संयत भाषा और संयत व्यवहार कैसे आए ?

संयत भाषा और संयत व्यवहार कैसे आये ? इसके लिए वेद ने कहा है :-

स्वस्ति पन्थामनुचरेम् सूय्र्याचन्द्रमसाविव।

पुनर्ददताअघ्नता जानता संगमेमहि।। (ऋ. 5/51/15)

इस मंत्र में वेद कह रहा है कि जैसे सूर्य और चंद्रमा अपनी मर्यादा में रहते और मर्यादा पथ में ही भ्रमण करते हैं, कभी अपने मर्यादा पथ का उल्लंघन नही करते वैसे हमें भी अपने कल्याणकारी मार्ग या मर्यादा पथ में रहना चाहिए। इसी को लोग प्रचलित भाषा में ‘औकात में रहकर चलना’ कहते हैं। किसी ने किसी से पूछा कि कहां रहते हो? इस पर दूसरे ने उत्तर दिया-‘अपनी औकात में।’ कितना प्यारा उत्तर है? यदि हम सभी अपनी-अपनी औकात को जान लें अर्थात अपनी-अपनी मर्यादा को पहचान लें, और उसके अनुसार रहना सीख लें, तो ‘स्वार्थभाव’ भी मिट जाएगा और ‘प्रेम पथ का विस्तार’ भी हो जाएगा।

पर कल्याण मार्ग के इस प्रेम पथ का विस्तार तब होगा जब हमारी संगति वेदमंत्र के उत्तराद्र्घ में कहे गये लोगों के साथ होगी। वेदमंत्र कह रहा है कि ‘पुनर्ददता अघ्नता जानता संगमेमहि’ अर्थात हमारी संगति दानियों, अहिंसकों और ज्ञानियों के साथ होनी चाहिए। यहां एक बात ध्यान देने की है कि वेद हमारी संगति अहिंसकों के साथ रहने की बात कह रहा है तो क्या इसका अभिप्राय हर स्थिति में अहिंसक बने रहने से है? नहीं। अहिंसक समाज की रचना के लिए की गयी हिंसा या अहिंसकों की रक्षा के लिए की गयी हिंसा भी अहिंसा ही होती है। इसलिए ऐसे अहिंसकों के साथ भी हमारी संगति होनी चाहिए जो अहिंसक समाज की रचना या रक्षा के लिए हिंसा करने में भी विश्वास करते हो-ऐसा वर्ग क्षत्रिय वर्ग ही है।

किसी कवि ने क्या सुंदर कहा है :-

‘ज्ञानबढ़े गुणवान की संगत

ध्यान बढ़े तपसी संग कीन्हें।

मोह बढ़े परिवार की संगत

लोभ बढ़े धन में चित्त दीन्हे।

क्रोध बढ़े नरमूढ़ की संगत

काम बढ़े तिय के संग कीन्हे।

‘सुंदर’ विवेक विचार बढ़ें

कविदीन सुसंगत सज्जन कीन्हे।।’

जैसी-जैसी संगति होती है, वैसी वैसी ही रंगत चढ़ जाती है। संगति यदि नि:स्वार्थ भाव से समाज सेवा करने वाले महानुभावों के साथ होगी तो निश्चित है कि व्यक्ति नि:स्वार्थ भाव वाला बनेगा और संसार के समस्त प्राणियों के साथ उसका व्यवहार भी प्रेमपूर्ण ही होगा।

‘सत्संगाद भवति हि साधुता खलानां’

साधूनाम नहि खलसंगात्खलत्वम्

आमोदम् कुसुमभवं मृदेव धत्ते

मृग गन्धं नहि कुसुमानि धारयन्ति।।

चाणक्य जैसे महामति का कथन है कि सज्जनों की संगति करने से दुर्जन लोगों के भीतर भी साधुता का प्रवेश हो जाना पूर्णत: सत्य है। परंतु जो वास्तव में सज्जन होते हैं, अर्थात जिनके हृदय में वास्तव में प्रेम प्रकट हो जाता है और जो प्रभु प्रेम में हर क्षण ही आत्मस्नान करते रहते हैं-उन पर दुष्टों की संगति का भी कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। उदाहरण के रूप में मिट्टी फूल की गंध को धारण कर लेती है, परंतु फूल मिट्टी की गंध को कभी धारण नही करते। प्रेम का विस्तार तभी संभव है जब दुष्ट अपनी दुष्टता को सज्जन की संगति में आकर छोड़ते जाएं और उसका हाथ पकडक़र भवसागर पार करने के लिए आगे बढ़ते जाएं।

गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं :-

सठ सुधरहिं सत्संगति पाई।

पारस परसि कुघात सुहाई।।

अर्थात दुष्ट व्यक्ति सज्जनों की संगति से सुधर जाते हैं जैसे पारसमणि के स्पर्श से बुरी धातुएं शोभायमान हो जाती हैं।

महर्षि दयानंद जी महाराज ने एक वेदमंत्र (ऋ. 2-7-3) का भावार्थ करते हुए लिखा है-

‘जैसे जल की धारा प्राप्त हुए स्थान को छोडक़र दूसरे स्थान को जाती है, वैसे शत्रुभाव को छोड़ मित्र भाव को सब मनुष्य प्राप्त होवें।’

इस मंत्र के महर्षिकृत इस भावार्थ को देखें तो पता चलता है कि प्रेम प्रवाहमान है। जल एक स्थान को छोडक़र जैसे दूसरे स्थान को प्राप्त करता रहता है, वैसे ही प्रेम भी द्वेष के या घृणा के या शत्रुभाव के एक स्थान को छोडक़र दूसरे स्थान को प्राप्त करता रहता है। इसलिए मनुष्य को प्रेमभाव के विस्तार के लिए सचेष्ट रहना चाहिए। क्योंकि प्रेमभाव के विस्तार से द्वेषभाव या शत्रुभाव का क्षेत्र अपने आप ही संकीर्ण व सीमित होता चला जाएगा। संसार में जितने देशों की सीमाएं हैं, या जितने देश या राष्ट्रीयताएं हैं, वे सबकी सब व्यक्ति की संकीर्ण द्वेष भावना की प्रतीक हैं। मानवता को प्रेम विकसित करता है और दानवता को द्वेष विकसित करता है। द्वेष संकीर्ण सीमाओं का सृजन करता है, तो प्रेम उन संकीर्ण सीमाओं को मिटाने की बात करता है। प्रेम के मार्ग में देशों की सीमाएं नही आतीं, इन्हें तो वह बड़े प्रेम से ही लांघ जाता है। कैसे? एक उदाहरण लें। अभी आपको पता चले कि सात समंदर पार ऑस्टे्रलिया में एक आतंकी घटना में दो सौ लोगों की हत्या कर दी गयी है। तब आप सूक्ष्म रूप में अपने आपको उन दो सौ मृत व्यक्तियों के परिजनों के साथ किसी न किसी प्रकार से खड़ा अनुभव करेंगे और अनायास ही आपके मुंह से आतंकियों के लिए अपशब्द निकल जाएंगे। ऐसे समय में उन मृत लोगों के परिजनों के प्रति आपका प्रेम संवेदनाएं यहां से उठीं और कई सारे देश और समुद्रों की सीमाएं लांघकर तुम्हें इतनी दूर ले गयीं। कितनी दूर जाकर आप खड़े हो गये। आपको कौन ले गया वहां ?

निस्संदेह यह प्रेम ही था जो आपको वहां ले गया जो संकीर्ण सीमाओं के बंधन से परे है। प्रेम के सामने प्रांत, देश, महाद्वीप, महासागर, संप्रदाय, भाषा, रंग-रूप, धन संपदा आदि सबके सब तुच्छ हैं।

एक विद्वान लिखते हैं-”प्रेम सब प्रकार की संकीर्णताओं को भस्मसात कर देता है। संसार के अंधकारमय वातावरण में प्रेम ही एक प्रकाश स्तंभ है। यही सन्मार्ग का प्रकाशक होता है। इसी में पथभ्रष्ट व्यक्ति सन्मार्ग पर चलता है। तभी तीर्थ स्थानों में जल से भी पवित्र यदि कुछ है तो वह है प्रेम। प्रेम विपत्ति का सामना तो भले ही कर ले, परंतु वह अवहेलना सहन नहीं कर सकता। संसार का बड़े से बड़ा ऐश्वर्य और बड़े से बड़ा वैभव प्रेम के साम्राज्य के आगे तुच्छ है। प्रेम की आधारशिला दृढ़ता है शिथिलता नहीं। प्रेम में स्वयं कोमलता पायी जाती है। परंतु वह कठोरता पर सदा विजय प्राप्त करता है। आत्मा की सच्ची तृप्ति का यदि कोई कारण है तो प्रेम। प्रेम अनन्यता का पोषक होता है। उसमें अनन्यता का कोई स्थान नहीं। जब हृदय में प्रेम झरना बहने लगता है तो मानो मनुष्य के हृदय में ईश्वरीय प्रेरणा काम कर रही होती है। सच्चे प्रेम में वासना का कोई स्थान नहीं होता। प्रेम वह रसमय काव्य है जिसमें शुष्कता का कोई स्थान नहीं है। प्रेम का अर्थ है सरसता और रसमयता। प्रेम सदाबहार है प्रेम के राज्य में शिशिर ऋतु का समावेश नहीं है।”

प्रेम के इसी सदाबहार रसमयी स्वरूप का जितना ही अधिक विस्तार होगा, संसार की संकीर्णताएं उतने ही अनुपात में उतनी ही शीघ्रता से धूलि धूसरित होती जाएंगी।

डॉ राकेश कुमार आर्य

संपादक : उगता भारत

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