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भारतीय संस्कृति

यह था आर्यावर्त का वास्तविक विस्तार और उसकी सीमाएं

आर्यावर्त शब्द हमारे भारत के प्राचीन गौरव को दर्शाने वाला बहुत ही पवित्र शब्द है । आर्यावर्त का शाब्दिक अर्थ है- ‘आर्यो आवर्तन्तेऽत्र’ अर्थात् ‘आर्य जहाँ सम्यक प्रकार से बसते हैं।’ आर्यावर्त का दूसरा अर्थ है- ‘पुण्यभूमि’। मनुस्मृति 2.22 में आर्यावर्त की परिभाषा इस प्रकार दी हुई है-

आसमुद्रात्तु वै पूर्वादासमुद्रात्तु पश्चिमात्।

तयोरेवान्तरं गिर्योरार्यावर्त विदुर्बुधा: ॥

सरस्वती दृषद्वत्योर्देवनद्योरन्तरम ।

तं देवनिर्मितं देशमार्यवर्तेति प्रचक्षते ।।

( मनुस्मृति – 1-2- 22, 29 )

अर्थात पश्चिमी भूमध्य सागर तथा पूर्वी प्रशांत महासागर के मध्य स्थित पर्वतों से घिरे हुए सरस्वती तथा दृषद्वती देव नदियां जिसके अंदर बहती हैं , उस सृष्टि के प्रारंभ में उत्पन्न मानवों ( जिनको इतिहास में देव कहा गया है ) द्वारा निर्मित देश को आर्यावर्त कहते हैं।

आजकल यह समझा जाता है कि इसके उत्तर में हिमालय शृंखला, दक्षिण में विन्ध्यमेखला, पूर्व में पूर्वसागर (वंग आखात) और पश्चिम में पश्चिम पयोधि (अरब सागर) है। उत्तर भारत के प्राय: सभी जनपद इसमें सम्मिलित हैं। परन्तु सच कुछ और है । कुछ विद्वानों ने इसकी सही व्याख्या इस प्रकार की है कि हिमालय का अर्थ है पूरी हिमालय श्रृखंला, जो प्रशान्त महासागर से भूमध्य महासागर तक फैली हुई है और जिसके दक्षिण में सम्पूर्ण पश्चिमी एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया के प्रदेश सम्मिलित थे। इन प्रदेशों में सामी और किरात प्रजाति बाद में आकर बस गयी।

दलीपसिंह अहलावत लिखते हैं… पूर्व में ब्रह्मपुत्र से लेकर पश्चिम में यूफ्रेट्स (फ्रात) और टाईग्रिस (दजला) नदियों तक, उत्तर में हिमालय पर्वत की माला, समरकन्द, कोकन्द, निशांपुर, कैस्पियन और कॉकेशस, दक्षिण में समुद्र पर्यन्त आर्यजन निवास करते थे। इन सीमाओं के अन्तर्गत जितने देश हैं वे आर्यावर्त कहलाते थे। इसलिए ईरान, अफगानिस्तान, बिलोचिस्तान, एशिया माइनर, पाकिस्तान, बांग्लादेश और वर्तमान भारतवर्ष के जितने प्रदेश हैं वे सब आर्यावर्त के प्रांत मात्र हैं।

जी हां , आजकल जिस भारत में हम रह रहे हैं यह भी कभी के हमारे आर्यावर्त का केवल एक प्रांत ही है।

कुछ लोगों ने गंगा और यमुना के बीच के क्षेत्र को आर्यावर्त के नाम से पुकारने का प्रयास किया है।

उनका ऐसा करना भी नितांत भ्रामक है। मनुस्मृति के दूसरे अध्याय में आए उपरोक्त श्लोक का यदि गहराई से अवलोकन करें तो उसमें स्पष्ट होता है कि आर्यावर्त के पूरब और पश्चिम दोनों में समुद्र है । पश्चिम का समुद्र टर्की की ओर जाकर पड़ने वाला भूमध्य सागर है , और चीन से आगे जाकर पूर्व में प्रशांत महासागर पड़ता है । इसलिए आर्यावर्त भूमध्य सागर से प्रशांत महासागर के बीच फैला हुआ था । अतः उपरोक्त व्याख्या ही वैज्ञानिक व्याख्या है।

हमें अपने गौरवशाली अतीत और गौरवशाली इतिहास पर गर्व है। जंबूद्वीप के इस आर्यावर्त देश के अंतर्गत रहने वाले हम सभी आर्य / हिंदू अपने आप को इस बात के लिए गौरवशाली समझें कि हमारे पूर्वजों ने कभी संपूर्ण वसुधा पर शांतिपूर्वक शासन किया था और भारत को विश्व का सिरमौर बना कर रखा था। यह वही काल था , जब हम आर्यावर्त देश के निवासी थे।

जब 712 में मोहम्मद बिन कासिम भारत पर आक्रमण के लिए आगे बढ़ा तो उस समय तक भी आर्यावर्त की सीमाएं अधिक टूटी-फूटी नहीं थीं । आर्यावर्त के भीतर उस समय 60 करोड़ आर्य / हिंदू निवास करते थे । कटते – कटते और घटते – घटते 1947 में जब भारत मिला तो हम 60 करोड के दुगुने 1अरब 20 करोड़ ना होकर हम आधे अर्थात 30 करोड़ रह गए । यदि 712 से 1947ई0 के बीच हमारी जनसंख्या दोगुनी भी होती तो भी हम उस समय दुनिया में 1अरब 20 करोड़ होते और आज हम लगभग 4 अरब होते । परंतु हम 30 करोड़ रह गए। इस प्रकार 90 करोड़ लोगों से हमें इतने काल में हाथ धोना पड़ गया। कभी के वही हमारे निज बंधु ही हमारे आज शत्रु बने हुए हैं ? धर्मांतरण कितना घातक रहा है – उसे इस उदाहरण से समझा जा सकता है।

तनिक सोचिए , अंजामे गुलिस्तां क्या होगा ?

हे भारतवर्ष के रहने वाले आर्यजनो ! समझो अपने अतीत को । ऐसा कौन मुगल बादशाह हुआ है ,जिसने इस संपूर्ण आर्यावर्त पर शासन किया हो या ऐसा कौन विदेशी शासक हुआ है जिसके शासन के अधीन संपूर्ण जंबूद्वीप या संपूर्ण भूमंडल कभी रहा हो ? निश्चित रूप से एक भी नहीं । जबकि आपके यहां तो ऐसे सम्राटों की लंबी श्रंखला है । खोजो अपने सम्राटों की उस श्रृंखला को और लिखो अपना गौरवपूर्ण इतिहास। समझो कि आपने संपूर्ण भूमंडल को एक बनाकर रखा और उन्होंने इसके अनेकों टुकड़े कर डाले । संपूर्ण धरती अपने अतीत को याद कर रो रही है और तुमको पुकार रही है।

सुन लो समय की पुकार।

डॉ राकेश कुमार आर्य

संपादक उगता भारत

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