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धर्म-अध्यात्म

मनुष्य वा जीवात्मा का जन्म मरण एवं मोक्ष

ओ३म्
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संसार में तीन पदार्थ सत्य हैं। इसका अर्थ यह है कि संसार में तीन पदार्थों की सत्ता है। यह तीन पदार्थ अनादि, नित्य, अविनाशी तथा अमर हैं। यह पदार्थ सदा से इस जगत में हैं और अनन्त काल तक रहने वाले हैं। यह तीन पदार्थ हैं ईश्वर, जीवात्मा और प्रकृति। ईश्वर व जीवात्मा दोनों अनादि, नित्य तथा चेतन पदार्थ हैं और प्रकृति अनादि, नित्य तो है परन्तु चेतन न होकर जड़ पदार्थ है। चेतन सत्ता में ज्ञान व कर्म करने की शक्ति, सामर्थ्य व गुण निहित होते हैं। ईश्वर ज्ञान की दृष्टि से सर्वज्ञ अर्थात् पूर्ण ज्ञानी वा सब कुछ जानने वाला है। वह कर्म की दृष्टि से सर्वशक्तिमान है। परमात्मा हर सम्भव कार्य को करने की सामथ्र्य रखता है। ईश्वर सर्वव्यापक भी है। ईश्वर के सभी गुणों का ज्ञान मनुष्यों को सृष्टि के आदि काल में ही वेद के आधार पर हुआ है। वर्तमान समय में भी ईश्वर के यथार्थ गुणों का ज्ञान सृष्टि में व्यवहारिक रूप में दृष्टिगोचर होता है।

ईश्वर इस जड़ सूक्ष्म त्रिगुणात्मक सत्व, रज व तम गुणों वाली प्रकृति से ही जीवों के लिये जगत के सूर्य, चन्द्र, पृथिवी आदि अनेकानेक, असंख्य व अनन्त संख्या वाले लोक लोकान्तरों से युक्त ब्रह्माण्ड की रचना करते हैं। लोक-लोकान्तर का अर्थ होता है कि जहां लोक व मनुष्य आदि प्राणी रहते हैं। जीवात्मा ईश्वर की तरह व्यापक न होकर एकदेशी एवं सूक्ष्म चेतन सत्ता है। एकदेशी एवं ससीम होने से जीवात्मा अल्पज्ञ है। यह ईश्वर से तथा अपनी आत्मा की मननशीलता के धर्म व गुण से सृष्टि के पदार्थों के ज्ञान को प्राप्त करने के कार्य में प्रवृत्त होकर उन्हें जानने में कुछ-कुछ व अधिकांशतः समर्थ होती है। एकदेशी व ससीम होने के कारण जीवात्मा की शक्ति अल्प व न्यून होती है। यह मनुष्य योनि में जन्म लेकर उसके लिये सम्भव पौरुषेय रचनायें तो कर सकती है परन्तु ईश्वर के समान अपौरुषेय रचनायें अर्थात् सूर्य, चन्द्र, पृथिवी आदि को नहीं बना सकती। जीवात्मा जन्म, मृत्यु एवं मोक्ष के लिये परमात्मा पर निर्भर रहती है। परमात्मा धार्मिक स्वभाव वाली सत्ता है। यह अपनी दयालुता एवं कृपालु स्वभाव सहित पक्षपात रहित तथा न्यायकारी न्यायाधीश के गुणों से युक्त होने के कारण से सभी जीवों को उनके पूर्व कृत कर्मों के अनुसार नाना योनियों में जन्म देता है। जन्म लेने वाले जीवात्माओं के भोजन व जीवन निर्वाह के लिये परमात्मा आवश्यक मात्रा में सभी पदार्थ उपलब्ध कराता है। जीवात्मा मनुष्य योनि में कर्म करते और भोगते भी हैं जबकि मनुष्य से इतर सभी योनियां केवल भोग योनियां होती हैं जहां रहकर जीवात्मा अपने पूर्व किये हुए पाप व पुण्य कर्मों का भोग करती है और भोग समाप्त हो जाने पर उन्हें पुनः मनुष्य योनि में जन्म मिलता है। मनुष्य जन्म में कोई भी आत्मा वेदाध्ययन एवं मननशीलता के अपने गुण से अपना ज्ञान बढ़ाकर और ईश्वर की उपासना आदि के द्वारा सद्कर्मों को करते हुए पुनः मनुष्य योनि में जन्म लेने की अर्हता को प्राप्त होकर मनुष्य योनि में जन्म प्राप्त करती हैं और वेद के अनुसार जीवन व्यतीत करते हुए ईश्वर साक्षात्कार कर मोक्ष प्राप्ति करने में भी समर्थ होती हैं। मनुष्य योनि एक प्रकार से सभी दुःखों से मुक्त होने का मार्ग हैं। सृष्टि के आदि काल से सहस्रों लोगों ने मुक्ति प्राप्ति के लिये साधनायें की हैं और इनमें से अनेक आत्माओं को मुक्ति प्राप्त होने का अनुमान है।

जीवात्मा एक चेतन सत्ता है। यह एकदेशी, अल्पज्ञ, ससीम, आकार रहित, अनादि, नित्य, अनुत्पन्न, अविनाशी, अमर, जन्म-मरण धर्मा, सुख व दुःखों का भोक्ता, बन्धन एवं मोक्ष के मध्य विचरण करने वाला, शुभ व अशुभ कर्मों का कर्ता एवं अजर होने सहित यह अग्नि, जल व वायु से अप्रभावी रहने वाली सत्ता व पदार्थ है। तलवार व शस्त्रों से इसका छेदन व भेदन नहीं होता। जीवात्मायें संसार में संख्या की दृष्टि से अनन्त हैं जबकि ईश्वर केवल एक है। ईश्वर एक से अधिक दो या तीन व अधिक नहीं हैं जबकि जीवात्माओं की संख्या अनन्त हैं। जीवात्मा जन्म व मरण धर्मा हंै। जीवात्मा के पास हमेशा अभुक्त पाप-पुण्य कर्मों की पूंजी होती है। यही कर्म उसके भावी जन्म का कारण होते हैं। मनुष्य को जन्म परमात्मा देता है। वह जीवात्मा के प्रत्येक कर्म का साक्षी होता है। जीवात्मा का ऐसा कोई कर्म नहीं होता जो ईश्वर को विदित व स्मरण न हो। जीवात्मा जिस योनि में भी होता है ईश्वर को उसके पाप व पुण्य कर्मों का ज्ञान रहता है। जब मनुष्य के पाप पुण्य कर्म संख्या में समान एवं पुण्य अधिक होते हैं तब जीवात्मा को मनुष्य का जन्म होता है अन्यथा जीवात्मा कर्मानुसार पशु, पक्षी, कीट, पतंग आदि नीच योनियों में जन्म लेता है। मनुष्येतर सभी योनियां केवल भोग योनियां होती हैं। वहां जीवात्मा अपने विवेक से पाप-पुण्य नहीं कर सकता। उसके पास बुद्धि नहीं होती। इस कारण वह केवल अपने पूर्वजन्म व जन्मों के कर्मों का भोग करता है।

मनुष्य जीवन में मनुष्य के पास बुद्धि एवं ज्ञान होता है। वह सत्य व असत्य तथा पाप व पुण्य कर्मों में भेद कर सकता है और अपने विवेक व हित अहित के अनुसार सत्यासत्य कर्मों को करता है। इस कारण वह कर्म फल के बन्धनों में फंस जाता है। यदि मनुष्य योनि में जीवात्मा ने पाप अधिक किये हैं तो उसे नीच योनियों में जन्म लेकर दुःखों का भोग करना होता है और यदि पुण्य कर्म अधिक होते हैं तो उसे सुखों की प्राप्ति के लिये मनुष्य जन्म मिलते हैं। यह क्रम अनादि काल से चला आ रहा है और अनन्त काल तक इसी प्रकार से चलता रहेगा। विचार करने पर ज्ञात होता है कि सभी जीव अनन्त बार मनुष्य व अन्य सभी योनियां जो हम संसार में देखते हैं, उनमें आ जा चुके हैं तथा अनेकानेक बार मुक्ति में जाकर मोक्ष के सुख का भी भोग कर चुके हैं। यह आवागमन का सिलसिला अनादि काल से चल रहा है और इसी प्रकार चलता रहेगा। इसका अन्त कभी नहीं होगा। हमारी यह सृष्टि भी रचना, पालन व प्रलय अवस्थाओं वाली है। परमात्मा सृष्टि को बनाते हैं, सृष्टि की अवधि 4.32 अरब तक इसका पालन करते हैं और इसके बाद इसकी प्रलय कर देते हैं। प्रलय को परमात्मा की रात्रि का कहा जाता है जो कि 4.32 अरब वर्षों की होती है। यह ज्ञान न वैज्ञानिकों के पास है न किसी मत-मतान्तर के पास। यह ज्ञान केवल और केवल वैदिक धर्मियों के पास ही है। इसी कारण से वेद संसार के महानतम धर्म ग्रन्थ हैं। वेद संसार के सभी मनुष्यों की महानतम सम्पत्ति है। जिन मनुष्यों ने वेदों के ज्ञान को ग्रहण कर अपना जीवन बनाया, वह मनुष्य धन्य होता है।

मनुष्य जन्म पूर्व जन्म के कर्मों का भोग करने तथा नये शुभ कर्मों को करने के लिये प्राप्त होता है परन्तु देखा जाता है कि मनुष्य वेद ज्ञान की प्राप्ति के लिये पुरुषार्थ नहीं करते और मत-मतान्तरों के चक्र में फंस कर ज्ञानविहीन मनुष्य का सा जीवन व्यतीत करते हैं। ऐसा करने से मनुष्य का जन्म लेना व्यर्थ हो जाता है। मनुष्य को जन्म लेकर वेद ज्ञान को प्राप्त होकर ईश्वर उपासना तथा परोपकार आदि के श्रेष्ठ कर्मों को करना था। मत-मतान्तर के लोग इससे वंचित हो जाते हैं और दुःखों से मुक्त होने के स्थान पर वेदविरुद्ध पाप कर्मों को करने से वह पुनः पुनः अनेक जन्मों के लिये पशु आदि नीच योनियों में पाप रूपी कर्मों का दुःख भोगने के लिये बन्धन में फंस जाते हैं। मनुष्य जन्म में दुःखों से मुक्त होने के साधन व उपाय न करने के कारण उनका जीवन लाभप्रद नहीं होता। विज्ञ मनुष्य वेदज्ञान को प्राप्त होकर पंचमहायज्ञों का अनुष्ठान सहित वैदिक ग्रन्थों का स्वाध्याय, सद्कर्म, परोपकारादि सहित ईश्वर की उपासना व अग्निहोत्र आदि यज्ञों को कर आत्मा की उन्नति करते व मोक्ष के अधिकारी बनते हैं। यही कारण है ऋषि दयानन्द द्वारा इन रहस्यों का वर्णन करने के बाद से उनके अनुयायी वैदिक धर्मी आर्यसमाजी पंच महायज्ञों सहित वेदों का स्वाध्याय, वेद प्रचार, अन्धविश्वास तथा मिथ्या परम्पराओं के निवार के साथ वृहद अग्निहोत्र यज्ञों का अनुष्ठान करते हुए आत्मा को उन्नत कर मोक्ष को प्राप्त हो जाते हैं। सभी मनुष्यों को इससे शिक्षा लेकर अपनी आत्मा व जीवन की उन्नति के कार्य करने चाहियें।

हमें अपने जीवन को महान बनाने के लिये ऋषि दयानन्द सहित स्वामी विरजानन्द, स्वामी श्रद्धानन्द, पं. लेखराम, पं. गुरुदत्त विद्यार्थी, महात्मा हंसराज, स्वामी दर्शनानन्द सरस्वती, महात्मा नारायण स्वामी, स्वामी स्वतन्त्रानन्द जी, स्वामी सर्वदानन्द, आचार्य पं. ब्रह्मदत्त जिज्ञासु जी, स्वामी विद्यानन्द सरस्वती, आचार्य रामनाथ वेदालंकार, आचार्य पं. चमूपति आदि महापुरुषों के जीवन चरित्रों को पढ़ना चाहिये। इन महापुरुषों ने अपना जीवन वेदाज्ञा पालन करते हुए व्यतीत किया था। इनके जीवन का अध्ययन करने पर हमें भी अपना जीवन श्रेष्ठ व उच्च बनाने की प्रेरणा प्राप्त होती है। इन महापुरुषों के साथ ही हमें मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम तथा योगेश्वर श्री कृष्ण सहित आचार्य चाणक्य, सरदार पटेल, नेताजी सुभाषचन्द्र बोस, वीर विनायक दामोदर सावरकर, पं. राम प्रसाद बिस्मिल एवं शहीद भगतसिंह आदि क्रान्तिकारियों के जीवन चरित्रों को भी पढ़ना चाहिये। इससे हम साधारण से असाधारण तथा पापों का त्याग कर साधु-संन्यासियों की तरह जीवनयापन कर अपने जीवन को महान बना सकते हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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