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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से देश विदेश

अमेरिका में हिंदू मंदिरों पर हमले चिंता का विषय

वैश्विक मंचों पर भारत की बढ़ती भागीदारी और सहभागिता के दृष्टिगत कई शक्तियां ऐसी हैं जो भारत से अनावश्यक ईर्ष्या भाव रखती हैं। उनका हर संभव प्रयास होता है कि जैसे भी हो भारत को रोका जाए और घेरा जाए। इसी सोच के चलते खालिस्तानी अलगाववादी विदेशी शक्तियों के मोहरे बन रहे हैं। यही कारण है कि विदेश में हिंदू धर्म स्थलों पर आक्रमण करने वालों में खालिस्तानी अलगाववादी सक्रिय भूमिका का निर्वाह कर रहे हैं। अभी अमेरिका में कैलिफोर्निया के स्वामीनारायण मंदिर पर इन लोगों ने हमला किया है। वहां पर उन्होंने “हिंदुओं ! वापस भारत जाओ” के संदेश भी अंकित किए हैं। भारत की केंद्र सरकार ने इस पर कड़ा स्टैंड लिया है और यह स्पष्ट किया है कि भारत विदेशों में हिंदू धर्म स्थलों पर हो रहे इन हमलों को बर्दाश्त नहीं करेगा। वास्तव में भारत को इस समय कड़ा स्टैंड लेने की केवल बयानबाजी ही नहीं करनी है अपितु अपनी बयानबाजी पर कुछ करके भी दिखाना है। जब सारा संसार इस्लाम और ईसाई मत के दो खेमों में विभाजित हो, तब भारत की बात को तभी सुना जा सकता है, जब वह हिंदू धर्म स्थलों पर होने वाले इस प्रकार के हमलों के प्रति कठोरता प्रदर्शित करने की स्थिति में आएगा। भारत को यह ध्यान रखना होगा कि ‘ सर्जिकल स्ट्राइक’ केवल पाकिस्तान में ही नहीं करनी थी, इसके कई अन्य क्षेत्र भी हो सकते हैं। यह भी आवश्यक नहीं है कि ‘ सर्जिकल स्ट्राइक’ का अभिप्राय सैनिक कार्यवाही से ही हो। इसके कई अन्य प्रकार भी हो सकते हैं। हम संबंधित देश के साथ अपने व्यापार पर जारी संधि शर्तों पर पुनर्विचार करने की बात कह सकते हैं या आर्थिक रूप से किसी भी ऐसे देश को अपने घेरे में ले सकते हैं, जिसकी भूमि पर हिंदू धर्म स्थलों पर इस प्रकार के हमले हो रहे हों ? इसके दृष्टिगत हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि भारत संसार के लगभग प्रत्येक देश के लिए ‘ बहुत बड़ा बाजार’ है। यदि भारत किसी भी ढंग से किसी भी देश को इतना बड़ा बाजार उपलब्ध कराने में किसी भी प्रकार की बाधा उत्पन्न कर दे तो बड़े से बड़ा देश भी तिलमिला उठेगा। इसके अतिरिक्त हमें वैश्विक मंचों पर अपने विश्वसनीय साथियों को खोजना होगा, जो किसी भी बुरे समय में हमारे साथ खड़ा हो सकते हों। माना कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में कभी कोई देश सदा हमारे साथ नहीं रह सकता, परंतु इतना अवश्य है कि अपने आयात निर्यात के कोटे को देखकर हम अलग-अलग देशों से उसकी और अपनी परिस्थितियों के आधार पर कहीं ना कहीं सहयोग ले सकते हैं। कूटनीति की मेजों पर बिना युद्ध के भी युद्ध लड़े और जीते जा सकते हैं। ऐसा अनेक बार देखा भी गया है। संभवत: राजनीति में कूटनीति को लाया भी इसीलिए जाता है कि युद्ध जैसी स्थिति को टालकर युद्ध को ही जीत लिया जाए।
सारा संसार इस समय जानता है कि 2014 से पहले के और अब के भारत में बहुत अंतर आ चुका है। आज का भारत अपने सैनिक, आर्थिक और राजनीतिक हितों के प्रति कहीं अधिक गंभीर और सावधान है। वह यह भी जानता है कि आज का भारत अपने देश के खालिस्तानी आतंकवादियों को यदि अपनी भूमि पर खुली छूट नहीं दे सकता तो वह विश्व के अन्य देशों में भी ऐसा न होने देने के लिए पहले की अपेक्षा बहुत अधिक स्पष्ट और कठोर है। यही कारण है कि भारत विरोधी शक्तियां पहले की अपेक्षा इस समय बहुत अधिक सीमा तक निष्क्रिय हैं। परन्तु उनकी निष्क्रियता का अभिप्राय यह नहीं समझना चाहिए कि वह समाप्त हो गई हैं । हमें मानना चाहिए कि उनकी जड़ें आज भी कहीं ना कहीं छिपी हैं। किसी भी पेड़ के तने को काटने का अभिप्राय यह नहीं होता कि अब वह समाप्त हो गया। हमें ध्यान रखना चाहिए कि ठूंठ तो फूट ही आते हैं, अक्सर जड़ें भी एक नए वृक्ष को जन्म दे दिया करती हैं। राजनीति में ठूंठ और जड़ों को कभी भी उपेक्षित नहीं किया सकता। अभी तो यह मानना चाहिए कि ठूंठ और जड़ ही समस्याएं होती हैं।
अमेरिका कभी भी हमारा स्थाई मित्र नहीं हो सकता। उसका इतिहास बताता है कि वह एक व्यापारी देश है और उसने कभी भी किसी भी देश के साथ देर तक और दूर तक संबंधों का निर्वाह नहीं किया है । उससे भारत को वर्तमान दौर में किसी भी प्रकार की अपेक्षा नहीं पालनी चाहिए। इस समय अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा की सरकारों के द्वारा भारत विरोधी खालिस्तानी आतंकवादियों के विरुद्ध कुछ भी नहीं करना या मौन साध लेना हमारे लिए चिंता का विषय हो सकता है। यदि अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप वास्तव में भारत के साथ अपने संबंधों की पुनर्व्याख्या के प्रति गंभीर हैं तो उन्हें अपनी धरती पर काम कर रही भारत विरोधी शक्तियों को यह कड़ा संदेश देना होगा कि वह अमेरिका की धरती को भारत विरोधी गतिविधियों के लिए न तो प्रयोग कर सकते हैं और न ही यहां पर स्थापित हिंदू धर्म स्थलों पर किसी भी प्रकार का हमला कर सकते हैं। यदि उन्होंने ऐसा किया तो अमेरिका उनके विरुद्ध कठोर कानूनी कार्यवाही करेगा। यद्यपि अमेरिका की ओर से अभी तक ऐसा कोई संकेत नहीं दिया गया है। यह तब है जब अमेरिका की अपनी घरेलू समस्याएं भी इतनी हैं कि यदि उनको हवा दी जाए तो अमेरिका की एकता और अखंडता भी चूर-चूर हो जाएगी। हम सभी जानते हैं कि अमेरिका में नीग्रो लोगों के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है ? रंगभेद की नीतियों में विश्वास रखने वाले लोग वहां आज भी जीवित हैं। अमेरिका के सुदूरवर्ती प्रान्तों में कई प्रकार की बेचैनी देखी जाती है। यद्यपि अमेरिका की सामरिक शक्ति के कारण इन समस्याओं को या बेचैनियों को सतह पर दिखाया नहीं जाता। इस संदर्भ में अमेरिका को ध्यान रखना होगा कि सामरिक अथवा सैन्य शक्ति चाहे कितनी ही मजबूत क्यों न हो, जब खराब दिन आते हैं तो सब कुछ रखा रह जाता है और बड़े-बड़े साम्राज्य दीवारों की भांति भरभराकर गिर जाते हैं। अमेरिका के दक्षिणी कैलिफोर्निया के चिनो हिल्स क्षेत्र में स्थित मंदिर की दीवारों पर जिस प्रकार भारत विरोधी नारे लिखे गए हैं और मंदिर को क्षतिग्रस्त किया गया है, उस पर अमेरिका को सकारात्मक और सहयोगात्मक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।
हम सभी यह भली प्रकार जानते हैं कि पिछले वर्ष 25 सितंबर को कैलिफोर्निया के सेक्रामेंटो स्थित स्वामीनारायण मंदिर को भी खालिस्तानी आतंकवादियों के द्वारा अपने हमले का शिकार बनाया गया था। वहां पर भी भारत विरोधी नारे लिखे गए थे। ऐसा कदापि संभव नहीं है कि भारत विरोधी शक्तियों के इरादों और उद्देश्यों से अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा अनभिज्ञ हों या उन्हें किसी भी प्रकार की आतंकी घटना या हिंदू धर्म स्थलों पर होने वाले आक्रमणों के बारे में कोई सूचना ही न हो । राजनीति में मासूमियत के लिए कभी कोई स्थान नहीं होता। इसके उपरांत भी यदि उसे धारण करने का नाटक किया जाता है तो उस ‘ बगुला भक्ति’ को कम से कम आज के विश्व में तो प्रत्येक व्यक्ति भली प्रकार जान चुका है। क्योंकि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से बड़ी शक्तियों का काम केवल एक दूसरे के यहां देश विरोधी तत्वों को भड़काने का रह गया है। द्वितीय विश्व युद्ध में भारत की कोई महत्वपूर्ण भूमिका नहीं थी, परंतु इसके उपरांत भी भारत से ईर्ष्या रखने वाले देशों की पर्याप्त संख्या है।
भारत को अपनी सांस्कृतिक विरासत के प्रतीक मंदिरों की सुरक्षा के प्रति मौन की कूटनीति से बाहर निकलना होगा। भारत विरोधी मानसिकता या घटनाओं को हमले के रूप में अभिव्यक्ति देना भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं हो सकती। यदि वास्तव में आज हम एक सभ्य संसार में जी रहे हैं तो हमें विरोध प्रदर्शन के लिए भी सभ्य आचरण करना ही होगा। कनाडा से हमारे संबंध इस समय के सबसे बुरे दौर से गुजर रहे हैं। उसे भारत के साथ अपने संबंधों को सामान्य करने के लिए कुछ विशेष करना ही होगा। कनाडा को यह भी समझना होगा कि भारत अब अपनी एकता को बनाए रखने के प्रति बहुत अधिक सावधान है। यहां पर आर्य समाज और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे अन्य अनेक संगठन लोगों को जागृत किए रखने के लिए आज भी जी तोड़ परिश्रम कर रहे हैं। अमेरिका और कनाडा को यह समझना चाहिए कि जब कोई व्यक्ति स्वयं शीशमहल में रह रहा हो तो उसे दूसरे के शीश महल पर पत्थर नहीं फेंकने चाहिए।

-डॉ राकेश कुमार आर्य
(लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं।)

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