हम वस्तुतः कौन हैं क्या शरीर हैं अथवा आत्मा हैं ?

ओ३म्

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हम अपने नाम, माता-पिता तथा आचार्य आदि के नामों व सम्बन्धों से जाने पहचाने जाते हैं। हमें स्कूलों में यह नहीं बताया जाता है कि वस्तुतः व तत्वतः हम कौन हैं? हमारे पास देखने के लिए आंखें, सुनने के लिये कान, चलने के लिए पैर, सूंघने के नासिका तथा पदार्थों का स्वाद जानने के लिये जिह्वा है। त्वचा से हम स्पर्श द्वारा दूसरे पदार्थों की कोमलता, कठोरता सहित शीतलता व उष्णता आदि का ज्ञान प्राप्त करते हैं। हमारा शरीर पृथिवी की मिट्टी व वनस्पतीय पदार्थों का बना हुआ है। वनस्पतियां सब पृथिवी में उत्पन्न होती हैं। उन्हें मिट्टी व गोबर आदि की खाद देकर उत्पन्न किया जाता है। वायु, जल तथा सूर्य के प्रकाश की भी उनको आवश्यकता होती है। उन वनस्पतियों का हम भक्षण करते हैं जिससे हमारे शरीर वृद्धि को प्राप्त होते हैं। आंखों से हमें अपना व दूसरों का पार्थिव शरीर ही दिखाई देता है। हम शरीर हैं, यह एक अर्धसत्य कहा जा सकता है। हम पूर्णतः शरीर ही हैं, इसके अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं, यह विचार व ज्ञान अधूरा व असत्य है। हम देखते हैं कि हमारी पृथिवी तथा अग्नि, वायु, जल, आकाश आदि जड़ पदार्थ हैं। इनमें चेतना नहीं है। हमें कांटा चुभता है तो दर्द होता है परन्तु उसी कांटे को हम जल, वायु, पृथिवी, अग्नि व आकाश आदि में चुभायें तो उनसे हमें वैसी प्रतिक्रिया नहीं मिलती जैसी किसी मनुष्य व पशु-पक्षी आदि प्राणियों से मिलती है। इससे हमें जड़ व चेतन का भेद व अन्तर विदित होता है। इससे यह भी विदित होता है कि जड़ व चेतन दो प्रकार के पृथक-पृथक पदार्थ हैं।

जड़ व चेतन पृथक-पृथक पदार्थ हैं, इसका अनुभव हम अपने शरीर में भी करते हैं। इसके कुछ उदाहरणों पर हम विचार कर सकते हैं। मृतक शरीर में मानव शरीर के सभी अवयव होते हैं परन्तु न वह देखता है, न सुनता है, न बोलता है और स्पर्श करने व कांटा चुभाने पर भी वह उस प्रकार की प्रतिक्रिया नहीं देता जैसी कि वह जीवित अवस्था में देता है। इससे विदित होता है कि उसके शरीर से प्रतिक्रिया व्यक्त करने वाला चेतन पदार्थ निकल गया है, चला गया है अथवा विलुप्त हो गया है। ऐसा ही मानव सहित सभी प्राणियों के शरीरों में देखने को मिलता है। सुप्तावस्था का उदाहरण भी जड़ व चेतन का भेद प्रकट करता है। सुप्तावस्था में हम व हमारा शरीर वह क्रियायें नहीं कर सकते जो जाग्रत अवस्था में करते हैं। उस समय हमारे शरीर का चेतन तत्व वा आत्मा सक्रिय अवस्था में नहीं होता अर्थात् आत्मा जाग्रत अवस्था में नहीं होता। हमारा शरीर नहीं सो रहा होता अपितु हमारा आत्मा ही सो रहा होता है। आत्मा के सोने से शरीर असक्रिय व नियमित किये जाने वाले कार्यों को निद्रावस्था में नहीं करता। इससे यह विदित होता है कि शरीर में एक चेतन तत्व व सत्ता है जिसके शरीर में होने से देखने, बोलने, चलने-फिरने तथा सुख व दुःख की क्रियायें होती हैं जिसका हम अपने शरीर व अन्यों के शरीरों में भी अनुभव करते हैं। इससे हमें ज्ञात होता है कि हम केवल शरीर मात्र नहीं हंै अपितु हमारे शरीर के भीतर एक चेतन तत्व है।

हम व्यवहार में भी प्रदर्शित करते हैं कि हम केवल शरीर मात्र नहीं हैं। हम व्यवहार में कहते हैं कि यह शरीर मेरा है। मेरा का प्रयोग मुझसे भिन्न वस्तुओं व पदार्थों के लिये किया जाता है। पालतू पशुओं के भी लोग नाम रख लेते हैं। एक मनुष्य के यहां तीन चार गाय होती हैं तो वह उनको उनके नामों से जानते हैं। उन सबमें सोने जागने, बोलने, चलने व सुख दुःख के समान नियम देखने को मिलते हैं। जैसे वह पशु हमसे भिन्न होकर मेरे या मेरा कहलाते हैं वैसे ही हमारा शरीर व इसके अंग भी हमसे भिन्न होने के ही कारण मेरे व हमारे कहलाते हैं। हम दूसरों को जब अपने विषय में कुछ कहते हैं तो हमारा वाक्य व शब्द होते हैं कि यह मेरा हाथ है, यह मेरा सिर, आंख, नाक, कान, मुंह, पैर, उदर व हस्त आदि हैं। मेरा का अर्थ मैं नहीं अपितु मैं से भिन्न होता है। मेरी पुस्तक मैं नहीं होता। पुस्तक व मैं दोनों अलग अलग होते हैं। अतः मेरा हाथ व मैं अलग अलग हैं, यह भाषा का प्रयोग बताता है। यह कहने का यही अभिप्रायः है कि मैं जो हूं वह मेरा जो है, उससे अलग है। जब हम किसी के लिये भी मेरा शब्द का प्रयोग करते हैं तो वह मुझ से अथवा मैं से पृथक व भिन्न होता है। अतः शरीर मेरा है, इसके अंग प्रत्यंग भी मेरे हैं परन्तु शरीर व इसके सभी अंग मैं से भिन्न व पृथक है। आगे चल कर हम जानेंगे कि मैं अनादि व नित्य तथा अजर व अमर हूं। मैं कभी नहीं मरता, मेरा शरीर मरता है। मेरा शरीर व इसके सभी अंग नाशवान हैं।

हमें शास्त्रों की बातों पर ध्यान भी देना चाहिये और उनकी समीक्षा कर उनमें से सत्य को ग्रहण करने के साथ असत्य का त्याग कर देना चाहिये। हमारे यहां वेद सबसे प्राचीन, ईश्वर से प्रादुर्भूत तथा सब सत्य विद्याओं का पुस्तक व कोष है। वेदों के आधार पर शोध एवं अन्वेषण सहित सत्यासत्य का विचार कर हमारे उच्च कोटि के विद्वान ऋषियों व मनीषियों ने अनेक शास्त्रीय ग्रन्थों की रचना की है। इन ग्रन्थों में जीवात्मा के स्वरूप सहित इसके गुण, कर्म व स्वभाव पर भी प्रकाश डाला गया है। ऋषि दयानन्द ने इसी प्रक्रिया तथा अपने ज्ञान व अनुभव के आधार पर अपनी ‘स्वमन्तव्यामन्तव्य प्रकाश’ पुस्तक में जीव वा आत्मा के विषय में बताया है कि जो इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख और ज्ञानादि गुणयुक्त अल्पज्ञ नित्य सत्ता है उसी को वह ‘जीव’ मानते थे। उन्होंने यह भी बताया है कि जीव और ईश्वर स्वरूप और वैधम्र्य से भिन्न और व्याप्य-व्यापक संबंध तथा साधम्र्य से अभिन्न हैं अर्थात् जैसे आकाश से मूर्तिमान् द्रव्य कभी भिन्न न था, न है, न होगा और न कभी एक था, न है, न होगा, इसी प्रकार परमेश्वर और जीव को व्याप्य-व्यापक, उपास्य-उपासक और पिता-पुत्र आदि सम्बन्धयुक्त ऋषि दयानन्द मानते थे। जीवात्मा से युक्त मनुष्य अपने मनुष्य-जन्म में कर्मों का करने वाला कर्ता होता है। ऋषि दयानन्द कहते हैं कि जो स्वतन्त्रता से कर्मों को करने वाला है, जिसके कामों में परमात्मा का हस्तक्षेप नहीं है, अर्थात् जिसके अधीन सब साधन होते हैं, वह कर्ता कहलाता है। मनुष्यरूप में कर्ता जीवात्मा को कहते हैं। जब हम सृष्टि की रचना, पालन व प्रलय सहित मनुष्य व प्राणियों के जन्म-मरण आदि की बातें करते हैं तो कर्ता ईश्वर होता है।

आत्मा के विषय में हम विचार करें तो यह निष्कर्ष निकलता है कि आत्मा एक चेतन पदार्थ वा सत्ता है। यह अनादि व नित्य है। अमर व अविनाशी है। आत्मा जन्म व मरण धर्मा है। यह कर्मों का कर्ता तथा उसके अनुरूप फलों का भोक्ता है। जीवात्मा एकदेशी व ससीम स्वरूप वाला है। अग्नि, वायु, जल आदि से न यह जलता है, न सूखता है और न ही गीला होता है। तलवार व कोई शस्त्र हमारी आत्मा को विखण्डित नहीं कर सकता। शरीर से पृथक आत्मरूप में जीवात्मा अग्नि आदि किसी पदार्थ से किसी भी रूप में सन्तप्त नहीं होता। संचित कर्मों से इसका जो प्रारब्ध व कर्माशय बनता है, उसके अनुसार ही जीवात्मा अनेकानेक योनियों में जन्म लेता है। आत्मा का आत्मा के साथ माता, पिता, भाई व बहिन जैसा कोई स्थाई सम्बन्ध नहीं है। इसके इस जन्म के सम्बन्ध सीमित समय के लिये हैं। मृत्यु के बाद तथा जन्म से पूर्व यह सम्बन्ध नहीं होते। परमात्मा के साथ आत्मा का स्थाई सम्बन्ध है। यह सम्बन्ध व्याप्य-व्यापक, स्वामी-सेवक, पिता-पुत्र, उपास्य-उपासक आदि हैं। जीवात्मा का जन्म व मरण अपने पूर्व कर्मों का भोग करने के साथ मनुष्य योनि में नये कर्मों को करने के लिये होता है।

मनुष्य व कोई भी प्राणी दुःख नहीं चाहता। परमात्मा जीवात्मा को मनुष्य जन्म दुःख की निवृत्ति करने के लिये ही देता है। दुःखों की निवृत्ति असत्य कर्मों का त्याग करने सहित सद्कर्मों को करने से होती है। यदि मनुष्य असत् कर्मों का करना सर्वथा त्याग दे, वेदाध्ययन कर योग की उपासना विधि से यम, नियमों, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि का सेवन करे, विद्या की प्राप्ति कर वेदों का स्वाध्याय व प्रचार करे, पंचमहायज्ञों को करे और सेवा व परोपकार के काम करे, तो आत्मा की दीर्घ काल के लिये दुःखों से मुक्ति हो जाती है। मुक्ति की अवधि 31 नील 10 खरब 40 अरब है। इतनी अवधि तक जीवात्मा मोक्ष में शरीर से पृथक केवल आत्म-तत्व के रूप में ईश्वर के सान्निध्य में रहकर व अनेक शक्तियों को प्राप्त कर उसके आनन्दस्वरूप से आनन्द को प्राप्त करता रहता है। उसे किसी प्रकार का कोई क्लेश वा दुःख नहीं होता। मुक्ति की अवधि पूर्ण होने पर जीवात्मा का पुनः मनुष्य योनि में जन्म होता है। मुक्ति से लौटने के बाद जीवात्मा एक ऋषि व योगी के रूप में जीवन व्यतीत करता है, ऐसा हम अनुमान से जानते हैं। यह कुछ बातें हमने जीवात्मा के स्वरूप व गुण, कर्म व स्वभाव को प्रस्तुत करने के लिये लिखी हैं।

मनुष्य परिवार में रहता है। उसका कोई दादा, दादी, पिता, माता, भाई, बहिन, पुत्र, पुत्री, बहु, दामाद आदि सम्बन्ध होते हैं। बहुत से उसके ऐसे मित्र होते हैं जिन्होंने उसे बुरे समय में सहयोग किया होता है, यहां तक की उसकी या उसके परिवार वालों के प्राण व जीवन को बचाया होता है। यदि इस व्यक्ति की मृत्यु होती है तो इसके अपने परिवार व मित्रों से सभी सम्बन्ध समाप्त हो जाते हैं और परिवारजनों आदि के सम्बन्ध भी मृत आत्मा से नहीं रहते है। अतः किसी मृतक व्यक्ति की स्मृति में दुःखी व भावुक होने से लाभ नहीं होता। हमें कृतघ्न तो कदापि नहीं होना है परन्तु हम जो भी कार्य करें वह विवेकपूर्वक होना चाहिये। मनुष्य का अपने परिवारजनों से अस्थाई सम्बन्ध बनता है जो मरने के बाद समाप्त हो जाता है। हमें यह भी ज्ञात होना चाहिये कि हमारे जन्म से पूर्व हमारे विभिन्न योनियों में अगणित जन्म हो चुके हैं। हमारे इस जन्म के बाद भी हमारे पुनर्जन्म होते रहेंगे। अतः हमें ऐसा कोई कर्म नहीं करना चाहिये जो इस जन्म व परजन्म में हमारे लिये दुःखों का कारण बनें।

मनुष्य का कर्तव्य है कि वह वेदों के परम विद्वान ऋषियों व योगियों द्वारा आचारित पंचमहायज्ञों का अभ्यास व आचरण करे। ऐसा करने से उसकी आत्मा व जीवन की उन्नति होगी। वह ईश्वर का साक्षात्कार कर परोपकार कर्मों को करते हुए जीवनमुक्त हो सकता है। इस अवस्था में रहते हुए मृत्यु के प्राप्त होने पर जन्म-मरण व दुःखों से 31 नील वर्ष से अधिक समय तक के लिये मुक्त हो जाता है। यह मुक्ति ही सभी जीवात्माओं का परम लक्ष्य है। सभी को इसके लिये प्रयत्न करना चाहिये। इसके लिये सत्यार्थप्रकाश सहित वेद, उपनिषद, दर्शन, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका एवं आर्य विद्वानों के ग्रन्थों का अध्ययन करना चाहिये। इसी के साथ लेख को विराम देते हैं। हम आशा करते हैं कि हमारे पाठक मित्र इस लेख को उपयोगी पायेंगे। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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