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धर्म-अध्यात्म

श्रद्धा का महत्व क्या है ?

जब तक ऐसी स्थिति किसी साधक की नहीं बनती है तब तक वह श्रद्घालु नही बन पाता है। आर्य वेदधर्म से इतर जितने भी मत-पंथ या संप्रदाय है, उन सबमें भी श्रद्घा को प्रमुखता प्रदान की गयी है। परंतु उनमें और वैदिक धर्म में अंतर केवल यह है कि ये अन्य मत वाले लोग श्रद्घा के स्थान पर अंधश्रद्घा उत्पन्न कराते हैं। उनके धर्माचार्य प्रमुखों की मान्यता होती है कि हम जो कुछ कहें उसे तुम यथावत मान लो। उसमें किंंतु-परंतु या किसी प्रकार की शंका-आशंका करने की कोई आवश्यकता नहीं है। इसी से कठमुल्लावाद या उस मठाधीश संस्कृति का प्रचलन हुआ जिसमें लोगों की श्रद्घा का अनुचित लाभ कुछ लोगों ने निजी स्वार्थ में उठाना आरंभ कर दिया। इसी से ‘गुरूडमवाद’ तथा धर्म के नाम पर पाखण्डवाद का प्रचलन बढ़ा है।

श्रद्घा किसी के पीछे-पीछे चलते रहने की अंधभक्ति का नाम नहीं है। ना ही श्रद्घा आंखों पर पट्टी बांधकर चले जाते रहने का नाम है। इसमें गुरू के संसर्ग और संपर्क से विवेक जागृत और विवेकशील लोगों से अपेक्षा की जाती है कि वह श्रद्घालु बनकर गुरूवचनों का अमृतपान करें। उन वचनों को जीवन में अपनायें और अपना जीवन सफल बनायें। इस प्रकार श्रद्घा जीवन की सफलता का मूलमंत्र है।

सफलता के इसी मूलमंत्र को नित्य अपनाने की बात हमारे ऋषियों ने कही है। इसी मूल मंत्र का दर्शन प्रत्येक सदगृहस्थ के परिवार में होने वाले नित्यप्रति के यज्ञ में होता है, जब सारा परिवार श्रद्घाभक्ति के साथ बैठकर अपने प्यारे प्रभु को स्मरण करते हुए यज्ञ करता है। ईश्वर के प्रति श्रद्घा ज्यों-ज्यों बढ़ती जाती है, त्यों-त्यों मनुष्य के भीतर कुछ चमत्कार प्रकट होते जाते हैं। व्यक्ति जिन परिजनों के साथ मिल बैठकर यज्ञ करता है उनके प्रति विनम्र और सरल बनता जाता है। छोटों के प्रति वह स्नेहभाव रखने वाला तथा बड़ों के प्रति सम्मानभाव रखने वाला बनता जाता है। यह स्नेहभाव और सम्मानभाव देानों ही श्रद्घा के ही रूप हैं। इन दोनों भावों से परिवार उन्नति करता है, उसमें एक दूसरे की बात को सम्मान देने का भाव हर व्यक्ति के भीतर पनपता है। जब घर के लोगों का परस्पर व्यवहार इस प्रकार का हो जाता है तो फिर ये लोग अपने पड़ोसियों से भी प्रीतिपूर्वक व्यवहार करने लगते हैं और उसके पश्चात समाज के लोगों में परस्पर प्रीति बढ़ती है। एक समय और एक अवस्था ऐसी आती है, जहां यह परस्पर की प्रीति ही मानवता में (मानवधर्म) में परिवर्तित हो जाती है। इस प्रकार मानवता या मानवधर्म भी श्रद्घा की नींव पर आधृत हैं। यदि नींव में श्रद्घा की ईंट ना लगी हो तो मानवता का भवन कभी भी भरभराकर गिर सकता है।

महाभारत में कहा गया है :-

यद्यदाचरिति श्रेष्ठस्तत्त देवेतरो जन:।

स यत्प्रमाणं कुरूते लोकस्तदनुगच्छति।।

अर्थात संसार में बड़े ज्येष्ठ-श्रेष्ठ लोग जैसा आचरण करते हैं छोटे जन तो उनकी नकल किया करते हैं। हम व्यावहारिक जीवन में देखा करते हैं कि जैसा पिता होता है, या जैसे जिस घर के बड़े लोग होते हैं, सामान्यत: वैसे ही छोटे बन जाते हैं। कारण कि छोटे बड़ों के खाने-पीने, रहने-सहने, बात करने इत्यादि का अनुकरण करते हैं। उनकी चाल तक की नकल करते हैं। जिससे वे अपने बड़ों के अनुसार आचरण करने के अभ्यासी बन जाते हैं।

स्पष्ट है कि यदि बड़े लोग ईशभक्त हैं, ईश्वर के प्रति श्रद्घा रखते हैं तो छोटे भी वैसे ही बनने लगते हैं। माना जा सकता है कि अपवाद हर सिद्घांत के होते हैं, परंतु जगत का एक सामान्य सिद्घांत यही है कि बड़ों की नकल करके ही छोटे अपना पथ निर्धारण करते हैं। हमारे लिए बड़ों का सम्मान करना इसीलिए अनिवार्य किया गया है कि हम अपने बड़ों से बहुत कुछ सीखते हैं। वे हमें ना भी सिखाएं तो भी हम उनसे बहुत कुछ सीखते हैं। क्योंकि हम उनका अनुकरण जो करने लगते हैं। जिससे सीखा जाए उस ज्येष्ठ-श्रेष्ठ के प्रति श्रद्घा का भाव रखना हमारा धर्म है। यही कारण है कि ‘ज्येष्ठ’ के सामने न बोलना और मौन (घूंघट) रहना उसके प्रति सम्मान या श्रद्घा की अभिव्यक्ति का एक माध्यम है।

जब व्यक्ति का मन संसार के भोगों से भर जाए या उधर से हटने लगे, तब ईश्वर के प्रति श्रद्घा ‘वैराग्य’ बनने लगती है और जब ईश्वर के अतिरिक्त और कुछ न तो दिखता है और न कुछ सूझता है तब यह वैराग्य ‘भक्ति’ बन जाता है। यदि मन भक्ति में नहीं लगता है तो समझो कि जीवन निरर्थक रहा।

शरीरम् सुरूपम् तथा च कलत्रम्

यशश्चारूचित्रम् धनम् मेरूतुल्यम्।

मनश्चेन्न लग्नं हरेरंगध्रिमध्ये,

तत: किम् तत: किम् तत: किम् तत: किम्।।

अर्थात ‘सुंदर शरीर रूपमती भार्या, यश उत्तम चरित्र, अपार धन-संपत्ति रहते हुए भी यदि भगवान की भक्ति में मन नही लगता तो इन पदार्थों के रहने का कोई लाभ नहीं।’

इसका अभिप्राय है कि सच्ची श्रद्घा जीवन की नश्वरता और जगत के माया-मोह के बंधन को ढीला करती है और व्यक्ति को सत्य को धारण करने के लिए प्रेरित करती है। जिनके हृदय में ईश्वर के प्रतिश्रद्घा का दीप जला करता है-उन्हें ईश्वर से यथाशीघ्र साक्षात्कार हो जाता है। वह समझ जाते हैं कि अविनाशी और अनंत परमात्मा के नामस्मरण रूप औषधि से सारे रोग -शोक-संताप समाप्त हो जाते हैं। कविराज धन्वंतरि ने कहा है-

अच्युतानंत गोविन्द नामस्मरण भेषजात्।

विनश्यन्ति सकला रोगा: सत्यं सत्यं वदाम्यहम्।।

अर्थात ‘मैं सत्य कहता हूं कि उस अविनाशी और अनंत परमात्मा के नामस्मरण रूप औषध से सारे रोगों का नाश हो जाता है।’

ऐसा चमत्कार सच्ची श्रद्घा से ही होता है। यदि हृदय में श्रद्घा नही है तो भक्ति भी ढोंग या पाखण्ड बनकर रह जाती है। पर जिसके हृदय में यह अपना स्थायी निवास बना लेती है और जिसके हृदय में उस परमपिता परमात्मा के दर्शन होने लगते हैं वह तो इस संसार में ‘शाहों का भी शाह’ बन जाता है। खाकानी जब मरने लगा, तो उससे किसी ने पूछ लिया कि जीवन का सार तुमने क्या निकाला ? तब उसने कहा-

पस अज साल ई नुक्ता मुहक्ककशुद बखाकानी।

कि यक दम बाखदा बूदन बेह अज तख्ते सुलेमानी।।

अर्थात मुझे सौ वर्ष के जीवन के अंत में यह बात मिली कि श्रद्घापूर्वक उस परमपिता परमात्मा का स्मरण करने और उसकी समीपता का अनुभव करने से जो आनंद मिलता है वह सुलेमान शासक के सिंहासन से भी उत्तम है।

अब बात आती है कि इस श्रद्घा का हमारे भीतर विकास कैसे हो? इसके लिए कई बातें हैं। प्रथम तो हृदय में ईश्वर के प्रति श्रद्घा अथवा अश्रद्घा का होना पूर्व जन्मों के कर्मों के आधार पर भी निर्भर होता है। प्रारब्ध की प्रबलता से या निर्बलता से इस जन्म में हमारी ईश्वर के प्रति श्रद्घा प्रबल या निर्बल होती है। हिरण्यकशिपु स्वयं ईश्वर के प्रति अश्रद्घा रखता था, परंतु उसी का पुत्र ईश्वर के प्रति अत्यंत श्रद्घालु था। यज्ञादि कर्मों को पूर्ण निष्ठा और श्रद्घा से करता था। यह सब प्रारब्ध के संस्कारों के कारण ही था। इसका अभिप्राय है कि जब हम किसी को ईश्वर के प्रति और यज्ञादि के प्रति बहुत प्रयास करने पर भी श्रद्घालु नही बना पाते हैं, या जब हम किसी को अपनी ओर से प्रयास किये बिना ही ईश्वर और यज्ञादि कर्मों के प्रति स्वयं ही श्रद्घालु बने देखते हैं तो उस समय हमें उसके पूर्व जन्मों के संस्कारों को मानना चाहिए।

दूसरी बात है कि हमें अपना हर कार्य ईश्वरीय अनुकंपा से संपन्न होता दिखना चाहिए। यदि हम कहीं असफल भी होते हैं तो भी हमें ईश्वर का धन्यवाद कहना चाहिए। पता नहीं उसने हमारे किस भले के लिए हमें हमारी कोई मनोवांछित या अभिलषित वस्तु को प्राप्त करने से अभी वंचित कर दिया हो? फल पर उसी का अधिकार है, इसलिए हमें अपने हरकार्य के फल को उसका प्रसाद मानकर स्वीकार करना चाहिए। इससे हमारे भीतर फलासक्ति का भाव समाप्त होगा और हम अपने कर्म पर विशेष ध्यान देंगे। ईश्वर हमारे पुरूषार्थ में रहे दोषों या त्रुटियों की ओर हमारा ध्यान दिलाएंगे और हमें प्रेरणा करेंगे कि इस बार के प्रयास में इन सभी दोषों या त्रुटियों को दूर कर लिया जाए। उसकी प्रेरणाशक्ति हमारे भीतर बल का संचार करेगी और हमें अपने लक्ष्य में सफलता दिलाएगी, तब हम हृदय से ही अपने किये गये कर्म को ईश्वरेच्छा मानना आरंभ कर देंगे। इस प्रकार की भावना से हमारे भीतर ‘श्रद्घा’ का असीम सागर लहरें मारने लगेगा।

डॉ राकेश कुमार आर्य

संपादक : उगता भारत

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