Categories
धर्म-अध्यात्म

वेदों का महत्व और उनका अध्ययन अध्यापन मानव मात्र का कर्तव्य

ओ३म्

============
वेदों का नाम प्रायः सभी लोगों ने सुना होता है परन्तु आर्य व हिन्दू भी वेदों के बारे में अनेक तथ्यों को नहीं जानते। हमारा सौभाग्य है कि हम ऋषि दयानन्द जी से परिचित हैं। उनके आर्यसमाज आन्दोलन के एक सदस्य भी हैं और हमने ऋषि दयानन्द के जीवन एवं कार्यों को जानने सहित उनके सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, आर्याभिविनय, संस्कारविधि सहित वेदभाष्य आदि ग्रन्थों को देखा है। ऋषि दयानन्द जी के यह सभी ग्रन्थ हमारे पास हैं और हमने इनका अध्ययन भी किया है। सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ का महत्व इस कारण से है कि यह हमें वेदों से जोड़ता है और वेदों के विषय में सत्य रहस्यों को बताता व जनाता है। वेदों को यथार्थरूप में जानना प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य एवं धर्म है। जो वेदों के सत्यस्वरूप को जानने का पुरुषार्थ नहीं करता और वेदों का अध्ययन कर अपने जीवन व आचरण का सुधार नहीं करता, हमें लगता है कि वह मनुष्य होकर भी अधूरा मनुष्य है। उसने ईश्वर प्रदत्त अपने मनुष्य जन्म को सार्थक सिद्ध नहीं किया है। पाठकगण विचार करें कि यदि उनकी सन्तानें उन्हें ठीक से न तो जाने तथा न पहचाने उन्हें आपकी व आपके पूर्वजों की विरासत का ज्ञान भी न हो और वह आपकी व उस सबकी उपेक्षा करते हों तो आपका अपनी उन सन्तानों के प्रति कैसा व्यवहार होगा? ऐसी ही कुछ स्थिति हमारी व संसार के 99 प्रतिशत लोगों की हमें दीख पड़ती हैं। हम ईश्वर के पुत्र होकर भी अपने उस पिता ईश्वर को जानते नहीं है। उसने हमारे कल्याण के लिये सृष्टि के आरम्भ में चार ऋषियों अग्नि, वायु, आदित्य व अंगिरा के माध्यम से जो ज्ञान दिया था उसे भी हम न तो जानते हैं और न ही उसका अपने हित में लाभ नही उठाते हैं।

वेदों का अध्ययन करने से हमें यह भी ज्ञात होता है कि हम जीवात्मा हैं जो पूर्वजन्म के अपने शुभाशुभ कर्मों का फल भोगने के लिये ईश्वर द्वारा व उसकी व्यवस्था से संसार में जन्म लेती हैं। हमें कभी अवसर ही नहीं मिलता कि हम यह विचार करें कि क्या हम अनादि व नित्य हैं या आदि, जन्म-मृत्यु धर्मा तथा उत्पत्ति व नाश धर्मा जीवात्मा हैं या कुछ और। हम यह भी नहीं जानते कि हमारा यह प्रथम जन्म है या इससे पूर्व भी हमारा अस्तित्व था और हम मनुष्य या किसी अन्य योनि में जीवन यापन करते थे? इस जन्म में हमारी मृत्यु दिन व रात्रि के चक्र के समान सुनिश्चत है। क्या हमारा मृत्यु के बाद पुनः जन्म होगा? यदि होगा तो वह मनुष्य का ही होगा या किसी अन्य प्राणी योनि में भी हो सकता है? हमारे इस जन्म व पुनर्जन्म का आधार व सिद्धान्त अथवा नियम क्या हैं? कम से कम इन प्रश्नों के उत्तर तो प्रत्येक मनुष्य को चाहे वह हिन्दू, आर्य, ईसाई, मुसलमान, बौद्ध व जैन धर्म का अनुयायी ही क्यों न हो, उसे पता होने चाहियें। आश्चर्य है कि आज की शिक्षित युवा पीढ़ी इन आवश्यक प्रश्नों की उपेक्षा करती है। यदि युवा पीढ़ी के जीवन व उसकी दिनचर्या पर विचार किया जाये तो विदित होता है कि वह स्कूली शिक्षा प्राप्त कर कुछ व्यवसाय करना चाहती है जहां से उसे पर्याप्त आय हो जिससे वह अपना जीवन सुख व सुविधाओं सहित व्यतीत कर सकें। ऐसा ही हम भारत व विश्व के लोगों को करते हुए देखते हैं। कुछ मत-मतान्तर के लोग अपने अनुयायियों को अपनी जनसंख्या बढ़ाने के उपाय बताते हैं जिनमें एक उपाय वह धर्मान्तरण को भी वैध मानते हैं। वह अपने मत की मान्यताओं पर विचार कर उसकी सत्यता की परीक्षा नहीं करते। सभी मतों में अविद्या विद्यमान है। इसका प्रकाश ऋषि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश में किया है।

मत-मतान्तरों के लोग अपने मतों के सिद्धान्तों को सत्य पर स्थिर करना नहीं चाहते। वह जो चला आ रहा है उसी को आगे बढ़ाने में विश्वास रखते हैं। इसके पीछे उनकी गहरी अविद्या युक्त बुद्धि व संस्कार ही प्रतीत होते हैं। सोचिये! यदि हमारे वैज्ञानिक भी अपने पूर्ववर्ती वैज्ञानिकों की बातों को अक्षरशः सत्य मानते और उनकी मान्यताओं में सुधार, परिवर्तन व संशोधन न करते तो आज ज्ञान व विज्ञान की क्या स्थिति होती। हम अनुमान व अनुभव करते हैं कि वैज्ञानिक यदि पुराने वैज्ञानिकों की अपूर्ण व अल्पज्ञान व अल्प विद्या की बातों में सुधार न करते तो जो स्थिति देश व समाज की होती वही स्थिति मत-मतान्तरों द्वारा अपने मत-मतान्तरों की मान्यताओं व सिद्धान्तों सहित परम्पराओं की परीक्षा कर उनका सत्य सिद्धान्तों के आधार पर संशोधन न करने के कारण बनी हुई है। देश में एकमात्र ऋषि दयानन्द ने इस समस्या को जाना व समझा था तथा अपने व अन्यों के मत-मतान्तरों की अविद्यायुक्त बातों पर विचार कर उन्हें त्याज्य माना था। उन्होंने अविद्या का त्याग करने सहित विद्या व सत्य ज्ञान की खोज भी की थी। उन्होंने जिस सत्य व मानव हितकारी बातों को हितकर स्वीकार किया था, उसे देश व समाज के सम्मुख प्रस्तुत कर लोगों से उसे स्वीकार, ग्रहण व धारण करने की अपील की थी। वह मानते थे कि मनुष्य का जन्म सत्य का ग्रहण और असत्य का त्याग करने के लिये हुआ है और सत्य का अनुसंधान, सत्य का ग्रहण और सत्य को धारण करना ही मनुष्य व मनुष्य जाति का एकमात्र उन्नति का कारण होता है। यह सिद्धान्त हमारे सामने हैं। सभी इसे सत्य स्वीकार करेंगे परन्तु मत-मतान्तर के लोग इसे स्वीकार करने को तैयार नहीं होते हैं। यह आज के युग का महा प्रश्न व समस्या है? इससे बड़ा आश्चर्य नहीं हो सकता। अपने हित व अहित की चिन्ता न कर वह आंखें बन्द कर मत-मतान्तरों की अविद्यायुक्त बातों को स्वीकार व आचरण करते हैं जिसका परिणाम वेद के सिद्धान्तों के अनुसार सुखद कदापि न होकर परलोक में दुःख व अकल्याण करने वाला होता है। वेदों से ही हमें सत्य ज्ञान की प्राप्ति होती है, अतः हमारा कर्तव्य व धर्म है कि हम वेदों के सत्य सिद्धान्तों को जानें व उनका आचरण करें जिससे हमारा कल्याण व उन्नति हो।

वेद वह ज्ञान है जो सच्चिदानन्दस्वरूप, सर्वज्ञ, निराकार तथा सर्वव्यापक परमात्मा ने सृष्टि की आदि में चार पवित्रतम आत्माओं वा अग्नि, वायु, आदित्य व अंगिरा ऋषियों की आत्माओं में प्रतिष्ठित किया था। ईश्वर की प्रेरणा से ही उन चार ऋषियों ने चार वेद ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद का ज्ञान ब्रह्मा ऋषि को दिया था। ब्रह्माजी से इन चार वेदों के अध्ययन व अध्यापन की परम्परा आरम्भ हुई। इससे पूर्व संसार में न तो कोई भाषा व ज्ञान था, न कोई पुस्तक और न ही कोई आचार्य। उस समय केवल अमैथुनी सृष्टि में उत्पन्न ऋषि एवं युवावस्था वाले स्त्री व पुरुष ही थे। परमात्मा ने चार ऋषियों को चारों वेदों की भाषा व उसके अर्थ भी जनाये व बताये थे। उन चार ऋषियों ने ब्रह्माजी को वेदभाषा का उच्चारण एवं सत्य वेदार्थ बताया था। ब्रह्मा जी भी अन्य चार ऋषियों के समान ही पवित्रात्मा व ऋषि कोटि के मनुष्य थे। अतः उन्हें ऋषियों से चार वेदों का ज्ञान ग्रहण करने में कठिनाई नहीं हुई होगी। वेदाविर्भाव एवं वेद प्रचार कार्य के लिये परमात्मा ने इन पांचों आत्माओं का चयन किया था। अतः ईश्वर को इन आत्माओं की क्षमताओं का ज्ञान था और उसने अपनी ओर से वेदज्ञान ग्रहण करने और उसके प्रचार के कार्य में इन्हें अपनी ओर से पूर्ण सहायता व सहयोग, अपने अन्तर्यामीस्वरूप से, दिया था वा दिया होगा। विचार करने पर यह भी विदित होता है कि सृष्टि की आदि में उत्पन्न मनुष्य भी आत्मा की पवित्रता की दृष्टि से आजकल की तरह की आत्मायें न होकर उच्च-कोटि की आत्मायें थी। अतः उनको ब्रह्मा जी व अन्य ऋषियों ने जो बताया व पढ़ाया होगा, वह उन्होंने अपनी पवित्र बुद्धि से ग्रहण कर उसे स्मरण कर लिया होगा।

इस प्रकार से सृष्टि के आरम्भ में वेदाविर्भाव हुआ और वेदों का सभी स्त्री-पुरुषों व मनुष्यों में प्रचार हुआ। इसी प्रकार से पीढ़ी दर पीढ़ी वेदों का प्रचार, संरक्षण एवं अध्ययन-अध्यापन चलता रहा। वेद ज्ञान को कहते हैं। वेदों में सभी सत्य विद्यायें हैं। इस सृष्टि का उत्पत्तिकर्ता एवं वेदज्ञान का दाता एक परमेश्वर ही हैं। अतः दोनों का ज्ञान एक समान होना स्वाभाविक व वांछनीय है। ऐसा नहीं हो सकता कि परमात्मा ने सृष्टि को बनाने में जिस ज्ञान का उपयोग किया और जो पदार्थ जिस प्रयोजन से बनाये उसके विपरीत उसने वेदों में ज्ञान दिया हो। मनुष्य अल्पज्ञ होता है। उससे कई बार अनेक विषयों के सत्य रहस्यों को जानने में अल्पज्ञता के कारण भूल हो जाती है। सृष्टि के आरम्भ व उसके बाद सहस्रों, लाखों व करोड़ों वर्षों तक वेदों का यथार्थ ज्ञान वा वेदार्थ संसार में प्रचारित व उपलब्ध रहा है। महाभारत काल व उसके कुछ बाद ऋषि जैमिनी तक ऋषि परम्परा अनविच्छिन्न रूप से देश में रही है। वेद में परा व अपरा दोनों प्रकार की विद्यायें हैं। इन्हें आध्यात्मिक ज्ञान व विद्या एवं भौतिक ज्ञान भी कहा जा सकता है। वेदों की सहायता से ही आध्यात्म विद्या के ग्रन्थ उपनिषदों आदि की रचना हमारे विद्वान ऋषियों ने की है। वेदांग में जिन 6 अंगों का उल्लेख किया जाता है वह भी वेद के ऋषियों ने वेदों की सहायता से ही बनाये हैं। वेदों में ईश्वर के सत्यस्वरूप, ईश्वर के गुण, कर्म व स्वभाव, ईश्वर की उपासना तथा मनुष्य जीवन के चार पुरुषार्थ व प्राप्तव्य धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष का उल्लेख है। देवयज्ञ अग्निहोत्र का विधान भी वेदों में मिलता है। अग्निहोत्र करने से भी मनुष्य को अनेकानेक लाभ होते हैं। पाप निवारण के लिये सन्ध्या सहित देवयज्ञ अग्निहोत्र करना सभी मनुष्यों का आवश्यक कर्तव्य है।

वेदाध्ययन, वेदांग, उपनिषद तथा दर्शन आदि ग्रन्थों के अध्ययन सहित सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कारविधि, आर्याभिविनय आदि ग्रन्थों के अध्ययन से मनुष्य ईश्वर को जानकर उसका साक्षात्कार कर सकता है और मोक्ष का अधिकारी होता है। उसका मानव जीवन भी सुख व शान्ति से व्यतीत होता है। वेदाध्ययन कर मनुष्य चिन्तन, मनन, अनुसंधान, विद्वानों व वैज्ञानिकों से संगतिकरण कर एक अध्यात्मवेत्ता सहित एक महान वैज्ञानिक एवं प्रौद्योगिकी का विद्वान व वेत्ता बन सकता है। वेद मनुष्य को सद्ज्ञान की प्राप्ति करने और उस ज्ञान से मानवता का हित करने का सन्देश देते हैं। वेद या वैदिक शास्त्रों में यदि युद्ध का विधान है तो वह सत्य व धर्म की रक्षा करने के लिये है। इसके साथ ही ऐसे विधान हिंसक प्रवृत्ति के दुष्ट मनुष्यों से सज्जन साधू मनुष्यों की रक्षा करने के लिये है। मर्यादा पुरुषोत्तम राम व योगेश्वर कृष्ण जी की रामायण एवं महाभारत में जो भूमिका है वह सत्य व धर्म की रक्षा करने वाले महापुरुषों की है। वेद मनुष्य को सत्य का ग्रहण एवं असत्य का त्याग करने सहित अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि का सन्देश देते हैं। वेदों का सन्देश है कि ईश्वर के उत्पन्न किये मनुष्यों में जन्म के आधार पर न कोई छोटा है न कोई बड़ा है। अपने गुण, कर्म व स्वभाव से ही मनुष्य अच्छे व बुरे होते हैं परन्तु होते तो सब समान ही हैं क्योंकि सबमें एक जैसा जीवात्मा ही विद्यमान होता है। हमें अपनी आत्मा को उच्च, पवित्र व श्रेष्ठ अवस्था को प्राप्त कराना है। यही हमारा कर्तव्य है। ईश्वर को जानना और उसकी उपासना करना भी संसार के सभी मनुष्यों का कर्तव्य है। ईश्वर का ज्ञान व उपासना की विधि वेद निहित ही उत्तम व श्रेष्ठ है। इसी से शुभ परिणाम मिलते हैं। वेदों का अध्ययन कर ही आदि मनुष्य वा हमारे सबके पूर्वज विद्वान व ज्ञानी बने थे व 1.96 वर्षों तक यही परम्परा विश्व में चली है। वर्तमान में जो आधुनिक ज्ञान व विज्ञान विकसित हुआ है उसमें आधार भूत वेदों का ज्ञान सहायक एवं उपयेागी रहा है। वेदों का महत्व निर्विवाद है। हमें ऋषि दयानन्द के इस कथन को स्वीकार एवं उसका पालन करना चाहिये ‘वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है। वेदों का पढ़ना पढ़ाना और सुनना व सुनाना सब आर्यों (वा मनुष्यों) का परम धर्म है।’ ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
betparibu giriş
efesbet giriş
efesbetcasino giriş
efesbetcasino giriş
noktabet giriş
noktabet giriş
betplay giriş
betplay giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
noktabet giriş
noktabet giriş
batumslot giriş
vaycasino giriş
betplay giriş
efesbet giriş
efesbetcasino giriş
efesbet giriş
betnano giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
yakabet giriş
yakabet giriş
betplay giriş
betplay giriş
betplay giriş
vaycasino giriş
fiksturbet giriş
noktabet
noktabetgiriş
noktabet
noktabetgiriş
noktabet
noktabetgiriş
noktabet
noktabetgiriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
Restbet giriş
Restbet güncel
vaycasino giriş
vaycasino giriş
meybet giriş
meybet giriş
betpark giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
casival
casival
betplay giriş
betplay giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
maritbet giriş
maritbet giriş
betplay giriş
betplay giriş
timebet giriş
timebet giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
ikimisli giriş
ikimisli giriş
nesinecasino giriş
roketbet giriş
betci giriş
betci giriş
roketbet giriş
nisanbet giriş
İmajbet giriş
İmajbet giriş
Safirbet giriş
Safirbet giriş
İmajbet giriş
piabellacasino giriş
betnano giriş
vaycasino
vaycasino
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano
betnano giriş
vaycasino
vaycasino
betpark giriş
betplay
holiganbet giriş
holiganbet giriş
betnano giriş
betnano giriş
timebet giriş
timebet giriş
hititbet giriş
norabahis giriş
hititbet giriş
norabahis giriş
grandpashabet
grandpashabet
nitrobahis giriş
betorder giriş
betorder giriş
betbox giriş
betbox giriş
betnano giriş
nitrobahis giriş
maritbet giriş
maritbet giriş
katlabet giriş
katlabet giriş
betorder giriş
betorder giriş
holiganbet giriş
kolaybet giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betpark giriş
betorder giriş
casival
casival
vaycasino
vaycasino
betorder giriş