आर्य समाज देहरादून का दिनांक 19 जनवरी 2020 का साप्ताहिक सत्संग

ओ३म्

“गुरु वह होता है जो अपने भक्तों को परमात्मा से जोड़ता हैः शैलेशमुनि सत्यार्थी”
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हमें आज दिनांक 19-1-2020 को आर्यसमाज धामावाला, देहरादून के साप्ताहिक सत्संग में जाने का अवसर मिला। इसका एक कारण आर्यसमाज में हरिद्वार के सुप्रसिद्ध आर्य विद्वान श्री शैलेश मुनि सत्यार्थी जी का व्याख्यान था। प्रातः आर्यसमाज की यज्ञशाला में सामूहिक यज्ञ, सभागार में भजन एवं सामूहिक प्रार्थना सम्पन्न की गई। इसके बाद ऋषिभक्त एवं ओजस्वी वक्ता श्री शैलेश मुनि सत्यार्थी जी का प्रवचन हुआ। श्री सत्यार्थी ने कहा कि परमात्मा सभी प्राणियों के सब कर्मों का न्यायपूर्वक फल प्रदाता है। परमात्मा ने ही हम सब प्राणियों के शरीरों को बनाया है। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार से कम्प्यूटर की चिप होती है उसी प्रकार हमारा चित्त होता है जिसमें हमारे कर्मों की स्मृतियां संचित रहती है। विद्वान वक्ता ने कहा कि परमात्मा को बाह्य आडम्बर पसन्द नहीं है। परमात्मा हमारे हृदयों की पवित्रता को देखता है। परमात्मा हमारे कर्मों का साक्षी होता है। हमारे सभी कर्म उसकी स्मृति में रहते हैं। वह किसी प्राणी के किसी कर्म भूलता नहीं है। हमारे उन शुभ और अशुभ कर्मों का फल परमात्मा हमें जन्म-जन्मान्तरों में प्रदान करता है।

आर्यसमाज के प्रवर विद्वान एवं प्रभावशाली व्यक्तित्व के धनी आचार्य शैलेश मुनि सत्यार्थी जी ने कहा कि परमात्मा सब जगह विद्यमान है। उन्होंने कहा कि सब जगह पूजा नहीं हो सकती। पूजा वहीं होती है जहां हमारी आत्मा व परमात्मा दोनों विद्यमान हों। विद्वान वक्ता ने कहा कि परमात्मा तो सर्वव्यापक होने से सब जगहों पर विद्यमान है परन्तु हमारा आत्मा सब जगत पर नहीं है। अतः परमात्मा की उपासना का स्थान हमारी आत्मा है जिसके बाहर व भीतर परमात्मा विराजमान है। आचार्य सत्यार्थी जी ने कहा कि देश में हजारों की संख्या में मन्दिर हैं परन्तु वह परमात्मा के मन्दिर नहीं हैं। उन्होंने कहा कि परमात्मा का असली मन्दिर तो उपासक व भक्त का भक्ति से पूरित हृदय होता है। श्री शैलेश मुनि सत्यार्थी जी ने ऋषिभक्त श्रोताओं को बताया कि राम व कृष्ण भगवान नहीं अपितु भगवान के भक्त थे। राम भक्त हनुमान को भी उन्होंने ईश्वर का भक्त बताया। विद्वान वक्ता ने यह भी कहा कि हमने साईं बाबा को भगवान मानकर भूल की है। उन्होंने कभी स्वयं को भगवान व ईश्वर नहीं कहा। वह तो कहा करते थे कि सब मनुष्यों का स्वामी वा मालिक एक ईश्वर है। श्री सत्यार्थी जी ने कहा कि परमात्मा का संसार में एक ही मन्दिर है और वह है भक्त व उपासक का हृदय वा मन। उन्होंने एक भजन की पंक्तियां प्रस्तुत की ‘तेरे पूजन को भगवान बना मन मन्दिर आलीशान’ और कहा कि हमें अपने मन को आलीशान बनाना है।

श्री शैलेश मुनि सत्यार्थी जी ने कर्मफल व्यवस्था की चर्चा करते हुए कहा कि दो बालक एक ही समय में अलग अलग दो स्थानों पर जन्म लेते हैं। एक शिशु एक झोपड़ पट्टी में जन्म लेता है और दूसरा एक सेठ जी के घर में। सेठ जी के यहां उत्पन्न बच्चा सब सुविधाओं से युक्त होता है और झोपड़ पट्टी में पैदा होने वाला बच्चा सुख-सुविधाओं के लिये तरसता है। दोनों बच्चों की स्थितियों में यह अन्तर उन बच्चों के पूर्वजन्मों के कर्मों के कारण से है। आचार्य सत्यार्थी जी ने आगे कहा कि हम दूसरों को जो सुख आदि देते हैं वही हमें मिलता है। आचार्य जी ने सबको परमात्मा की उपासना करने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि हमारे जीवन में कष्ट आते और जाते रहते हैं। यदि कभी किसी कष्ट के आने पर उसका कारण जानना हो तो परमात्मा के सान्निध्य में बैठ कर अपने पूर्व जीवन पर दृष्टि डालनी चाहिये। इससे हमें अनुमान हो जाता है कि हमने अवश्य कोई अशुभ काम किया था। आचार्य सत्यार्थी जी ने कहा कि मनुष्य जो बोता है वही उसे मिलता है। इससे सम्बन्धित एक दृष्टान्त भी आचार्य जी ने श्रोताओं को सुनाया। उन्होंने बताया कि जब राजा दशरथ की मृत्यु होने को आयी तो उन्हें अपने अतीत के जीवन का एक प्रसंग याद आया जिसमें उन्होंने वन में शिकार खेलते हुए एक शब्द भेदी बाण चलाया था जिससे मातृ-पितृभक्त पुत्र श्रवण कुमार की मृत्यु हो गई थी। इस घटना से श्रवणकुमार के नेत्रान्ध माता-पिता को असह्य पीड़ा व दुःख हुआ था और उन्होंने राजा दशरथ को श्राप देकर अपने प्राण त्याग दिये थे। दशरथ जी ने बताया था कि उनके पुत्र राम व लक्ष्मण आदि से वियोग का कारण वही घटना थी। आचार्य सत्यार्थी जी ने भीष्म पितामह की शर-शय्या की चर्चा कर बताया कि उनके शरीर में सर्वत्र जो बाण लगे थे उसका कारण भी उनके पूर्वजन्म के कर्म थे। आचार्य जी ने उस पूरी घटना को सुनाया और कहा कि भीष्म के पूर्वजन्म की वह घटना एक सर्प से जुड़ी थी जिसे उन्होंने उनके रथ के मार्ग में आने पर वायु-बाण से दूर फेंक दिया था। वह सर्प कांटों के एक वृक्ष पर जा गिरा था जहां उसे भीष्म जी को बाणों की पीड़ा के समान ही पीड़ा हुई थी। श्री सत्यार्थी ने कहा कि मनुष्य को अपने किये हुए कर्मों का फल भोगना ही पड़ता है।

श्री शैलेश मुनि सत्यार्थी जी ने प्रभु आश्रित जी की पुस्तक ‘डरो वह परमात्मा बड़ा जबरदस्त है’ की चर्चा भी की और उसे पढ़ने की सलाह दी। विद्वान वक्ता ने कहा कि गुरु वह होता है जो अपने भक्तों को परमात्मा से मिलाता व उससे जोड़ता है। सच्चा गुरु अपने शिष्यों को ईश्वर प्राप्त कराने के मार्ग में बाधा नहीं बनता। उन्होंने कुछ आधुनिक गुरुओं व उनके दुष्कर्मों की चर्चा की और कहा कि अनेक गुरु जेलों में बन्द है और चक्की पीस रहे हैं। उन्होंने इसे उनके दुष्कर्मों का परिणाम बताया। आचार्य सत्यार्थी जी ने यह भी कहा कि उन गुरुओं के पास अथाह धन सम्पत्ति है। वह भी उनकों जेल जाने से बचाने में काम नहीं आयी। श्री सत्यार्थी जी ने माता-पिताओं को अपने बच्चों को अच्छे संस्कार देने की अपील की। श्री सत्यार्थी ने कहा कि परमात्मा सृष्टि के आरम्भ में वेदों के माध्यम से सब विद्याओं का ज्ञान देता है। इस विषय को श्रोताओं को उन्होंने विस्तार से समझाया। उन्होंने वेदों का अध्ययन करने की सलाह दी और कहा कि वेद मनुष्यों को जीने की श्रेष्ठ कला बताते हैं।

श्री शैलेश मुनि सत्यार्थी जी ने कहा कि वेदों में सब प्रकार का ज्ञान निहित है। उन्होंने कहा कि मुसलमान व ईसाई सब अपने घरों में कुरान व बाइबिल रखते हैं परन्तु आपके घरों में क्या वेद और सत्यार्थग्रन्थ हैं? यदि नहीं हैं तो आपको शीघ्र इनका प्रबन्ध करना चाहिये और इनका अध्ययन भी करना चाहिये। आचार्य सत्यार्थी जी ने श्रोताओं को ईश्वर के पांच कार्यों के विषय में बताया। उन्होंने कहा कि ईश्वर सृष्टि को बनाता है। उसका दूसरा काम सृष्टि का पालन और तीसरा काम सृष्टि की प्रलय करना है। ईश्वर चैथा काम यह करता है कि वह सब जीवों को उनके सभी कर्मों का पूरा-पूरा सुख व दुःख रूपी फल जन्म-जन्मान्तरों में देता है। ईश्वर का पांचवा मुख्य काम है सृष्टि के आरम्भ में वेदों का ज्ञान देना। ईश्वर समस्त संसार की व्यवस्था देखता व उसे चलाता है। उन्होंने कहा कि परमात्मा सर्वव्यापक, निराकार, चेतन एवं आनन्दस्वरूप सत्ता है। उपासक द्वारा उसकी वैदिक विधि से उपासना कर अपनी आत्मा में साक्षात्कार किया जाता है। सब ऋषि-मुनि ईश्वर का साक्षात्कार करने में ही अपना समय लगाया करते थे। इसी के साथ आचार्य शैलेश मुनि सत्यार्थी जी ने अपने वक्तव्य को विराम दिया। आर्यसमाज के मंत्री श्री सुधीर गुलाटी जी ने श्री शैलैश मुनि सत्यार्थी जी की मुख्य मुख्य बातों को रेखंकित करते हुए उनके व्याख्यान की प्रशंसा की और उनका धन्यवाद किया।

आर्यसमाज धामावाला के प्रधान डा. महेश कुमार शर्मा ने ने आज का वेद विचार सूचित करते हुए बताया कि ’ईश्वर के ज्ञान व उसकी वैदिक आज्ञाओं का पालन ही देवत्व है।’ उन्होंने सभी बन्धुओं को मकर संक्रान्ति पर्व की बाधाईयां दीं। प्रधान जी ने आज अन्तरंग सभा की बैठक की सूचना भी दी। आर्यसमाज की नई सदस्या बहिन कविता गुसेरा जी का परिचय भी प्रधान डा. शर्मा जी ने सदस्यों को दिया। उन्होंने बताया कि आज खीर, पूरी व चाय आदि का प्रसाद आर्यसमाज के सदस्य श्री राधे श्याम खत्री जी को ओर से दिया जा रहा है। समाज के सदस्य श्री कर्नल दिनेश चन्द्र जी की 12 जनवरी, 2020 को 83 वर्ष की आयु में मृत्यु की सूचना भी सदस्यों को दी गई और दो मिनट का नाम रखकर दिवंगत आत्मा की शान्ति की प्रार्थना की गई। इसके बाद आर्यसमाज के दस नियमों का पाठ किया गया एवं शान्ति पाठ हुआ। प्रसाद वितरण के साथ ही आज का सत्संग समाप्त हुआ। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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