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भारतीय संस्कृति

अपने जीवन के जन्म और विवाह वर्षगांठ आदि अवसरों पर क्या कुछ करें

ओ३म्

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मनुष्य जीवन परमात्मा का जीवात्मा को सबसे उत्तम व महत्तम उपहार है। हम विचार करें कि क्या ऐसा उत्तम उपहार ईश्वर के अतिरिक्त कोई किसी जीवात्मा को दे सकता है? हम पाते हैं कि इससे उत्तम उपहार संसार में दूसरा कोई नहीं है। ईश्वर ने हमें यह उपहार इस जन्म में तो दिया ही है इससे पूर्व के अनन्त जन्मों में भी दिया है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वह अपने इस उपहार के बदले में हमसे कुछ भी अपेक्षा नहीं करता। वह चाहता है कि हम असद्कर्मों का त्याग कर सद्कर्म करें। ऐसा करना हमारे लिये ही हितकर एवं लाभप्रद होता है। इसमें ईश्वर का कोई निजी लाभ नहीं है। परमात्मा ने हमें चिन्तन, मनन व विचार करने के लिये मन व बुद्धि आदि करण दिये हैं। इनका उपयोग कर हम यह जान सकते हैं कि हम क्या हैं, कैसे हैं और ईश्वर क्या व कैसा है? हम विचार न भी करें, केवल ऋषियों के ग्रन्थों सत्यार्थप्रकाश आदि का अध्ययन ही कर लें तो हमें ईश्वर और जीवात्मा सहित इस सृष्टि के अधिकांश रहस्यों का ज्ञान हो जाता है। यह बात कहने में तो सरल है परन्तु हम भौतिक सुखों के पीछे भागते हुए इन बातों पर विचार करना ही भूले रहते हैं। हमें कोई गलत व सही कुछ भी बता दे जिस पर हमारी अन्धी आस्था हो तो हम उसे तुरन्त स्वीकार कर लेते हैं। ऐसा करते हुए हम अपने ज्ञान, बुद्धि, विवेक, अध्ययन आदि का भी ध्यान नहीं रखते। यही कारण हैं कि संसार अविद्या से भरा हुआ है। जो लोग आर्यसमाज से जुड़े हैं और ईश्वर, वेद, आत्मा आदि विषयों को जानते व समझते हैं, पंच-महायज्ञों का महत्व भी जानते हैं उनके भी यदि जीवन में झांका जाये तो वह लोग भी अपने ज्ञान के अनुसार अपना जीवन यापन करते हुए बहुत कम ही मिलेंगे। हम अनेक महत्वपूर्ण बातों की उपेक्षा कर धन कमाने व सुख भोग में लगे हैं। ऐसा हम कर तो रहे हैं परन्तु यह हमारे लिये सर्वथा उचित नहीं है।

हम अल्प बुद्धि वाले मनुष्य हैं। हमें सौभाग्य से जीवन में आर्यसमाज से जुड़ने का सुअवसर मिला। हमने विद्वानों के प्रवचनों को सुनकर व कुछ पुस्तकों को पढ़कर विचार किया तो पाया था कि आर्यसमाज के विचार, मान्यतायें एवं सिद्धान्त सत्य एवं यथार्थ हैं। इसके विपरीत संसार के विभिन्न मत-मतान्तरों में जो भी मान्यतायें, व्यवहार व परम्परायें हैं वह अविद्या से युक्त एवं अयथार्थ हैं। उनको करने से स्वयं को व समाज को लाभ नहीं अपितु हानि होती है। हमारे पतन, अवनति, पराभव तथा परतन्त्र होने के कारणों पर विचार करते हैं तो हमें इसकी नींव में अविद्या व हमारे अज्ञान व अन्धविश्वासों से युक्त कर्म व आचरण ही दृष्टिगोचर होते हैं। यदि हमारे पूर्वजों ने सत्यासत्य पर विचार कर अपने कर्मों का निर्धारण किया होता, सत्य का ग्रहण और असत्य का त्याग किया होता, अपने स्वार्थों को अपने कर्तव्यों पर अधिकार न करने दिया होता और हमने देश व समाज के हित के कार्यों को करने का महत्व जाना होता और उन्हें किया होता तो इतिहास में हमारे पूर्वजों व हमारी जाति को जो पराभव के दुर्दिन झेलने पड़े हैं, वह कदापि नहीं होते। यदि हम सजग रहते, स्वकर्तव्यों का चिन्तन और उसका पालन करते तो ऐसा होने पर संसार में बुराईयों का जन्म ही न होता। आज तो स्थिति यह लगती है कि बुराईयां इतनी अधिक हो गई हैं कि हम उनसे अपनी मनुष्य जाति, अपने बन्धु-बान्धव, अपने धर्म व सस्कृति सहित स्वदेश की रक्षा करने में भी असफल एवं अयोग्य सिद्ध हो रहे हैं। अतः हमें अपने पूरे जीवन के सभी कर्तव्यों कर्मों को सत्यासत्य की दृष्टि से विचार कर और सन्मार्गदर्शी सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ का अध्ययन कर उससे मार्गदर्शन प्राप्त कर तथा अपने जीवन में उसके अनुरूप सुधार करना चाहिये और ऐसा ही दूसरों का भी मार्गदर्शन करना चाहिये। यदि हम ऐसा नहीं करेंगे तो हमें लगता है कि हम केवल इतिहास बन कर रह जायेंगे और उस इतिहास को भी मानवता के शत्रु जिनकी संख्या कम नहीं है, ऐसा नष्ट करेंगे कि भविष्य में शायद कोई यह जानेगा भी नहीं कि कभी संसार में वेद और ऋषियों के ग्रन्थ थे, राम, कृष्ण व ऋषि होते थे, कभी इस देश में दयानन्द, चाणक्य, सरदार पटेल, नेताजी सुभाष चन्द्र बोस आदि महापुरुष भी हुए थे।

शिक्षा व संस्कार ही किसी समाज व देश सहित जाति की रक्षा करते हैं। हमारी शिक्षा और हमारे संस्कार पहले अज्ञान ने व पुराणों ने तथा उसके बाद अविद्यायुक्त पौराणिक मान्यताओं, अन्धविश्वासों, पाखण्डों, कुरीतियों तथा इसके साथ ही अविद्यायुक्त मत-मतान्तरों ने बदल दिये और उनके कारण हमारी जति अज्ञान व स्वार्थ सहित सुविधाभोगी बन गयी। आज की हमारी जाति के लोगों को ईश्वर, आत्मा और अपने पूर्वजन्म व परजन्मों पर विचार करने की आवश्यकता अनुभव नहीं होती। ईश्वर के प्रति कर्तव्यों, उसके ऋण से उऋण होने की बात करने तथा अपनी आत्मा को असत से दूर व सत्य में रमण कराने की बात करना तो आज अप्रासांगिक ही हो गया है।

मनुष्य अपने जीवन के जन्म दिवस, विवाह की वर्षगांठ आदि महत्वपूर्ण अवसरों पर प्रथम कर्तव्य के रूप में तो ईश्वर व आत्मा के स्वरूप पर विचार कर ईश्वर के जीवात्मा पर उपकारों का चिन्तन करें। ऋषि दयानन्द के लघु ग्रन्थ आर्याभिविनय के कुछ मन्त्रों के अर्थों का अध्ययन व उन पर विचार करे। सत्यार्थप्रकाश के सातवें एवं प्रथम समुल्लास के कुछ भाग का पाठ भी करें। सन्ध्या के मन्त्रों का अर्थ सहित पाठ व जितना हो सके ईश्वर के सत्यस्वरूप का ध्यान कर उससे स्तुति-प्रार्थना-उपासना के आठ मन्त्रों से प्रार्थना करे और विश्वास रखे कि ईश्वर ने उसकी प्रार्थना को सुना व जाना है और उसकी पात्रता के अनुरूप उसको लाभ मिलेगा। अग्निहोत्र देवयज्ञ प्रत्येक मनुष्य को प्रत्येक शुभ अवसर पर अपने प्रिय परिवार जनों के साथ मिलकर अवश्य करना चाहिये। इससे हम अपने कर्तव्य का आंशिक रूप से पालन करने के साथ बहुत से प्राणियों को शुद्ध प्राणरक्षक वायु का दान करते हैं। इससे बड़ा दान शायद और कुछ नहीं हो सकता। यही कारण है कि प्राचीन काल से भारतीय संस्कृति और अग्निहोत्र यज्ञ दोनों एक दूसरे की पहचान बन गये। यज्ञों में विकृतियों व हिंसा आदि की घटनाओं के कारण न केवल वैदिक धर्मियों का अपितु पूरे विश्व में मनुष्य जाति का पतन हुआ। आज भी यह पतन अपने विस्तार को प्राप्त है।

वर्तमान समय में ज्ञान व बुद्धि की क्षतमाओं में वृद्धि होने पर भी शिक्षित मनुष्य अग्निहोत्र यज्ञ के महत्व को जान नहीं पा रहे हैं। यह विश्व का एक आश्चर्य है। देश में यज्ञ करने के लिये आज शुद्ध गोघृत मिलना दुर्लभ व प्रायः असुलभ हो गया है। यह आधुनिकता के युग की उपलब्धि है। क्या हमने यही उन्नति की है मांसाहारियों के कारण आज हम शुद्ध गोदुग्ध व गोघृत के लिये तरसते हैं? विज्ञान की उन्नति का यह एक अभिशाप है। हमने गो आदि पशुओं के महत्व तक को नहीं समझा। आत्मा व ईश्वर को तो हम क्या समझेंगे? जो लोग आज के विज्ञान के युग में पशुओं की हत्या और उनके मांस के आहार को बुरा नहीं मानते व इन घटनाओं में भागीदार हैं, उन्हें मनुष्य कहना उचित प्रतीत नहीं होता। मनुष्य तो वह होता है जो न केवल मनुष्य अपितु पशु-पक्षियों व अन्य जीव-जन्तुओं के प्राणों वा जीवनों की रक्षा करने वाला हो। जो रक्षा करने के स्थान पर अन्य प्राणियों की हत्या कर उनका मांस खाये, वह किसी भी दृष्टि से मनुष्य कोटि में आता दिखाई नहीं देता। सच्चे वैदिक विद्वान ही जान सकते हैं कि ऐसे लोगों को ईश्वर क्या दण्ड देगा? हमें मनुष्य बनने के लिये ही सत्यार्थप्रकाश, वेद, उपनिषद, दर्शन, मनुस्मृति, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, आर्याभिविनय, संस्कारविधि आदि ग्रन्थों का अध्ययन करना है। इनके अध्ययन से ही मनुष्य मनुष्य बन सकता है। यदि ऐसा नहीं करेंगे तो हमारा मनुष्य जन्म लेना निरर्थक व व्यर्थ होगा। हम यदि स्वयं को मनुष्य कहते हैं तो हमें अन्य प्राणियों के सुख व दुःखों को भी स्वात्मवत् अनुभव करना चाहिये और किसी को दुःख न देने के साथ उनको किसी प्रकार का दुःख न हो, इसका ध्यान रखना चाहिये और इसके प्रयत्न भी करने चाहियें। महर्षि दयानन्द, स्वामी श्रद्धानन्द, पं. गुरुदत्त विद्यार्थी आदि आर्यपुरुषों का जीवन आदर्श जीवन था जिससे संसार के सभी लोग शिक्षा व प्रेरणा ले सकते हैं।

अपने जन्म दिवस, विवाह की वर्षगांठ आदि उत्सव मनाते हुए हमें विचार, चिन्तन, मनन करने के साथ विवेकपूर्वक सत्य ऋषि परम्पराओं का अनुकरण व अनुसरण करना चाहिये। हम सन्ध्या, अग्निहोत्र यज्ञ, निर्धनों को प्रचुर दान तथा सभी सत्कर्मों को करते हुए अपने निजी जीवन के जन्मदिवसादि पर्वों व उत्सवों को मनायें। ऐसा करने से निश्चय ही हमारी आत्मा और जीवन की उन्नति होगी और इससे हमारा परजन्म भी सुधरेगा व उन्नति को प्राप्त होगा। सन्ध्या करने से आत्मा और परमेश्वर का साक्षात्कार किया जा सकता है व होता है। यज्ञ से वायु व जल की शुद्धि सहित इससे मनुष्य की सभी उचित शुभकामनायें व इच्छायें पूर्ण होती हैं। मातृ-पिता की सेवा करने से उनके आशीर्वाद से भी मनुष्य का जीवन सुखी होता है। इसका करना इसलिये भी आवश्यक होता है आने वाले दिनों में हम स्वयं माता-पिता व वृद्ध होंगे और हमें अपने बच्चों की आर्थिक तथा उनसे शारीरिक सेवा आदि की सहायता होगी। हमने यदि अपने माता-पिता की होगी तभी हम अपने बच्चों से अपनी सेवा की अपेक्षा कर सकते हैं। पशु-पक्षियों को परमात्मा ने अपने पूर्वजन्मों के कर्मों का फल भोगने और इस जन्म में मनुष्य आदि प्राणियों को सहयोग एवं जीवन के आवश्यक साधन उपलब्ध कराने के लिये उत्पन्न किया है। हम इनसे जो सेवा व लाभ लेते हैं उसके प्रति हमें इनका कृतज्ञ होने के साथ इनके सुखो का ध्यान रखते हुए इन्हें यथासम्भव सुख सुविधायें प्रदान करनी हैं। इसी प्रकार से हमें अपने आचार्यों, वृद्धों, ज्ञानियों, समाजोपकारी व्यक्तियों सहित देश व समाज के हितकारी लोगों को भी नमन करने के साथ उनको मन, वचन व कर्म से सहयोग व सहायता करनी चाहिये। ऐसा करने से हमें लाभ होगा। इससे समाज को भी लाभ होगा। हम दान के जितने अधिक कार्य करेंगे उतना अधिक हम यशस्वी होंगे। जीवन में यश प्राप्त करना ही मनुष्य की बहुत बड़ी सम्पत्ति होती है जिसे व्यक्ति के मरने के बाद भी लोग स्मरण रखते हैं जैसे कि हम ऋषि दयानन्द और स्वामी श्रद्धानन्द जी आदि महामानवों को स्मरण करते हैं। हम सत्य मार्ग के पर्याय वेद मार्ग पर चलें। यही जीवन की सफलता का मार्ग हैं। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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