अविभाजित उत्तर भारत (पाकिस्तान का सिंध – पंजाब प्रांत) में “बसंत पंचमी” इस उत्सव तीन कारणों से याद किया जाता है। एक है पतंगबाजी की परंपरा और दूसरा है वीर बालक हकीकत राय जी का बलिदान और तीसरा है पीला रंग। ये दोनों “बसंत पंचमी” से इस कदर जुड़ गए हैं कि बसंत पंचमी का अर्थ ही इस दिन पतंग बाजी से हो गया है। उसमें भी यदि पीला, केसरी रंग न हो तो या पर्व ही अधूरा लगता है। इस दिन पीले चावल, पीले वस्त्र, पीली पतंगे धरती – आसमान को भगवामय बना कर वीरता, बलिदान, त्याग और तपस्या का एक ऐसा रोमांचकारी संगम बना देते हैं कि जिसके उत्साह का वर्णन करना आसान नहीं। इस रोमांच, उत्साह और आध्यात्मिक संदेश को सिर्फ वही सुन सकता है जो इससे गुजरा हो। आखिर क्या हुआ था उस बसंत पंचमी के दिन, जानते हैं नीचे।
बसंत पंचमी के दिन मुगल शासकों ने धर्म की रक्षा के लिए छोटे बालक हकीकत राय को मृत्युदंड दे दिया था, जिसकी याद में देश के कई स्थानों पर इस दिन “शहीदी मेले” लगते हैं। अपनी कुर्बानी देकर देश को धन्य करने वाले इस वीर बालक का जन्म 1719 में पंजाब के सियालकोट (अब पाकिस्तान में) के सम्पन्न व्यापारी परिवार में पिता भागमल के घर माता गौरां की कोख से इकलौती संतान के रूप में हुआ।
पिता चाहते थे कि बेटा पढ़-लिख कर अच्छी सरकारी नौकरी करे, परंतु फारसी सीखे बिना ऐसा संभव नहीं था। इसलिए पिता ने हकीकत को फारसी सीखने लाहौर एक मदरसे में भेज दिया। हकीकत के कुशाग्र बुद्धि होने के कारण मुस्लिम बच्चे हकीकत से ईर्ष्या करने लगे।
इसी दौरान हकीकत के माता-पिता ने गुरदासपुर जिला के बटाला नगर के कादी हट्टी मोहल्ले के किशन सिंह और भागवती की सुंदर, सुशील कन्या लक्ष्मी देवी से विवाह कर दिया। लेकिन बाल्यावस्था होने के कारण उनका गौना नहीं किया गया।
एक दिन जब मदरसे में जब मौलवी नहीं थे, तो मुस्लिम बच्चों ने हकीकत के सामने मां दुर्गा को अपशब्द कहे। जिसे किसी भी हिन्दू वीर द्वारा सहन करना असम्भव था। हकीकत ने भी कह दिया कि ऐसा ही मैं यदि तुम्हारी बीबी फातिमा के लिए कहूं तो तुम्हे कैसा लगेगा?
इस पर मुस्लिम बच्चों ने शोर मचा दिया कि हकीकत ने इस्लाम का अपमान किया है। बात सारे लाहौर में फैली तो मुस्लिम लोगों ने हकीकत के ” सर तन से जुदा” की मांग की। (ध्यातव्य है ऐसा ही वाकया एक हिंदू महिला नूपुर शर्मा के साथ हुआ था) हकीकत राय के माता-पिता और हिन्दू समाज ने दया की याचना की। तब अदीना बेग ने कहा यदि हकीकत इस्लाम कबूल ले तो उसकी जान बख्श दी जाएगी। किंतु उस 14 वर्ष के बालक हकीकत राय ने धर्म परिवर्तन करने से इंकार कर दिया।
परिणाम यह हुआ कि 1734 में बसंत पंचमी के दिन हकीकत राय को मृत्यु दंड दे दिया गया। जब हकीकत के शव का लाहौर में अंतिम संस्कार हो रहा था, ठीक उसी समय बटाला में उसकी 12 वर्षीया पत्नी लक्ष्मी देवी भी चिता सजा कर सती हो गई। बटाला में आज भी उनकी समाधि मौजूद है, जहां हर बसंत पंचमी पर मेला लगता है। ऐसा ही मेला लाहौर में वीर हकीकत राय की समाधि पर भी लगता है।
मुसलमानों ने इसे इस्लाम की जीत और हिंदुओं की हार के रूप में दिखाना चाहा। लेकिन, हिंदुओं ने वीर हकीकत राय के इस साहसी कदम को हिंदुत्व की जीत के रूप में देशभर में स्वीकार्यता दी और बसंत पंचमी के दिन पूरे आकाश को भगवा और पीले रंग की पतंगों से पाट दिया। धीरे धीरे यह एक परंपरा बन गई और एक आयोजन के रूप में हिन्दू मुसलमान दोनों इस परंपरा को मनाने लगे।
हालांकि मुसलमान इस दिन पतंगबाजी के मूल कारण को न जानकर इसे मनोरंजन हेतु मनाने लगे। यही कारण है, पाकिस्तान और बहुत से मुसलमान इस “कारण” को जानने के बाद मुसलमानों द्वारा इस दिन की जाने वाली पतंगबाजी के खिलाफ फतवा दे चुके हैं।
लेकिन उस समय हिंदुओं ने वीर हकीकत राय को श्रद्धांजलि देने का जो लोकतांत्रिक तरीका अपनाया वह अपने आप में एक मिसाल है। क्योंकि उस समय न लोकतंत्र था न ही लोकतांत्रिक दल। उस समय तो देश मुस्लिम नियंत्रण में था। जहां शरिया कानून ही सब कुछ था।
युवराज पल्लव

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