेजी से वृद्धि हो रही है। सरकार को इस पर विशेष ध्यान देना चाहिये और इसके लिये यदि आईपीसी में संशोधन करना पड़े तो करना चाहिये। यह समय की आवश्यकता है।आज हमारे देश सहित समस्त संसार में कोरोना महामारी का प्रकोप है। ऐसे में डाक्टर, नर्स, अस्पतालों के सभी कर्मचारी, पुलिस, बैंक कर्मचारी, दूध, सब्जी, राशन वाले लोग हमारे सच्चे रक्षक व जीवन दाता सिद्ध हो रहे हैं। ऐसे लोगों के प्रति जो दुव्र्यवहार कर रहा है व दुव्र्यवहार करने की प्रेरणा कर रहा है, इसमें सम्मिलित सभी लोग निन्दनीय व दण्डनीय हंै। ऐसे लोगों का उपचार ज्ञान देकर या हाथ जोड़कर नहीं हो सकता। इनका उपचार तो मुख्यमंत्री योगी जी के सिद्धान्त के अनुसार ही हो सकता है। सारे देश की सरकारों को ऐसे लोगों के प्रति कठोर होना चाहिये और उन्हें ऐसा दण्ड देना चाहिये जिससे वह ऐसे जघन्य अपराध करने की बातें सोच भी न सके। ऐसा करके ही हम सज्जन पुरुषों, अपने रक्षकों तथा कोरोना योद्धाओं के सम्मान व जीवन की रक्षा कर सकते हैं। जो व्यक्ति व समूह ऐसे समय में भी घृणित राजनीति कर रहा है, बहुत से कर रहे हैं, वह सब निन्दा के पात्र हैं। ईश्वर उन्हें उनके पाप कर्मों का यथोचित दण्ड देगा, भले ही इस जन्म में वह अनुभव न करें, परन्तु परजन्म में तो उन्हें इन दुष्कर्मों का फल भोगना ही है। ईश्वर सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ, सर्वान्तर्यामी और सर्वव्यापक होने सहित अनादि, नित्य व अमर भी है। उसका अपना कर्म-फल व दण्ड व्यवस्था का विधान है। संसार का कोई मनुष्य, आचार्य या महापुरुष, जिसने इस संसार में जन्म लिया है, अपने किसी अनुयायी को ईश्वर के दण्ड से बचा नहीं सकता। जब उनके यह कर्म पक जायेंगे, इसका फल उन्हें अवश्य मिलेगा। यह सोच कि हमारा यही प्रथम व आखिरी जन्म है, घोर अज्ञानता का विचार है। मनुष्य पूर्वजन्म में मरने के बाद इस जन्म को प्राप्त करता है व हम सबने प्रापत किया है। इस जन्म में वह अवश्य ही मरेगा और निश्चय ही उसका पुनर्जन्म होगा। इसे संसार का कोई मनुष्य, मत, पन्थ व आचार्य रोक नहीं सकता। सभी मतों के आचार्यों के भी पुर्नजन्म होते हैं व आगे भी होते रहेंगे और सबको अपने-अपने पापों का फल भी भोगना होगा। यह वैदिक विचार धारा, कर्म-फल सिद्धान्त, ईश्वरीय दण्ड व्यवस्था और गीता पुस्तक के अनुसार निभ्र्रान्त सत्य है।मर्यादाओं का पालन करने और वैदिक धर्म का पालन करने से मनुष्य को धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति होती है। सदाचरण का नाम ही धर्म है। इसके अतिरिक्त कोई धर्म नहीं है। वैदिक धर्म भी सदाचरण का ही धर्म है। इसके विपरीत जो मत-मतान्तर हैं वह सब अविद्या से युक्त हैं जिसका दिग्दर्शन ऋषि दयानन्द ने 145 वर्ष पूर्व अपने सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ, उपदेशों एवं शास्त्रार्थों में करा दिया था। वेदों का यही सन्देश है कि मनुष्य एक ईश्वर की उपासना करने वाला हो। वह अन्धविश्वासों से मुक्त हो तथा सन्मार्गगामी बने। ऐसा वेद और सत्यार्थप्रकाश पढ़कर ही हो सकता है। हमें जीवन में सत्य को धारण करना चाहिये और असत्य का त्याग करना चाहिये। हमें जगत के स्रष्टा, सर्वव्यापक व निराकार ईश्वर को अपनी आत्मा में अनुभव करना चाहिये। ऐसा करके ही ईश्वर का साक्षात्कार व प्रत्यक्ष होगा। हमारी आत्मा उन्नति को प्राप्त होगी। इससे जन्म व परजन्म में भी उन्नति होगी। इति ओ३म् शम्।-मनमोहन कुमार आर्य

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