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इतिहास के पन्नों से

क्रांतिकारी श्यामजी कृष्ण वर्मा की जयंती के अवसर पर विशेष

आज क्रांतिकारियों के सिरमौर श्यामजी कृष्ण वर्मा की जयंती है । आज ही के दिन 1857 में , जो कि भारतीय इतिहास में क्रांति वर्ष के नाम से विख्यात है , हमारे इस क्रांति पुत्र का जन्म हुआ था । श्यामजी कृष्ण वर्मा ही हमारे वह क्रांति नायक हैं , जिनसे क्रांतिवीर सावरकर , मदन लाल धींगरा और उन जैसे अन्य अनेकों क्रांतिकारियों ने प्रेरणा प्राप्त कर भारत माता की अनुपम और अद्वितीय सेवा करते हुए भारत में सशस्त्र क्रांति का मार्ग प्रशस्त किया ।

श्यामजी कृष्ण वर्मा पहले भारतीय थे, जिन्हें ऑक्सफोर्ड से एम॰ए॰ और बार-ऐट-ला की उपाधियाँ मिलीं थीं। उनका संस्कृत भाषा पर बहुत अच्छा अधिकार था । जिसमें वह धाराप्रवाह भाषण भी दे सकते थे । यही कारण था कि उन्हें मोनियर विलियम्स ने उनके द्वारा पुणे में दिए गए भाषण से प्रभावित होकर ऑक्सफोर्ड में संस्कृत का सहायक प्रोफेसर बना दिया था।श्यामजी कृष्ण वर्मा का जन्म 4 अक्टूबर 1857 को गुजरात प्रान्त के माण्डवी कस्बे में श्रीकृष्ण वर्मा के यहाँ हुआ था। वह महर्षि दयानंद के स्वराज्य चिंतन से बहुत अधिक प्रभावित थे । स्वराज्य शब्द उन्हें महर्षि दयानंद के सत्यार्थ प्रकाश से मिला था । जिस पर वह अपने साथियों के साथ मिलकर चिंतन किया करते थे । उन्होंने 1888 में अजमेर में वकालत के दौरान स्वराज्य के लिए कार्य करना आरंभ किया ।

मध्यप्रदेश के रतलाम और गुजरात के जूनागढ़ जस्सी रियासतों के दीवान पद पर भी नियुक्त रहे वहां रहते भी उनका स्वराज्य चिंतन और उसके लिए किया जा रहा कार्य बाधित नहीं हुआ । इन्हीं से प्रभावित होकर महादेव गोविंद रानाडे ने महर्षि दयानंद के पुणे में 15 दिन के भाषण कराए थे , जो आजकल हमें ‘ उपदेशमंजरी ‘ नामक पुस्तक में पढ़ने को मिलते हैं । 1918 के बर्लिन और इंग्लैण्ड में हुए विद्या सम्मेलनों में उन्होंने भारत का प्रतिनिधित्व किया था।

श्यामजी कृष्ण वर्मा की प्रेरणा से ही स्वातंत्र्यवीर सावरकर ने 1857 की क्रांति को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम घोषित करते हुए उस पर अपनी सुप्रसिद्ध पुस्तक लिखी थी ।श्यामजी कृष्ण वर्मा ने 1905 में इंग्लैण्ड से मासिक समाचार-पत्र “द इण्डियन सोशियोलोजिस्ट” निकाला, जिसे आगे चलकर जिनेवा से भी प्रकाशित किया गया। इंग्लैण्ड में रहकर उन्होंने इंडिया हाउस की स्थापना की। भारत लौटने के बाद 1905 में उन्होंने क्रान्तिकारी छात्रों को लेकर इण्डियन होम रूल सोसायटी की स्थापना की। उस समय यह संस्था क्रान्तिकारी छात्रों के जमावड़े के लिये प्रेरणास्रोत सिद्ध हुई। क्रान्तिकारी शहीद मदनलाल ढींगरा उनके प्रिय शिष्यों में थे ।31 मार्च 1930 को जिनेवा के एक अस्पताल में वे अपना नश्वर शरीर त्यागकर चले गये। उनका शव अन्तर्राष्ट्रीय कानूनों के कारण भारत नहीं लाया जा सका और वहीं उनकी अन्त्येष्टि कर दी गयी। बाद में जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने देश के इस उपेक्षित क्रांतिवीर की ओर ध्यान दिया और उनकी अस्थियों को अथक प्रयास करने के पश्चात भारत लाने में सफल हुए । गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी का यह कार्य बहुत ही वंदनीय रहा । यह घटना 22 अगस्त 2003 की है जब हमारे इस क्रांतिवीर और उनकी धर्मपत्नी श्रीमती भानुमति कृष्ण वर्मा जी की अस्थियों को नरेंद्र मोदी भारत लाने में सफल हुए और भारत के राष्ट्रवादी लोगों ने अपने इस महानायक को अपना विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित की।

जब इन अस्थियों को भारत में लाया गया तो मुंबई से लेकर मांडवी तक एक भव्य जुलूस का आयोजन किया गया था । जिसमें सम्मिलित हुए लोगों का उत्साह और देशभक्ति देखते ही बनती थी ।गुजरात की नरेंद्र मोदी सरकार ने उनके जन्म स्थान को क्रांति तीर्थ के रूप में परिवर्तित किया । जिससे राष्ट्रवादी और राष्ट्रभक्त लोगों को बहुत ही अधिक आनंदानुभूति हुई । उनके इस मेमोरियल को नरेंद्र मोदी ने गुजरात का मुख्यमंत्री रहते हुए 13 दिसंबर 2010 को राष्ट्र को समर्पित किया था ।

इंग्लैंड में रहकर ही ‘ इंडिया हाउस ‘ की स्थापना कर वहां से क्रांतिकारी गतिविधियों को संचालित करने वाले और अनेकों क्रांति सपूतों को गढ़ने वाले अपने इस महानायक की जयंती के अवसर पर हम उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं ।डॉ राकेश कुमार आर्यसंपादक : उगता भारत

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