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धर्म-अध्यात्म

ईश्वर की उपासना दुखों के निवारण एवं सद्गुणों की प्राप्ति के लिए करते हैं

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अधिकांश मनुष्य प्रायः ईश्वर की भक्ति व उपासना करते हैं। संसार में अनेक प्रकार की उपासना पद्धतियां प्रचलित हैं। कुछ तो ऐसी हैं जो मनुष्य को मंजिल वा लक्ष्य से दूर भी करती हैं। उपासना करने का कारण भी अवश्य कुछ है? वह क्या है, इसका उत्तर वेद एवं वैदिक साहित्य पढ़ने के बाद सामने आता है। वह यह है कि ईश्वर सब गुणों, सुखों व आनन्द का स्रोत है। मनुष्य को यदि सद्गुणों की प्राप्ति करनी है तो वह उस स्रोत को पाने व उसमें स्नान कर ही प्राप्त हो सकते हैं। इसी के लिये हम ईश्वर की उपासना करते हैं। मनुष्य एक अल्पज्ञ प्राणी है। इस अल्पज्ञता के कारण वह अज्ञानतावश अथवा स्वाध्याय एवं सत्य गुणों के महत्व को न जानने के कारण स्वार्थ, काम, क्रोध, मोह, लोभ, इच्छा, द्वेष आदि दुगुर्णों व दुव्र्यसनों में फंस जाता है। इनसे मुक्त होने का एक ही उपाय है और वह है स्वाध्याय से दुर्गुणों व दुव्र्यसनों का ज्ञान प्राप्त कर ईश्वर की उपासना करना, उसके स्वरूप, गुण, कर्म व स्वभाव का ध्यान करके इन दुःख आदि से मुक्त होना है। जिस प्रकार हमारे वस्त्र मैले या दूषित होने पर हम उसे साबुन लगाकर रगड़ते व पीटते हैं, उसी प्रकार से परमात्मा का ध्यान व चिन्तन करने से परमात्मा हमारी आत्मा के दुर्गुणों व दुव्र्यसनों को चिन्तम-मनन व सत्यसंकल्प की धर्षण प्रक्रिया से दूर कर देते हैं और हमारा आत्मा दुर्गुणों से रहित व सद्गुणों से पूरित हो जाता है।

मनुष्य को दुर्गुणों को धारण करने से इस जन्म व परजन्म में भी हानि होती है और सद्गुणों वा सदाचार को धारण करने इस जन्म व परजन्म में लाभ होता है। सद्गुणों का धारण करने वाला मनुष्य सन्तुष्ट व प्रसन्न रहता है तथा दुर्गुणों से युक्त मनुष्य सदैव अप्रसन्न, भयातुर एवं दुःखी देखा जाता है। यदि एक मनुष्य दुःखी है तो उसकी परिस्थितियों व स्वभाव आदि सहित उसके जीवन पर दृष्टि डालने से उसके दुःखों के कारणों का अनुमान किया जा सकता है। मनुष्य के दुःखों का कारण सदैव अज्ञान सहित उसके अतीत व वर्तमान के अशुभ व पाप कर्म ही हुआ करते हैं। मनुष्य तो अपने अतीत के अधिकांश शुभ व अशुभ कर्मों को भूल चुका होता है परन्तु ईश्वर के ज्ञान व व्यवस्था में वह कर्म बिना भोगे नष्ट व निर्मूल नहीं होते। इन अशुभ व पाप कर्म का कारण मनुष्य के दुर्गुण व अशुभ कर्म ही हुआ करते हैं। इसी कारण इनको दूर करना आवश्यक होता है। वैदिक धर्म का प्रयोजन व आधार ही मनुष्य को सद्ज्ञान कराकर अशुभ व दुर्गुणों को दूर करना व उसे सद्गणों व सद्ज्ञान से युक्त करना होता है। हम जब विद्या प्राप्ति में पुरुषार्थ करते हैं तो यह हमारा सद्गुण व सद्कर्म होता है। इससे हमें वर्तमान व भविष्य में सुख मिलते हैं। यदि हमें यह ज्ञान हो कि विद्या प्राप्त करने के बाद हमें क्या क्या लाभ होंगे तो हम अवश्य ही विद्या प्राप्ति में पुरुषार्थ व तप करेंगे। आज का वातावरण ऐसा है कि न तो माता-पिता तथा न ही स्कूल व कालेजों में बच्चों को विद्या के महत्व की जानकारी दी जाती है। इसी के अभाव में मनुष्य दुर्गुणों से युक्त होकर दुःख पाता है। हमें इसके पीछे देश की शिक्षा नीति भी प्रमुख कारण प्रतीत होती है। यदि हमारी स्कूली शिक्षा में हमें वेद, दर्शन, उपनिषदों, सत्यार्थप्रकाश, व्यवहारभानु, गोकरुणानिधि तथा पंचमहायज्ञविधि आदि को पढ़ाया जाता तो हमारा जीवन वर्तमान जीवन से सर्वथा भिन्न एवं सत्य ज्ञान से युक्त होता। इस प्रयोजन की पूर्ति आर्यसमाज में जाने व ऋषि दयानन्द सहित आर्य विद्वानों के ग्रन्थों व लेखों को पढ़ने से होती है। स्वाध्याय, उपासना व ज्ञान का अभाव ही मुख्यतः हमसे पाप कर्म करवा रहा है हमारे हमें इस जन्म व परजन्म में दुःखों का कारण बन रहा है।

वेदों में कहा गया है कि विद्या अर्थात् सद्ज्ञान से मनुष्य को अमृत, सुख व मोक्ष की प्राप्ति होती है। अमृत का एक अर्थ यह भी है कि विद्या से मनुष्य अमृत अर्थात् मृत्यु पर विजय प्राप्त कर लेता है। जो मनुष्य अमृत को प्राप्त करता है उसका पुनर्जन्म न होकर वह मोक्षावस्था में ईश्वर के आश्रय से सुखों को भोगता है। यही कारण था कि आदि काल से हमारे पूर्वज ऋषि, मुनि, राम, कृष्ण, दयानन्द, पतंजलि, कपिल, कणाद, गौतम, व्यास आदि वेद मार्ग पर चलते हुए विद्या प्राप्ति और सदाचरण सहित ईश्वरोपासना, अग्निहोत्र-यज्ञ, परोपकार तथा समाज व देश हित के कार्यों को महत्व दिया करते थे। हमें इन सब विद्वान पूर्वजों के जीवन से शिक्षा लेनी है। यदि हम इनके जीवन व कार्यों का अनुकरण करेंगे तो हमें अवश्य ही लाभ होगा और हम इस जन्म व परजन्म में दुःखों से बच सकेंगे।

यह भी उल्लेख कर दें कि हमारा शरीर कार्य करने पर थक जाता है और उसे भूख लगती है। शरीर की भूख का निवारण भोजन, फल, दुग्ध व जल आदि से हो जाता है परन्तु हम यह विचार नहीं करते कि हमारी आत्मा को क्या चाहिये। वह किस वस्तु से सुखी व सन्तुष्ट होगी? हम अपनी आत्मा की आवाज उपेक्षा करते हैं। आरम्भ में तो आत्मा हमारे मन में अनेक प्रकार की शंकायें उत्पन्न करती है परन्तु जब इनका समाधान वा निवारण नहीं होता तो हम आत्मा में उठने वाले उन प्रश्नों की उपेक्षा करने लगते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि आत्मा में ईश्वर की प्रेरणा व स्वभाव से उठने वाली शंकायें होना बन्द हो जाती हैं। आत्मा में उठने वाली शंकायें यह संसार किसने, कब व कैसे बनाया, मैं कौन हूं, मृत्यु से पूर्व मैं कहां था, मरने के बाद मेरी आत्मा का अस्तित्व रहेगा या नहीं, यदि नहीं रहेगा तो आत्मा जिस चेतन तत्व से बना हुआ अनादि पदार्थ है, उसकी विकृति किस रूप में होगी? यदि आत्मा का अस्तित्व रहेगा तो क्या पुनर्जन्म होगा? होगा तो मैं मनुष्य ही बनूगां या किसी पशु, पक्षी, कीट, पतंग आदि देह वा योनि में भी जन्म ले सकता हूं या मनुष्य ही बनूगां? ऐसे सैकड़ों प्रश्न हैं जिसका उत्तर हमें वेद, दर्शन, उपनिषद, सत्यार्थप्रकाश, व्यवहारभानु तथा मनुस्मृति आदि ग्रन्थों के अध्ययन से प्राप्त हो जाता है।

हम भाग्यशाली हैं कि हमें इन विषयों का ज्ञान है। जिन मनुष्यों ने ऋषि दयानन्द के ग्रन्थों सहित इतर वैदिक साहित्य को पढ़ा है वह भी भाग्यशाली हैं। परन्तु यदि ऐसे बन्धु अच्छे धनाड्य भी हैं तो वह पूरे भाग्यशाली नहीं है। अत्याधिक धन सीमा से अधिक सुख का परिणाम होकर परिणाम में दुःख देने वाला होता है। अधिक धन दौलत से मनुष्य सुख की वस्तुयें तो प्राप्त कर सकता है परन्तु सुखोपभोग में सहायक इन्द्रियों को बलवान एवं निरोग नहीं रख सकता। प्रकृति का नियम है कि अधिक सुख व सुविधाओं से हमारा शरीर अस्वस्थ व निर्बल हो जाता है और इससे शरीर अधिक सुख भोग नहीं कर सकता। यही कारण हैं कि मनुष्य को भोगी नहीं योगी बनना चाहिये जब कि आज की स्कूल शिक्षा योग न सिखा कर प्रचुर मात्रा में भोग के साधनों को एकत्र करने की प्रेरणा करती है। मनुष्य इतने अधिक साधन व सम्पत्ति एकत्र कर लेता है कि उनका भोग भी नहीं कर पाता और मृत्यु आने पर सब कुछ छोड़ कर चला जाता है। उसकी कमाई यह वस्तुयें उसके साथ नहंी जाती। केवल अच्छे काम व पुण्य-पाप कर्म ही साथ जाते हैं। धनोपार्जन व सम्पत्ति अर्जित करने में उसे जो सत्य आचरण से विमुख होना पड़ता है उसका परिणाम कर्म-फल सिद्धान्त के अनुसार दुःखों के रूप में सामने आता है जो शारीरिक रोग व अन्य अनेक दुःखों के रूप में हो सकते हैं।

हमारे समाज में माता-पिताओं को अपने और अपनी सन्तानों के हित के लिये स्वयं भी पंचमहायज्ञ विधि का अध्ययन कर प्रातः व सायं ईश्वरोपासना तथा अग्निहोत्र-देव-यज्ञ करना चाहिये। इससे उनकी सन्तानों व परिवार के सभी सदस्यों पर अच्छे संस्कार पड़ेंगे। इसके अभ्यास से वह नास्तिकता से दूर रहेंगे। साथ ही वह अपने माता-पिता से प्राप्त संस्कारों व ज्ञान से अपने सभी कार्यों में सफलता प्राप्त करेंगे। उपासना वस्तुतः आत्मा और परमात्मा को जोड़ने व उन्हें आपस में मिलाने की एक क्रिया है। इस क्रिया को प्रतिदिन बिना बाधा दीर्घकाल तक करने से आत्मा के दुर्गुण, दुव्र्यसन और दुःख दूर हो जाते हैं। इससे आत्मा का ज्ञान भी बढ़ता है और सत्कर्मों को करने की प्रेरणा भी मिलती है। सद्कर्मों को करने में कर्ता को ईश्वर का सहाय प्राप्त होता है। ऋषि दयानन्द ने लिखा है कि उपासना से मनुष्य में निर्भीकता एवं साहस की वृद्धि होती है। उसकी दुःखों को सहन करने की शक्ति में वृद्धि होती है। बड़े से बड़े दुःख को भी वह आसानी से सहन कर सकता है। ऋषि के शब्दों में ‘पहाड़ के समान दुःख प्राप्त होने पर भी वह (भक्त व उपासक) घबराता नहीं है। क्या यह छोटी बात है?’ ऋषि दयानन्द ने जो कहा है वह सर्वथा सत्य है। अतः हमें दुःख पर विजय पाने के लिये ईश्वर की भक्ति व उपासना जिसमें योगाभ्यास, ध्यान व समाधि का अभ्यास सम्मिलित है, अवश्य ही करनी चाहिये। उपासना से आत्मा की भूख शान्त होती है। आत्मा अशुद्धियों से दूर होकर शुद्ध व पवित्र बनता है। ऐसे मनुष्य की आयु, विद्या, यश व बल सभी बढ़ते हैं। यह चार बातें ही मनुष्य की सबसे बड़ी पूंजी हैं। इन्हें उपासना सहित वृद्धों की सेवा करके भी प्राप्त किया जा सकता है। हमें यह भी अनुभव होता है कि जो मनुष्य उपासना नहीं करता वह वस्तुतः नास्तिक होता है और ईश्वर के उपकारों के प्रति कृतज्ञ न होकर कृतघ्न होता है। अतः अनेक लाभों को प्राप्त करने व कृतघ्नता से बचने के लिये उपासना अवश्य ही करनी चाहिये। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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