राज्यसभा का चुनावी खेल , दांव पर कांग्रेस

प्रमोद भार्गवमध्य-प्रदेश में चल रहे शह और मात के खेल में भाजपा ने कांग्रेस को या कांग्रेस ने भाजपा को पछाड़ा, इसका अंतिम निर्णय राज्यसभा चुनाव के परिणाम आने के बाद ही होगा। तब तक प्रदेश में मुख्यमंत्री कमलनाथ की सरकार को अस्थिर बनाए रखने और राज्यसभा चुनाव के समीकरण बनाने व बिगाड़ने की कुटिल राणनीति में हर दिन नए मोड़ आते रहेंगे। कांग्रेस विधायक हरदीप सिंह डंग ने इस्तीफा दे दिया है। कांग्रेस के विधायक बिसाहूलाल सिंह, रघुराज सिंह कंसाना और डंग अभी भी भोपाल नहीं लौटे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान, नरोत्तम मिश्रा, संजय पाठक, अरविंद सिंह भदौरिया और विश्वास सारंग समेत दिल्ली में बैठे भाजपा नेताओं ने कुछ ऐसी रणनीति बनाई है कि कांग्रेस और अन्य दलों के 12 विधायक अपने पाले में लेकर राज्यसभा चुनाव में दो सीटें तो वह जीत ही ले और फिर कमलनाथ को सदन में बहुमत सिद्ध करने की चुनौती देकर सत्ता भी हथिया ले ? इस संकट से दो-चार हो रही कांग्रेस ने फिलहाल संकट टालने के लिए जल्द ही मंत्रीमण्डल के विस्तार का ऐलान कर दिया है, जिससे असंतुष्टों को साधकर सरकार को जीवनदान मिल जाए। पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने भाजपा पर राज्यसभा चुनाव और सरकार गिराने को लेकर कांग्रेस विधायकों की खरद-फरोक्त का आरोप लगाकर इस चर्चा को गरमा दिया था कि कांग्रेस के कुछ विधायकों समेत सरकार को समर्थन दे रहे सपा, बसपा और निर्दलीय विधायक भाजपा की शरण में हैं। इन्हें खरीदने के लिए 25 से 35 करोड़ रुपए का लालच दिया जा रहा है। बंधक बनाकर इस हाॅर्स ट्रेडिंग के आरोप से वे विधायक तिलमिला गए हैं, जिन पर ये आरोप लगे हैं। इन विधायकों ने जो बयान दिए हैं, उनमें भाजपा द्वारा खरीद-फरोख्त की कोशिश और बंधक बनाने की स्थिति को न केवल बेबुनियाद बताया, बल्कि यह प्रश्न भी खड़ा किया है कि दिग्विजय सिंह यह बताएं कि आखिर हमें बंधक बनाया किसने और मुठभेड़़ करके छुड़ाया किसने ?बसपा विधायक रामाबाई परिहार का कहना है कि मेरे साथ न तो कोई खरीद-फरोख्त की बात हुई और न ही हाथापाई हुई। इसी तरह बसपा के ही विधायक संजीव सिंह कुशवाह ने कहा कि हमें किसी ने बंधक नहीं बनाया और न ही दिल्ली में किसी भाजपा नेता से मुलाकात हुई। कांग्रेस के मंत्री हीरो बनने और कमलनाथ की नजरों में नंबर बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। सपा के राजेश शुक्ला ने कहा कि हम अपनी मर्जी के मालिक हैं। भाजपा के किसी नेता के संपर्क में नहीं हैं। एक तो हम सरकार को समर्थन दे रहे हैं, बावजूद हम पर शक किया जा रहा है। कांग्रेस के विधायक कमलेश जाटव ने अपनी मां के इलाज के लिए दिल्ली जाने का बहाना बनाया है। कांग्रेस के ही ऐंदल सिंह कंसाना, रणवीर जाटव और निर्दलीय विधायक सुरेंद्र सिंह शेरा ने भी पैसे देने की बात नकारने के साथ यह प्रश्न भी उठाया कि आखिर 35 करोड़ रुपए दे कौन रहा है ? इन नाराज विधायकों में रणवीर, कमलेश और रघुराज कंसाना, ज्योतिरादित्य सिंधिया के खेमे से हैं। इन विधायकों की नाराजगी से यह तय होता है कि ये विधायक मंत्री पद नहीं मिलने के साथ-साथ इस कारण भी नाराज हैं कि प्रदेश की राजनीति से आखिर सिंधिया को दूर क्यों रखा जा रहा है ? न तो उन्हें प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया और न ही अभी तक उनके नाम को राज्यसभा के लिए हरी झंडी दिखाई गई है। खासतौर से ग्वालियर-चंबल संभाग से जीतने वाले कांग्रेस के 26 विधायकों व मंत्रियों की गतिविधियों पर खुफिया नजर रखने के निर्देश पुलिस विभाग को कमलनाथ सरकार ने पहले ही दे दिए थे। लेकिन पुलिस इस हाॅर्स ट्रेडिंग की जासूसी करने से तो दूर रही, भनक भी नहीं लगा पाई। दिग्विजय सिंह के सूत्रों ने ही हाॅर्स ट्रेडिंग का खुलासा किया। जासूसी में नाकाम रहने की सजा पुलिस महानिदेशक वीके सिंह को हटाकर दे दी गई है। उनकी जगह अब वीके जौहरी ने ले ली है। इस पूरे घटनाक्रम में मजेदार बात यह भी है कि दिग्विजय सिंह के साथ जीतू पटवारी, तरुण भनोत और जयवर्धन सिंह तो इस मामले को सुलझाने और विधायकों को मनाने में लगे रहे, लेकिन सिंधिया की कहीं कोई भूमिका नजर नहीं आई। बावजूद सिंधिया यह मंशा रखते हैं कि प्रदेश अध्यक्ष नहीं बनने की स्थिति में उन्हें मध्य-प्रदेश के कोटे से राज्यसभा सदस्य बना दिया जाए। मध्य-प्रदेश में राज्यसभा के तीन सदस्य चुने जाने हैं। ऐसी उम्मीद है कि दो कांग्रेस के और एक भाजपा के खाते में जाएंगे। लेकिन हाॅर्स ट्रेडिंग की अफवाहों के बाद लग रहा है कि अब भाजपा के दो और कांग्रेस का एक राज्यसभा सदस्य बनेगा। इसमें राजनीति के चतुर खिलाड़ी दिग्विजय सिंह बाजी मार ले जा सकते हैं। चूंकि, सिंधिया जोड़-तोड़ की राजनीति के खिलाड़ी नहीं हैं, इसलिए वे प्रत्याशी बन भी जाते हैं तो भी जीत हासिल करना मुश्किल होगा ? वैसे भी दिग्विजय सिंह कूटनीति के बड़े खिलाड़ी हैं और दिग्विजय व कमलनाथ के पास विधायकों की संख्या भी अधिकतम है। सिंधिया के पास तो बमुश्किल डेढ़ दर्जन विधायक हैं। उनमें भी सवा साल की सरकार में ज्यादातर ने अपनी गरिमा खो दी है। यदि हरदीप सिंह डंग का इस्तीफा स्वीकार हो जाता है तो कांग्रेस के 113 विधायक ही रह जाएंगे। ऐसे में वर्तमान में 227 सदस्यों वाले सदन में भाजपा ने हाॅर्स ट्रेडिंग की जो रणनीति चली है, यदि वह फलीभूत होती है तो भाजपा राज्यसभा की दो सीटें जीतने में तो सफल होगी ही, सरकार गिराने में भी कालांतर में सफल हो सकती है ?

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