सृष्टि के प्रारंभ में परमात्मा वेद ज्ञान न देता तो अद्यावधि सभी मनुष्य अज्ञानी व असभ्य होते

ओ३म्

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वर्तमान संसार अनेक भाषाओं एवं ज्ञान-विज्ञान से युक्त है। इन सब भाषाओं एवं ज्ञान-विज्ञान का विकास कैसे व कब हुआ, इस प्रश्न का उठना स्वाभाविक है। इन प्रश्नों का समाधान खोजने का सबको प्रयत्न करना चाहिये। हम जानते हैं कि संसार कि सबसे पुरानी सभ्यता वैदिक सभ्यता है। इस सभ्यता का आविर्भाव वेदों की शिक्षाओं के पालन तथा प्रचार व प्रसार से हुआ था। वेद से पुराना कोई ग्रन्थ यहां तक की रामायण, महाभारत, मनुस्मृति, उपनिषद, दर्शन, बाइबिल, कुरान, पुराण आदि कोई भी नहीं है। वेद सबसे प्राचीन ग्रन्थ है इसको जर्मन व इंग्लैण्ड के प्राच्य विद्याओं के विद्वान प्रो. मैक्समूलर ने भी स्वीकार किया है। अब प्रश्न है कि वेदों में क्या है और उसमें जो भाषा एवं ज्ञान है उसका स्तर क्या है? यह भी विचारणीय है कि वेदों की उत्पत्ति कैसे व कब हुई? इस प्रश्न की उपेक्षा वही लोग करेंगे जिनको अपनी मान्यताओं व सिद्धान्तों के असत्य व भ्रामक होने का खतरा होगा। आर्यसमाज इस प्रश्न की उपेक्षा न कर इसका अन्वेषण कर इसका उत्तर देता है। आर्यसमाज के संस्थापक ऋषि दयानन्द सरस्वती (1825-1883) ने अपना जीवन लगा कर इन प्रश्नों की खोज की और उनके सत्य, तर्क एवं युक्तियों से युक्त व पोषित उत्तर प्रदान किये हैं। उनके अध्ययन के परिणाम उनके बनाये प्रमुख दो ग्रन्थ सत्यार्थप्रकाश एवं ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका में प्राप्त होते हैं। ऋषि दयानन्द बताते हैं कि वेद ज्ञान, कर्म, उपासना एवं विशिष्ट ज्ञान के ग्रन्थ हैं। इन वेदों के नाम हैं ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद। शतपथ ब्राह्मण अत्यन्त प्राचीन ग्रन्थ है। अनुमान है कि यह वेदों के बाद मनुष्य रूप में विद्वान ऋषियों की प्रथम रचनाओं में से हैं। इस ग्रन्थ के अनुसार चार वेदों का ज्ञान परमात्मा से अग्नि, वायु, आदित्य एवं अंगिरा नाम वाले चार ऋषि तुल्य शीर्ष विद्वानों को सीधा परमात्मा से मिला था। अब प्रश्न होगा कि परमात्मा कौन है, वह कहां रहता है, उसको ज्ञान कहां व कैसे मिला, चार ऋषियों की उत्पत्ति कैसे हुई और इन ऋषियों के बाद प्रचार-प्रसार की प्रक्रिया किस प्रकार की थी? इन प्रश्नों का उत्तर भी ऋषि दयानन्द ने समस्त धार्मिक व वैदिक साहित्य का अध्ययन कर व उसमें निहित सत्यासत्य का विवेचन कर हमें निष्कर्ष रूप में हमें दिया है।

वर्तमान में चारों वेद हमें सुलभ हैं जिस पर महर्षि दयानन्द और उनके अनुयायी विद्वानों के भाष्य व टीकायें उपलब्ध हैं। इन ग्रन्थों को पढ़ने के बाद स्पष्ट होता है कि वेदों की भाषा संस्कृत है जो अपने आशय को स्पष्ट रूप से समझाने व बताने में सबसे अधिक समर्थ भाषा हैं। ववेदों का व्याकरण पाणिनी-अष्टाध्यायी महाभाष्य विश्व की सभी भाषाओं के व्याकरण से उत्कृष्ट है। यह भी तथ्य है कि ज्ञान भाषा में निहित होता है। भाषा न हो तो ज्ञान को जाना व समझा नहीं जा सकता। यह भी जानने योग्य तथ्य है कि वेद का अर्थ संस्कृत में ज्ञान होता है। वेदों का अध्ययन करने पर यह तथ्य सामने आता है कि वेदों में अन्य ग्रन्थों की तरह कहानी, किस्से, मिथ्या, कल्पित, अविश्वसनीय कथायें व मान्यतायें नहीं हंन अपितु वेदों में ईश्वर, जीवन व प्रकृति का उच्च कोटि का ज्ञान है जिसे उपनिषद, दर्शन एवं वैदिक साहित्य के अन्य ग्रन्थों में स्पष्ट किया गया है। चार वेद व वैदिक साहित्य का अध्ययन करने पर ईश्वर, जीव व प्रकृति का प्रामाणिक ज्ञान प्राप्त होता है। वेदों से मनुष्य जीवन को आदर्श रूप में व्यतीत करने सहित सुख प्राप्ति एवं धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति भी होती है। वैदिक धर्म का आचरण करने से मनुष्य का परजन्म वा पुनर्जन्म भी सुधरता है तथा वह श्रेष्ठ योनि व स्थिति में प्रापत होता है। मत-मतान्तरों के ग्रन्थों में वेदों के समान ज्ञान उपलब्ध नहीं होता। अतः वेद ही मानव जाति के सभी लोगों के लिए स्वीकार्य एवं आचरणीय ग्रन्थ सिद्ध होते हैं।

वेदों की उत्पत्ति के विषय में प्राचीन ग्रन्थों में उल्लेख मिलते हैं। वेदों का आविर्भाव सृष्टि के आरम्भ में परमात्मा द्वारा अमैथुनी सृष्टि में उत्पन्न मनुष्यों में से चार ऋषियों के द्वारा किया गया था। यह स्पष्ट होता है कि इस सृष्टि को बनाने वाली कोई साकार सत्ता नहीं है। सृष्टि की रचना एक सत्य, चेतन, आनन्दस्वरूप, सर्वज्ञ, निराकार, सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक, अनादि, नित्य, अविनाशी, अजर व अमर सत्ता के द्वारा हुई है। परमात्मा का मनुष्य की तरह से कोई शरीर नहीं है। जब परमात्मा का शरीर ही नहीं है और उसके आंख, नाक, कान व मुंह आदि इन्द्रियां व अवयव नहीं हैं तो फिर वह मनुष्यों वा ऋषियों को वेदों का ज्ञान कैसे दे सकता है? इसका उत्तर है कि सर्वज्ञ, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, वेदज्ञान का अधिष्ठाता, ऋषियों सहित समस्त ब्रह्माण्ड और प्राणीमात्र को उत्पन्न करने वाला परमात्मा मनुष्यों व ऋषियों को उत्पन्न कर ऋषियों को एक-एक वेद का ज्ञान दे सकता है। इस बात को हम इस प्रकार भी समझ सकते हैं कि जब परमात्मा बिना हाथों के इस ब्रह्माण्ड को बना सकता है, सूर्य बना सकता है, चन्द्र व पृथिवी एवं इस सौर मण्डल के ग्रहों को बना सकता है, इस ब्रह्माण्ड में अनन्त सूर्य, पृथिवी व लोक-लोकान्तरों को बना सकता है तो वह परमात्मा ऋषियों को चार वेदों का ज्ञान भी दे सकता है। ज्ञान देने के लिये परमात्मा के पास ज्ञान होना चाहिये और ऋषियोें के पास ज्ञान ग्रहण करने के लिये आत्मा, मन, बुद्धि, हृदय, मस्तिष्क आदि अवयव स्वस्थ एवं आदर्श स्थिति में होने चाहियें। जगत का स्रष्टा परमात्मा हमारी आत्मा के भीतर भी व्यापक है। परमात्मा और जीवात्मा का परस्पर व्याप्य-व्यापक सम्बन्ध है। माता अपने गर्भ में अपनी सन्तान को धारण करती है। जन्म से काफी पहले सन्तान के पूरे अंग व अवयव बने भी नहीं होते, तब भी माता-पिता जैसे विचार करते हैं, माता जैसा देखती, सोचती, बोलती व गाती है तथा जैसा उसका चिन्तन व विचार होते हैं, उसकी भाषा होती है, उसके संस्कार व उनका प्रभाव भावी सन्तान के मन, मस्तिक व प्रकृति पर पड़ता है। यह स्थिति तब होती है जब कि माता की आत्मा व गर्भस्थ शिशु की आत्मा माता के शरीर के भीतर ही एक दूसरे से पृथक होने के साथ कुछ दूरी पर होती है। दोनों में एक दूसरे के साथ परमात्मा व आत्मा की तरह का व्याप्य-व्यापक संबंध भी नहीं होता।

परमात्मा सर्वज्ञ है और उसको वेदों का ज्ञान है। उसने इस सृष्टि से पूर्व जितनी अनन्त सृष्टियों को बनाया ह,ै उन सबमें भी वेदों का ज्ञान इसी प्रकार से दिया है जिस प्रकार वर्तमान सृष्टि में दिया व अब भी हमें प्राप्त है। परमात्मा का सर्वज्ञ एवं सर्वशक्तिमान सत्ता होने से उसे अपने ज्ञान का विस्मरण कभी नहीं होता। अतः वह अपने नित्य व अनादि वेदज्ञान को सृष्टि के आरम्भ में चार ऋषियों को जो ज्ञान प्राप्ति के पात्र होते हैं, उनकी आत्मा में प्रेरणा व अपने सर्वशक्तिमान जीवस्थ स्वरूप से स्थिर कर देता है। विद्यालयों में अनेक बच्चें पढ़ते हैं परन्तु सबका ज्ञान एक जैसा नहीं होता। जो बच्चा सबसे अधिक पात्र होता है, बुद्धिमान व अनुशासित होता है, गुरुओं का आज्ञाकारी होता है, वही विद्यार्थी गुरुओं की विशेष कृपा व ज्ञान के रहस्यों को प्राप्त करने का अधिकारी होता है। गुरु कठिन व जटिल बातें अपने उन्हीं योग्य व पात्र शिष्यों को बतातें हैं। यही कारण है कि परमात्मा ने वेदों का ज्ञान अपने श्रेष्ठ व योग्य पात्र चार शिष्य ऋषियों को दिया था। सब मनुष्य वेदज्ञान को धारण व ग्रहण नहीं कर सकते थे। इस ज्ञान प्राप्ति के बाद चार ऋषियों ने उस वेदज्ञान को ब्रह्मा जी नाम के ऋषि को दिया और फिर इन ऋषियों ने सब मनुष्यों को इस ज्ञान को उन्हें पढ़ाया, सिखाया व बताया। इन प्रयत्नों से वेदों का ज्ञान आविर्भूत एवं विस्तृत हुआ और उसका पीढ़ी दर पीढ़ी महाभारत युद्ध के समय तक के 1.96 अरब वर्षों तक प्रचार हुआ। इस प्रकार से वेदों का आविर्भाव हुआ और उनका संसार में प्रचार व प्रसार हुआ।

महाभारत के समय तक वेदों का प्रचार समस्त विश्व में रहा है। महाभारत के बाद आर्यावर्त वा भारत देश में अव्यवस्था और विद्वानों की अकर्मण्यता के कारण वेद विश्व से ही नहीं अपितु भारत से भी विलुप्त होते गये थे। वेदों के ज्ञान के विलुप्त होने के कारण ही देश विदेश में अविद्यायुक्त मतों का आविर्भाव हुआ और वह फल-फूल रहे हैं। ऋषि दयानन्द ने आकर इस स्थिति को जाना और इससे देशवासियों को अवगत कराया। उनके द्वारा वेदों का सत्यस्वरूप प्रकाशित करने पर भी लोग सत्य का ग्रहण और असत्य का त्याग नहीं कर पा रहे हैं। यह ऐसा ही है जैसे कि सिगरेट, शराब व मांस खाने वाला व्यक्ति जानता है कि इनके सेवन से हानि होती है तथापि वह इनका त्याग नहीं करता। यही स्थिति हमें भारत में मत-मतान्तरों की लगती है। धन्य हैं वह लोग जिन्होंने ऋषि दयानन्द के उपदेशों में निहित सत्य ज्ञान के अंश को जाना था तथा उसे अपनाकर उसका प्रचार-प्रसार किया जिसका परिणाम देश में विद्या के प्रचार प्रसार सहित अंधविश्वासों, कुरीतियों में न्यूनता एवं देश की आजादी के रूप में प्राप्त हुआ। ऋषि दयानन्द ने अपने समय में समाज सुधार के भी प्रशंसनीय कार्य किये जिससे भारत ने अनेक कुरीतियों पर विजय प्राप्त की।

परमात्मा एक सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक, न्यायकारी, अनादि व नित्य सत्ता है। यह संसार में सर्वत्र व्यापक होने के कारण प्रत्येक स्थान पर विद्यमान है। अनादि व नित्य होने से वह हमेशा से है और हमेशा रहेगी। अविनाशी होने से उसका कभी अभाव नहीं होगा। वह सदा सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति व प्रलय करती रहेगी। वेदों का ज्ञान उसको सदा से अर्थात् अनादि काल से है जो उसके ज्ञान में सदा, हर क्षण व हर पल बना रहता है व बना रहेगा, कभी अभाव को प्राप्त नहीं होगा। उसने यह ज्ञान किसी से सीख कर प्राप्त नहीं किया अपितु वेदों सहित सृष्टि रचना, पालन व प्रलय करने का ज्ञान उसको स्वाभाविक रूप से है। वेदों का ज्ञान उसके स्वभाव में अनादि काल से अनन्त काल तक के लिये निहित है। वह पूर्ण होने के कारण वृद्धि व ह्रास को प्राप्त नहीं होता। जिन ऋषियों को परमात्मा ने वेदज्ञान दिया था, उन चार ऋषियों को उसने अमैथुनी सृष्टि में अन्य प्राणियों के समान ही बनाया था। इन चार ऋषियों ने ब्रह्मा जी के साथ मिलकर वेदों का प्रचार किया और इनके बाद विद्वान पीढ़ी दर पीढ़ी वेदों का प्रचार श्रवण प्रक्रिया अर्थात् सुन व सुना कर तथा अध्ययन-अध्यापन प्रक्रिया से करते आ रहे हैं।

परमात्मा ने ही सृष्टि की आदि में चार ऋषियों के माध्यम से संस्कृत भाषा और वेदों का ज्ञान दिया था। यदि परमात्मा वेदों का और संस्कृत भाषा का ज्ञान न देता तो मनुष्य आद्य किसी भाषा का निर्माण नहीं कर सकता था। अतीत में कुछ राजाओं ने इसके लिये परीक्षण भी किये थे जिनसे यह ज्ञात हुआ कि मनुष्य भाषा का निर्माण नहीं कर सकते। भाषा सृष्टि के आरम्भ में परमात्मा से ही प्राप्त होती है। यदि वह न हो तो मनुष्य सदा सर्वदा भाषा से हीन व वियुक्त अर्थात् अपढ़ व अज्ञानी रहेगा। सृष्टि की आदि में मनुष्यों को भाषा सहित ज्ञान देना परमात्मा का कर्तव्य भी था। जिस प्रकार माता-पिता अपने बच्चों को भाषा सिखाते हैं, उन्हें उपयोगी व हितकारी बातें सिखाते हैं, उसी प्रकार से परमात्मा ने भी सृष्टि के आरम्भ में मनुष्यों को वेदों का ज्ञान दिया था। भारत वा आर्यावर्त की भूमि गौरवशाली भूमि है जहां परमात्मा ने तिब्बत में मनुष्यादि प्रथम सृष्टि की थी और वेदों का ज्ञान दिया था। वेदों की मूल भाषा संस्कृत में विकार होने से ही समय-समय पर विश्व की अन्य सभी भाषायें बनी हैं। इस दृष्टि से सारा विश्व भारत का आभारी व ऋणी है और हमेशा रहेगा। यह भी ज्ञातव्य है कि पूरी दुनिया के पूर्वज प्राचीन भारतीय वैदिक धर्मी ही थे। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना भी वैदिक विचारों के अनुरूप भारत के ऋषियों द्वारा ही विश्व में प्रचारित हुई है। कोई माने या न माने, परन्तु सारा विश्व भाषा एवं ज्ञान प्राप्ति के लिये भारत का चिरऋणी है। यह बात अनेक प्रमाणों एवं युक्तियों से सिद्ध होती है। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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