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धर्म-अध्यात्म

ईश्वर न होता तो क्या यह संसार होता

ओ३म्
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हम अपनी आंखों से भौतिक जगत वा संसार का प्रत्यक्ष करते हैं। इस संसार में सूर्य, पृथिवी, चन्द्र व अनेक ग्रह-उपग्रह हैं। हमारे सौर मण्डल के अतिरिक्त भी सृष्टि में असंख्य व अनन्त लोक-लोकान्तर एवं सौर्य मण्डल हैं। यह सब आकाश में विद्यमान हैं और अपनी धुरी सहित अपने-अपने सूर्य-सम मुख्य ग्रह की परिक्रमा कर रहे हैं। विज्ञान व तर्क से यह सिद्ध है कि यह सृष्टि हमेशा से नहीं है। इसकी कभी न कभी उत्पत्ति हुई है। हमारी इस सृष्टि का आदि भी है और अन्त भी है। वैदिक मान्यताओं के अनुसार इस सृष्टि की रचना परमात्मा ने की है। 1.96 अरब वर्ष इस सृष्टि की रचना व अस्तित्व को हो चुके हैं। विज्ञान अभी तक सृष्टि के रचना काल पर शायद एक मत नहीं है। हमारा विश्वास है कि जब वह सही निर्णय लेगा तो वह अवश्य ही वैदिक मान्यताओं के अनुरूप ही होगा। हम विचार करते हैं कि सृष्टि परमाणुओं से बनी है। हमारे वैज्ञानिक ग्रन्थ दर्शनों के अनुसार इन परमाणुओं की रचना त्रिगुणात्मक अर्थात् सत्व, रज व तम गुणों वाली सूक्ष्म प्रकृति से हुई है। प्रकृति को पहले परमाणु रूप में रचा गया और उसके साथ व कुछ बाद इनसे इस सृष्टि व हमारी आत्मा के सूक्ष्म शरीर के अवयवों जिसमें अन्तःकरण चतुष्टय और अन्य सूक्ष्म रचनायें हैं, उनकी रचना भी हुई। अपने आप यह सृष्टि बन नहीं सकती। ऐसा कोई उदाहरण संसार में नहीं है कि जब कोई महद प्रयोजन से युक्त कोई रचना बिना किसी बुद्धि व ज्ञान से युक्त सत्ता वा रचयिता के द्वारा की गई हो। इस कारण इस सृष्टि की रचना सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, अनादि, नित्य, अमर, अविनाशी, इस सृष्टि से पूर्व भी अनन्त बार इसी प्रकार की सृष्टि को बनाने वाला, सर्वज्ञ, धार्मिक स्वभाव वाला, अपने नियम व सिद्धान्तों में कभी परिवर्तन न करने वाले परमेश्वर से हुई है।

हम विचार करते हैं तो पाते हैं कि यदि हमें प्रकृति के सूक्ष्म परमाणुओं से ही जल या किसी अन्य पदार्थ की कुछ थोड़ी सी मात्रा भी बनानी हो तो यह असम्भव सा कार्य है। परमात्मा ने असंख्य पदार्थों को प्रचुर व अकल्पनीय मात्रा में बना कर सृष्टि में प्रस्तुत व उलब्ध कराया है। इससे परमात्मा सर्वतोमहान सिद्ध होता है और उसकी महिमा अपरम्पार सिद्ध होती है। यही कारण है कि ईश्वर ने सृष्टि के आरम्भ मे वेदों का जो ज्ञान दिया है उसमें सृष्टि के रहस्यों सहित अपने स्वरूप का ज्ञान भी दिया है और बताया है कि हमें उस सुखस्वरूप परमेश्वर की उपासना उसके सत्य गुणों की स्तुति व प्रार्थना करते हुए करनी चाहिये। उपासना में परेमश्वर के मनुष्यादि प्राणियों पर अनन्त उपकारों को स्मरण भी करना चाहिये। मनुष्य वेदों का अध्ययन कर ही विद्वान बनता है। विद्वान मनुष्य विचार व चिन्तन कर ईश्वर के अस्तित्व व उसके मनुष्यों पर उपकारों को जानकर आश्वस्त होता है कि ईश्वर सभी मनुष्यों द्वारा वैदिक विधि से ही पूजनीय, स्तुति करने सहित ध्यान व उपासना करने योग्य है। यही कारण है कि प्राचीन काल से वर्तमान काल तक योगी व ऋषि आदि विचारशील मनुष्य ईश्वर के गुणों का ध्यान व चिन्तन कर उसका साक्षात्कार करते रहे हैं। इसका परिणाम होता है कि उपासक मनुष्य सत्कर्मों को करने तथा पाप कर्मों से सर्वथा दूर रहने के कारण ईश्वर विषयक सत्य ज्ञान को प्राप्त होकर जन्म व मरण के बन्धनों से छूट जाता है और वह आनन्द से युक्त मोक्ष अवस्था को प्राप्त हो जाता है। ऋषि दयानन्द ने भी योग विधि से ईश्वर का साक्षात्कार किया था और अपने जीवन में सत्कर्मों व ज्ञान की पराकाष्ठा से वह निश्चय ही मुक्ति को प्राप्त हुए थे, यह विदित होता है।

ईश्वर एक चेतन सत्ता है। चेतन को सुख व दुःख का अनुभव होता है। उसे सुख व दुःख के अनुभव सहित सांसारिक पदार्थों का ज्ञान भी होता है। इसके साथ ही चेतन पदार्थ में कर्म व पुरुषार्थ करने की सामर्थ्य भी होती है। जीवात्मा भी एक चेतन सत्ता वा पदार्थ है। चेतन होने के कारण ही हम शरीर से युक्त होकर ज्ञान प्राप्ति व सत्यासत्य कर्मों को करते हैं। ईश्वर एकदेशी व ससीम जीवात्मा की तुलना में सर्वज्ञ एवं सर्वव्यापक है। यही कारण है कि उसमें ज्ञान व कर्मों की पराकाष्ठा है। उसके लिये सृष्टि की रचना, उसका पालन व संहार करना तथा जीवों को उनके कर्मानुसार जन्म व मृत्यु प्रदान करने, उन्हें सुख व दुःख प्रदान करने में कोई कठिनाई नहीं होती। यह कार्य उसके लिये असम्भव नहीं अपितु सम्भव एवं सहज हंै। ईश्वर अपने स्वभाववश ही इन सब कामों को करता है जिन्हें करने में उसे कोई थकान व कष्ट आदि नहीं होता। जिस प्रकार हमारे श्वास-प्रश्वास चलते हैं और हमें इसका पता तक नहीं होता, उसी प्रकार से ईश्वर भी अपने सहज स्वभाव से इस सृष्टि की रचना व इसका पालन करता है। वह ज्ञान व आनन्द स्वरूप है, अतः उसे कभी क्लेश भी नहीं होता। क्लेश के जो कारण मनुष्य में पाये जाते हैं वह ईश्वर में नहीं घटते। इससे वह सदा आनन्द में रहता है और जो मनुष्य ईश्वर की भक्ति व उपासना आदि नियम व वेद विधि से करते हैं उनको भी ईश्वर का सान्निध्य वा सम्पर्क होने पर उनमें ज्ञान व आनन्द का संचार होता है। भक्ति व उपासन से जीवात्मा को अनेक प्रकार के लाभ होते हैं जिनमें अनेक प्रकार की सिद्धियां भी होती हैं जो कि ध्यान साधना में आगे चलकर प्राप्त होती हैं। ऐसा ईश्वर यदि संसार वा ब्रह्माण्ड में न होता तब यह संसार होता वा नहीं, इसका उत्तर देने की आवश्यकता नहीं है। सभी यह कहेंगे कि ईश्वर है तो उसका बनाया हुआ संसार है और यदि वह न होता तो संसार बन नहीं सकता था। उस स्थिति में प्रकृति व जीवों के होते हुए भी संसार के अस्तित्व में न आने पर जीवों को सुख व दुःख प्राप्त न होते और वह गहरी निद्रा में सोये रहते। हमारा यह सौभाग्य है कि पूर्वजन्मों के पुण्य कर्मों से हमें इस जन्म में परमात्मा ने मनुष्य का जन्म दिया है और हम भारत देश में उत्पन्न हुए हैं जहां वेद व ऋषियों के वेदों पर उपनिषद, दर्शन, मनुस्मृति आदि अनेक व्याख्यान उपलब्ध हैं जो हमें संसार के सभी सत्य रहस्यों का ज्ञान कराते हैं। यह ग्रन्थ व ज्ञान की पुस्तकें हमें दुःखों से मुक्त होने तथा ईश्वर को प्राप्त कर मोक्ष का आनन्द प्राप्त करने का मार्ग व उसके साधनों से भी परिचित कराते हैं।

हम संसार में जो अच्छी वस्तु देखते हैं तो दूसरों से पूछते हैं कि यह किस कम्पनी व व्यक्ति के द्वारा बनाई गई है। अच्छी चीजों की हम प्रशंसा करते हैं। यह प्रशंसा उन वस्तुओं को बनाने वालों की होती है क्योंकि हम जानते हैं कि सभी वस्तुयें किसी न किसी व्यक्ति के द्वारा बनाई गई हैं। मशीनों से बनी वस्तुओं को भी वस्तुतः मनुष्य ही बनाता है। मनुष्य ही मशीन का आविष्कार करता है तथा मनुष्यों को चलाता भी मनुष्य ही है। अतः मशीन से बनी वस्तु भी मनुष्य द्वारा बनी वस्तु होती है। इसी प्रकार से हमारी यह सृष्टि व उसके सभी पदार्थ भी स्वतः बने हुए नहीं हैं अपितु किसी ज्ञानयुक्त चेतन सत्ता द्वारा बनाये गये हैं। उस रचयिता जिसने इस अपौरुषेय सृष्टि को बनाया व संचालन कर रहा है, उसी को परमेश्वर कहते हैं। परमेश्वर का सत्य ज्ञान वेदों में ही प्राप्त होता है। उस ज्ञान को प्राप्त होकर मनुष्य विज्ञानपूर्वक ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना व उपासना कर ईश्वर की निकटता को प्राप्त होता है जिससे उसके सभी उचित प्रयोजन सिद्ध हो जाते हैं। उसको अभय सहित आत्मिक बल की प्राप्ति होती है। वह ज्ञानयुक्त हो जाता है। उसके मन से मृत्यु का भय भी निकल जाता है। मृत्यु उसके लिये ऐसी एक घटना होती है जिसमें मनुष्य पुराने वस्त्र को त्याग कर नये वस्त्र पहनता वा बदलता है।

यही कारण था कि हमारे ऋषि, मुनि व योगी, चिन्तक, विचारक तथा उपासक संसार के भौतिक सुखों को तुच्छ समझते थे और वेदाचरण व सदाचारण में ही अपना जीवन व्यतीत करते थे। आज इसी जीवन पद्धति की सबसे अधिक आवश्यकता है। विज्ञान ने हमें प्रदुषण व स्वार्थ बुद्धि प्रदान की है जो मानवता के लिये हानिकारण व विनाशक है। यह ग्राह्य एवं प्राप्तव्य नहीं है। वैदिक धर्म एवं संस्कृति तथा अपरिग्रह युक्त ज्ञान व उपासना से युक्त जीवन ही वरेण्य है। इसी से हमें इस जन्म व परजन्म में सुख व शान्ति प्राप्त हो सकती है। हमें आत्म चिन्तन करना है। स्वाध्याय से हम सत्यासत्य का ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। सत्य ही वरेण्य एवं आचरणीय है। असत्य त्याज्य है। यही वैदिक जीवन का मूलमंत्र है। इसी कारण से वैदिक धर्म एवं संस्कृति सारे संसार में वरेण्य थी। इसी से इस संस्कृति में असंख्य ऋषि-मुनि व राम, कृष्ण, चाणक्य, विदुर, युधिष्ठिर सहित ऋषि दयानन्द उत्पन्न हुए हैं। ऐसे मनुष्य संसार के किसी मत, पन्थ, समुदाय या मजहब में नहीं हुए हैं। किसी के पास रामायण एवं महाभारत जैसा इतिहास भी नहीं है। मनुष्य श्रेष्ठ मनुष्य केवल वेदाचरण व सत्याचरण कर ही बन सकता है। मत-मतान्तरों का अनुयायी बन कर तो वह संकुचित व साम्प्रदायिक विचारों का प्रतिनिधित्व करता है जिसमें न तो सच्चा ज्ञान होता है न ही सच्ची उपासना। ऐसा जीवन अधिक श्रेयस्कर नहीं होता।

ईश्वर न होता तो हमारी यह सृष्टि व हम भी मनुष्य व प्राणी रूप में न होते। ईश्वर के हम सब आभारी एवं कृतज्ञ हैं। हम सबको मिलकर उसके सत्यस्वरूप को जानकर उसकी उपासना करनी चाहिये। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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