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  • सहदेव समर्पित

एक विदेशी विचारक ने कहा था कि दुनिया मेें और कहीं हो न हो भारत में भगवान अवश्य है। क्योंकि कोई भी इस देश को बसाना नहीं चाहता, फिर भी यह बसा हुआ है; यह किसी चमत्कार से कम नहीं है। नास्तिक विचार वाले लोग भगवान के बारे में जो मरजी कह देते हैं। उनकी भगवान से सबसे बड़ी शिकायत यह होती है कि इतनी गड़बड़ हो रही है फिर भी भगवान कुछ करता क्यों नहीं। इस ब्रह्माण्ड में इतना कुछ हो रहा है जो मनुष्य कर नहीं सकता फिर भी उन्हें यह सब दिखाई नहीं देता। लेकिन जो काम मनुष्य कर सकता है, मनुष्य को ही करने चाहिएँ, मनुष्यों के करने से ही उन कार्यों की सार्थकता है, उन कार्यों के लिए भगवान को दोष देता रहता है, और फिर एक नाजुक बच्चे की तरह कह देता है कि जा भगवान मैं तुझे नहीं मानता। तू है ही नहीं। भगवान को इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता है कि कोई उसे मानता है या नहीं। कोई उससे बात करे (उपासना) तो इससे उसको कोई लाभ नहीं होता। जो उससे बात करता है, वही इससे लाभ उठाता है। नास्तिक भी दुःख होने पर रोते बिलखते हैं, सुख होने पर खुश होते हैं। कोई गलत कार्य करते समय उनको भी कोई रोकने की प्रेरणा सी करता अनुभव होता है। अच्छा कार्य करने पर उनको भी आत्म-संतुष्टि मिलती है।

आज लगता है कि आस्तिक लोग नास्तिकों से ज्यादा नास्तिक हैं। उसे ईश्वर की सत्ता के स्पष्ट दिखाई देने वाले लक्षणों, युक्तियों, प्रमाणों से कुछ लेना देना नहीं है। उसे तो वह चमत्कार चाहिए जिसे वह चमत्कार समझता है। यह विराट् ब्रह्माण्ड, यह अद्भुत व्यवस्था, प्रकृति के नियम, कर्म-फल व्यवस्था, यह सृष्टि रचना– उसे चमत्कार नहीं लगता। ये तथाकथित आस्तिक लोग समोसे खाकर धन प्राप्ति या नौकरी मिलने को चमत्कार मानते हैं। कादियानी पैगम्बर ने भविष्यवाणी की थी किसी के मरने की। कई वर्ष बाद उस महापुरुष को छुरे से मार दिया गया। आज तक वे इसी को चमत्कार प्रचारित कर रहे हैं। आस्तिक कहलाए जाने वाले लोग अविवाहित स्त्री से संतान होना, मुरदे का जी उठना आदि चमत्कारों पर आधारित हैं। ये चमत्कार न हों तो उनकी आस्तिकता का आधार ही समाप्त हो जाता है। आप धार्मिक चैनल देखें। कोई गुरु, कोई भगवान? अपने आप को पूरा भगवान सिद्ध करने के लिए अपने अनुयायियों के अनुभव सुनवाने पर पर्याप्त समय खर्च करता है। आध्यात्मिक कही जाने वाली पत्रिकाओं में अनेक पृष्ठ इसी कार्य के लिए होते हैं। चेलों के जो अनुभव होते हैं वे इस तरह के नहीं कि हमारी इस तरह से आत्मिक उन्नति हो गई, हमने योग मेें यह गति प्राप्त कर ली, बल्कि चमत्कारों की साक्षियाँ होती हैं। असाध्य रोग ठीक हो गया, नौकरी मिल गई। व्यापार में लाभ हो गया– । यह आस्तिकता तो नास्तिकता से भी ज्यादा हानिकारक है।

आस्तिकता जीवन की आधारशिला है और आस्तिकता की आधारशिला है परमेश्वर की सर्वव्यापकता और न्याय व्यवस्था को जानना और मानना। अच्छी प्रकार जानकर ही मानने से कुछ लाभ हो सकता है। जो यह मानते और जानते हैं कि परमेश्वर न्यायकारी है, वह कर्मों का फल पूरा-पूरा देता है, और यह जानकर परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार आचरण करते हैं वे ही सच्चे आस्तिक हैं। वह परमेश्वर का भक्त और प्रशंसक भी है। जो यह सोचता है कि किसी व्यक्ति विशेष की सिफारिश से परमेश्वर हमारे पापकर्मों का फल नहीं देगा या पापों के बदले में सुख देगा– वह वास्तव में परमेश्वर का सबसे बड़ा निन्दक और नास्तिक है। आप्त पुरुषों के उपदेश से और परमात्मा की उपासना करने से हम आगे पाप करने से हट जाते हैं यह क्या कोई छोटा चमत्कार है।
यदि आस्तिक होने के बाद भी व्यक्ति के कर्म में सुधार नहीं आया तो आस्तिक होने का कोई अर्थ नहीं है। इसलिए आस्तिकता का मूल आधार है परमेश्वर की सर्वव्यापकता। परमेश्वर संसार के कण-कण में व्यापक है। हमारे हृदय में भी। वह किसी भी कार्य को करने से पहले, हमारे मन में संकल्प आते ही जान लेता है। वह हमारे अच्छे बुरे कर्मों को ठीक प्रकार से जानता है। उससे छुपकर कोई पाप नहीं किया जा सकता और पाप करने के बाद उसके दुःख रूप फल से किसी भी प्रकार से बचा नहीं जा सकता। — यही आस्तिकता की आधारशिला है। किसी चौथे, सातवें आसमान या किसी सतलोक में बैठा हुआ भगवान न तो हमारे कर्मों को जान सकता है और न फल दे सकता है। उसको वहाँ बैठाकर फिर हमें उसके संदेश वाहकों की कहानी बनानी पड़ती है। फिर इसकी जांच का चक्कर– कि कौन संदेशवाहक झूठा है कौन सच्चा? फिर इसके प्रमाण के लिए चमत्कार!! और ‘चमत्कार’ तो सारे ही करना जानते हैं।

संभवतः उस विदेशी विचारक ने ठीक ही कहा कि इस देश में कोई भगवान अवश्य है। कोई भगवान का दूत बनकर खा रहा है। अपने अपने अलग अलग भगवान् बनाकर खा रहे हैं।कोई भगवान को गाली देकर खा रहा है। भगवान की भक्ति से मिलने वाले आत्मिक आनन्द को प्राप्त करने के बारे में भी कोई सोचे तो सचमुच में चमत्कार हो जाए।

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