स्वार्थ भाव मिटे हमारा प्रेम पथ विस्तार हो

प्रेम में सृजन है, और प्रेम में परमार्थभाव भी है। कैसे ? अब यह प्रश्न है। इसके लिए महात्मा बुद्घ के जीवन के इन दो प्रसंगों पर तनिक विचार कीजिए। महात्मा बुद्घ एक घर में ठहरे हुए थे। एक व्यक्ति जो उनसे घृणा करता था, उनके पास आया और उसने आते ही उन पर थूक दिया।

बुद्घ ने बड़ी सहजता से और बिना क्रोध किये वह थूक साफ कर लिया और उस आगंतुक महानुभाव से बड़े प्रेम से बोले-”अभी कुछ और भी करना है क्या ?”

वह आगंतुक आश्चर्य से कहने लगा-”मैंने तुम पर थूका है इसलिए आपको मुझ पर क्रोधित होना चाहिए…..क्या आप मुझ पर क्रोधित नहीं होंगे।….मैं चाहता हूं कि आप मुझ पर क्रोध करें।”

बुद्घ इसके उपरांत भी सहज और सरल रहे, उन्होंने बड़े शांतभाव से आगन्तुक व्यक्ति की भावना को समझ लिया था, इसलिए उसकी क्रोध करने की जिज्ञासा का समाधान करते हुए बोले-”यदि तुम मुझसे क्रोध ही कराना चाहते थे, तो इसके लिए महोदय आप मेरे पास दस वर्ष के विलंब से पहुंचे हो। इसे मारे हुए मुझे दस वर्ष हो गये हैं। तुम्हारे थूक को तो मैंने अपनी चादर से पोंछकर ही साफ कर दिया है। मुझे नहीं लगता कि तुम्हारे थूक ने मेरे भीतर विराजमान हुई अखण्ड शांति को तनिक भी कष्ट पहुंचाया हो। अथवा उसे तनिक भी हिलाया हो। तुम्हारे थूकने न थूकने का उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। क्योंकि थूक वहां तक पहुंचा ही नहीं था।”

आगन्तुक कुछ लज्जित सा होकर-पर अपने लज्जाभाव को छिपाते हुए वहां से चला गया। पर घर जाकर वह रात को सो नहीं सका। अगले दिन प्रात:काल में ही वह महात्मा बुद्घ के पास आ गया। आज वह थूक नही रहा था-अपितु अपने किये पर पश्चात्ताप करते हुए क्षमायाचना कर रहा था।

बुद्घ ने उसकी क्षमा प्रार्थना पर कहा-”क्षमा करूं तो इसका अभिप्राय होगा कि तुम्हारे थूकने पर मैंने भी तुम पर क्रोध किया था। जब क्रोध किया ही नहीं, सिर्फ दया की थी कि तुम कैसे अज्ञानी हो किसलिए किस पर थूक रहे हो? मैं जानता हूं कि दूसरे की भूल के लिए स्वयं को दण्ड देना पागलपन है, इसे तुम भी भली प्रकार जानो।”

वास्तविक प्रेम हृदय से उठता है, क्योंकि उसका निवास स्थान भी वहीं है-आत्मा के निकट। यही कारण है कि वह नवसृजन में विश्वास करता है, वह विध्वंस को तो जानता तक भी नहीं। बुद्घ ने एक ‘पागल’ का हृदय अपने हृदय रूपी झरने से निकले शब्द रूपी प्रेमपूर्ण शब्दों से निर्मल और पवित्र कर दिया, उसका नवसृजन कर दिया-इसलिए उसे रात भर नींद नहीं आयी। उसके भीतर नया सृजन हो रहा था, वह जैसा आज तक था, उसका वह रूप मिटता जा रहा था, और आज से एक ‘नया पुरूष’ उसके भीतर स्थान पाता जा रहा था। भला ऐसे अद्भुत क्षणों में वह कैसे सो पाता? जब बच्चे का जन्म हो रहा होता है तो उन क्षणों में मां भी नहीं सो पाती, सोये भी कैसे? क्योंकि नया पुष्प खिलाने के लिए कष्ट भी तो उसे ही झेलने हैं, और इसलिए मां उन क्षणों के कष्टों को झेलने के लिए स्वयं को स्वेच्छा से ही आगे कर देती है। एक दिन समय आता है कि मां की कोख से निकला वह पुष्प अपनी सुगंधि से संसार भर को सुगंधित कर डालता है।

पुन: अपने प्रसंग पर आते हैं। प्रात:काल से सायंकाल तक उस व्यक्ति के भीतर से सायंकाल वाला ‘कालाभूत’ विदा हो चुका था, अब वह बुद्घ की कृपा से देवता बन गया था। वह चुपचाप उठा और महात्मा बुद्घ के पास जाकर क्षमायाचना करने लगा।

महापुरूष इसीलिए महापुरूष कहलाते हैं कि वे दूसरों के भीतर के ‘महापुरूष’ को भी जगाने की क्षमता और सामथ्र्य रखते हैं। ‘महापुरूषों’ का जीवन चुम्बकीय शक्ति रखता है। उसके चुम्बकीय क्षेत्र में जो भी कोई आता है वह इसी को अपने गुणों से ओत-प्रोत कर डालता है। ‘महापुरूषों’ के आभामंडल में ऐसा आकर्षण होता है कि उसके आकर्षण क्षेत्र में पहुंचते ही बड़ों- बड़ों का कल्याण हो जाता है।

महात्मा बुद्घ के जीवन का एक और प्रसंग है। महात्मा बुद्घ अपने शिष्यों सहित किसी सभा में विराजमान थे। उसी समय वहां एक व्यक्ति आता है। बाहर द्वार से ही वह जोर से चिल्लाकर कहता है-”आज मुझे सभा में बैठने की अनुमति क्यों नही दी गयी?”

महात्मा बुद्ध की शिक्षा

बुद्घ नेत्र बंद किये अपनी साधना में लीन थे, उन्होंने आगन्तुक महानुभाव की आवाज को सुन तो लिया था, पर इसके उपरांत भी वे अविचल भाव से अपनी साधना में लीन रहे। महात्मा बुद्घ का संकेत भी किसी शिष्य को उस बाहरी व्यक्ति को भीतर लाने का नहीं मिला था, ऐसे में किसी अन्य शिष्य का भी यह साहस नहीं हुआ कि वह उठकर बाहर जाता और उस आगन्तुक महोदय को ससम्मान अंदर ले आता। सभा में से कोई भी नहीं हिला और सब शांति से अपनी साधना में मग्न रहे। इतने में ही बाहर से उस व्यक्ति ने पुन: आवाज लगायी-”मुझे भीतर क्यों नहीं बुलाया जा रहा है?” पहले की आवाज की अपेक्षा इस बार की आवाज में कुछ और तीखापन था। जिसे सुनकर लग रहा था कि वह व्यक्ति यदि अंदर नहीं बुलाया गया तो बार-बार व्यवधान डालने का प्रयास करता रहेगा। इसलिए साधना में रत एक शिष्य ने महात्मा बुद्घ से कह ही दिया कि -”भगवन! बाहर खड़े उस शिष्य को भीतर लाने की अनुमति हो तो द्वार खोल दूं?”

शिष्य की बात में प्रश्नचिन्ह भी था और लोगों की साधना में कोई व्यवधान न हो, ऐसा भाव भी था। शिष्य चाहता था कि बाहर खड़ा हुआ व्यक्ति अधिक व्यवधान किये बिना भीतर बुला लिया जाए।

आज बुद्घ ने अप्रत्याशित बात कह दी, जो बुद्घ सबको गले लगाकर चलते थे। वह आज बोले-”नहीं, उसके लिए द्वार नहीं खोलने हैं क्योंकि वह अस्पृश्य है।”

सिद्घांतप्रियता व्यक्ति को प्रेम साधना की ऊंचाई तक ले जाती है। उसे पता होता है कि सिद्घांतों की रक्षा के लिए कई बार अप्रिय स्थितियों का सामना भी करना पड़ेगा। परंतु वह अपनी सिद्घांत साधना को अपनी प्रेमसाधना के माध्यम से ही पूर्ण करता रहता है। यह ध्यान रखने की बात है कि स्वार्थ साधना में बाधा पहुंचते ही क्रोध उफनता है, और सिद्घांत साधना में व्यवधान आते ही प्रेम उपजता है। जैसे महात्मा बुद्घ को उक्त दोनों प्रसंगों में प्रेम उपजा वैसे ही महर्षि दयानंद के जीवन का एक प्रसंग भी ध्यान देने योग्य है।

डॉ राकेश कुमार आर्य

संपादक : उगता भारत

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