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विशेष संपादकीय

मानवाधिकारों के संरक्षण का सही स्वरूप

शिव संकल्पों से युक्त मन ही इदन्नमम् का सार्थक व्यवहार कर सकता है। जो ‘मेरे लिए नही’ कहना सीख गया वही तो परमार्थी बन गया, दूसरे के अधिकारों का प्रहरी बन गया। ऐसी भव्य नींव पर भव्य भारत की भव्य संस्कृति का भवन टिका है। इसीलिए तो मनु महाराज ने कहा है:-
एतददेशेप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मन:।
स्वं-स्वं चरित्रं शिक्षेरन पृथ्व्यिां सर्वमानवा:।।11-human-right-300
भारत में उत्पन्न हुए विद्वानों ने भूतल के मानव समाज को आचार और व्यवहार सिखाया। यह जीवट भरा संदेश दयानंद जैसे महापुरूष ने मृतप्राय जाति को सुनाकर जीवनदान दिया कि सारे संसार से लोग यहां शिक्षा लेने के लिए आते थे।
कपिल मुनि ने भी बड़ा अच्छा कहा है :-
उपदेश्योपदेशरत्वात तत्सिद्घिरन्यथान्ध-परंपरा
अर्थात अच्छे उपदेशक और श्रोता शुभ कर्मों के मार्ग को प्रशस्त करने के लिए सदविचारों के प्रचार में लगे रहते हैं तो संसार में धर्म की वृद्घि होती है, अन्यथा अज्ञान के अंधेरे में स्वार्थसिद्घि और भोग का वातावरण तैयार हो जाता है।
यह है मानवाधिकारों के रक्षण का सही स्वरूप। आज की स्थिति और परिस्थिति पर यदि प्रकाश डालें तो स्पष्ट हो जाएगा कि संसार में आजकल स्वार्थ सिद्घि और भोग का वातावरण ही बना हुआ है। कारण है कि हम लोगों ने स्वार्थसिद्घि और भोग की पुष्टि’ करने वाली पश्चिमी संस्कृति को अपना लिया है। सब ओर स्वार्थ और भोग की आग लग रही है और अज्ञानी मानवाधिकारवादी मानवाधिकारों को जलते जंगल में से ढूंढ़कर बाहर निकालने का अतार्किक प्रयास कर रहे हैं। आवश्यकता अधिकारों को खोजने की नही है अपितु कर्त्तव्यों को खोजने की है। सारी आग शांत हो जाएगी। मर्यादा से भटका सारा संसार मर्यादा के खूंटे से बंधकर अपनी सही परिक्रमा में घूमने लगेगा। जिसके लिए वेद ने सूर्या चंद्रमसाविव कहकर हमें निर्देशित किया है। अर्थात हम सूर्य और चंद्रमा की भांति अपने अपने मर्यादा पथ में रहें कभी एक दूसरे को क्षति पहुंचाने के लिए अथवा एक दूसरे के अधिकारों का अतिक्रमण करने के लिए अपने मर्यादा पथ का उल्लंघन न करें। अपितु एक दूसरे के सच्चे मित्र बनकर ‘योजयते हिताय’ के अनुसार सबको लोकहित के कार्यों में लगने के लिए प्रेरित भी करें।
महाभारत के इस श्लोक को सदा स्मरण रखें-
न जातु कामान्न भयान्न लोभात धर्म त्यजेत जीवितस्यापि हेतो:।
अर्थात किसी भी अवस्था में हम काम और लोभ के वशीभूत होकर अथवा भय से भी त्रस्त होकर अथवा मृत्यु का भी संकट उपस्थित होने पर धर्म का परित्याग न करें। सीधी सी बात है कि अपनी मर्यादा में रहें। अपने कर्त्तव्य का पालन करें। दूसरे के अधिकारों का सम्मान करना सीखें। परंतु आज क्या हो रहा है? आज मर्यादा की बातें की जा रही हैं और अधिकांश समाज मर्यादा से बाहर निकलकर अपने कार्यों का संपादन कर रहा है। जैसा कि किसी नीतिकार ने कहा है :- फ लं पापं नेच्छन्ति पापं कुर्वन्ति यत्नत:।
पाप के फल दुख को कोई नही चाहता किंतु फिर भी पाप पूरे यत्न से करता रहता है। इसी को नादानी कहते हैं। जिसकी इच्छा नही है उसी को पाने के लिए प्रयास करना। तब मानवाधिकारों की रक्षा कैसे हो सकती है? आज का तथाकथित सभ्य समाज इस प्रश्न पर सोचें। एक व्यक्ति, जो व्यवसाय से चिकित्सक है, फल सब्जी वाले से अपेक्षा करता है कि वह फल सब्जी अच्छी बेचें। किंतु स्वयं कितने ही लोगों को चांदी के चंद सिक्कों के लालच में अपंग बना देता है। (जैसा कि नोएडा में एक चिकित्सक ने स्वयं अपने ही विषय में स्वीकार किया है) जीवन रक्षक औषधियां बड़े महंगे स्तर पर देता है। निर्धनों को चिकित्सा की सुविधाएं उपलब्ध नही कराता। ऐसी स्थिति में उसका फल सब्जी वालों के प्रति चिंतन उचित नही है। वह विचार करे कि वह फल सब्जीवाला भी पैसे के उसी लालच के वशीभूत होकर दूसरों के जीवन से खिलवाड़ कर रहा है जिसके कारण तू स्वयं दूसरों के जीवन नष्ट कर रहा है। फल सब्जी वालों को चिकित्सक से शिकायत है और चिकित्सक को फल सब्जीवालों से। मानवाधिकारों के हत्यारे दोनों हैं। यही स्थिति हर क्षेत्र के लोगों की है। इससे पता चलता है कि मर्यादाहीन ही मानवाधिकारों का हन्ता बनता है। इसलिए आवश्यकता मात्र इस बात की है कि मर्यादा हीन समाज कर्त्तव्य को समझे। चिकित्सक फल सब्जीवालों की टोकरी के सड़े आम या टमाटर न देखें अपितु अपने कार्य पर ध्यान दें। इसी प्रकार फल सब्जीवालों के लिए अपेक्षित है। तभी मानवाधिकारों की रक्षा होगी।

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