विश्व में शांति एवं कल्याण के लिए एक सत्य विचारधारा का प्रचार आवश्यक

ओ३म्
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विश्व में अशान्ति, हिंसा, भेदभाव, अज्ञान, अविद्या, अन्धविश्वास, अनेकानेक अनावश्यक सामाजिक परम्पराओं आदि के कारणों पर विचार करें तो विश्व में अनेक परस्पर विरोधी विचारधाराओं वाले मतों और उनके अनुयायियों द्वारा अपनी सत्यासत्य मिश्रित विचारधारा को सबसे मनवानें के लिये किया जाने वाला प्रचार व अनुचित साधन ही विश्व में अशान्ति के प्रमुख कारण प्रतीत होते हैं। ऋषि दयानन्द सम्पूर्ण वेद सहित ईश्वर व आत्मा विषयक यथार्थ ज्ञान रखते थे। उनसे एक बार पूछा गया कि विश्व का पूर्ण हित कब होगा? उन्होंने कुछ क्षण सोचा और फिर उत्तर दिया कि जब पूरे विश्व में सत्य को प्रतिष्ठित किया जायेगा, असत्य विचारों व मान्यताओं का प्रचार व प्रचलन बन्द होगा, सबके सत्य पर आधारित एक समान भाव, विचार होंगे, सब परस्पर, मित्रता, प्रेम, एक दूसरे को अपना समझना व उनकी उन्नति व कल्याण के लिये कार्य करने जैसी भावनाओं से युक्त होंगे, तभी इस विश्व का पूर्ण उपकार एवं कल्याण हो सकता है। तभी सर्वत्र सुख, शान्ति व कल्याण होगा। आज इस बात पर विचार करते हैं तो ऋषि द्वारा बताये गये समाधान को समस्या का सही निदान पाते हैं। समान विचारों के लोगों में मित्रता व प्रेमभाव होता है और पृथक-पृथक विचारों के लोगों में परस्पर तनाव, विरोध, भेदभाव, अन्याय, शोषण, एक दूसरे से अपनी विचारधारा व मान्यताओं को सहमत कराने के लिये प्रयत्न आदि को देखा जाता है। अतः आवश्यकता इस बात की है कि देश व समाज के योग्य विद्वान आचार्य ऐसे सभी लोगों को सत्य उपदेश कर उनकी अविद्या को दूर कर दें और उन्हें सत्य को स्वीकार करने और असत्य को छोड़ने की प्रेरणा करें।

विद्या व सत्य के प्रचार से ही सभी विवाद, समस्यायें, लड़ाई-झगड़ें समाप्त होकर परस्पर प्रेम हो सकता है। सृष्टि के आरम्भ से महाभारत युद्ध तक के 1.96 अरब वर्षों के काल में देखते हैं कि संसार में सत्य पर आधारित वेद मत व वेद की शिक्षायें ही प्रचलित थी। पूरे विश्व में ईश्वर व आत्मा के स्वरूप, उसकी उपासना, परम्पराओं व संस्कृति में अन्तर व भेदभाव नहीं था। इसी कारण पूरे विश्व में सुख व समृद्धि थी। महाभारत युद्ध तक वेदों का सत्य रूप प्रकाशित होने के कारण अनेकानेक बड़े बड़े बुद्धिमानों व विद्वानों के होते हुए भी किसी ने कोई नया मत नहीं चलाया। सब वेदों व ऋषियों के बनाये वेदानुकूल ग्रन्थों में विश्वास रखते थे तथा विद्वानों का सभी लोग समान रूप से आदर करते थे। यह नहीं था कि यह ईसाई मत का, यह हिन्दू मत का, यह सिख मत का विद्वान है, उन्हीं उन्हीं मत के विद्वान उनका आदर करेंगे अन्य नहीं। आजकल हम कल्पना भी नहीं कर सकते कि कोई व्यक्ति किसी दूसरे मत के आचार्य व अनुयायियों का जो गुण, कर्म व स्वभाव में उनसे श्रेष्ठ व उत्तम हो, उसकी प्रशंसा व आदर करें। सब अपने अपने मत के आचार्य व लोगों का, चाहें वह ज्ञानी हों या न हों, उनका ही आदर सत्कार करते प्रतीत होते हैं और दूसरें मत के लोगों व आचार्यों के प्रति उनके मनों में कुछ न कुछ भीतर ही भीतर अप्रत्यक्ष रूप से एक विरोधी व उनसे निम्नतर होने की भावना होती है। ऐसे विचार अविद्या पर आधारित होते हैं और यह संघर्ष को आमंत्रित करते हैं। इन्हें केवल सत्य व विद्या के प्रचार से नियंत्रित व दूर किया जा सकता है।

समस्त विश्व वर्तमान में किसी न किसी मत के प्रभाव में है। कहीं किसी देश में किसी एक मत का प्रभाव है तो दूसरे देश में किसी अन्य मत का। कुछ ऐसे भी देश हैं जो नास्तिक विचारों के हैं। इन्हीं को साम्यवादी विचारों वाले लोग कहते हैं। समस्त संसार ईश्वर को मानने वाले और ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकार न करने वाले दो प्रकार के विचारों के लोगों में बंटा हुआ है। जो लोग ईश्वर को मानते हैं वह इस प्रश्न पर विचार नहीं करते कि सभी ईश्वर को मानने वाले मतों के ईश्वर विषयक विचारों में समानता क्यों नहीं है? इस विषय पर मत-मतान्तरों के विद्वानों व आचार्यों द्वारा किसी प्रकार का अनुसंधान व प्रयत्न नहीं किया जाता। जो जिस मत की पुस्तक में मध्यकाल व उसके आसपास लिखा जा चुका है, उनके लिये वही सत्य है। सभी आस्तिक मतों के अनुयायी व आचार्य अपने मत की पुस्तक के अनुसार ही ईश्वर को मानते हैं। उपासना पद्धतियों में भी आस्तिक मतों के अनुयायियों में अन्तर देखा जाता है। उपासना पद्धतियों पर भी उनके अनुयायी विचार नहीं करते कि जिस उद्देश्य को लेकर उपासना की जाती है वह पूर्ण होता है अथवा नहीं? उपासना ईश्वर को प्राप्त करने के लिए की जाती है। इस प्रश्न पर भी विचार नहीं किया जाता कि उपासना करने पर भी ईश्वर क्यों प्राप्त नहीं होता? ईश्वर संसार में सर्वव्यापक सत्ता है। ईश्वर को तर्क व युक्तियों से सिद्ध किया जा सकता है। ऋषि दयानन्द ने अपने ग्रन्थों में ईश्वर के सत्यस्वरूप एवं गुण, कर्म व स्वभावों का परिचय कराया है। सभी वेदेतर आचार्य वेदों के ईश्वर विषयक सत्य ज्ञान से बचते हैं और अंधविश्वासों का प्रचार करते हैं। कुछ मत-मतान्तरों में यह प्रवृत्ति भी पाई जाती है कि वह अपने मत के अनुयायियों की संख्या बढ़ाने के लिये छल, कपट, लोभ, बल का प्रयोग करते हुए सामान्य मनुष्य की अज्ञानता का लाभ उठाते हैं। उन्हें अपने अनुयायियों व अन्य मनुष्यों के दीर्घकालिक हितों व कल्याण से लेना देना नहीं होता अपितु येन केन प्रकारेण अपने मत की संख्या बढ़ाना ही उद्देश्य होता है। इसके उदाहरण की आवश्यकता नहीं है। इसे समाज में देखा जा सकता है। हम देख सकते हैं कि किसी एक मत की आज से एक हजार वर्ष पहले अनुयायियों की संख्या कितनी व किस अनुपात में थी और आज वह कितनी व किस अनुपात में है। इससे उनकी जनसंख्या में वृद्धि से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि उन्होंने इस लक्ष्य को कैसे पाया है।

देश का हिन्दू जिसका पूर्ववर्ती नाम आर्य रहा है, ऐसा प्राणी, मत व सम्प्रदाय है जो विगत कुछ हजार वर्षों से अपने ही निर्णयों व परम्पराओं आदि से अपने लोगों की संख्या को निरन्तर घटाता जा रहा है। उस पर संकट के बादल छा रहे हैं परन्तु वह गहरी नींद सो रहा है। विगत कुछ वर्षों में उसकी इस उदासीनता, अविद्यायुक्त परम्पराओं व असंगठन आदि की भावना से देश का विभाजन हुआ, अनेक नये देश उसी के नागरिकों से टूट कर बन गये, पुनः पाकिस्तान बनने से पूर्व की स्थितियां विद्यमान हो रही हैं, परन्तु फिर भी वह जागना नहीं चाहता। इस विषय पर अधिक विस्तार से कहना उचित नहीं। हिन्दू आज भी अपनी अविद्या, अन्धविश्वासों तथा समाजिक बुराईयों पर विचार नहीं करते और विधर्मियों से निरन्तर हानि पहुंचने पर भी सुधर नहीं रहे है। कुछ बन्धु हैं जो आसन्न संकटों को जानकर हिन्दुओं के हित की बातें करते हैं परन्तु हिन्दुओं पर इसका कोई प्रभाव देखने में नहीं आता। सब कुछ ईश्वर के भरोसे है। जब सोमनाथ मन्दिर टूटा तब भी हम ईश्वर के भरोसे थे। हमारे लोग मारे गये, मन्दिर की अथाह सम्पत्ति को शत्रुओं व दरिन्दों ने लूटा, माताओं व बहिनों को अपमानित किया, उनको नग्न कर जलूस निकाले गये और उनको दो-दो आने में गजनी के बाजारों में बेचा गया परन्तु हम फिर भी सोते रहे। अयोध्या का राम मन्दिर टूटा, काशी का विश्वनाथ मन्दिर भी टूटा, कृष्ण जन्म भूमि का मन्दिर तोड़ा गया और इन पर विधर्मियों ने कब्जा किया परन्तु हम फिर भी सोते रहे। मन्दिर टूटने की हजारों घटनाओं ने भी हमें अपने अन्धविश्वास दूर करने और संगठित होने की प्रेरणा नहीं की। अतः इस जाति के विषय में कुछ कहा नहीं जा सकता कि इसका भविष्य क्या होगा? इसके अपने ही तथाकथित बुद्धिजीवी अपनी अज्ञानता व किन्हीं स्वार्थों के कारण इस जाति को कमजोर करने के उपाय करते रहते हैं। यह स्थिति निराशाजनक है। इससे बाहर निकालने के प्रयत्न जाति के हित-साधकों व ईश्वर के सच्चे भक्त विद्वानों द्वारा निरन्तर किये जाते रहने चाहियें।

सत्य एक होता है। धर्म तो कर्तव्य पालन व सत्य के आचरण को ही कहा जाता है। धर्म का किसी मनुष्य, व्यक्ति, आचार्य आदि से विशेष लेना देना नहीं है। धर्म का एक अर्थ ईश्वर को जानना व इसकी आज्ञाओं का पालन करना है। मनुष्य अल्पज्ञ होता है। उसे धर्म विषयक जो विद्वान सत्य मार्ग दिखाता है वह सम्मानीय होता है। मनुष्य का जन्म भी सत्य के अनुसंधान व उसके आचरण के लिये ही होता है। सत्य के अनुसंधान का यह कार्य सभी मनुष्यों को समान रूप से करना चाहिये। इस कार्य में बाधक कौन है? इसका उत्तर यही मिलता है कि मत-मतान्तरों के वह आचार्य जो बिना सत्यासत्य का विचार किये अपने-अपने मत के प्रति तीव्र समर्पण की भावना रखते हंै और दूसरों को ऐसा करने के लिये बाध्य करते हैं। यदि ऐसा ही चलता रहा तो भविष्य में संसार में तथा समाज में सुख शान्ति नहीं आ सकती। आर्यसमाज पर दृष्टि डालते हैं तो यह दृष्टिगोचर होता है कि उसने भी सब मतों से असत्य को छोड़ने और सत्य को स्वीकार कराने के लिये अपने प्रयत्न करने के कार्य को प्रायः छोड़ दिया है। वह अपने साप्ताहिक सत्संगों, वार्षिक उत्सवों, वेद पारायण महायज्ञों, आर्य महासम्मेलनों आदि तक सीमित हो गया है। इनसे विश्व से अविद्या व अन्धविश्वास दूर करने का कार्य पूरा नहीं हो सकता। महर्षि दयानन्द के एकता के सूत्र व विचारों यथा सत्य और विद्या का प्रचार तथा एक भाव, एक सम्पर्क भाषा, एक सुख-दुःख, एक हानि-लाभ, वेदों की सत्य शिक्षाओं का सबको मानना, सब ईश्वर के पुत्र-पुत्रियां हैं, सब प्राणियों को जीने का अधिकार है, संसार से सभी प्रकार का भेदभाव, उत्पीड़न, अत्याचार, अन्याय, शोषण आदि दूर होना चाहिये आदि को विस्मृत कर दिया गया है। आज पुनः ऋषि दयानन्द के विचारों व सिद्धान्तों के प्रचार सहित समग्र वेदादि साहित्य का अध्ययन कर देश व समाज से अविद्या व अन्धविश्वासों को दूर करने के लिये एक प्रभावशाली आन्दोलन व प्रचार की आवश्यकता है। ऐसा प्रचार आन्दोलन विश्व में सब लोगों के लिए सुख, शान्ति व कल्याण सहित सत्य व ज्ञान के कार्यों को करने का कार्य करेगा। यदि ऐसा कभी होता है तो वह आर्यसमाज की ओर से होना ही सम्भव है। इसके माध्यम से लोगों को सत्य व वेद के सिद्धान्तों का दिया जा सकता है। सभी वैदिक विचारधारा के लोग अपने अपने क्षेत्रों में वेदों के विचारों का प्रचार करें। ऐसा करने से अवश्य कुछ न कुछ लाभ होगा। हमें यह विश्वास रखना है कि पूरे विश्व में सभी मतों व विचारधाराओं में सत्य सिद्धान्तों को प्रतिष्ठित कर तथा सब मनुष्यों के समान भाव सहित सबके सुख व कल्याण की सच्ची भावना को रखकर ही शान्ति लाई जा सकती है। विज्ञ जन इस विषय पर समाज का मार्गदर्शन करें। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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