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धर्म-अध्यात्म

घृणा प्रेम को खा जाती है

जहां घृणा होती है वहां भावनाओं में पाप छाने लगता है। घृणा प्रेम को खा जाती है, जिससे जीवन रस का स्रोत सूखने लगता है। और हमारे सबके बीच का बिछा हुआ प्रेम का तानाबाना भी छिन्न-भिन्न हो जाता है। तब व्यक्ति व्यक्ति के प्रति पाप और अत्याचार से भर जाता है। कई बार इस प्रकार की परिस्थितियां मोह के कारण तो कई बार लोभ के कारण उत्पन्न होती हैं। कारण चाहे कुछ भी हो पर यह सत्य है कि कुल मिलाकर सर्वप्रथम भावनाएं दूषित होती हैं। इसलिए यह आवश्यक है ‘पाप अत्याचार’ को विश्व से दूर करने के लिए मन की भावनाओं की पवित्रता पर विशेष ध्यान दिया जाए।

वेद के उपरोक्त मंत्रार्थों को ध्यानपूर्वक देखने से पता चलता है कि वेद पति-पत्नी के मध्य शुद्घ भावनाओं पर आधारित प्रेम की दृष्टि और सृष्टि का उपदेश कर रहा है। कारण कि पति-पत्नी ही परिवार की रीढ़ होते हैं। उनके मध्य यदि निश्छल प्रेम है तो वैसा ही परिवेश उस परिवार का बनता है-जिसके वह मुखिया हैं।

यदि पति-पत्नी के मध्य प्रेम नहीं है तो घर साक्षात नरक बन जाता है और ऐसी संतानें भी बिगड़ जाती हैं जिनके माता-पिता चौबीस घंटे उपद्रव करते हैं या कलह पूर्ण वातावरण में रहने के अभ्यासी हो जाते हैं। भावना तभी पवित्र होती है-जब उसमें भाव होता है, भाव का अभाव होते ही भावना में अभावना और अपवित्रता आ जाती है। अब भावना और अभावना क्या है ? इस पर भी विचार किया जाना अपेक्षित है। जो जैसी वस्तु हो, उसमें विचार से वैसा ही निश्चय करना कि जिसका विषय भ्रमरहित हो, अर्थात जैसे को तैसा ही समझ लेना उसको भावना कहते हैं। जैसे पिता को पिता, माता को माता और गुरू को गुरू समझना और उनके प्रति वैसा ही व्यवहार करना भावना है, और यदि इन सबको माता-पिता गुरू आदि समझकर भी इनके प्रति सम्मान व श्रद्घा का भाव ना हो तो भावना भावना नहीं रह पाती है। एक प्रकार से विद्या का दूसरा नाम ही भावना है। यद्यपि विद्या इससे कुछ बढक़र है पर जैसे विद्या किसी पदार्थ या वस्तु के विषय में हमें यथार्थ ज्ञान कराती है और उसे वह जैसा है वैसा ही मानने की हमें शिक्षा देती है-वही कार्य भावना का भी है। अब अभावना पर विचार करते हैं। जो भावना से उल्टा हो अर्थात जो मिथ्यावान से अन्य में अन्य का निश्चय मान लेना है, जैसे जड़ में चेतन और चेतन में जड़ का निश्चय कर लेना है-उसको अभावना कहते हैं।

इस प्रकार स्पष्ट हुआ कि किसी भी पदार्थ के प्रति निभ्र्रांत जानकारी का नाम भावना है। भावना को व्यक्ति की मौलिक जानकारी का निराकार प्रतीक माना गया है। जब तक व्यक्ति अपनी मौलिक जानकारी या ज्ञान का यथार्थ प्रयोग करते हुए उचित अनुचित का विवेक रखते हुए कार्य करता है, तब तक उसका ज्ञान और उसका विवेक उसकी भावना का अनुचर या अनुगामी होकर कार्य करता है और वह व्यक्ति महाबुद्घिमान और विवेकशील कहलाता है। पर जब व्यक्ति किसी बाह्य या भीतरी आवेश में बह जाता है और अपनी भावनाओं पर नियंत्रण नहीं रख पाता है, तब कहा जाता है कि उसमें भावुकता समाविष्ट हो जाती है। ऐसी मानसिकता के वशीभूत होकर मानव कभी-कभी बड़े भयंकर और आत्मघाती निर्णय ले जाता है। यही कारण है कि विवेकशील लोग भावुकता पर नियंत्रण रखकर चलते हैं और दूसरों से भी ऐसी ही अपेक्षा करते हैं। भावुकता से अभावना का जन्म होता है और व्यक्ति विकास का प्रतीक बन जाता है। रावण अपनी बहन का अपमान राम और लक्ष्मण के द्वारा होते नहीं देख पाया तो वह भावुक हो गया और भावुकता में अपने विवेक को खो बैठा। दुर्योधन को भावुकता अपने परिवार का विनाश कराने के लिए ही उद्यत कर बैठी।

कई बार ऐसा भी होता है कि व्यक्ति छोटी-छोटी बातों को स्वाभिमान का प्रश्न बना लेता है, और उन्हीं में बह जाता है। बात-बात पर कहने लगता है कि-यह बात तो मेरे स्वाभिमान को चोट पहुंचा गयी, और कोई भी व्यक्ति मेरे स्वाभिमान को चोटिल नहीं कर सकता। जबकि उन्हीं परिस्थितियों में एक धीर-वीर गंभीर व्यक्ति भी रहता है और वह दूसरों की ऐसी कई अनर्गल बातों को या बकवास को अपने गले ही नही लगाता-जिससे उसका मानसिक संतुलन बिगड़े। वह उन बातों को बड़ी सहजता से निकल जाने देता है, उसकी भावनाएं उसे बताती हैं कि इस व्यक्ति का मानसिक स्तर क्या है, और इसने किन परिस्थितियों में या किस मानसिकता के वशीभूत होकर तुझसे ऐसा कुछ कह दिया है जो तेरे लिए चोटिल और बोझिल हो गया है ? वह उन सब परिस्थितियों पर विचार करके समय के अनुसार निर्णय लेता है, और यदि उसके स्वाभिमान को या भावनाओं को कहीं चोट पहुंची है-तो वह समय की प्रतीक्षा करता है। समय आने पर वह देखता है कि कई बार तो समय ही उसकी बातों का उत्तर दे देता है तो कई बार वह स्वयं अवसर को पहचानकर उस व्यक्ति को उत्तर देता है – जिसने उसकी भावनाओं को कहीं चोट पहुंचाई थी।

डॉ राकेश कुमार आर्य

संपादक : उगता भारत

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