इतिहास का विकृतिकरण और नेहरू (अध्याय 9)

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डिस्कवरी ऑफ इंडिया की डिस्कवरी पुस्तक से ..

नेहरू बोले – आर्य विदेशी थे

  • डॉ राकेश कुमार आर्य

पंडित जवाहरलाल नेहरू ने हिंदुस्तान की कहानी लिखनी तो आरंभकर दी, परंतु वह यह नहीं जानते थे कि इस कहानी का शुभारंभकहां से हुआ? इसके सूत्रधार कौन थे? इसीलिए उन्होंने अपनी पुस्तक के पृष्ठ संख्या 83 पर लिखा है कि-

“सिंधु घाटी के सभ्यता वाले ये लोग कौन थे और कहां से आए थे? इसका हमें अब तक पता नहीं है। यह बहुत मुमकिन बल्कि संभावित है कि उनकी संस्कृति इसी देश की संस्कृति थी और इसकी जड़ें और शाखाएं दक्षिण हिंदुस्तान तक में मिलती हैं। कुछ विद्वान इन लोगों में और दक्षिण हिंदुस्तान के द्रविड़ों में कौम और संस्कृति की खासतौर पर समानता पाते हैं और अगर बहुत कम वक्त में हिंदुस्तान में बाहरी लोग आते आए थे तो इसकी तारीख मोहनजोदड़ो से हजारों वर्ष पुरानी है। व्यवहार के विचार से हम उन्हें हिंदुस्तान के ही निवासी मान सकते हैं।”

वास्तव में नेहरू जी ने यह प्रयास ही नहीं किया कि सिंधु सभ्यता के लोग कौन थे और कहां से आए थे? नेहरू जी इस बात पर पूर्णतया स्पष्ट नहीं थे कि ये लोग भारतीय ही थे। उन्होंने एक रहस्य पर और भी बड़े-बड़े प्रश्नचिह्न लगाकर उसे और अधिक गहरा दिया। वह नहीं जानते थे कि आर्य लोग कौन थे? यहां तक कि आर्य शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई और क्या इसका शाब्दिक अर्थ है?-नेहरू जी इस बात से भी अपरिचित थे।
नेहरू जी के अनुसार सिंधु सभ्यता के 1,000 वर्ष पश्चात यहां पर आर्यों का आगमन हुआ।

नेहरू जी पृष्ठ 84 पर लिखते हैं कि “आर्यों का यहां आना सिंघ घाटी की सभ्यता के 1,000 साल बाद हुआ, लेकिन यह भी मुमकिन है कि वक्त की इतनी बड़ी खाई दोनों के बीच में रही हो और जातियां और कबीले पश्चिमोत्तर से बराबर थोड़े-थोड़े समय बाद आकर रहे हों। जैसा कि वे बाद में आए और आने पर हिंदुस्तान में घुलमिल जाते रहे हों। हम कह सकते हैं कि संस्कृतियों का पहला बड़ा समन्वय और मेलजोल आने वाले आर्यों और द्रविड़ों में जो संभवतः सिंधु घाटी की सभ्यता के प्रतिनिधि थे, हुआ। इस समन्वय और मेलजोल से हिंदुस्तान की जातियां बनी और एक बुनियादी हिंदुस्तानी संस्कृति तैयार हुई। जिसमें दोनों के अंश थे। बाद के युगों में और बहुत सी जातियां आती रहीं। जैसे ईरानी, यूनानी, पार्थियन, बैक्ट्रियन, सिदियन, हूण, तुर्क (इस्लाम से पहले के) कदीम ईसाई, यहूदी और पारसी वगैरा ये सभी लोग आए। इन्होंने अपना प्रभाव डाला और बाद में यहां के लोगों में घुल मिल गए।

डॉडबेल के कहने के अनुसार “हिंदुस्तान में समुद्र की तरह सोखने की असीम शक्ति थी।” यह कुछ अजब सी बात जान पड़ती है कि हिंदुस्तान में जहां ऐसी वर्ण-व्यवस्था है और अलग बने रहने की भावना है, विदेशी जातियों और संस्कृतियों को जज्ब कर लेने की इतनी समाई रही हो। शायद यही वजह है कि उसने अपनी जीवनी शक्ति कायम रखी है और समय-समय पर वह अपना कायाकल्प करता रहा है। जब मुसलमान यहां आए तो उन पर भी उसका असर पड़ा।

विंसेंट स्मिथ का कहना है कि-

“विदेशी (मुसलमान तुक) अपने पूर्वजों शकों और यूची की तरह हिंदू धर्म की पचा लेने की अद्भुत शक्ति के वश में हुए और तेजी के साथ उनमें हिंदूपन आ गया।”

नेहरू जी के इस कथन की समीक्षा करने पर स्पष्ट होता है कि वह आर्यों को अर्थात भारत के मूल निवासियों को विदेशी मानते थे। इससे अनावश्यक ही भारत की युवा पीढी को अपने बारे में कई भ्रांतियों का शिकार होना पड़ा। इस एक विचार ने ही भारत के बारे में नई-नई भ्रांतियों को जन्म दे दिया। इसके अतिरिक्त नेहरू जी आर्य और द्रविड़ की समस्या के भी जनक हैं। उनके लेखन से ही यह विवाद खड़ा हुआ कि द्रविड़ों को उत्तर भारत से दक्षिण की ओर भगाने का काम आर्यों ने किया। नेहरू जी के उपरोक्त कथन से तीसरी बात यह भी स्पष्ट होती है कि भारत में बाहर से विभिन्न जातियों और कबीलों के काफिले आते गए और हिंदुस्तान बनता गया। ये विभिन्न कबीले और गिरोह भारत के आर्ष साहित्य में कहीं पर भी नहीं मिलते। ये सारे विदेशी शब्द हैं। संपूर्ण मानवता को कबीलों और गिरोहों में बांटकर देखना और उसी के अनुसार मानव जाति का या किसी देश का इतिहास लेखन करना, यह भारतीय परंपरा के विरुद्ध है। इसका कारण केवल एक है कि भारत में ये सामाजिक विभाजनकारी सोच कभी नहीं रही। जातियों के नाम पर जिस प्रकार भारत के समाज को बांटकर देखने की सोच विकसित की गई है, वह परंपरा भी बहुत बाद की है।

वर्ण-व्यवस्था को नेहरू जी ने अपने इस कथन में विभाजनकारी माना है। इसका अभिप्राय है कि नेहरू जी वर्ण-व्यवस्था की वैज्ञानिक और बुद्धिपरक सच्चाई से भी परिचित नहीं थे। इसके अतिरिक्त एक और तथ्य भी इस कथन से स्पष्ट हो रहा है कि नेहरू जी इस बात को मानते थे कि हिंदू धर्म की पचा लेने की अद्भुत शक्ति के वश में होकर मुसलमानों के भीतर भी हिंदूपन आ गया। जबकि सच यह है कि इस्लाम को मानने वाले लोगों के भीतर कभी काफिरों के साथ मिलकर चलने का भाव आ ही नहीं सकता। क्योंकि गैर मुसलमानों को संसार से समाप्त करना उनका जीवनोद्देश्य है।

आयों को विदेशी सिद्ध करने की होड़ में नेहरूवादी इतिहास लेखकों ने एड़ी चोटी का जोर लगा दिया। इस चर्चा में भाग लेते हुए कम्युनिस्ट इतिहास लेखक रोमिला थापर (संदर्भ : Guide to Secular Action, p. 24) कहती हैं :
“भाषा बाहर से आई, ईरान से. शायद लोगों के छोटे समूहों द्वारा, जिसका हमारे पास पुरातत्व प्रमाण है। यह खानाबदोश आमतौर पर चरवाहे या छोटे किसान थे, जो सैकड़ों वर्षों से नई भाषा का विकास कर रहे थे और जो इस प्रक्रिया में बदलती जा रही थी। फिर जब वह भारत में स्थायी हुए तो भारतीय संदर्भों के कारण भारत की भाषा भी बदलने लगी। इसलिए हमारी राय है कि कोई आक्रमण नहीं हुआ होगा, जैसा मैक्स मूलर (Max Müller) कहते हैं, बल्कि कई स्थानांतरण हुए थे और पुरातत्व के प्रमाण हैं कि समूहों का स्थानांतरण हुआ था। एक तरह से यह कहते रहना महत्वपूर्ण नहीं है कि हम स्थानीय हैं, क्योंकि हम यह कभी सिद्ध नहीं कर पाएंगे। वास्तव में हम बहुत मिश्र हैं। आर्य कोई नस्ल नहीं है, क्योंकि हम सभी इस शब्द को बहुत सरलता से इस्तेमाल करते हैं और आर्य नस्ल और द्रविड़ नस्ल के बारे में बोलते हैं यह शब्द नस्ल की ओर संकेत नहीं करते पर भाषा की ओर संकेत करते हैं।”

इस प्रकार की निराधार बातें करके रोमिला थापर ने बहस को नया स्वरूप दे दिया। कन्हैयालाल माणिक लाल मुंशी जी तो अपनी पुस्तक लोपामुद्रा में ऋग्वेद के आधार पर प्राचीन आर्यों के बारे में यह भी लिख देते हैं कि-

“इनकी भाषा में अभी जंगली दशा के स्मरण मौजूद थे। मांस भी खाते थे और गाय का भी। ‘अतिथिग्व’ गोमांस खिलाने वाले की बहुमानास्पद उपाधि थी। ऋषि सोमरस पीकर नशे में चूर रहते थे और लोभ तथा क्रोध का प्रदर्शन करते थे। सर्वसाधारण सुरा पीकर नशा करते थे। वह जुआ खूब खेलते थे। ऋषि युद्ध में जाकर हजारों का संहार करते थे। वे रूपवती स्त्रियों को आकर्षित करने के लिए मंत्रों की रचना करते थे। कुमारी से उत्पन्न बच्चे अधम पतित नहीं माने जाते थे। कई ऋषियों के पिताओं का पता न था। आर्य भेड़िया की तरह लोभी थे। वीभत्सता या अश्लीलता का कोई विचार नहीं था। आत्मा का कोई ख्याल नहीं था। ईश्वर की कल्पना नहीं. नाम नहीं. मान्यता नहीं। स्वदेश की कल्पना नहीं थी। दत्यु भारतवर्ष के शिवलिंग उपासक मूल निवासी थे।”

स्वामी विद्यानंद सरस्वती जी से पत्राचार के माध्यम से श्री मंशी जी ने यह स्वीकार किया था कि उन्होंने आर्यों के विषय में जो कुछ लिखा है वह अपने शोध अनुसंधान के आधार पर नहीं लिखा है, अपितु उन्होंने पश्चिमी विद्वानों की कही हुई बातों के आधार पर ऐसा लिख दिया है। बस, यही स्थिति नेहरू जी और रोमिला थापर जैसे इतिहास लेखकों की है।

आर्यों का विदेशी होना, भारतीय इतिहास पर लगाए जाने वाला एक महाभयंकर आक्षेप है। इस आक्षेप को पंडित जवाहरलाल नेहरू ने बहुत अधिक मजबूती प्रदान की है। नेहरू जी ने उन बातों को पकड़ लिया जो उनसे पहले या उनके समकालीन लेखक भारत विरोध की भावना से प्रेरित होकर प्रस्तुत करते जा रहे थे। जब लॉर्ड मैकाले ने भारत की शिक्षा नीति को विकृत करने का संकल्प व्यक्त किया था तो उस समय उसने मैक्स मूलर को यह काम सौंप दिया था कि वह संस्कृत ग्रंथों के अर्थ का अनर्थ करने का काम करे। सन 1857 की क्रांति समाप्त हुई तो भारत को सांस्कृतिक रूप से उजाड़कर उसका ईसाईकरण करने का संकल्प व्यक्त करते हुए ब्रिटिश प्रधानमंत्री लार्ड पामर्स्टन ने घोषणा की कि-

“यह हमारा कर्तव्य ही नही, अपितु हमारा अपना हित भी इसी में है कि भारत भर में ईसाइयत का प्रचार प्रसार हो।” (संदर्भ : मैथ्यू, क्रिश्चियनिटी एंड गवर्नमेंट ऑफ इंडिया, पृष्ठ 194)

कहने का अभिप्राय है कि जिन लोगों का यह घोषित लक्ष्य था कि उन्हें भारतवर्ष में अपने मत का प्रचार प्रसार करना है और भारत को सांस्कृतिक, धार्मिक एवं बौद्धिक आधार पर दिवालिया घोषित कर देना है, उनसे यह अपेक्षा नहीं की जा सकती थी कि यह भारत के इतिहास और सांस्कृतिक परंपराओं को सुरक्षित रखने का काम करते।

अपने इसी प्रकार के मल को स्पष्ट अभिव्यक्ति देते हुए ईस्ट इंडिया कंपनी के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स के चेयरमैन मि. मेंगल्स ने ब्रिटिश पार्लियामेंट में कहा था-

“विधाता ने हिंदुस्तान का विशाल साम्राज्य इंगलैंड के हाथों में इसलिए सौंपा है कि ईसा मसीह का झंडा इस देश के एक कोने से दूसरे कोने तक लहराए। प्रत्येक ईसाई का कर्तव्य है कि समस्त भारतीयों को अविलंब ईसाई बनाने के महान कार्य में पूरी शक्ति के साथ जुट जाएं।”

इसी सोच के अंतर्गत भारत पर पहला और सबसे बड़ा सांस्कृतिक आक्रमण यह किया गया कि इस देश के पास ऐसा अपना कुछ भी नहीं है, जिस पर यह गौरव की अभिव्यक्ति कर सके ? भारत प्राचीन काल से ही अपनी आर्य संस्कृति को लेकर गौरव करता आया था। अंग्रेजों ने इस बात को गहराई से समझा कि आर्य संस्कृति इस देश की रीढ़ है, उसे तोड़ने के लिए इन लोगों ने यह प्रचार किया कि आर्य लोग यहां के नहीं थे, बल्कि वह कहीं बाहर से आए थे। मैक्स मूलर ने इस नीति पर काम करते हुए तेजी से आगे बढ़ना आरंभ किया। उसने अपनी कार्य योजना को स्पष्ट करते हुए 16 दिसंबर 1868 को भारत सचिव “ड्यूक ऑफ आर्गाइल” को एक पत्र यूं लिखा-

“भारत का प्राचीन धर्म अब नष्ट प्रायः है। अब यदि ईसाइयत उसका स्थान नहीं लेती तो यह किसका दोष होगा?”

मैक्स मूलर के प्रयास की प्रशंसा करते हुए उसके एक मित्र ई.बी. पुसे ने उसके लिए लिखा है-

“भारत को ईसाई बनाने की दिशा में किया गया आपका प्रयास एक नये युग का सूत्रपात करने वाला होगा।”

पूरे भारत को ईसाई झंडे के नीचे ले आना अंग्रेजों की नीति का एक आवश्यक अंग था। यही कारण था कि उन्होंने भारत के इतिहास में यह मनगढ़ंत तथ्य डलवाया कि भारत में आर्य विदेशी थे।

यह अलग बात है कि उनकी इस प्रकार की नीति को स्वाभी दिया। स्वामी जी महाराज ने देश के लोगों को अंग्रेजी मीडियम के दयानंद जी महाराज जैसे क्रांतिकारी आध्यात्मिक नेता ने असफल कर स्कूलों में जाने से रोकने का संकल्प लिया और लोगों को गुरुकुल की शिक्षा प्राप्त करते रहने के लिए प्रेरित किया। महर्षि दयानंद ने देशवासियों को सत्यार्थ प्रकाश के माध्यम से बताया कि-

“मनुष्यों की आदि सृष्टि त्रिविष्टप अर्थात तिब्बत में हुई और आर्य लोग सृष्टि के आदि में कुछ काल पश्चात तिब्बत से सूधे इसी देश (भारत) में आकर बसे । इसके पूर्व इस देश का कोई नाम नहीं था, और न कोई आर्यों के पूर्व इस देश में बसता था।”

ऐसा लिखकर स्वामी जी महाराज ने यह स्पष्ट कर दिया कि इस देश के मूल निवासी आर्य लोग थे। आर्य अर्थात श्रेष्ठ पुरुषों ने श्रेष्ठ मानव समाज की रचना की। उनकी इस श्रेष्ठ सृजन शक्ति से भारत में राष्ट्र, राष्ट्रवाद और राष्ट्रीयता का संगम बना।

मैक्स मूलर ने अपनी पुस्तक इंडिया व्हाट इट कैन टीच अस में जो स्वीकारोक्ति की है, वह भारत के उन उच्छिष्टभोजी लेखकों के मुंह पर एक तमाचा है जो अभी तक आर्यों को विदेशी मानने या समझाने का प्रयास कर रहे थे। वह लिखता है-
“यह निश्चित हो चुका है कि हम सब पूर्व से ही आये हैं। इतना ही नही, हमारे जीवन की जितनी भी प्रमुख महत्वपूर्ण बातें हैं, सबकी सब हमें पूर्व से ही मिली हैं। ऐसी स्थिति में जब हम पूर्व की ओर जायें तभी हमें यह सोचना चाहिए कि पुरानी स्मृतियों को संजोए हम अपने पुराने घर की ओर जा रहे हैं।”

आर्यों के भारतीय होने और भारतीयों का आर्य होने का भूत मैक्स मूलर के सिर चढ़कर ही नहीं बोला बल्कि फ्रांस के महान विचारक क्रूजे ने भी यही कहा। उन्होंने लिखा है कि-

“यदि कोई देश वास्तव में मनुष्य जाति का पालक होने अथवा उस आदि सभ्यता का जिसने विकसित होकर संसार के कोने-कोने में ज्ञान का प्रसार किया, स्रोत होने का दावा कर सकता है तो निश्चत ही वह भारत है।”

इसी बात को विलियम दुरां (William Durian) ने यों कहा है-

“भारत मनुष्य जाति की मातृभूमि तथा संस्कृत यूरोपियन भाषाओं की जननी है, वह हमारे दर्शन की जननी है. अरबों के माध्यम से हमारे गणित की जननी, बुद्ध के माध्यम से ईसाइयत में निहित आदर्शों की जननी। ग्राम पंचायत के माध्यम से स्वायत्त शासन की और लोकतंत्र की जननी है। वास्तव में भारत माता अनेक रूपों में हम सबकी जननी है।” मैकक्रिंडल (McCrindle) ने अपनी पुस्तक एशियेंट इंडिया ऑफ मेगस्थनीज में बड़ी पते की बात कही है। वह लिखता है कि-

“भारत के एक विशाल देश होने के कारण उसमें विभिन्न एवं बहुसंख्यक जातियां बसती हैं, जिनमें मूलतः विदेशी एक भी नहीं है।”

जिन भारतीयों ने आर्यों को विदेशी माना उनमें लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का नाम भी सम्मिलित है। उनकी इस धारणा पर विचार विमर्श करने के लिए बाबू उमेश चंद्र विद्यारत्न उनसे मिलने उनके निवास पर गये। अपनी पुस्तक मानवेर आदि जन्मभूमि में बाबू उमेशचंद्र लिखते हैं-

“गत वर्ष हम तिलक के घर गये और उनके साथ पांच दिन तक इस विषय पर बातचीत करते रहे। अंत में उन्होंने सरलतापूर्वक कह दिया कि हमने मूल वेद नहीं पढ़े, हमने तो केवल साहब लोगों के अनुवाद पढ़े हैं।”

इसका अभिप्राय है कि तिलक ने भी विदेशी साहबों (अंग्रेजों) के अनुवादों को पढ़कर ही अपनी मान्यता स्थापित की थी। तिलक एक अगस्त 1920 को जब स्वर्गवासी हुए तो उस समय गीता प्रैस गोरखपुर के संस्थापक और कल्याण के संपादक श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार उनके पास थे। तिलक जी के स्वर्गवासी होने से पूर्व का एक संस्मरण सुनाते हुए उन्होंने कहा था-

“आर्यों के आदि देश के विषय में तिलक महाराज ने पुनः एक पुस्तक तैयार की थी, जिसमें उन्होंने अपनी पुरानी मान्यता को समाप्त कर दिया था।”

कुल मिलाकर हमें अपने बारे में नेहरू जी और उन जैसे लेखकों के द्वारा फैलाई गई व्याप्त भ्रांत धारणाओं का निवारण स्वयं करना चाहिए। इसके लिए आवश्यक है कि हम अपने इतिहास को समझें और समझ कर तदनुरूप कार्य करें।
क्रमशः

(आलोक – डॉक्टर राकेश कुमार आर्य के द्वारा 82 पुस्तकें लिखी व प्रकाशित की जा चुकी हैं। उक्त पुस्तक के प्रथम संस्करण – 2025 का प्रकाशन अक्षय प्रकाशन दिल्ली – 110052 मो० न० 9818452269 से हुआ है।
यदि आप उपरोक्त पुस्तक के माध्यम से पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा भारत के इतिहास के विकृतिकरण में दिए गए योगदान की सच्चाई जानना चाहते हैं तो आप हमसे 9911169917, 8920613273 पर संपर्क कर उपरोक्त पुस्तक को मंगवा सकते हैं। उपरोक्त पुस्तक का मूल्य 360 रुपए है। परंतु आपके लिए डाक खर्च सहित ₹300 में भेजी जाएगी । – निवेदक : अजय कुमार आर्य कार्यालय प्रबंधक)

– डॉ राकेश कुमार आर्य
(लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं।)

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