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सावधान! भारतीय भाषाओं के खिलाफ़ षडयंत्र

डा0 कुलदीप चंद अग्निहोत्री
संघ लोकसेवा आयोग देश के बड़े नौकरशाहों की भर्ती करता है । ऐसे नौकरशाह जो हिन्दुस्थान की नीतियों का निर्धारण करते हैं , जो देश के भाग्य विधाता हैं । इन नौकरशाहों में भी ,जो पहाड़ की चोटी पर बैठते हैं और जिनको देश की स्थायी सरकार कहा जाता है , आई ए एस की भर्ती आयोग का प्रमुख काम है । अंग्रेज़ों के वक़्त इन नौकरशाहों को आई सी एस कहा जाता था , लेकिन ये नीति निर्धारित नहीं करते थे , केवल उसको लागू करते थे । लेकिन अब नीति निर्धारण का काम भी बड़ी चुराई से इन्होंने ख़ुद ही संभाल लिया है और राजनैतिक नेतृत्व को कर्मचारियों के स्थानान्तरणों के महत्वपूर्ण काम इत्यादि में उलझा दिया है या फिर घोटालों में । ज़ाहिर है इस नई भूमिका से इन नौकरशाहों की ताक़त और भी बढ़ गई है । लेकिन पिछली सदी के मध्य में इन नौकरशाहों की शाही सवारी में एक पेंच फँस गया था । समाजवादियों और जनसंघियों ने मिलकर बबाल मचा दिया कि नौकरशाहों की भर्ती की परीक्षा भारतीय भाषाओं में भी ली जानी चाहिये । शोर बढऩे लगा तो आयोग का आभिजात्य वर्ग सोची समझी रणनीति के तहत पीछे हट गया और आई ए एस और उसकी सहायक परीक्षाओं में भारतीय भाषाएँ भी दाख़िल हो गईं । अंग्रेज़ी का बर्चस्व पूरी तरह समाप्त तो नहीं हुआ लेकिन कहीं कहीं भारतीय भाषाओं के आसन भी शाहजहाँ मार्ग ( जहाँ दिल्ली में आयोग का मुख्य कार्यालय है) पर बिछ गये । परीक्षा का माध्यम भी भारतीय भाषाओं को बनाने की दिशा में प्रगति हुई । अंग्रेज़ी की परीक्षा पास करना तो अनिवार्य रखा गया लेकिन अब उसके अंक मेरिट में नहीं जुड़ते थे । इस सब का परिणाम जो हो सकता था वही हुआ । रिक्शा चलाने वाले का बेटा भी आई ए एस के आभिजात्य क्लब में शामिल होने के लिये दस्तक देने लगा । क्योंकि रिक्शा चलाने बाले के बेटे में प्रतिभा और योग्यता की कमी तो कभी नहीं रही थी । लेकिन बेचारा तुलसीदास की अवधि और सूरदास की ब्रजभाषा बोलता था, शेकस्पियर की अंग्रेज़ी नहीं । बस भारतीय भाषाओं का छोटा सा रोशनदान खुलने भर की देर थी कि जूते बनाने वाले मोची की बेटी , रिक्शा चलाने वाले का बेटा , किसी झोंपड़ी में रहने वाले परिवार के आठ बच्चों में से कोई एक ,खेत में हल चलाने वाले का कोई होनहार , ठेस पंजाबी , ओडिया ,मराठी , गुजराती ,असमिया में सारी पढ़ाई करने वाला कोई युवक या युवती सभी इंडिया के इस सबसे पुराने आभिजात्य क्लब में घुस आये । ऐसे ऐसे लोग जिनमें प्रतिभा-ज्ञान तो था लेकिन क्लब के शऊर से वास्ता नहीं था । ऊपर से हेकड़ी की हद कि वे यह शऊर सीखने के लिये भी तैयार नहीं थे । मुंशी प्रेमचंद की कहानी के वे नायक इस क्लब में घुस आये जो कीचड़ में फँसी किसान की गाड़ी को धक्का लगाते लगाते अपने कपड़े भी कीचड़ से भर चुके थे । यह सब भारतीय भाषाओं की करामात थी । लगता था इंडिया के कबूतरों की टेकरी पर भारत के बाज आकर बैठने लगे हैं और वे नफ़ासत की अंग्रेज़ी के स्थान पर शुद्ध हिन्दी पंजाबी में दहाड़ रहे हैं ।
यदि यही अराजकता ज़्यादा देर रही तो इंडिया का भविष्य क्या हो सकता है ? वह तो सचमुच सौ पचास साल में भारत बन जायेगा । अंग्रेज़ों ने बड़ी मेहनत से दो सौ साल में भारत को इंडिया बनाया था , लेकिन अब इतिहास उलटा घूमना शुरु हो गया था । सचमुच भाषा में बड़ी ताक़त होती है । आदमी अपनी भाषा में बोलता है । अपना दुख दर्द सुनता और सुनाता है । अपने समाज का दुख दर्द समझता भी है । एक बार आदमी से उसकी भाषा छीन लो तो वह गूँगा हो जाता है । गूँगे को मारना बहुत आसान होता है । वह बोल नहीं सकता । वह सम्प्रेषण नहीं कर सकता । अंग्रेज़ों के इंडिया ने भारत को गूँगा कर दिया था । तभी वह इसे लूट सके । महात्मा गान्धी ने उसको उसकी ज़बान लौटा दी । देश आज़ाद हो गया । लेकिन अंग्रेज़ों के बनाये तंत्र ने उनकी ज़बान को फिर देश पर लादे रखा । महात्मा गान्धी तो हे राम कहते हुये चले गये । उनके बाद फिर इंडिया का भारत पर क़ब्ज़ा हो गया । जैसा कि मैंने कहा कि 1960-70 के दशक में एक बार फिर भारत ने लड़ाई लड़ी तो इस तंत्र में एक दो रोशनदान बना कर भारतीय भाषाओं के बलबूते फिर अपनी ताक़त दिखाई । अब क़ायदे से हमला करने की बारी इंडिया की थी। उसने ठीक मौक़ा देख कर वार कर दिया।
संघ लोक सेवा आयोग 1960-70 में जो रोशनदान बन गये थे उनकी मरम्मत में जुट गया है , उनको बंद कर रहा है । उसने फऱमान जारी कर दिया कि अब भारतीय भाषाओं में परीक्षा नहीं दी जा सकेगी । तमिल , ओडिया , बंगला , पंजाबी इत्यादि भारतीय भाषाओं में परीक्षा देने की अनुमति तभी दी जायेगी यदि प्रत्याशी ने स्नातक स्तर तक अपनी पढ़ाई इन भाषाओं में की हो और उनकी संख्या भी एक निश्चित सीमा से कम नहीं होनी चाहिये । सामान्य तौर पर माना जाता है कि जब कोई निर्णय लिया जाता है तो उसको पुष्ट करने के लिये उसके पीछे कोई समझ आ जाने वाला तर्क होना चाहिये । लोक सेवा आयोग के इस निर्णय के पीछे भला क्या तर्क हो सकता है ? मान लीजिये , मैं ओडिया भाषी हूँ । मैंने अपनी सारी पढ़ाई लिखाई अंग्रेज़ी मीडियम से की है । लेकिन लोक सेवा आयोग की परीक्षा मैं ओडिया माध्यम से देना चाहता हूँ । लोक सेवा आयोग ने ओडिया भाषा में परीक्षा देने की व्यवस्था भी कर रखी है । अब आयोग को मेरे ओडिया माध्यम से परीक्षा देने में क्यों आपत्ति है ? सरकार के पास इस का उत्तर तो कोई नहीं है । यदि किसी प्रश्न का उत्तर न हो तो या तो प्रश्न मूर्खता पूर्ण हो सकता है या फिर षड्यंत्र का हिस्सा । आयोग मूर्खतापूर्ण निर्णय लेगा , यह कहना ठीक नहीं होगा । तो ज़ाहिर है सारी प्रक्रिया भारतीय भाषाओं के ख़िलाफ़ एक बड़े षड्यंत्र का हिस्सा ही है । आयोग के इस निर्णय में एक और पेंच है । आयोग अंग्रेज़ी माध्यम से पढ़े छात्र को ओडिया माध्यम से परीक्षा देने से रोकता है , लेकिन ओडिया माध्यम से पढ़े छात्र को अंग्रेज़ी माध्यम से परीक्षा देने पर रोक नहीं लगाता । यह दोहरा मापदंड क्यों ? भारतीय भाषाओं के दबाब के चलते पहले संघ ने अपनी परीक्षाओं में अंग्रेज़ी के पेपर को द्वार बैठे द्वारपाल की हैसियत दे दी थी । जब छात्र किसी तरह लड़ भिड़ कर इस बाधा को पार कर लेता था , तो अंदर सब के लिये खेल आसन बराबर का था । यहाँ भारतीय भाषाओं में पारंगत , भारत के प्रत्याशी , केवल अंग्रेज़ी ज़ुबान बोलने के बलबूते योग्यता का भ्रम पैदा किये इंडिया के प्रत्याशियों को धोबी पटका देने लगे तो हाहाकार मचना ही था । आयोग का वर्तमान निर्णय उसी हाहाकार का उत्तर है । लेकिन सरकार ने इस बार भी अपनी वही , अंग्रेज़ मालिकों से सीखी , रणनीति अपनाने का निर्णय किया । हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं को आपस में लड़ा दिया जाये ताकि अंग्रेज़ी का बर्चस्व बना रहे । आयोग ने परीक्षा देने के लिये अन्य भारतीय भाषाओं पर तो संख्या की शर्त लगा दी और हिन्दी को छोड़ दिया । सरकार की शैतानी साफ़ पकड़ में आ रही थी । जब अंग्रेज़ी की परीक्षा के अंक मेरिट में जोड़ दिये जायेंगे तो हिन्दी समेत सभी भारतीय भाषाएँ घायल होंगी । लेकिन परीक्षा के माध्यम बाले निर्णय से यह आभास मिलता था कि शायद हिन्दी के मुक़ाबले अन्य भारतीय भाषाओं से मतभेद किया जा रहा है । लेकिन इस बार भारतीय भाषाओं के पक्षधर सरकार की इस चाल में नहीं फँसे और सभी ने भारतीय भाषाओं के पक्ष में सम्मिलित आवाज़ उठाई और इसे हिन्दी बनाम अन्य भारतीय भाषाएँ मानने से इन्कार कर दिया अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने तो देश भर में इसका विरोधा किया।

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