संसार को बनाने और पालन करने वाली सत्ता ईश्वर ही उपासनीय है

ओ३म्

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मनुष्य संसार में माता-पिता से एक शिशु के रूप में जन्म लेता है। वह पहली बार जब आंखे खोलता है तो शायद अपनी माता को अपनी आंखों के सम्मुख देखता है। माता के बाद वह अपने परिवार के अन्य सदस्यों यथा पिता व भाई-बहिनों सहित दादा व दादी आदि को देखता है। इसके बाद वह घर से बाहर निकलता है तो उसे ईश्वर का रचा वा बनाया हुआ संसार दृष्टिगोचर होता है। यह संसार ही परिवार सहित हमारे जीवन व सुख का आधार है। सृष्टि बनने के बाद आदि काल से यह क्रम चला आ रहा है। वैदिक गणनायें बताती हैं कि सृष्टि के आरम्भ में 1.96 अरब वर्ष पूर्व परमात्मा ने सृष्टि रचकर अमैथुनी सृष्टि में मनुष्य आदि प्राणियों को रचा था। तब से मनुष्य जन्म लेता आ रहा है। हम सब भी इस कल्प में सृष्टि के आरम्भ से अनेक योनियों में जन्म लेते आ रहे हैं। मनुष्य एक शिशु के रूप में जन्म लेता है, तदन्तर वह किशोर व युवावस्था को प्राप्त होता है। इसके बाद प्रौढ़ व वृद्धावस्था को प्राप्त होकर वह मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। मनुष्य पहले पुत्र व पुत्री बनते हैं, बाद में युवावस्था में यही माता-पिता बन जाते हैं। परमात्मा ने इन सब व्यवस्थाओं को बनाया है। इसका क्या प्रयोजन है इस पर भी एक दृष्टि डाल लेते हैं।

हमारा संसार तीन अनादि सत्ताओं से युक्त है। यह सत्तायें हैं ईश्वर, जीव तथा प्रकृति। ईश्वर एक है और वह सच्चिदानन्दस्वरूप, सर्वज्ञ, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अनादि, अनुपम, नित्य आदि असंख्य व अनन्त गुणों से युक्त है। जीवात्मा चेतन सत्ता है एवं यह अल्प परिणाम, ईश्वर से व्याप्य, अल्पज्ञ, एकदेशी, ससीम, अजर, अमर, अच्छेद्य, वेदज्ञान से युक्त होकर ईश्वर, आत्मा व सृष्टि को जानने में समर्थ होता है। साधना व उपासना आदि कर्मों को करके यह सत्य व असत्य के भेद को जानने में सफल हो जाता है। ईश्वर व आत्मा का प्रत्यक्ष भी मनुष्यों को साधना व उपासना से होता है। ईश्वर का प्रत्यक्ष हो जाने पर मनुष्य की जीवन-मुक्त अवस्था होती है। वह अपना शेष जीवन सत्कर्मों को करते हुए मृत्यु आने पर मोक्ष को प्राप्त होकर जन्म-मरण के चक्र से सुदीर्घकाल तक के लिये अवकाश प्राप्त कर लेता है। यह स्थिति लाखों व करोड़ों मनुष्यों में शायद ही किसी को प्राप्त होती है। मोक्ष प्राप्ति में केवल जीवात्मा व मनुष्य की योग्यता आधार बनती है। ईश्वर के सम्मुख किसी जीवात्मा, मनुष्य, मत-मतान्तर के संस्थापक या आचार्य या किसी मत के अनुयायी का पक्षपात नहीं होता। ईश्वर पक्षपात रहित है। सभी जीवात्मायें उसके लिये अपने पुत्र, पुत्री, बन्धु व सखा तथा मित्रों के समान हैं। जीवों को सुख व समाधि की अवस्था शुभकर्मों सहित स्वाध्याय, ईश-चिन्तन, उपासना, योगाभ्यास, त्यागपूर्ण जीवन व्यतीत करते हुए प्राप्त होती है। मृत्यु पर्यन्त समाधि सुलभ होने तथा जीवन-मुक्त अवस्था व्यतीत करने वाले साधकों को ही पूर्णानन्द से युक्त मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस अज्ञान व दुःख रहित मोक्ष की प्राप्ति के लिये ही सभी साधु, सन्यासी, योगी, ज्ञानी, मुमुक्षु, ऋषि, परिव्राजक, साधक व उपासक प्रयत्न करते हैं। जीवात्माओं को सुख व मोक्ष प्रदान करने के लिये ही ईश्वर ने इस संसार को बनाया है और वह अनादि काल से इसका पालन करते हुए सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति व प्रलय करता चला आ रहा है। यह क्रम कभी समाप्त नहीं होगा। संसार में मनुष्य मुक्ति को प्राप्त होते रहते हैं और मुक्त जीव मोक्ष की अवधि समाप्त होने पर मोक्ष से लौटकर पुनः जन्म व मरण के चक्र व बन्धन में आते रहते हैं। मोक्ष में जाने वाले जीवों व लौटने वाले जीवों की संख्या कम होती है। मोक्ष में वही जीवात्मायें जाती हैं जिनका ज्ञान व कर्म एवं जिनका पुरुषार्थ, साधना, उपासना, सत्कर्म तथा आत्मा की पवित्रता आदि गुण उत्तम कोटि के होते हैं।

हमें मनुष्य जन्म परमात्मा ने दिया है। उसी ने हमें हमारे माता-पिता प्रदान करने सहित हमें समस्त पारिवारिक-जन, देश, समाज एवं मित्र व संबंधी आदि भी प्रदान किये हैं। ईश्वर की इन कृपाओं के कारण हम उसके ऋणी एवं आभारी हैं। परमात्मा से हमें जो मिला है उसके लिये हमारे भी ईश्वर के प्रति कुछ कर्तव्य हैं। वह क्या हैं, इसे हम वेद व ऋषियों के ग्रन्थों का अध्ययन कर जान सकते हैं। यह अत्यन्त सरल है परन्तु अभ्यास से ही इसमें प्रवृत्ति उत्पन्न होती है। बहुत से लोग प्रयत्न करने पर भी लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाते। हम संसार में जिस मनुष्य के ऋणी होते हैं, उसका वह ऋण लौटा कर उससे उऋण हो जाते हैं। परमात्मा से हमें जो पदार्थ प्राप्त हुए हंै, उसकी न तो परमात्मा को आवश्यकता है और न ही हम उस रूप में परमात्मा को उसका ऋण लौटा सकते हैं। हम परमात्मा के पुत्र व पुत्रियां हैं और वह हमारा पिता है। माता-पिता अपनी सन्तानों को जो भौतिक पदार्थ व धन आदि देते हैं उसे सन्तानों को लौटाने की आवश्यकता नहीं होती। माता-पिता ने हमें जन्म देकर हमारा जो पालन पोषण किया होता है तथा हमें शिक्षा प्रदान की होती है वह भी उनका सन्तानों पर ऋण होता है। इस ऋण को पितृ यज्ञ करके लौटाया जाता है।

पितृयज्ञ का अर्थ है माता-पिता की श्रद्धा भक्ति से सेवा करना। उनकी आवश्यकता की वस्तुयें उन्हें प्रदान करना। उन्हें भोजन व वस्त्र सहित धन आदि देना जिससे उनकी भावनाओं व विचारों को कहीं ठेस न लगे और वह सुखपूर्वक अपना जीवन व्यतीत कर सके। यदि हम अपने कर्तव्य पालन करते हुए अपने माता-पिता को पूर्ण सन्तुष्ट रख पाते हैं तो यही हमारा उनके ऋणों के प्रति उऋण होने का साधन व तरीका है। परमात्मा के प्रति भी हमें उसके गुणों की स्तुति कर उसकी प्रशंसा करनी चाहिये। उसके गुणों का वर्णन करने व उसके गुणों के अनुरूप भक्ति के गीत गाने से उन गुणों का हमारी आत्मा पर संस्कार बनता है जिससे हमारे दुर्गुण व अविद्या दूर होकर हमारे भीतर गुणों की वृद्धि होती है। हम ईश्वर की उपासना, भक्ति, अर्चना, प्रार्थना, उसका गुणानुवाद कर तथा ईश्वर के गुणों को बोलकर एवं उन्हें धारण कर अपने जीवन को ऊंचा उठा सकते हैं। परमात्मा की वेदाज्ञा के अनुसार जीवन जीने से परमात्मा प्रसन्न होते हैं और हमें इसके अतिरिक्त परमात्मा को उनके ऋण से उऋण होने के लिये अन्य कोई वस्तु आदि भेंट नहीं करनी पड़ती।

हमें वेदों का ध्यानपूर्वक अध्ययन करना चाहिये। हमारे ऋषियों ने प्रतिदिन वेदों के स्वाध्याय का विधान किया है। हमें इसका पालन करना चाहिये। ऐसा करने से हमारे ज्ञान में वृद्धि होती जायेगी, हमारा आचरण सुधरता जायेगा और हम ईश्वर के गुणों को जानकर व उसकी स्तुति व प्रार्थना से उसकी निकटता को प्राप्त होकर दुःखों से दूर होकर सुखों से पूरित व आनन्द से युक्त होते जायेंगे। उपासना करते हुए हमें योगदर्शन का अध्ययन कर उसके अनुसार अभ्यास करने का प्रयत्न करना चाहिये। इससे हमारी आत्मा, मन व बुद्धि उन्नति को प्राप्त होगी और हम समाधि अवस्था को प्राप्त होकर ईश्वर का साक्षात्कार कर सकते हैं। यही मनुष्य के जीवन का लक्ष्य होता है। इस लक्ष्य को प्राप्त कर मनुष्य व उसकी आत्मा मोक्ष की अधिकारी हो जाती है। मोक्ष में आत्मा 31 नील 10 खरब वर्षों तक रहकर ईश्वर के सान्निध्य से आनन्द का भोग करती है। उसे किसी प्रकार का कोई दुःख व क्लेश नहीं होता। समाधि की यह अवस्था संसार में बहुत कम लोगों को प्राप्त होती है। समाधि का अभ्यास करने से हमारी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति में भी किसी प्रकार की बाधा नहीं आती। हम उसके लिये भी सात्विक साधनों द्वारा धनोपार्जन कर सकते हैं और सुखी व समृद्धि से युक्त जीवन व्यतीत कर सकते हैं।

परमात्मा ने हमारे लिये यह संसार बनाया है और हमें मनुष्य जन्म देकर हमारी आवश्यकता की सभी वस्तुयें हमें प्रदान की हैं। हमें ईश्वर के ऋणों के लिये उसकी स्तुति, प्रार्थना व उपासना करनी है। इसका उल्लेख हम ऊपर की पंक्तियों में कर चुके हैं। हम यह भी कहेंगे कि ज्ञान व कर्म की दृष्टि से साधारणों मनुष्य को सत्यार्थप्रकाश का अध्ययन करना चाहिये। यह ग्रन्थ हिन्दी में लिखा गया है। इसके अनेक भाषाओं में अनुवाद भी उपलब्ध हैं। इस ग्रन्थ को पढ़ने से मनुष्य की अविद्या दूर हो जाती है। वह सृष्टि के सभी रहस्यों से परिचित हो जाता है। उसके अपने कर्तव्यों का बोध भी इसके अध्ययन से होता है। वेदों का सार सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ को कहा जा सकता है। वेद संस्कृत में होने के कारण व उसका व्याकरण वर्तमान समय में अधिक प्रचलित न होने के कारण हिन्दी भाषी लोगों के लिये सत्यार्थप्रकाश एक वरदान है। विगत 145 वर्षों में जिन लोगों ने भी सत्यार्थप्रकाश का अध्ययन किया है उन्होंने इस ग्रन्थ को अतीव महत्वपूर्ण पाया है। सत्यार्थप्रकाश में उपनिषद एवं दर्शनों की भी प्रमुख बातों व मान्यताओं का समावेश है। इसके साथ ही सत्यार्थप्रकाश में अवैदिक मत-मतान्तरों की समीक्षा है। इस समीक्षा को पढ़ कर सभी सम्प्रदायों के लोगों को सभी मतों की अविद्या का परिचय मिलता है। सत्यार्थप्रकाश को विश्वधर्मकोष भी कह सकते हैं। इस एक ग्रन्थ से वैदिक सिद्धान्तों व मान्यताओं का परिचय होने सहित संसार में प्रचलित सभी मत-मतान्तरों का ज्ञान भी पाठक व अध्येता को हो जाता है। अतः सभी मनुष्यों को जीवन में न केवल एक बार अपितु कई बार इस ग्रन्थ का अध्ययन करना चाहिये। मनीषी गुरुदत्त विद्यार्थी जी ने लगभग 18 बार इस ग्रन्थ का अध्ययन किया था। उन्होंने अपने समय में एक प्रकार की धार्मिक क्रान्ति की थी। विेदेशी विद्वानों की वेद-विषयक पक्षपातपूर्ण व अज्ञानता के प्रभाव से युक्त मान्यताओं का पं. गुरुदत्त जी ने अपनी समीक्षा व लेखों से समाधान किया था। पं. गुरुदत्त जी ने विदेशी विचारकों के सभी आक्षेपों का सप्रमाणा उत्तर दिया था। यह उपलब्धि पं. गुरुदत्त विद्यार्थीजी को अन्य शास्त्रीय ग्रन्थों के अध्ययन के साथ मुख्य रूप से सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ का अध्ययन करने से प्राप्त हुई थी।

परमात्मा का हम सब पर जो ऋण हैं उसे हम चुका नहीं सकते। हम सबको उसकी वैदिक विधि से स्तुति, प्रार्थना व उपासना करनी चाहिये। इससे हमारा निःसन्देह कल्याण होगा। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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