इतिहास का विकृतिकरण और नेहरू (अध्याय – 12)

nehru
  • डॉ राकेश कुमार आर्य

(डिस्कवरी ऑफ इंडिया की डिस्कवरी) (अध्याय – 12)

हिंदी-हिंदू-हिंदुस्तान के विरोधी नेहरू

यद्यपि नेहरू जी की द डिस्कवरी ऑफ इंडिया में हिंदी, हिंदू और हिंदुस्तान का भरपूर प्रयोग हुआ है, परंतु इसके उपरांत भी उनके बारे में यह भी सच है कि वे इन तीनों शब्दों का कुछ अलग ही अर्थ निकालते थे। कहीं-कहीं लगता है कि वह हिंदू और हिंदुस्तान को हमारे देश की राष्ट्रीयता के साथ जोड़कर देख रहे हैं, जिसे बहुत उचित कहा जा सकता है। जबकि कहीं-कहीं ऐसा लगता है कि वह इन तीनों शब्दों पर भी अस्पष्ट थे। वह कहते हैं कि-

“बौद्ध धर्म और जैन धर्म यकीनी तौर पर हिंदू धर्म नहीं हैं और न वैदिक धर्म ही हैं फिर भी उनकी उत्पत्ति हिंदुस्तान में ही हुई और यह हिंदुस्तानी जिंदगी, तहजीब और फिलसफे के अंग हैं।
हिंदुस्तान में बौद्ध और जैनी हिंदुस्तानी विचारधारा और संस्कृति की सौ फीसदी उपज हैं, फिर भी इनमें से कोई भी मत के ख्याल से हिंदू नहीं है, इसलिए हिंदुस्तानी संस्कृति को हिंदू संस्कृति कहना एक सरासर गलतफहमी फैलाने वाली बात है। बाद के वक्तों में इस संस्कृति पर इस्लाम के संपर्क का बड़ा असर पड़ा।”

यह बड़ी अजीब बात है कि नेहरू जी बौद्ध और जैन मतों को न तो हिंदू धर्म का अंग मानते हैं और न ही वैदिक धर्म का।

मतों के सिद्धांतों में भारत के ऋषियों और उनकी परंपरा को स्पष्टतः देखा जा सकता है। इतना ही नहीं, वह हिंदू और वैदिक मत को भी अलग-अलग करके देखते हैं। यदि नेहरू जी अपनी इस बात को कुछ और अधिक गहराई तक समझते कि भारतवर्ष की पवित्र भूमि में ही बौद्ध और जैन मत का प्रादुर्भाव होने के कारण इनमें बहुत कुछ ऐसा है जिससे भारतीयता को बल मिलता है तो नेहरू जी इन दोनों मतों में समता खोजने का प्रयास करते। इसके साथ-साथ ही उन बिंदुओं पर सहमति बनाने का प्रयास करते, जहां कहीं मतभिन्नता है। इसके विपरीत नेहरू जी ने इन तीनों को अलग-अलग करके देखने का प्रयास किया। उसी का परिणाम है कि उनके समर्थक इन तीनों को तो अलग करके देखते ही हैं, सिखों और लिंगायतों को भी अलग अलग देखने लगे हैं। भारत के लोगों का मौलिक धर्म वैदिक धर्म है, इसके उपरांत भी हिंदू इस देश की आम सहमति का नाम है। इस बात पर यदि शासन में बैठे लोगों की ओर से बल दिया जाता तो नेहरू जी इस देश की राष्ट्रीयता का बोध कराने वाले हिंदू शब्द पर विशेष ध्यान देते।

उन्होंने पृष्ठ 86 पर लिखा-

“हिंदू और हिंदू धर्म शब्दों का हिंदुस्तानी संस्कृति के लिए इस्तेमाल किया जाना न ही तो शुद्ध है और न मुनासिब ही है।” (बात स्पष्ट है कि नेहरू जी भारत की संस्कृति को “गंगा जमुनी तहजीब” कहना तो पसंद करते थे, परंतु उन्हें यह हिंदू वैदिक संस्कृति के रूप में स्वीकार्य नहीं थी। उनकी ‘हिंदुस्तानी संस्कृति’ का अभिप्राय एक ऐसी संस्कृति से था, जिस पर मुस्लिम संस्कृति का अत्यधिक प्रभाव था, या कहिए कि जिसे हिंदुस्तान की रूढ़िवादी परंपराओं को प्रभावित कर मुस्लिम परंपराओं ने बनाने में विशेष योगदान दिया था।) चाहे इन्हें बहुत पुराने जमाने के हवाले में ही क्यों ना इस्तेमाल कर रहे हैं, अगरचे बहुत से विचार जो प्राचीन ग्रंथों में सुरक्षित हैं, इस संस्कृति के उद्‌गार हैं और आज तो इन शब्दों का इस अर्थ में इस्तेमाल किया जाना और भी गलत है। जब तक पुराने विश्वास और फिलसफे सिर्फ जिंदगी के एक मार्ग और संसार को देखने के एक रुख के रूप थे, तब तक तो अधिकतर हिंदुस्तानी संस्कृति का पर्याय हो सकते थे, लेकिन जब एक पाबंदी वाले मजहब का विकास हुआ, (यहां पर पर नेहरू जी का वैदिक धर्म के कर्मकांड की ओर संकेत है। यज्ञ हवन आदि के प्रति भी नेहरू जी के नेक विचार नहीं थे। वह इस बात में भी विश्वास नहीं रखते थे कि हिंदुत्व एक जीवन शैली है। जिसे इस देश की आम सहमति माना जा सकता है। उन्हें हिंदी, हिंदू और हिंदुस्तान में अपने ढंग की ही रुचि थी। सावरकर जी के हिंदी, हिंदू और हिंदुस्तान के नारे में उनकी कोई रुचि नहीं थी। जिसके साथ न जाने कितने विधि-विधान और कर्मकांड लगे हुए थे, तब यह उससे कुछ आगे बढ़ी हुई चीज थी (जिसे एक राष्ट्र के लिए स्वीकार किया जाना उचित नहीं था) और साथ ही उस मिली जुली संस्कृति (जिसे नेहरू के भारत में ‘गंगा जमुनी तहजीब’ कहा जाता है) के मुकाबले में घटकर भी थी।”

नेहरू जी हिंदी के संबंध में अपने विचार व्यक्त करते हुए पृष्ठ 87 पर लिखते हैं कि-

“हिंदी (भाषा) का मजहब से कोई संबंध नहीं (इसलिए नेहरू जी के दृष्टिकोण से हिंदी को संस्कृतनिष्ठ बनाना पाप है। इतना ही नहीं, हिंदी को संस्कृत से जन्मा हुआ मानना भी अनुचित है। इसका कारण यह है कि नेहरू जी संस्कृत को एक संप्रदाय विशेष की भाषा मानते थे। और हिंदुस्तानी मुसलमान और ईसाई इस तरह से हिंदी हैं, जिस तरह कि एक हिंदू मत का मानने वाला। अमेरिका के लोग जो सभी हिंदुस्तानियों को हिंदू कहते हैं, बहुत गलती नहीं करते। अगर वह हिंदी शब्द का प्रयोग करें तो उनका प्रयोग बिल्कुल ठीक होगा। दुर्भाग्य से हिंदी शब्द हिंदुस्तान में एक खास लिपि के लिए इस्तेमाल होने लगा है। (नेहरू जी देवनागरी की ओर संकेत कर रहे हैं। हिंदी को देवनागरी में लिखा जाना वह दुर्भाग्य का कारण मानते थे। जबकि सावरकर जी इस बात के विरोधी थे। उन्होंने हिंदी शब्दकोश को समृद्ध करने के लिए अनेक शब्दों की रचना भी की। इसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि जिस देश का पहला प्रधानमंत्री अपनी राष्ट्रभाषा हिन्दी की देवनागरी लिपि को भी उसका दुर्भाग्य मानता हो, वह राष्ट्रभाषा के प्रति श्रद्धा का कितना भाव रखता होगा? यही कारण रहा कि नेहरू जी ने अपने अन्य साथियों के दबाव में हिंदी को भविष्य में राष्ट्रभाषा बनाया जाना तो स्वीकार किया, परंतु वह अपने साथियों को इस बात को मनवाने में भी सफल हो गए कि अभी अगले 15 वर्ष तक अंग्रेजी में ही सरकारी राजकाज चलता रहेगा।) यह भी संस्कृत की देवनागरी लिपि के लिए इसलिए इसका व्यापक और स्वाभाविक अर्थ में इस्तेमाल करना कठिन हो गया है।”

नेहरू जी हिंदी के नहीं, ‘हिंदुस्तानी’ के समर्थक थे। उन्होंने अपनी पुस्तक हिंदुस्तान की कहानी भी उर्दू-मिश्रित हिंदी में अर्थात ‘हिंदुस्तानी’ में लिखी है। नेहरू जी की यह भी सोच थी कि ‘हिंदुस्तानी’ को ही देश की राष्ट्रभाषा बनाया जाए अर्थात संस्कृत, संस्कृति और भारतीय परंपरा को मारकर एक नई अवैज्ञानिक और अतार्किक भाषा को देश के लोगों पर थोप दिया जाए। राष्ट्र निर्माण में नेहरू जी का यही योगदान था।

इस प्रकार नेहरू जी ‘हिंदू’ के अस्तित्व पर यह कहकर प्रश्नचिह लगाते हैं कि ‘हिंदू’ नाम का कोई प्राणी है ही नहीं। यदि हिंदू को स्वामी दयानंद जी के दृष्टिकोण से ‘आर्य’ के रूप में देखा जाए तो इस पर उनकी मान्यता थी कि आर्य तो विदेशी थे। उन्होंने इस देश के लोगों पर अनगिनत अत्याचार किए थे। उनकी कोई धार्मिक परंपराएं नहीं थीं और अनेक प्रकार के पाखंडों में वे लोग फंसे हुए थे। इसलिए भारत देश के मूल निवासियों को आर्य भी नहीं कह सकते। अब समस्या ये है कि यदि भारतवर्ष के मूल निवासी आर्य नहीं थे और हिंदू भी नहीं थे तो फिर कौन थे? नेहरू जी की लेखन संबंधी इसी ऊहापोह के चलते अब भारत पर कुछ नए लोगों ने अपना अधिकार करना आरंभ किया है। ये लोग ‘जय भीम और जय मीम’ के झंडा नीचे आकर अपने आप को भारत के मूल निवासी मानते हैं। यद्यपि वह स्वयं इस देश के मूल निवासी आर्यों की ही संतानें हैं।

आज ‘जय भीम और जय मीम’ की राजनीति करने वाले लोग उस जोगेंद्र नाथ मंडल के इतिहास को दलित समाज के सामने लाने में संकोच करते हैं, जिसने भारत के साथ गद्दारी करते हुए पाकिस्तान में जाकर देख लिया था। जहां उसे बहुत जल्दी ही यह पता चल गया था कि उसने मुसलमानों का साथ देकर बहुत बड़ी गलती कर दी है। आज के दलित समाज के नेताओं को इतिहास के इस सच को समझना चाहिए। यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि लोग इस सच्चाई को समझ नहीं रहे हैं।

क्रमशः

(आलोक – डॉक्टर राकेश कुमार आर्य के द्वारा 82 पुस्तकें लिखी व प्रकाशित की जा चुकी हैं। उक्त पुस्तक के प्रथम संस्करण – 2025 का प्रकाशन अक्षय प्रकाशन दिल्ली – 110052 मो० न० 9818452269 से हुआ है।
यदि आप उपरोक्त पुस्तक के माध्यम से पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा भारत के इतिहास के विकृतिकरण में दिए गए योगदान की सच्चाई जानना चाहते हैं तो आप हमसे 99111699 17, 8920613273 पर संपर्क कर उपरोक्त पुस्तक को मंगवा सकते हैं। उपरोक्त पुस्तक का मूल्य 360 रुपए है। परंतु आपके लिए डाक खर्च सहित ₹300 में भेजी जाएगी । – निवेदक : अजय कुमार आर्य कार्यालय प्रबंधक)

डॉ राकेश कुमार आर्य
(लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं।)

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