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आतंकवाद

नमन सिंदूर

22 अप्रैल की ढलती शाम में जिस पहलगाम की बैसरन घाटी में पाक प्रायोजित आतंकवाद ने सांप्रदायिक घृणा और धार्मिक विद्वेष बढ़ाने के लिए नरसंहार किया, उससे न केवल भारतीय आवाम बल्कि पूरा विश्व दुखी और स्तब्ध था। शासनिक प्रशासनिक चूक कहां हुई सवाल इसका नहीं, सवाल अवाम में यह उठा कि कब तक पाकिस्तान की इन नापाक आदमखोर नृंशस और बर्बर आतंकी करतूतों को झेलते रहेंगे। पूरा राष्ट्र एक साथ खड़ा हुआ और सरकार और सेना को राष्ट्र रक्षा, जन रक्षा और आतंकवाद को समूल उखाड़ने का समर्थन दिया और परिस्थिति के अनुसार निर्णय लेने का स्वतंत्र अधिकार दिया।

“कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना, छोड़ो कल की बातें।” अमर प्रेम फिल्म का यह गीत यही संदेश देता है कि युद्ध और प्रेम में आत्मालोचन कर स्वयं की अस्मिता गरिमा के अनुरूप हालातो और परिस्थितियों के अनुकूल गंभीर निर्णय लें। विगत दिनों में हमने मीडिया, सोशल मीडिया और जन संवादों में अनेकों तर्क वितर्क देखें सुने हैं। आरोप प्रत्यारोप राजनैतिक निष्ठाओं के आग्रहों के साथ उभरे और बरसाती बुलबुलों की तरह शून्य में विलय हो गए। सुखद यह रहा कि ना तो समाज में सांप्रदायिक घृणा विद्वेष या अनचाही घटनाऐं उभरी और ना ही दलो या संगठनों में लोग अपने कथनों में हदों से गुजरे। विश्व समुदाय भारत के पक्ष में मानवता की रक्षा में पुरजोर समर्थन देता दिखाई दिया। हां, आदतन विस्तारवादी नीतियों के आग्रहों से ग्रस्त कुछ राष्ट्र भारत के समर्थन में किंतु परंतु करते दिखाई अवश्य दिए। लाशों में व्यापार खोजने वाली, सत्ता खोजने वाली निंदनीय प्रवृत्तियाँ और मानवता विरोधी नीतियाँ सर्वत्र और सर्वकालिक हैं। एकजुट भारत का जनमानस उनकी चिंता नहीं करता। लगभग दो सप्ताह की भारत की जन बेचैनी को जब सुकून दे दिया जब 7 मई के प्रथम पहर में सेना ने पाकिस्तानी आतंक की गतिविधियों की 9 आतंकी पनाहगाहों को दो घंटे की एयर स्ट्राइक में ध्वस्त कर न केवल भारत के सैन्य कौशल का, सैन्य शक्ति का और स्वाभिमानी राष्ट्रीय संप्रभुता के सैनिक साहस का, राष्ट्र भक्ति का परिचय दिया है बल्कि इस राष्ट्रीय सोच का भी परिचय दिया है कि लोकतंत्र और जनतंत्र में विश्वास करने वाली भारत की नीतियां किसी राष्ट्र पर व्यर्थ युद्ध थोपना नहीं चाहती। वरना तो एल ओ सी पर रोजाना पाक द्वारा की जा रही उकसाने वाली गतिविधियों की आड़ में भारत युद्ध का बिगुल भी बजा सकता था। लेकिन भारत की मूल नीति जियो और जीने दो कि रही है, विश्व बंधुत्व की रही है, कृण्वन्तो विश्वमार्यम की रही है। इसलिए वह युद्ध नहीं समाधान चाहता है, शांति चाहता है। हां, उसकी संप्रभुता पर कोई आंख उठाए तो वह कभी लाल बहादुर शास्त्री के जय जवान-जय किसान का स्वाभिमानी उदघोष बन जवाब देता है। कभी इंदिरा गांधी का यह आवाहन कि मेरे खून की एक-एक बूंद इस देश की रक्षा की चिंगारी बन शत्रु को झुलस देगी और कभी अटल बिहारी वाजपेई की कारगिल में अनुगूंज बन विजय पताका फहराता है कि यज्ञ अधूरा युद्ध शेष है, नव दधीचि आगे आओ, निज हड्डियों का वज्र बनाकर शत्रु का काल बन जाओ। सेना के साहस, विवेक, निर्णय और कौशल को राष्ट्र लेखनी का पुनः पुनः नमन कि उसने मात्र 2 घंटे की अवधि में आतंक की 9 पनाहगाहों को और सैकड़ो आतंकी नर पिशाचों को उनके कुकर्मों की माकूल सजा दे दी, जिसके वह हकदार थे।

यहां भारत के स्वाभिमानी राष्ट्रवाद से एक निवेदन और की अटल बिहारी वाजपेई जी के उसे युगांतरकारी दृष्टि बोध से जुड़े की यज्ञ अधूरा युद्ध शेष है नव दधीचि आगे आओ का शांति से विश्लेषण करें। यज्ञ शांति, शक्ति और संतुलन का प्रतीक है, त्याग और संपन्नता का प्रतीक है, यज्ञ विध्वंश का नहीं सृजन का प्रतीक है। शांति सुरक्षा और प्रगति उन्नति की राहें युद्ध से नहीं संवाद और समझौते से होकर निकलती हैं। आज वैश्विक परिस्थितियां वैज्ञानिक प्रगति और आर्थिक उन्नति प्रगति और समृद्धि संपन्नता की पक्षधर हैं। मुट्ठी में बारूद भरकर कोई अहंकारी रावण न स्वर्ण लंका को बचा सकता है, न साम्राज्य को, न रक्ष संस्कृति को और न ही अजेय इंद्रजीत के पौरुष साहस को बचा सकता है। जिस नापाक पाकिस्तान ने आतंक को पनाह दी, सैन्य उन्माद को पनाह दी, सांप्रदायिक विद्वेष को सत्ता का हथियार बनाया, आज वह पंच नदों वाला आर्यावर्त का, स्वर्ण कटोरा वाला पाकिस्तान अपनी नीतियों के चलते ही बर्बादी के कगार पर खड़ा है। जबकि पाकिस्तान का आवाम सिंधु नदी के सतत प्रवाह सा प्रगति चाहता है, शांति चाहता है। उन्माद और जुनून जब राष्ट्र निर्माण की उत्तरदाई युवा पीढ़ी की रक्त धमनियों में नफरत का जहर बन बहता है, तो इसका संक्रमण युवा शक्ति की दिशा को विध्वंश और विनाश की ओर ले जाता है। भारत स्वामी दयानंद के सत्य और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का देश है। भारत विवेकानंद के शिकागो के बंधुत्व के उदघोष का देश है, भारत महात्मा गांधी के सत्य अहिंसा का देश है। भारत नेताजी सुभाष चंद्र बोस के खून के बदले आजादी पाने के जय हिंद उदघोष का देश है। भगत सिंह जैसे राष्ट्रभक्त क्रांति वीरों की इंकलाबी शाहदत का देश है। भारत मां पन्नाधाय के राष्ट्र रक्षा में ममता के अनुपम त्याग का देश है। भारत सर्वखाप की सैन्य शक्ति बन आत्मरक्षा में शस्त्र उठाने वाली राम प्यारी गुर्जरी और आशा त्यागी का, सेनापति योगराज पंवार, हरबीर गुलिया, धूला बालमिक और देव पाल चौधरी की स्वाभिमानी सोच का और अद्भुत साहस का देश है। रामकृष्ण का यह देश अब्दुल हमीद के राष्ट्रीय शौर्य का भी देश है। हम सब मिलकर अपना राष्ट्र धर्म निभाएं। सेना और शासनिक निर्णय का समर्थन करें। हम लाल बहादुर शास्त्री के 1965 के नैनी जनसभा के उदघोष के आवाहन को अपना नागरिक दायित्व स्वीकार करें कि सीमा पर जवान सैनिक और खेत में किसान और देश के हर मोर्चे पर प्रत्येक नागरिक अपना कर्तव्य निभाकर स्वयं राष्ट्र धर्म निभाता है। हम एक हाथ में बलिदान का साहस शौर्य और शस्त्र रखें, लेकिन दूसरे हाथ में शांति संवाद और समझौते की संभावना का विवेक भी रखें। उत्तेजना से बचे, सनसनी से बचे क्योंकि ये दोनों ही एक निष्ठ संकल्प को, संयोजित शक्ति को और संगठित सामूहिक लक्ष्य को बाधित करती है।
जय जवान-जय किसान, जय भारत महान।

राजपाल सिंह कसाना
8586066280

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