प्रेम वही जो मुक्त करता है
जो बाँधता है वह महापाश है

डॉ. दीपक आचार्य
9413306077
dr.deepakaacharya@gmail.com

मानवीय संवेदनशीलता के चरमोत्कर्ष से प्रेम का Untitled1जागरण होता है और यही प्रेम यदि सात्ति्वकता के धरातल पर आगे बढ़ता रहे तो आनंद अभिव्यक्ति का महास्रोत एवं शाश्वत आत्मतुष्टि के सारे द्वारों को खोल कर जीवन्मुक्ति का वरदान देता है।

लेकिन इसकी धाराओं में जरा सा भी विचलन अधोगामी वृत्तियों की ओर उन्मुख कर देने वाला है। वेग का घनत्व दोनों दिशाओं में बराबर होता है और इनका सामथ्र्य भी उतना ही होता है। लेकिन सिर्फ दिशा बदल जाने पर यह ऊध्र्वगामी अथवा अधोगामी हो सकता है।

जीवन में प्रेम का धरातल अनंत, आक्षिजित पसरा हुआ होता है जिसका कोई ओर या छोर नहीं हुआ करता लेकिन दूसरी अवस्था में यह सूई की नोक की तरह भी व्यवहार करने में सक्षम है। प्रेम की दशा और दिशाओं के मनोविज्ञान को समझने की कोशिश करें तो थोड़े से चिंतन से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि जहाँ प्रेम भौतिक दृष्टि से निश्छल, निष्कपट, निर्मोही और निरपेक्ष होता है वही स्थायित्व की सारी सीमाओें को पार करता हुआ आनंद की भावभूमि तक पहुँचा सकता है जहाँ अपना और जगत का सारा द्वैत भाव समाप्त होकर अद्वैत का अनुभव होने लगता है।

अद्वैत का यह आनंद सभी पक्षों में अनुभवित होता है और फिर इसके आगे महाआनंद का सेतु पार करने पर सीधे ईश्वरत्व या आत्मतत्व से साक्षात्कार किया जा सकता है। प्रेम और ईश्वर एक दूसरे के पर्याय हैं और दोनों के लिए पूर्ण समर्पण और शुचिता के साथ निरपेक्ष भावों का होना जरूरी है और ऎसा होने पर ही प्रेेम की परिपक्वता का माधुर्य रस प्राप्त हो सकता है।

जहाँ कहीं अपेक्षा और छल-कपट का भाव होता है वहाँ द्वैत से अद्वैत की यात्रा रूक जाती है और यह प्रेम सिर्फ भौतिक मानवी व्यवहार होकर रह जाता है जिसका अंतिम सत्य दुःख, शोक और विषाद के गलियारों तक पहुच कर जीवन के साथ ही अपने आप समाप्त हो जाता है।

हमारा लक्ष्य चाहे ईश्वर की प्राप्ति हो अथवा आत्म तत्व की, इन दोनों का ही मार्ग प्रेम और समर्पण की पगडण्डियों से होकर जाता है जहाँ कई सारे खतरों के बीच अपने लक्ष्य के प्रति एकाग्र होकर आगे बढ़ते जाने से ही श्रेय की प्राप्ति संभव हो पाती है। राह के खतरे और चुनौतियाँ हर दैवीय कर्म में आएंगी क्योंकि प्रकृति हमेशा परीक्षा लेती हुई बाधाओं के साथ निखारती है।

प्रेम का अर्थ किसी भौतिक वस्तु या व्यक्ति से लगाव का होना बिल्कुल नहीं है बल्कि संवेदनशीलता का वह चरम है जहाँ प्रेेम किसी एक से नहीं होता बल्कि जो लोग प्रेम तत्व को जान लेते हैं वे दुनिया में जड़-चेतन, जीव-जंगम सभी से प्रेम करने लगते हैं। उनके भीतर हर किसी के प्रति एक अजीब सा राग और आत्मीयता का समंदर हमेशा ज्वार उमड़ाता रहता है। फिर चाहे वह इंसान हो, पशु-पक्षी हो या फिर प्रकृति का कोई सा कारक।

प्रेम की परिपूर्णता ही इसी में है कि जहाँ प्रेम स्थान बना लेता है वहाँ ईष्र्या-द्वेष, शत्रुता, प्रतिस्पर्धा, मनोमालिन्य, कलुष और प्रतिद्वन्दि्वता के सारे भाव पूरी तरह समाप्त हो जाते हैं और इनका उन्मूलन भी ऎसा ठोस होता है कि इनके बीज तत्व तक चेतन-अवचेतन और हृदय से नष्ट हो जाते हैं। फिर इनके अंकुरण और पल्लवन की कहीं कोई संभावना किसी भी जन्म में शेष नहीं बचती।

प्रेम अपने आप में वह शीतल महाग्नि है जिसके भीतर प्रेम में बाधक तत्व और कलुष अपने आप भस्म हो जाते हैं। जो लोग प्रेम का आश्रय ग्रहण करते हैं, वे और प्रेम एक-दूसरे के पूरक हो जाते हैं और यही प्रेम उनकी जीवन्मुक्ति के महा आनंद का जयघोष करता रहता है।

जो बाँधता है उसे प्रेम नहीं कहा जा सकता है। प्रेम वह ब्रह्मास्त्र है जो समस्त बंधनों और पाशों को तोड़कर आत्मतत्व की प्राप्ति कराता है। सच्चा प्रेम वही है जो बाँधता नहीं, अपितु सभी प्रकार से मुक्त करता है। प्रेम करने का अर्थ किसी को अपना बनाए रखने के लिए उसे काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, अहंकार आदि के पाशों से बाँध कर अपने इर्द-गिर्द बनाए रखना नहीं है बल्कि प्रेम का सीधा और स्पष्ट अर्थ है मुक्त करना है।

जो एक-दूसरे को या कि दूसरों को किसी न किसी बहाने से बाँधता है, वस्तुतः वह प्रेम नहीं बल्कि मोहान्धता है और यही मोहान्धता प्रेमियों के जीवन में जड़ता लाती है। यही जड़ता फिर अंधकार की ओर ले जाती है तथा यही अंधकार मनुष्य की दुर्गति का कारण बनता है और इस गलती को सुधारने में कई जन्म तक कम पड़ जाते हैं।

इसलिए प्रेम को मुक्ति का महामंत्र मानें और यह शाश्वत सिद्धान्त बना लें कि जो हमें किसी न किसी रूप में बाँधने की कोशिश करता है, वह प्रेमी या प्रेमिका न होकर चतुर शिकारी से ज्यादा कुछ नहीं है। और जिस प्रेम में हम बँधे हुए महसूस करें,किसी संबंध या पाश में बंधने की घुटन जैसा लगे, तो समझ लें यह प्रेम नहीं होकर दिखावा और छल है अथवा मोह….।

आज का ‘लव’ शब्द प्रेम का पर्याय नहीं कहा जा सकता। इसकी सीमाएं भौतिकता तक को ही छू पाने में सक्षम हैं। यह शब्द प्रेम के मूल तत्वों से दूर बहुत दूर है और इसके उच्चारण के भरोसे प्रेमतत्व के महासागर का पता नहीं पाया जा सकता है,आनंद या ईश्वर की प्राप्ति की बात तो बहुत दूर है। प्रेम की गहराइयों और मूल मर्म को आत्मसात करते हुए जो लोग आगे बढ़ते हैं वस्तुतः उनका ही जीवन धन्य है और ऎसे लोग ही मानवीय संवेदनाओं की परिपूर्णता के सहारे जगत का कल्याण कर सकते हैं।

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