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पर्यावरण

कुआँ सूखने पर ही पता चलता है पानी की कीमत

कहावत “जब तक कुआँ सूख नहीं जाता, हमें पानी की कीमत का पता नहीं चलता” हमें इस बात की याद दिलाती है कि हमें अपने जीवन और संसाधनों के प्रति जागरूक और कृतज्ञ रहना चाहिए। चाहे वह जल हो, प्रेम हो, स्वतंत्रता हो या स्वास्थ्य, हमें इनका सम्मान और संरक्षण करना चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए वे उपलब्ध रह सकें। मनुष्य अक्सर किसी चीज़ का वास्तविक मूल्य तब तक नहीं समझता जब तक वह खत्म नहीं हो जाती। एक गाँव के सूखते झरने की कहानी के माध्यम से यह विचार प्रस्तुत किया गया है कि कैसे प्रचुरता हमें आत्मसंतुष्ट बना देती है और कमी हमें जागरूक करती है।

  • डॉ. सत्यवान सौरभ

एक सुदूर घाटी में बसे गांव में एक झरना था जिसे जीवन धारा कहा जाता था। पीढ़ियों तक ग्रामीणों ने इसका उपयोग किया, लेकिन जब आधुनिक सुविधाएं आईं, तो यह उपेक्षित हो गया। एक साल, भीषण सूखे ने झरने को सुखा दिया, और तभी ग्रामीणों को इसकी कीमत का एहसास हुआ। यह कहानी दर्शाती है कि हम अक्सर किसी चीज़ के महत्व को तब तक नहीं समझते जब तक वह खत्म नहीं हो जाती। पानी जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं जैसे स्वास्थ्य, संबंध और स्वतंत्रता का प्रतीक है। हम अक्सर मान लेते हैं कि ये हमेशा बने रहेंगे, परंतु जब यह संकट में होते हैं, तभी हम उनकी कीमत समझते हैं। जीवन की क्षणभंगुरता हमें वर्तमान का आदर करने के लिए प्रेरित करती है। जैसे नल से पानी की सतत आपूर्ति को हम सामान्य मानते हैं, वैसे ही हम अपनों, स्वास्थ्य और स्वतंत्रता को भी हल्के में लेते हैं।

जब संसाधन प्रचुर मात्रा में होते हैं, तो हम उनकी कद्र करना छोड़ देते हैं। अरस्तू के नैतिक दर्शन के अनुसार, जागरूकता और संतुलन ही सच्चे गुणों को जन्म देते हैं। भरे कुएं का पानी हमें कृतज्ञ नहीं बनाता, परंतु पानी की कमी हमें उसकी महत्ता सिखाती है। 1930 के दशक की महामंदी ने लोगों को यह समझाया कि संसाधनों की उपलब्धता और कमी का चक्र कैसा होता है। ग्रीक त्रासदियों में अक्सर चरित्रों को जीवन का सच्चा अर्थ तब पता चलता है जब वे सब कुछ खो चुके होते हैं। शेक्सपियर के किंग लियर को प्यार की वास्तविकता तब समझ आई जब वह धोखा खा चुका था। महामारी ने भी हमें सामाजिक मेलजोल की अहमियत सिखाई। मानवता बार-बार संसाधनों का दुरुपयोग करती है और फिर संकट के समय उन्हें बचाने का प्रयास करती है। नीत्शे की शाश्वत पुनरावृत्ति की अवधारणा बताती है कि जब तक हम सच में नहीं सीखते, हम वही गलतियाँ दोहराते हैं। 1930 के डस्ट बाउल संकट ने कृषि को नुकसान पहुँचाया, जिससे सबक लेकर सुधार हुए, लेकिन समय के साथ लोग फिर लापरवाह हो गए।
उपयोगितावादी दर्शन कहता है कि किसी चीज़ का मूल्य उसकी उपयोगिता से निर्धारित होता है। जल की वास्तविक कीमत उसकी उपलब्धता के अनुसार बदलती है। उप-सहारा अफ्रीका में पानी की कमी ने जल संरक्षण के नए समाधान उत्पन्न किए। इसी तरह, जब कोई संसाधन दुर्लभ हो जाता है, तब उसका महत्व और अधिक बढ़ जाता है। जल संकट सिर्फ मानव जीवन ही नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित करता है। पारिस्थितिक दर्शन बताता है कि हमें प्रकृति के प्रति जागरूक होना चाहिए। अरल सागर का सूखना इसका उदाहरण है, जिससे सामाजिक और आर्थिक संकट पैदा हुए। यदि हम संसाधनों को संरक्षित नहीं करते, तो हमारा अस्तित्व भी खतरे में पड़ सकता है। धार्मिक और दार्शनिक परंपराएँ बताती हैं कि वंचना मूल्य की गहरी समझ देती है। रमज़ान के उपवास लोगों को भोजन की कीमत और जरूरतमंदों की स्थिति का एहसास कराते हैं। इसी तरह, कठिनाइयाँ हमें जीवन की असली जरूरतों का महत्व सिखाती हैं।

मानव अस्तित्व प्रकृति पर निर्भर है, और जल संकट इस निर्भरता को दर्शाता है। फुकुशिमा परमाणु आपदा ने भी दिखाया कि तकनीकी विकास के बावजूद हम प्राकृतिक शक्तियों के आगे असहाय हैं। यह हमें हमारे संसाधनों की सीमाओं का सम्मान करना सिखाता है। पानी जीवन देता है, परंतु बाढ़ और सुनामी जैसी आपदाओं से विनाश भी ला सकता है। ताओवाद के अनुसार, जीवन विरोधाभासों से भरा है, और हमें संतुलन बनाए रखना सीखना चाहिए। विभिन्न संस्कृतियों में जल को शुद्धिकरण का प्रतीक माना जाता है। ईसाई धर्म में बपतिस्मा का जल आत्मा की पुनर्जन्म का संकेत देता है। कुँए का सूखना हमें चेतावनी देता है कि हमें अपने संसाधनों की रक्षा करनी चाहिए। महात्मा गांधी ने कहा था, “पृथ्वी हर व्यक्ति की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पर्याप्त प्रदान करती है, लेकिन हर व्यक्ति के लालच को पूरा नहीं कर सकती।” भारत में चिपको आंदोलन इस बात का उदाहरण है कि समुदाय मिलकर प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा कर सकता है।

कहावत “जब तक कुआँ सूख नहीं जाता, हमें पानी की कीमत का पता नहीं चलता” एक गहरी सच्चाई को उजागर करती है। हमें संसाधनों के खत्म होने से पहले उनके महत्व को समझना चाहिए। जल, प्रेम, स्वास्थ्य या स्वतंत्रता—इन सभी को खोने से पहले संजोना चाहिए ताकि भविष्य की पीढ़ियों के लिए उनका संरक्षण हो सके। पानी सिर्फ एक भौतिक संसाधन नहीं है, बल्कि यह जीवन की अनिवार्य आवश्यकताओं—स्वास्थ्य, रिश्ते और स्वतंत्रता—का प्रतीक भी है। जब ये आसानी से उपलब्ध होते हैं, तो हम उन्हें हल्के में लेते हैं, लेकिन जब वे खतरे में होते हैं या खो जाते हैं, तब हमें उनका महत्व समझ आता है।

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