Categories
प्रमुख समाचार/संपादकीय

प्राकृतिक आपदा,स्वार्थपरक विकास और लुप्त मानवता

 

सिद्धार्थ मिश्र स्वतंत्र

केदारनाथ  में घटित अकल्पनीय प्राकृतिक त्रासदी के दंnewश सदियों तक इतिहास की तिथियों में याद किये जायेंगे। इस हादसे  ने लाखों लोगों को अपनी चपेट में ले लिया । जिनमें से हजारों  लोग अब तक अपने प्राण गंवा चुके हैं । इतिहास गवाह है कि ऐसे प्राकृतिक तांडव के मूल में कहीं न कहीं मनुष्य का लालच ही है । बावजूद इसके ये सर्वमान्य सत्य है कि ये समय घटना के कारणों के पडताल का नहीं वरन जिंदगियों को बचाने का है । मौसम विभाग के अनुसार आगामी ४८ घंटों दोबारा भीषण वर्षा के संकेत मिल रहे हैं । देखने वाली बात है कि इस तयशुदा समय सीमा में कितने प्राणों के दीप बुझने से बचा सकते हैं । इस भीषण दुर्घटना ने एक ओर यदि हमारे आपदा प्रबंधन की क्षमताओं की कलई खोल कर रख दी है तो दूसरी ओर हिमालय क्षेत्र में हुए अव्यवस्थित मानव विकास पर सवालिया निशान खडे कर दिये हैं ।

इस पूरे परिप्रेक्ष्य में हम स्वार्थपरक विकास और राजनीति के तुच्छ स्वार्थों से अपनायी गयी ध्वंसात्मक नीतियों को कत्तई नहीं भुला सकते । ये वही नीतियों हैं जिनके विस्तार ने देवभूमि को श्मशान भूमि में बदल दिया है । हालिया वर्षों में घटी दुर्घटनाओं को यदि चेतावनी मानें तो निश्चित तौर पर एक बडी प्राकृ तिक आपदा के मुहाने पर खडा है उत्तराखंड । इन सारी बातों से एक बात और स्पष्ट हो जाती है कि कहंीं न कहीं कुछ तो गलत अवश्य हुआ है जिससे कि इस हिमालय क्षेत्र का पूरा प्राकृतिक संतुलन बिगड गया है । स्मरण रहे कि वरीष्ठ पर्यावरणविद हेमवती नंदन बहुगुणा ने बहुत वर्षों पूर्व इस आशय से चेतावनी भी दी  थी । उन्होने पेडों की अंधाधुंध कटाई,कंक्रीट के जंगलों के विस्तार एवं टिहरी बांध समेत विभिन्न सरकारी योजनाओं का पुरजोर विरोध कि या था । बडे अफसोस की बात है उनकी बातों को तब सभी ने अनसुना कर दिया था ।

इस पूरी बात को यदि वैज्ञानिक आधारों पर देखें तो बातें और भी स्पष्ट हो जाएंगी । इस घटना को समझने के लिए हमें हिमालय के पारिस्थितिक तंत्र को समझना होगा । हिमालय क्षेत्र मुख्यत: वनों एवं पर्वतों का प्रदेश है । इस पूरे क्षेत्र को भूस्खलन से बचाने में वृक्षों की एक विशिष्ट भूमिका है । सदियों तक खडे रहने वाले ये वृक्ष दूर दूर तक फैली अपनी जडों से मिट्टी को बांधे रखते है । जहां तक वर्तमान परिप्रेक्ष्यों को प्रश्र है तो हिमालय के अनेक क्षेत्रों में अनियंत्रित एवं अत्यधिक खनन ने सीधे तौर पर वन क्षेत्रों को प्रभावित किया है । खनन के कारण ही इस क्षेत्र में भू्-स्खलन एवं बाढ की समस्याएं बढती जा रही हैं । ज्ञात हो कि खनन में प्रयुक्त होने वाले विस्फोटकों के बहुतायत प्रयोग से इस पूरे इलाके की भूमिगत संरचना बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गयी है । इस प्रक्रिया से एक भूतल का भीतरी विक्षोभ बढा है जिसका परिणाम हमें लगातार अस्तित्ववान प्राकृतिक विनाश लीलाओं के रूप में देखने को मिल रहा है । इस पूरे विषय में कोढ में खाज का काम किया निर्माणाधीन बांध परियोजनाओं ने । विदित हो कि इस पूरे क्षेत्र में सैकडों बांध बनाये जा रहे हैं । ये परियोजनाएं आज इस पूरे क्षेत्र के लिए संकट का पर्याय बन चुकी हैं । इन परियोजनाओं ने एक ओर जहां नदियों के नैसर्गिक मार्गों को रोका है तो दूसरी ओर परिक्षेत्र का पूरा भूगोल बदल डाला है । बांध बनाने के लिए पहाडों में सुरंग बनाने से पूरा उत्तराखंड पारिस्थितिक तौर पर खोखला हो गया है । अत: ये कहना अतिश्योक्ति न होगा कि इन सभी विकास कार्यों का परिणाम है इन प्राकृतिक आपदाओं की पुनरावृत्ति । ऐसे में अब वक्त आ गया है जब सरकार को निकटवर्ती स्वार्थ के बजाय दूरगामी भविष्य में आसन्न संकट को देखते हुए अपने विकास कार्यों की पुर्नसमीक्षा करनी ही होगी ।

ताजा मामले में घटना का एक अनकहा यथार्थ है,मानवीय मूल्यों का पतन । इस पूरे घटनाक्रम में जहां सरकार की गलत नीतियां जिम्मेदार हैं तो वहीं दूसरी ओर आम आदमी भी कम कुसुरवार नहीं है । आम आदमी का विभत्स स्वरूप के किस्से आज अखबारों की सुर्खियां बटोर रहे हैं । वास्तव में वर्तमान भौतिक युग में कहीं न कहीं मनुष्य के मूल चरित्र में लोभ का विस्तार हुआ है । यदि दूसरे शब्दों में कहें तो मानव के पेट की आग अब और नीचे वासना तक जा पहुंची है । बडे दुर्भाग्य की बात है कि समग्र वैश्विक इतिहास में हमें वासना की आग बुझाने का एक भी उदाहरण दृष्टिगोचर नहीं होता । सबसे दुख की बात है कि घटना के लगभग पांच दिनों बाद भी तीर्थ यात्री जान बचाने के लिए दर दर भटक रहे हैं । जहां तक सरकारी सहायता का प्रश्र है तो उसके विषय में लोगों का आक्रोश विभिन्न समाचार पत्रों एवं चैनलों पर साफ देखा जा सकता है । जहां तक प्रश्र है स्थानीय रहवासियों के सहयोग का निश्चित तौर पर उनके कृत्यों ने मानवता को शर्मसार कर दिया है । प्राप्त समाचारों के अनुसार दुर्घटनाग्रस्त इलाके में चोरी,ठगी और बलात्कार जैसी घटनाएं भी हो रही हैं जो नि:संदेह मानवीय मूल्यों के अवमूल्यन को दर्शाती हैं । घटना में जीवित बचे लोगों का कहना है कि स्थानीय लोगों ने मदद के स्थान पर पानी और भोजन देने के हजारों रूपयें ऐंठ लिये । बात यहां तक सीमित रहती तो फिर भी गनीमत थी लेकिन इसके अलावा कुछ स्थानों पर लूटपाट,बलात्कार एवं लाशों से गहने एवं जेब से पैसे निकालने जैसी घटनाएं भी प्रकाश में आयी हैं । आप ही बताइये क्या यही मानवता है ? सरकार को कोसने वाला आम आदमी किस मुंह से नैतिकता की दुहाई देता है ? हैरत होती है इस तरह की घटनाओं को देखकर ,क्या यही है मानवता का मूल चरित्र ? लोभ और स्वार्थ के संगम में तैर रहा मनुष्य वास्तव में इसी सजा का हकदार है । जहां तक धर्म का प्रश्र है तो शायद मानव के इसी विकृत स्वरूप की कल्पना के कारण ही वृक्षों,नदियों एवं जीव-जंतुओं को धर्म से जोडकर रखा गया था । ऐसे में ये मानवीय कृ त्य इस बात का प्रत्यक्ष है प्रमाण है कि धर्म विमुख होकर मनुष्य आज प्रकृति के स्थान विकृति के पाले में जा पहुंचा है । अंतत: हमें इस प्राकृतिक आपदा की चेतावनी को समझते हुए स्वार्थपरक विकास एवं लुप्तप्राय मानवता के मर्म को समझना ही होगा ।

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
betpark giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
vaycasino
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betpark
kolaybet
betgaranti
betpark
kolaybet
betpark
betpark
casibom giriş
casibom giriş
casibom
betnano giriş
betnano giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
betnano giriş
betpark
betpark
kolaybet giriş
betpark
betpark
betgaranti
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betpark
betpark
kolaybet
kolaybet
vaycasino
vaycasino
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
holiganbet giriş
holiganbet
bettilt giriş
bettilt giriş
harbiwin giriş
harbiwin giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betbox giriş
betbox giriş
vaycasino
vaycasino
vaycasino
vaycasino
Hitbet giriş
xbahis
xbahis
vaycasino
vaycasino